हिंदी पर हंगामा, maharashtra tamilnadu
आलोक कुमार मिश्रा की कलम से....

हिंदी पर हंगामा-2

           हिंदी भाषा को लेकर हम हिंदीभाषियों का रवैया भी कुछ अजीब-सा है। हम ये तो चाहते हैं कि देश के हर हिस्से के लोग हिंदी पढ़ें, बोलें और समझें, लेकिन ख़ुद हमारे बीच ही इसकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। उत्तर भारत के मध्यवर्गीय परिवारों में ही नहीं साधारण और गरीब लोगों में भी अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाने की चाह और होड़ ज़ोरों पर है। सरकारी स्कूलों को लेकर बनी आम धारणा में इनके कमतर माने जाने के पीछे एक कारण ये भी रहा है कि यहां हिंदी माध्यम में पढ़ाई होती रही है। जबकि पढ़े-लिखे होने की पहचान और आगे बढ़ने की ओर ले जाने वाला रास्ता अंग्रेज़ी को मान लिया गया है। अब तो सरकारी स्कूलों में भी अंग्रेजी माध्यम सेक्शन का विकल्प दिया जाने लगा है। कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे निजी स्कूलों की तो मुख्य रेसिपी और आकर्षण ही उनका अंग्रेजी माध्यम होना है।

वैसे तो देश के हर हिस्से और हर राज्य में अंग्रेज़ी के प्रति रुझान है, पर हिंदी भाषी क्षेत्रों में ये सबसे अधिक दिखता है। इसके पीछे अंग्रेज़ी की वैश्विक स्तर पर बढ़ती मान्यता, प्रभाव और बाज़ार में उसकी उपयोगिता की भूमिका तो है ही। इन मामलों में हिंदी कहीं न कहीं पिछड़ गई है। वह बातचीत, साहित्य, मनोरंजन, रिपोर्टिंग और मीडिया की भाषा तो बन सकी, पर ज्ञान, विज्ञान, शोध, मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र में आगे नहीं आ सकी। दूसरी तरफ़ जहाँ दक्षिण के राज्यों में अपनी भाषाई पहचान और अस्मिता को लेकर लोगों में लगाव और आग्रह साफ़ दिखाई देता है, वहीं हिंदी भाषियों में इसका नितांत अभाव परिलक्षित होता है। आख़िर हिंदी के प्रचार-प्रसार और उत्थान को लेकर, शिक्षा और नौकरियों में इसको मजबूती से अपनाने को लेकर या इसकी अवहेलना के खिलाफ़ कब कोई जन आंदोलन शुरू हुआ? सोए हुए लोगों की भाषा भी तो सोएगी ही!

एक बात और हिंदी का विकास या प्रसार गैर-हिंदियों पर इसे थोप कर नहीं, बल्कि ख़ुद हिंदी भाषियों के बीच सच्चे मन से इसे स्वीकार करके, शिक्षा का माध्यम बनाकर, इसे बाज़ार से जोड़कर और इसमें नौकरियों की संभावना पैदा करके किया जा सकता है। हिंदी की दुर्दशा का साक्षी मैं स्वयं अपनी दिल्ली विश्वविद्यालय में सम्पन्न हुई उच्च शिक्षा की प्रक्रिया के दौरान रहा। उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी और दक्षिणी परिसर (कैंपस) का पूरा माहौल अंग्रेज़ीदाँ था। इस माहौल में सरकारी स्कूलों से पढ़कर निकले मेरे जैसे कुछ विद्यार्थी जो वहाँ पहुँच पाए, उन सबको हाशिए पर पहुँच जाने के गहरा एहसास होता। न हमारे शिक्षक हिंदी में बोलते या समझाते और न हमारी समस्याओं पर कोई ध्यान देते। अच्छी किताबें भी अंग्रेज़ी में होतीं, लाइब्रेरी में अधिकतर उम्दा कलेक्शन भी अंग्रेजी में। हम बोलते तो लगता की उपहास और अवमानना की नज़र से हमें देखा जा रहा हो। उत्तर भारत के इस शिक्षाई टापू पर हर तरीके से अंग्रेज़ी का उपनिवेशवाद जीवंत स्थिति में दिखता। हाल ही में आई प्रभात रंजन की किताब ‘हिंदी मीडियम टाइट’ हिंदी मीडियम विद्यार्थियों की अवमानना पर टिके इसी विश्वविद्यालयी माहौल को दर्ज़ करती है। अब जब हिंदी क्षेत्र की संपूर्ण शिक्षाई परिवेश में हिंदी ख़ुद ऐसे हाशिए पर हो, तब यहाँ के लोगों का इसे लेकर राष्ट्रभाषा वाला रवैया कहाँ तक उचित है?

अब फिर से लौटते हैं नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति सहित पुराने शिक्षाई दस्तावेजों में प्रस्तावित ‘त्रिभाषा-सूत्र’ पर। देश की भाषाई विविधता और राष्ट्रीय एकता को अभिव्यक्त करने वाली यह उम्दा नीति है। पर ध्यान रहे, इन नीतियों में भी प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या परिवेश की भाषा को बनाने की बात ही की गई है। छोटी कक्षाओं में परिवेश के बाहर की भाषा को थोपना कहीं से भी उचित नहीं है। मातृभाषा में ही अधिकतम सहज अधिगम संभव है, इसे कई शोधों ने सिद्ध किया है। त्रिभाषा-सूत्र में भी दूसरी भाषा के रूप में किसी भारतीय भाषा (गौरतलब है कि इसमें हिंदी की अनिवार्यता नहीं है) और तीसरी भाषा के रूप में विदेशी भाषा या अंग्रेज़ी की बात की गई है। सहज मान्यता है कि देश की एक बड़ी संपर्क भाषा के रूप में अधिकतर गैर-हिंदी प्रदेशों के लोग हिंदी को ही दूसरी भाषा के रूप में अपनाएंगे। पर महाराष्ट्र जैसे राज्य में प्राथमिक स्तर पर ही दूसरी भारतीय भाषा के रूप में हिंदी के प्रावधान वो भी इसे अनिवार्य बना देने जैसे अतिवादी कदम ने विवाद पैदा कर दिया। जब नीति में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा को ही तवज्जो दी गई है तो फिर ऐसी जल्दबाजी क्यों? हिंदी को अनिवार्य बनाने की जिद क्यों? फिर हिंदी भाषी प्रदेशों में देश की दूसरी भाषाओं में से किसी को भी सीखने-समझने को लेकर इतनी उदासीनता क्यों? इन प्रश्नों के जवाब ही हमें सही रास्ता दिखा सकते हैं।

alok mishra

आलोक कुमार मिश्रा

पेशे से शिक्षक। कविता, कहानी और समसामयिक मुद्दों पर लेखन। शिक्षा और उसकी दुनिया में विशेष रुचि। अब तक चार पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। जिनमें एक बाल कविता संग्रह, एक शैक्षिक मुद्दों से जुड़ी कविताओं का संग्रह, एक शैक्षिक लेखों का संग्रह और एक कहानी संग्रह शामिल है। लेखन के माध्यम से दुनिया में सकारात्मक बदलाव का सपना देखने वाला मनुष्य। शिक्षण जिसका पैशन है और लिखना जिसकी अनंतिम चाह।

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