
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
भवेश दिलशाद की कलम से....
शोले के 50 साल के बरअक्स 1975 का सिनेमाई जादू
भारत की आज़ादी को चौथाई सदी पूरी हो चुकी थी। आज़ाद भारत के ख़्वाबों को जिस दौर में चांद-सितारे छूने थे, एक बेचैनी, नाराज़गी और असंतोष का दलदल फैल रहा था। बहुत बड़ी आबादी मूलभूत ज़रूरतों से दो-चार हो रही थी और नेताओं पर ‘एक का सौ, एक का हज़ार’ करने के इल्ज़ाम लग रहे थे। अपराध, तस्करी, कालाबाज़ारी और अन्याय आम अवाम के लिए सिरदर्द नहीं, महामारी बन रहे थे। 1970 के दशक के शुरू में इंदिरा गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया तो ज़रूर, पर हक़ीक़त थी कि ग़रीबी, बेकारी, भूख और अशिक्षा जैसे मकड़ी के कई जाले थे, जिनमें आम जन-गण-मन कीड़ों की तरह फंसा हुआ था। छटपटाता हुआ। ऐसी छटपटाहट के सामने नैतिकता कहां टिक पाती है! और क्या मानीख़ेज़ रह भी जाती है?
पचास बरस पहले की बात करते हुए एकबारगी तो चौंक जाता हूं, क्या हम वहीं के वहीं हैं! या पचास बरस पुराना वक़्त ख़ुद को दोहरा रहा है! तब देश दोराहे पर खड़ा था, चरित्र की शुचिता को चुना जाये या फिर दो कौड़ी की ज़िंदगी से निजात के लिए, महत्वाकांक्षाओं के लिए रास्ते बनाये जाएं। यानी नैतिक आदर्श बनाम व्यावहारिक गुनाह। इस कशमकश से कोई कला-जगत कैसे अछूता रहता। सिनेमा भी नहीं रहा। 1974 में मनोज कुमार की फ़िल्म ‘रोटी कपड़ा और मकान’ ने सिस्टम पर सवालिया निशान लगाया, फिर भी इसका नायक नैतिकता का साथ नहीं छोड़ सका। तमाम द्वंद्वों के बावजूद ‘भारत’ एक आदर्श के हक़ में दिखा। यह उस साल की सबसे बड़ी हिट थी। सिर्फ़ तीन महीने बाद ‘दीवार’ आयी, जिसने इस पक्षधरता के सिक्के का दूसरा पहलू उघाड़ दिया। दो भाइयों के किरदारों के ज़रिये नैतिकता का द्वंद्व दर्शकों को छू गया। “उफ़्फ़! ये तुम्हारे उसूल.. तुम्हारे आदर्श.. तुम्हारे आदर्शों को गूंधकर दो वक़्त की रोटी नहीं बनायी जा सकती रवि!”.. और फिर “मेरे पास मां है…” तक ये संवाद किसे याद नहीं। भारत के गणतंत्र दिवस की 25वीं सालगिरह से ठीक दो दिन पहले (24 जनवरी 1975) यह फ़िल्म रिलीज़ हुई और आक्रोशित समाज, ख़ासकर युवा वर्ग की दुखती रग छेड़ गयी। 1975 की सबसे कामयाब फ़िल्मों में इसे होना ही था। 1975 में ही सिनेमा के इतिहास की सबसे लोकप्रिय या कहें कमाऊ फ़िल्म ‘शोले’ 15 अगस्त को रिलीज़ हुई। ‘शोले’ को 50 साल पूरे होने के समय में इसी बहाने 1975 की सिनेमाई आब-ओ-हवा को समझे जाने की ज़रूरत है।
> “रील हो या रियल, भारतीय युवाओं का आक्रोश उबल रहा था, जिसे देश भर का सिनेमा पर्दे पर उतार रहा था… आधी सदी बीत जाने के बाद भी 1975 को सिर्फ़ राष्ट्रीय सियासी आपातकाल के लिए ही नहीं बल्कि मिसाल बन गये हिंदी की मुख्यधारा के उस सिनेमा के लिए भी याद किया जाएगा, जो तब एक ऐतिहासिक मोड़ ले रहा था।”
> — अमृत गांगर, टीओआई रिपोर्ट से
सिनेमा और सिनेप्रेमियों के लिए 1975 एक ख़ास साल रहा है। इस बरस के सिनेमा ने समाज की साइकी में पैठ बनायी। इसे हिंदी सिनेमा का सुनहरा साल कहा जा सकता है, मील का पत्थर या फिर रचनात्मक उत्कर्ष का अद्भुत वर्ष भी। इस साल की प्रमुख और महत्वपूर्ण फ़िल्मों की बातचीत उस समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों के बग़ैर सार्थक नहीं है। सिनेमा ने ऐसे तमाम संदर्भों को न सिर्फ़ टटोला बल्कि एक आज़ाद अभिव्यक्ति के रास्ते भी तैयार किये। और यही वह वक़्त था, जब अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बड़े प्रतिबंध लगे। आपातकाल के रूप में यहीं से वो दौर शुरू हुआ जब देश लोकतंत्र, विरोध-विद्रोह, अधिकारों, कर्तव्यों के बारे में विचार-विमर्श करता दिखा।
कला जगत का प्रतिरोध
सत्ता की नाकामियों के ख़िलाफ़ लोकनेता जयप्रकाश नारायण 1974 में बिहार से आंदोलन शुरू कर चुके थे। धीरे-धीरे यह राष्ट्रव्यापी हो चला और ‘संपूर्ण क्रांति’ के नारे हर दिशा तक पहुंचे। इसी आंदोलन से उपजी सत्ता की घबराहट ‘आपातकाल’ के ऐलान के पीछे बड़ी वजह रही थी। इस परिदृश्य में साहित्य जगत का प्रतिरोध उल्लेखनीय रहा। हिंदी पट्टी से मजरूह सुल्तानपुरी, अज्ञेय, नागार्जुन, धर्मवीर भारती, दुष्यंत कुमार, रघुवीर सहाय, श्याम मनोहर जोशी जैसे अनेक साहित्यकार अपने-अपने ढंग से प्रतिरोध दर्ज कर रहे थे। देश की लगभग सभी भाषाओं के हस्ताक्षरों ने मुख़ालफ़त की।
रंगमंच पंचम सुर में गा रहा था। यह 1970 का दशक ही था, जब नुक्कड़ नाटक की धार तीखी हो रही थी, यह आपातकाल के दौरान और पैना औज़ार हो गया। इसके इतर समकालीन समस्याओं को उठाने वाली कहानियों का मंचन नया अध्याय लिख रहा था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रयोग हो रहे थे। उधर, जेपी के ‘संपूर्ण क्रांति’ उद्घोष दक्षिण तक पहुंच चुके थे। पी. लंकेश का एक कन्नड़ नाटक था ‘क्रांति आओ क्रांति’, जिसने लोकतांत्रिक प्रतिरोध, युवाओं के क्रांतिकारी जज़्बे, भूख, महंगाई, भ्रष्टाचार, अत्याचार जैसे सामाजिक मुद्दों को विषय बनाया। आपातकाल की घोषणा से ठीक पहले इसी नाटक पर पी.आर. रेड्डी निर्देशित कन्नड़ फ़िल्म ‘चंदा मारूत’ (यानी ‘चक्रवात’, 1975) रिलीज़ हुई। आपातकाल लगते ही इसके प्रदर्शन को प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रतिबंध आख़िरी हथियार था, सत्ता के पास इससे पहले और भी हथकंडे थे। सोनी जलराजन राज के 2024 में प्रकाशित एक शोधपत्र का यह अंश क़ाबिले-ग़ौर है:
“सत्ता के इशारे पर ‘गुणवत्तापूर्ण फ़िल्में’ बनाने के लिए फ़िल्म उद्योग का जैसे ‘राष्ट्रीयकरण’ कर देने की नयी राज्य नीति के तहत फ़िल्म निर्माताओं को अलग-थलग कर दिया गया, जिससे एकजुट राजनीतिक विपक्ष की संभावना कमज़ोर हो गयी (राजाध्यक्ष)। मीडिया को नियंत्रित करने के लिए सेंसरशिप क़ानून लागू किये गये। फ़िल्म निर्माताओं को परेशान किया गया और राज्य की मंशा के तहत उन्हें फ़िल्में बनाने की सलाह दी गयी (खन्ना) – जैसा कि पूर्व भारतीय प्रसारण मंत्री, लालकृष्ण आडवाणी का कथन चर्चित रहा: ‘आपको झुकने के लिए कहा गया था और आप तो रेंगने लगे’ (नैयर) – नतीजा? कई फ़िल्म निर्माताओं ने चुप्पी चुनी ताकि निरंकुश सत्ता के कोपभाजन न बनें।”
मैंने 2007 में जब श्याम बेनेगल साहब का साक्षात्कार किया था, तब उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में माना कि स्वतंत्र भारत का सबसे महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट 1975 से 1977 के बीच आपातकाल था। प्रतिप्रश्न था, फिर क्या हुआ कि इस घटना पर कोई सार्थक कलात्मक फ़िल्म नहीं बन सकी? बेनेगल साहब का बचाव यही था कि संदर्भ तो आते रहे लेकिन पूरी फ़िल्म के लिए कोई कहानी/स्क्रिप्ट नहीं मिल सकी… अब सोनी के शोध का उपर्युक्त अंश भी तस्दीक़ करता है फ़िल्मकार सत्ता से सीधे टकराने के जोखम के पक्ष में नहीं रहे।
आपातकाल के दौरान कुछ फ़िल्मों को पाबंदियां झेलना पड़ीं। ‘क़िस्सा कुर्सी का’, ‘नसबंदी’, ‘आंदोलन’, ‘क्रांति की तरंगें’, ‘आंधी’ आदि के नाम प्रमुख रूप से आते हैं। गुलज़ार निर्देशित और कमलेश्वर लिखित ‘आंधी’ 1975 में ही आयी। प्रतिबंध के कारण चर्चा में आ गयी और इसे बारीक़ी से विश्लेषित किया गया। 1977 में इमरजेंसी हटने के बाद इसे दोबारा रिलीज़ किया गया। तब इसने क्रिटिक चॉइस बेस्ट फ़िल्म का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीत लिया।
सत्ता, व्यवस्था पर प्रहार
मूलत: एक महिला राजनेता की प्रेम कहानी पर आधारित ‘आंधी’ चुनाव प्रणाली का मख़ौल भी उड़ाती दिखी और व्यवस्थागत ख़ामियों एवं चरित्रों का भी। 1971 में गुलज़ार ‘मेरे अपने’ बना चुके थे, वह भी सत्ता विरोधी टिप्पणी की तरह ही थी, सियासी विफलताओं और बेरोज़गार-दिशाहीन युवाओं के रोष व हिंसा को दिखाने के रास्ते से। इस कोण से अगर हम ‘शोले’ पर नज़र डालें तो मुमकिन है कोई आलोचक कहना चाहे कि गब्बर सिंह का किरदार आपराधिक आतंक, क्रूरता और अन्याय का प्रतीक है, जिसके सामने समाज और व्यवस्था पूरी तरह लाचार है। समाज और निज़ाम की लाचारी ही ‘दीवार’ की पृष्ठभूमि भी बनी रहती है।
हालांकि 1975 की सर्वश्रेष्ठ हिंदी फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार श्याम बेनेगल निर्देशित ‘निशांत’ के नाम रहा। विजय तेंदुलकर और सत्यदेव दुबे जैसे शीर्ष रंगकर्मी लेखकों ने इसे लिखा। यह फ़िल्म सत्ता के नशे, सामंतवादी प्रवृत्ति द्वारा किये जाने वाले शोषण, आम जनता की निरीहता जैसे मुद्दों को लक्ष्य करती है। चूंकि सामाजिक दमन की एक कहानी बुनी गयी, जिसने तत्कालीन राजनीति/राजनेताओं को सीधे-सीधे निशाने पर नहीं लिया, इसलिए भी शायद यह पाबंदी से बची रह सकी। बहरहाल, ‘निशांत’ ने ग्रामीण भारत में हाकिम वर्ग की कड़वी सच्चाइयों को उघाड़ दिया।
राष्ट्रीय पुरस्कारों में उस बरस इस सिनेमाई दृष्टि का वर्चस्व रहा। सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ब.व. कारंत की कन्नड़ फ़िल्म ‘चोमाना डुड्डी’ को चुना गया था। कला फ़िल्मों के उत्कर्ष के समय में इस फ़िल्म ने कई तरह से अपना स्वर रखा। इस फ़िल्म में भी ग्रामीण भारत के आम जनमानस के संघर्ष की त्रासदी कथा कही गयी। जातिवाद और सामंतवादी अत्याचार इसके अंतर्विषय रहे। इसके क्लाइमेक्स दृश्य में प्रतीकात्मकता यादगार बन गयी। फ़िल्म का केंद्रीय पात्र चोमा यानी एक ग़रीब, अछूत और बेबस किसान भाग्य और पूरे सिस्टम से हार जाने के बाद लड़ भले ही नहीं पाता लेकिन उसका आक्रोश चरम पर है, वह ज़ोर-ज़ोर से ढोलक पीटता हुआ, फटी आंखों से घूरता हुआ दम तोड़ देता है।
जनमानस की त्रासदी अस्ल में, अपने आक्रोश को आकार नहीं दे पा रही थी। अपनी बेचैनी, ग़ुस्से और असंतोष को ज़ाहिर करने के लिए उसके पास न कोई ताक़त थी, न कोई सपोर्ट सिस्टम और न कोई तरक़ीब, व्यावसायिक सिनेमा ने भीतर धधक रहे इसी ज्वालामुखी के लिए हिंसा और अपराध को इतना जायज़ बना दिया कि यह ‘व्यावहारिक’ श्रेणी में आता गया। ‘शोले’, ‘दीवार’ और बाद के वर्षों में, 80 के दशक के आख़िर तक, ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि परोसने वाली फ़िल्में सिर्फ़ हिंदी ही नहीं बल्कि तमाम भारतीय भाषाओं के सिनेमा में कमाई की चाबी बनी रहीं।
> “शोले’ के बाद सिनेमा हिंसक होता चला गया। 1990 में ‘मैंने प्यार किया’ की अप्रत्याशित सफलता ने प्रेम कथाओं और संगीत आदि को प्रतिष्ठा दिलायी। तबसे मुंबई का हिंदी फ़िल्म उद्योग प्रेम और हिंसा के बीच में बँटा हुआ है।”
> — विनोद भारद्वाज, (‘सिनेमा: कल-आज-कल’ से)
व्यावसायिक सिनेमा ने युवाओं की कुंठाओं को एक युक्ति से तुष्ट करने की कोशिश की। देश की बेरोज़गार और भ्रमित आबादी को एक सपना दिया। इधर, वो तस्वीरें समानांतर या कला सिनेमा कहला रही थीं, जो खुरदुरे यथार्थ को बयान कर रही थीं। यथार्थ, जिसमें ज़ियादातर पात्र बेबस; संघर्ष की कहानी लेकिन ‘लार्जर दैन लाइफ़’ समाधान वाली नहीं; किसी स्तर पर नायकत्व होते हुए भी पात्र बड़े स्तर पर सामान्य ही।
एक जो मध्यमार्ग होता है, एक सिनेमा इसके बीच भी धड़कता रहा। ‘अमानुष’ फ़िल्म को कैसे भुलाया जा सकता है। एक अनोखी फ़िल्म, जिसमें आक्रोश के तत्व भी हैं, व्यवस्था से रोष भी है, प्रेमकथा भी है, ग्राम त्रासदियां/विसंगतियां भी और सुधारवादी नज़रिया भी। यह यथार्थ जितनी खुरदुरी भी है और स्वप्न जितनी तरल भी। व्यावसायिक धारा में ‘धर्मात्मा’ और कला धारा में ‘चरणदास चोर’ भी इस लिहाज़ से उल्लेखनीय फ़िल्में रहीं।
रंग-बिरंगा सिनेमा
विविधताओं वाले भारत के लिए कहा जाता है- एक देश में कई देश, एक साथ कई सदियां यहां ज़िंदा रहती हैं। उसी तरह सिनेमा की दुनिया भी ऐसी ही है कि एक साथ कई धाराएं बहती रहती हैं। 1975 का साल इसलिए भी उल्लेखनीय है कि कई धाराओं ने उत्कर्ष के मापदंड रच दिये। व्यावसायिक मनोरंजन वाले सिनेमा की अलमबरदार बनी ‘शोले’, जिसकी सफलता एक बड़ा अजूबा ही रही। पहले हफ़्ते में फ़्लॉप रहने के बाद दूसरे हफ़्ते से इस फ़िल्म ने जो कमाल किया, यह देश की एक सामाजिक स्मृति बनती चली गयी। आलोचकों के साथ ही इसे बनाने वाले भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे कि फ़िल्म बहुत कामयाब होगी। आलोचकों ने तो इसे कॉमिक बुक फ़िल्म तक कहा। कई पत्रिकाओं ने फ़िल्म समीक्षा स्तंभों में इसे ख़ारिज कर दिया था। हॉलीवुड की कई फ़िल्मों से दृश्य हू-ब-हू ले लिये जाने, संगीत और संवाद में पहले की फ़िल्मों की प्रतिध्वनियां होने जैसी न जाने कितनी ही बातें होती रहीं… अगर वी. शांताराम की ‘दो आंखें बारह हाथ’ के प्रभाव की बात न भी करें तब भी 1974 में फ़िरोज़ ख़ान की फ़िल्म ‘खोटे सिक्के’ को छोड़ा नहीं जा सकता। ‘शोले’ और ‘खोटे सिक्के’ का प्लॉट अचंभे की हद तक एक जैसा है। एक फ़िल्म आयी-गयी हो गयी और दूसरी इतिहास। एक बरस के भीतर ही यह प्लॉट सिनेमाई मनोरंजन इतिहास की सबसे कामयाब फ़िल्म का फ़ॉर्मूला बन जाएगा, किसी को आभास नहीं था। ख़ुद जावेद अख़्तर इस पर चुटकी लेते रहे:
> “भारतीय फ़िल्मों के लेखकों में यह ख़ूबी बहुत ज़रूरी है कि वो एकदम ऐसी ओरिजनल स्क्रिप्ट लिख सकें, जो पहले भी लिखी जा चुकी हो।”
> — जावेद अख़्तर (कबीर 2006: 34)
मनोरंजन आधारित सिनेमा की दूसरी सबसे कामयाब फ़िल्म भी 1975 में ही रिलीज़ हुई, ‘जय संतोषी मां’। संख्या की बजाय मुनाफ़े के प्रतिशत के लिहाज़ से इससे बड़ी कमाई शायद ही किसी फ़िल्म ने की हो। इस फ़िल्म की लागत कुछ लाख रुपयों में थी और मुनाफ़ा कई करोड़ों में। गांव-गांव तक यह फ़िल्म पहुंची और देश की एक धार्मिक घटना बनती चली गयी। जिस तरह ‘शोले’ वाला जादू दोबारा उतना कामयाब नहीं हुआ, उसी तरह धार्मिक फ़िल्में और भी बनीं लेकिन यह आस ही रही कि ‘जय संतोषी मां’ जैसी कामयाबी का स्वाद चख सकें।
देश और सिनेमा की विविधता के उदाहरण देने में 1975 जैसा साल भी दोबारा नहीं आया। ‘संन्यासी’, ‘प्रतिज्ञा’, ‘वॉरंट’, ‘चोरी मेरा काम’ जैसी फ़िल्में (ड्रामाई और स्थापित कलाकारों की) दर्शक जुटा रही थीं, तो ‘गीत गाता चल’, ‘जूली’ जैसी फ़िल्में भी। एक तरफ़ ‘छोटी-सी बात’, ‘चुपके-चुपके’ जैसी नैचुरल कॉमेडी परदे पर थी तो दूसरी तरफ़ ‘खेल-खेल में’ और ‘रफ़ू-चक्कर’ जैसी लाइट कॉमेडी। दूसरे शब्दों में, एक तरफ़ अमिताभ बच्चन सदी के सुपरस्टार के रूप में स्थापित हो रहे थे, तो एक तरफ़ नसीरुद्दीन शाह, अमोल पालेकर, श्याम बेनेगल, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी जैसे कलाकारों की पूरी पीढ़ी और एक तरफ़ सचिन, सारिका जैसे कलाकार आमद दर्ज करवा रहे थे। एक तरफ़ गुलज़ार और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे फ़िल्मकार ‘मौसम’, ‘ख़ुशबू’, ‘मिली’, ‘चैताली’ जैसी तस्वीरें रच रहे थे, तो दूसरी तरफ़ जासूसी, एडवेंचर, एक्शन और हॉरर फ़िल्में लगातार आ रही थीं। ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं कि उलटबांसियों से भरे सिनेमा के चरम का साल था 1975, और यह कहना भी अतिरंजना नहीं है कि कलात्मक चरम देखने वाले इस साल ने दो सबसे कामयाब फ़िल्में वो दीं, जो सामाजिक प्रगतिशीलता की पक्षधर न होकर एक स्तर पर दक़ियानूस ही थीं। डा. नाइल्स क्रैन का दावा एक तरह से सिद्ध हुआ “popularity is the hallmark of mediocrity” यानी लोकप्रियता मामूलीपन की पुख़्ता गवाही है।
पचास बरस पहले की ये तमाम बातें आज भी किस क़दर प्रासंगिक लगती हैं! पिछले दिनों कंगना रनौत की ‘इमरजेंसी’ फ़िल्म पर लिखे लेख में भी मैंने इंगित किया कि इस फ़िल्म के कुछ दृश्यों से लगता है वही घटनाक्रम आज भी लाइव चल रहा हो। यह भी ग़ौरतलब कि इमरजेंसी जैसे हालात में मनोरंजन उद्योग (तब रील्स, सोशल मीडिया आदि न थे) नित नये कीर्तिमान रच रहा था। देश जब रोज़मर्रा में भयावह समस्याओं और चुनौतियों से जूझ रहा था, तब सिनेमा शायद सबसे बड़ा पलायन था। सुनील दत्त जैसे कलाकार थे, जिन्होंने आपातकाल को समर्थन दिया था और बाद के वर्षों में वह कांग्रेस सरकार में मंत्री भी रहे.. उधर देव आनंद जैसे कलाकार थे, जो आपातकाल के विरोध में आये थे, अपनी अलग राजनीतिक पार्टी (नैशनल पार्टी आफ़ इंडिया) तक बना ली थी। सिनेमा उद्योग बंटा हुआ था। सिनेमा एक बाज़ार था, जिसका सूत्रवाक्य ‘मुनाफ़ा’ तब भी हो चुका था। अहमतरीन सिनेमा के बावजूद 1975 की हक़ीक़त यही है कि वो फ़िल्में कम थीं, जिनमें कलात्मकता की आंच थी या जो परिदृश्य के करंट से चार्ज थीं। और ऐसी फ़िल्मों की आवाज़ “अरे ओ सांभा..” और “मैं तो आरती उतारूं रे..” जैसे शोरो-ग़ुल में धुंधली ही रही।
सिनेमा@1975: कुछ और दिलचस्प झलकियां
- ‘शोले’ का श्रेय रमेश सिप्पी से अधिक सलीम-जावेद को मिला। ‘हाथी मेरे साथी’ से ‘दीवार’ तक लगातार आठ हिट देने वाली इस लेखक जोड़ी की पहली फ़िल्म रही ‘आख़िरी दांव’, जो सिल्वर जुबली नहीं मना सकी।
- लक्ष्मी-प्यारे, आर.डी. बर्मन और कल्याणजी-आनंदजी का जलवा रहा जबकि सपन चक्रवर्ती और रवींद्र जैन ने वाहवाही लूटी।
- चैताली बिमल रॉय बैनर की आख़िरी फ़िल्म थी। रॉय के निधन के बाद इसका ज़िम्मा ऋषि दा ने लिया था।
- इमरजेंसी में सत्ता के साथ सुर मिलाने से किशोर कुमार ने इनकार कर दिया था।
- ‘सुनहरा संसार’ के लिए किशोर कुमार ने नौशाद के लिए पहली और आख़िरी बार गाया।
- बतौर फ़िल्मकार गुलज़ार, ऋषिकेश मुखर्जी और श्याम बेनेगल की तीन-तीन फ़िल्में आयीं। गुलज़ार ने ‘फ़रार’ का लेखन भी किया था, पर वह नाकाम रही।
- ‘वॉरंट’ देव आनंद की वह आख़िरी हिट फ़िल्म रही, जो नवकेतन बैनर के बाहर उन्होंने की।
- सफल फ़िल्म ‘धरम करम’ से रणधीर कपूर निर्देशक बने फिर भी बतौर निर्देशक उनकी अगली फ़िल्म 16 साल बाद आयी ‘हिना’।
- ‘जूली’ फ़िल्म से संगीतकार राजेश रोशन को पहचान और श्रीदेवी को मौक़े मिलने के रास्ते खुले।
- ‘क्रांति आओ क्रांति’ के लेखक पी. लंकेश वही थे, जिन्होंने ‘लंकेश पत्रिके’ शुरू की थी, जिसे बाद में उनकी बेटी गौरी लंकेश (2017 में जिनकी हत्या की गयी) ने संभाला।
- जैसे शोले की तर्ज़ पर फ़िल्में बनती रहीं, ‘कर्मा’ कामयाब भी रही, उसी तरह ‘जय संतोषी मां’ ने ऐसी राह बनायी कि 1976 में ‘बजरंगबली’ और ‘सीता कल्याणम’ जैसी फ़िल्में आयीं तो 1977 में ‘शिरडी के साई बाबा’ ने अच्छा व्यवसाय किया।
- ‘आंधी’ पर इंदिरा गांधी की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करने के आरोप थे। यह सुचित्रा सेन की आख़िरी हिंदी फ़िल्म भी रही।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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फिल्में समाज का आईना होती हैं।फिल्म के बनने और उसकी रिलीज़ तारीख से उस दौर के सामाजिक,और राजनैतिक हालात का पता चलता है।1975 वाकई बहुत खास रहा, यह सांस्कृतिक प्रयोग का समय था। जनता का मन समझने का प्रयोग। संगीत,नाटक, नृत्य,फिल्म सभी में प्रयोग हो रहे थे।बड़ी बात यह थी कि उनमें से अक्सर सफल रहे। यह प्रयोग आगे चलकर मील का पत्थर बने।यह पचास साल पुराना वाक्या है।पर मजे की बात आज भी हालत वही है।एक अघोषित आपातकाल से हम आज भी गुजर रहे हैं। लेकिन जनता की नब्ज़ का किसी को नहीं पता।यह भ्रम का दौर है। न समस्या पता है और न उसके निदान की किसी को चिंता है। फिल्म के बहाने आपने उस दौर के हालात की अच्छी पड़ताल की।