एक नज़्म, एक शेर, एक प्ले, एक तस्वीर, और फ़ज़ल ताबिश
पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....

एक नज़्म, एक शेर, एक प्ले, एक तस्वीर, और फ़ज़ल ताबिश

           एक नज़्म, एक शेर, एक प्ले और एक तस्वीर के साथ फ़ज़ल ताबिश साहब मेरी यादों में ऐसे मेहमान हुए कि फिर कभी लौटे ही नहीं… इसे मैं इस तरह भी कह सकता हूँ- मैंने उनके शहर भोपाल को अपना वतन किया और यहां से पलटकर अपने गांव नहीं गया।

वह अपने गांव से कल ही तो शहर आया है
वह बात-बात पे हंसता है मैं लरज़ता हूँ

अजीब इत्तिफ़ाक़ है 10 नवंबर 1995 को फ़ज़ल ताबिश साहब ने इस दुनिया से विदा ली और इसी साल मैंने भोपाल के एक स्कूल में (नवीं क्लास में) दाख़िला लिया। मैं उनसे नहीं मिला… लेकिन जिस हवा की जगह को उन्होंने घेरा था, उसी शहर की उसी हवा को अपने बदन से मैंने भी हटाया।

हवा मुझको भी इक दिन जीत लेगी
जहाँ माँ का बदन था अब हवा है

अब मुझे याद नहीं उनका एक शेर मैंने कब और किसके हवाले से सुना… लेकिन इस एक शेर ने उनसे मेरा एक राब्ता बना दिया जो कभी नहीं टूटा। शायद वो शेर भोपाल की फ़ज़ाओं में ही तैर रहा था जो मेरी समाअत में आ गया।

एक नज़्म, एक शेर, एक प्ले, एक तस्वीर, और फ़ज़ल ताबिश

रेशा-रेशा उधेड़कर देखो
रौशनी किस जगह से काली है

इस एक शेर ने मुझे इतना सचेत, इतना साइंटिफ़िक, इतना बेदार और इतना ताक़तवर बना दिया कि किसी भी बात को मैं एक नज़र से कभी नहीं देखता। सोचता भले ही ये उत्तम विचार है, भले ही ये बेहतरीन नज़रिया है लेकिन हर उजले पहलू को मुझे अब पलट-पलट कर देखना है। ‘रोशनी किस जगह से काली है’ जब उनकी किताब मुझे दुकान पर दिखी तो उसे झट से ख़रीद ली। किताब की पहली नज़्म थी-

शुरू करता हूँ मैं उसके नाम से
जो रहीम है न करीम है

इन दो सतरों ने मेरी मासूम समझ के ग़ुब्बारे में पिन चुभो दिया। मेरे अंदर तामीर किया गया वो तयशुदा ढांचा भरभरा के ढह गया। एकदम से सारे बंधन एक ही बार में कमज़ोर हो गये। क्या किसी किताब की शुरूआत इस तरह हो सकती है? इसमें तो हम्दो-सना, मुनाज़ात, प्रार्थना, वंदन, स्तुति की जगह इंसानी दर्द छलक रहा है।

जो क़रीम है न अज़ीम
नहीं बनाया है जिसने कुछ भी अभी तक
पैदा नहीं कर सकता जो तन्हा कुछ

नज़्म का उन्वान है ‘उसके नाम’…और इस नज़्म में सवाल है छुपा हुआ है… एक अमल वही रेशा-रेशा उधेड़कर देखो। फ़ज़ल ताबिश साहब इस किताब में हिज्र-ओ-विसाल की शायरी नहीं कर रहे हैं। उनकी तड़प किसी महबूब के लिए नहीं है… उनकी शायरी में सवाल है, सवाल जो अपने पहले ही क़दम से ऐलान कर देता है कि वो आख़िरी नहीं है लेकिन जवाब को ये शरफ़ नहीं मिला है। इंसान सवाल के साथ वजूद में आया है, ख़ुदा इस मिज़ाज से महरूम है।

ऐ ख़ुदा एक तरफ़ तेरा राज़
और हर सिम्त हमारा रस्ता

मांगिए हर एक से उसके गुनाहों का हिसाब
और सारे शहर में सबके ख़ुदा हो जाइए

ख़ुदा भी जानता हो कौन जाने
हमें कुछ ख़ुद भी करना चाहिए था

वो कुछ कहना चाहते हैं। शायरी उनका वसीला है। उनका शेवा फ़क़त लफ़्फ़ाज़ी नहीं है। वो दिलों को जोड़ना चाहते हैं। वो पुल बनना चाहते हैं- दो मज़हबों के बीच, दो ज़बानों के बीच और दो इंसानों के बीच भी लेकिन उनकी शायरी में बेचारगी है, खीझ है। वो अपने मज़हबी उसूलों, क़ायदों और आईन के साथ रहकर इंसानियत के रास्ते से हर हाल में डिगना नहीं चाहते।

हम भी लफ़्ज़ों के मर्द हैं ताबिश
हमसे दुनिया न बदली जाएगी

भागते लम्हों को अंदाज़ा न था
लम्हा-लम्हा मौत पास आती गयी

सब साथी कहते हैं ताबिश कुछ करके दिखलाओ
ख़ाली बातें करते-करते बूढ़े मत हो जाना

वो अच्छे थे जो पहले मर गये
हमें कुछ और पछताना पड़ेगा

यहाँ सूरज काला पड़ गया है
कहीं से दिन भी मंगवाना पड़ेगा

मछली की तरह उसको तड़पते हुए देखा
मैं कोई न था उसका तो ख़ामोश खड़ा था

गलियों-गलियों ख़ाक उड़ा ली हर दरवाज़ा झांक आये
उस पर भी यह ख़्वाबों जैसा धुंधलापन हाथ आया है

मुहब्बत सारा आलम अपनी बांहों में समेटे है
तुम्हारी दुश्मनी दो एक घर ही तो जला पायी

मैंने फ़ज़ल ताबिश साहब को एक तस्वीर में देखा है- बड़े घुंघराले बाल, कंजी और बड़ी बड़ी आँखें, लाल-गुलाल चेहरा और होंठों पर मुस्कुराहट जिसमें सैकड़ों सवाल पिन्हां हैं। उनका ये चेहरा ज़ेह्न में है मुमकिन है उनकी इस तस्वीर में मेरे तसव्वुर की मिलावट अधिक हो लेकिन मैं दावे से कह सकता हूँ- वो खरे इंसान होंगे, ख़ुद्दार और बेपरवा भी। भारत भवन में उनका एक प्ले देखा था- उर्दू हिंदी फ़ारसी संस्कृत के किरदार थे उसमें… वो तबसे मेरे लिए और भी पसंदीदा हो गये थे। वो कहते हैं- ‘संस्कृत ने भगवान के नाम पर राज किया तो फ़ारसी ने ताक़त के दम पर’, वो ज़रूर किसी भी अनचाहे ख़ुदा और बेलगाम ताक़त से गुरेज़ करते होंगे।

सलीम सरमद

सलीम सरमद

1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।

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