
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
"दौड़": आर्थिक उदारीकरण और युवा पीढ़ी
ममता कालिया हमारे समय की वरिष्ठ लेखिका हैं, जिन्होंने हिन्दी कथा-साहित्य को अपनी कृतियों से समृद्ध किया है। 2014 में उनका लघु-उपन्यास “दौड़” प्रकाशित हुआ था। इसे एक लंबी कहानी की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। नब्बे पृष्ठों में समाया यह उपन्यास अपने लघु कलेवर के विपरीत आज के समय के बड़े प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।
पिछली सदी के अंतिम दशक से देश की राजनीति में आर्थिक उदारीकरण की शुरूआत हुई, जो आज चरम पर पहुँच चुकी है। इसके साथ ही देश में बाहर की बड़ी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रवेश हुआ और दिनो-दिन उनका वर्चस्व बढ़ता गया। कम्प्यूटर-क्रांति ने एक पढ़ा-लिखा, नया युवा वर्ग तैयार किया। सफलता के लिए अब बिज़नेस मैनेजमेंट और एडमिनिस्ट्रेशन जैसे पाठ्यक्रम मानो अनिवार्य होने लगे। सरकारी नौकरियों की जगह अब निजी व्यापारिक संस्थान शरणस्थली थे। सरकारी संस्थान धीरे-धीरे पूंजीपतियों के हवाले हुए तो नयी कार्य संस्कृति में पारिवारिक संरचना भी बदलने लगी और जीवन-मूल्य भी बदले। दरअसल टेक्नोलॉजी क्राति हमेशा सामाजिक परिवर्तन की दिशा तय करती है और मानव-मूल्यों में बदलाव इसका अनिवार्य अंग है। नयी टेक्नोलोजी के साथ नये आर्थिक सुधारों के प्रभाव ने पूरा सामाजिक परिदश्य ही बदल दिया। औसत पढ़े-लिखे भारतीय युवा के भविष्य के सपने में एक सरकरी नौकरी की आकांक्षा रहती थी, जो आर्थिक संबल के साथ-साथ बुढ़ापे में सुरक्षा का आश्वासन भी होती थी। आज मध्यवर्गीय युवा का सपना ऊँची तनख़्वाह और आधुनिक सुख-सुविधा में है। वह सिर्फ़ आज में जीता है। निजी कंपनियों और बड़े व्यवसायिक संस्थानों में छटनी की तलवार हमेशा सिर पर लटकी रहती है। इस निरंतर असुरक्षा की भावना और साथ ही शानदार जीवन की आकांक्षा ने पूरे समाज का रंग-रूप बदल दिया है। इसके साथ ही बनता हुआ एक संवेदनहीन समाज जिसमें व्यक्ति आत्म केंद्रित हो रहा है। महत्वाकांक्षी, सफलता की दौड़ में लगे बच्चे और पीछे बूढ़े माँ-बाप अकेलेपन के लिए अभिशप्त हैं।
यह पूरा परिदृश्य इतना सामान्य हो गया है अब कुछ भी असामान्य नहीं लगता। इन सभी बदल रहे दृश्यों को ममता जी ने अपने इस लघु उपन्यास “दौड़” में समेटा है। इसमें वर्णित घटनाएँ अपने हर फ्रेम में पाठकों के चारों ओर बिखरी हैं लेकिन उपन्यास का कौशल पाठकों को महसूस कराता है कि वे भी इस ऐतिहासिक कालखंड के हिस्सेदार हैं या कि इन परिस्थितियों से गुज़रना उनकी भी नियति बन रही है। ये बदलाव कहीं अगर पुरानी मान्यताओं और स्थितियों से टकराते हैं तो कहीं उनमें बहुत कुछ सकारात्मक भी दिखायी देता है।
उपन्यास के केंद्र में इलाहाबाद शहर से अहमदाबाद आया नौजवान पवन पाँडे है जो एल.पी.जी. बनाने वाली एक निजी कंपनी में काम करता है। एम.बी.ए. करने के दौरान ही उसका इस गैस कंपनी में चयन हो गया था। उसके साथ काम करने वाले अन्य लड़के- लड़कियां, सभी एम.बी.ए. करके आये हैं। मार्केट में गलाकाट प्रतिद्वंद्विता है। सवेरे से शाम तक ऑफ़िस, पूरा समय कम्प्यूटर पर गड़ी नज़रें, पंगा होने पर मैनेजमेंट द्वारा दिया जाने वाला नोटिस और फिर किसी दूसरे व्यापारिक संस्थान के अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाने की कोशिशें। छोटे शहरों, क़स्बों से आने वाले ये युवा नौकरी के लिए महानगरों में जाते हैं- “सबेरे नौ से रात नौ बजे तक अथक परिश्रम करते हैं। एक दफ़्तर के दो-तीन लड़के मिलकर तीन-चार हज़ार तक के किराये का फ्लैट ले लेते हैं। सभी बराबर का शेयर करते हैं, न भोजन की चिंता है न आराम की। एक आंख कम्प्यूटर पर गड़ाये ये भोजन की रस्म अदा कर लेते हैं और फिर लग जाते हैं कंपनी के व्यापार-लक्ष्य सिद्ध करने में।” इस तनाव भरे माहैल में अगर कोई युवा किन्हीं बाबाओं के मेडिटेशन कैंप में हाज़िरी लगाने लगे तो क्या आश्चर्य!

लेखिका एक दंपति राजुल और अभिषेक के परिवार का भी वर्णन करती हैं जिसमें अभिषेक एक विज्ञापन-कंपनी से जुड़ा है। प्रॉडक्ट को बेचना और उसकी सच्चाई से गुँह मोड़ना ‘प्रोफ़ेशनल इथिक्स’ है। उसकी पत्नी राजुल जब प्रॉडक्ट की वास्तविकता पर सवाल करती है तो वह कहता है- मैंने आई.आई.एम. में दो साल भाड़ नहीं झौंका। आई कैन सेल ए डैड रैट” पवन कहता है “मैनेजमेंट और मार्केटिंग की किताबों में नैतिकता पर कोई चैप्टर नहीं”।
इलाहाबाद में पवन की माँ रेखा स्कूल टीचर है, कहानियाँ लिखती हैं। पिता राकेश एक छोटे साप्ताहिक पत्र के संपादक-प्रकाशक हैं। पवन अपनी पार्टनर स्टैला के साथ रहता है और अब उससे शादी करने वाला है। वह स्टैला को ‘कंप्यूटर विज़ार्ड’ कहता है, जो एक कम्प्यूटर कंपनी चलाती है। वे देनों उनकी शादी में शामिल नहीं होते। बाद में वे लोग इलाहाबाद आते हैं। स्टैला ने रेखा की कहानियाँ फ्लॉपी पर उतारकर उन्हें सुरक्षित कर दिया। वो राकेश को भी कम्प्यूटर चलाना सिखा देती है कि उन्हें अब काम आसान लगने लगता है। यहाँ परंपरागत परिवार के तौर-तरीक़े और नये ज़माने की सोच और कार्यप्रणाली में गहरा अंतर है जिसे रेखा स्वीकार करने को मजबूर है। स्टैला पवन के छोटे भाई सघन को भी कम्प्यूटर के साथ सभी उपकरण मुहैया कराती है। कृतज्ञ सघन अब आगे ट्रेनिंग के कि लिए दिल्ली चला जाता है।
रेखा और राकेश की कॉलोनी में अब अधिकतर अकेले रहने वाले सीनियर सिटीज़न्स हैं। सोनी साहब हार्ट अटैक से चल बसे तो वहीं के लोगों ने दाह संस्कार किया, क्योंकि बेटा अमरीका से नहीं आ सका। पवन और स्टैला के माँ-बाप के आपसी मिलन के लिए घर पर्याप्त नहीं। स्टैला एक रिसॉर्ट में तीन-चार दिन की बुकिंग कराती है। अपने समय को पूरी संपूर्णता और संवेदना के सथ उपन्यास प्रस्तुत करता है। निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास है।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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उपन्यास का कौशल पाठकों को महसूस कराता है कि वे भी इस ऐतिहासिक कालखंड के हिस्सेदार हैं या कि इन परिस्थितियों से गुजरना उनकी भी नियति बन रही है।”—-
इन शब्दों से
उपन्यास का विवरण जिज्ञासा को उत्प्रेरित करता है कि आज के इस संवेदनहीन समाज की नियति क्या है ।
दौड़ उपन्यास की समीक्षा, उपन्यास को पढ़ने के ऊ प्रेरित करती है। इससे बेहतर इस उपन्यास की समीक्षा नहीं हो सकती।