परसाई, harishankar parsai
पंकज निनाद की कलम से....

हरिशंकर परसाई – राजनैतिक व्यंग्य के पुरोधा

            किशोर उम्र में बच्चे सवाल करने लगें, तर्क देने लगें और पलटकर जवाब भी देने लगें तो घर-गली-समाज का फ़ैसला तय होता है, “लड़का बिगड़ गया है, इसकी संगत ख़राब है।” बिगड़े लड़कों में हमारा भी शुमार था, पर हमारी संगत में लोग कम, किताबें ज़्यादा थीं। सौभाग्य से, कुछ अच्छी किताबें जल्दी ही ज़िंदगी में आ गयीं। वरना जवानी गुलशन नंदा की चाशनी में तर होती, मस्तराम की मस्ती में बहक जाती, या जासूसी उपन्यासों के तिलिस्म में कहीं गुम हो गयी होती। इन अच्छी किताबों ने समझदार बना दिया, वरना आप जानते हैं— जवानी और बेवकूफ़ी एक ही चीज़ के दो नाम हैं।

बहरहाल, हम बिगड़ैल बच्चे थे और मुझे बिगाड़ने में जिन साहित्यकारों का हाथ रहा, उनमें परसाई सर्वोपरि हैं। बल्कि यूँ कहूँ कि मैं परसाई की संगत में बिगड़ा और इस बिगाड़ पर मुझे गर्व है।

परसाई, harishankar parsai

परसाई सिर्फ़ एक व्यंग्यकार नहीं, बल्कि अपने आप में एक पूरा “संस्थान” हैं, जहाँ दाख़िला लेने पर दिमाग़ को तंज़ की धार, नज़र को राजनीतिक समझ और ज़ुबान को चुभन की ताक़त मिलती है।

जीवन की शायद ही कोई विद्रूपता या विसंगति हो, जिस पर उन्होंने बेधड़क क़लम न चलाई हो। और सच कहूँ तो परसाई जैसी पैनी राजनीतिक दृष्टि और बेबाक समझ, अन्य व्यंग्यकारों में विरले ही देखने को मिलती है।

कुछ लेखक और व्यंग्यकार परसाई को उनकी राजनीतिक विचारधारा के कारण व्यंग्यकार मानने से ही इनकार कर देते हैं। उनकी दलील है, “साहित्य और कला को राजनीति से दूर रहना चाहिए।” इनसे मेरा सीधा सवाल है— क्या यह संभव है? तुम भले ही राजनीति से किनारा कर लो, लेकिन राजनीति कब तुम्हें किनारे रहने देती है? ज़रा सोचो— तुम्हारी शिक्षा, तुम्हारी नौकरी, तुम्हारी गृहस्थी… ये सब तुम्हारे अपने फ़ैसले हैं? मेरे भाई, तुम्हारी ज़िंदगी के सारे बड़े फ़ैसले राजनीति तय करती है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष— या तो तुम राजनीति में जाते हो, या राजनीति तुम्हारे पास आती है। बेहतर है समय रहते राजनीति को पहचान लो ताकि उसका चेहरा साफ़ देख सको, वरना जिस दिन राजनीति तुम्हारी चौखट पर आकर खड़ी हो जाएगी, उस दिन उसकी सूरत बहुत भयानक होगी।

दरअसल, ऐसे बुद्धिजीवी ख़ुद ही बड़े राजनीतिक होते हैं क्योंकि किसी राजनीति में न होना भी अपने आप में एक राजनीति है। यह राजनीति है सुरक्षा और सुविधा की, लाभ और अवसर की, पुरस्कार और सम्मान की। और फिर सौ बात की एक बात— राजनीति पर व्यंग्य लिखने के लिए जो परसाई जैसी दृष्टि, समझ, गहन चिंतन और हिम्मत की दरकार होती है, वह भी कहाँ है इन सज्जनों के पास?

पेशे से प्रोफ़ेसर एक व्यंग्यकार मित्र है मेरा, पट्ठे ने पी.एच.डी. भी परसाई पर ही कर रखी है। परसाई के राजनैतिक व्यंग्य पर चर्चा चली तो कहने लगा— “मैं परसाई को शत-प्रतिशत फ़ॉलो करता हूँ, जैसे परसाई हाथ धोकर कॉंग्रेस के पीछे पड़े रहते थे और नेहरू, इंदिरा और राजीव को कभी नहीं छोड़ते थे, वैसे ही मैं भी राहुल, प्रियंका और सोनिया को नहीं छोड़ता हूँ।” मैंने उससे कहा— “अबे मेरे लल्लूलाल! तूने परसाई से यही सीखा!” परसाई का व्यंग्य तो हमेशा सत्ता का प्रतिगामी होता था। जनता जिन आवारा सांडों को चुनकर संसद और विधानसभा में भेजती है, परसाई उनकी नाक में नकेल कसने का काम करते रहे हैं जीवन भर। फिर भले वह मोरारजी देसाई हों, जयप्रकाश नारायण हों या अटल बिहारी… उनके व्यंग्य की चाबुक सभी की पीठ पर बरसती रही।

लोकतंत्र में सबसे अहम भूमिका होती है विपक्ष की। ख़ासकर तब, जब हालात आज जैसे हों, जब विपक्ष लगभग नाममात्र रह गया हो। ऐसे में यह ज़िम्मेदारी हमारे हिस्से आती है—लेखकों, पत्रकारों और रंगकर्मियों के। रंगकर्मी और साहित्यकार, हमेशा सत्ता के प्रतिगामी होते हैं— उसकी गोद में बैठे चाटुकार नहीं, बल्कि उसकी पीठ पर लदे वेताल होते हैं। और भला, वेताल कभी सवाल पूछे बिना रह सकता है क्या?

मनुष्य की हर बुराई— कुंठा, आडंबर, स्वार्थ और टुच्चेपन— परसाई का व्यंग्य इतना करारा और तीखा होता था कि लक्षित व्यक्ति अक्सर तिलमिला जाता था। उनके इस बेबाक लेखन पर अन्य व्यंग्यकारों को बहुत आपत्ति है। उनकी दलील होती है— “व्यंग्य को इतना तीखा नहीं होना चाहिए, उसको हास्य की चाशनी में लिपटा होना चाहिए।”

हाँ, होना चाहिए। लेकिन मेरा सवाल है— तब क्या किया जाये जब दुश्मन गब्बर सिंह जैसा जबर हो? तब जूतों की नोक से उसका मुँह कुचलना चाहिए या कालिया की तरह उसको हँसा-हँसा कर शहीद हो जाना चाहिए? हो सकता है, तुम्हारी चाटुकारिता से ख़ुश होकर गब्बर तुम्हारे प्राण बख़्श दे, लेकिन फिर वो जीना भी कोई जीना हुआ लल्लू? अब एक सवाल और— उसको हँसाना क्यों है, भाई? वो तुम्हारा दुश्मन है या जीजा?

व्यंग्य में जो स्थान प्रेम का है, वही करुणा का है और करुणा का जो कारण है, उसके प्रति घृणा और क्रोध का भी उतना ही स्थान है। उनकी फ़िक्र हमेशा दबे-कुचले और हाशिये पर डाल दिये गये लोगों के प्रति बनी रही। वे आजीवन मनुष्य के भीतर मनुष्यता के स्तर को बचाये रखने के लिए फ़िक्रमंद रहे। ‘यथा राजा तथा प्रजा’— यह सूक्ति राजे-रजवाड़ों के ज़माने तक ही ठीक थी, पर लोकतंत्र में तो जैसी प्रजा होती है, वैसा ही राजा चुनती है। जब प्रजा ही भ्रष्ट और पतित हो तो सत्ता भी पतनशील होगी। इसलिए वे प्रजा को उसके दोगलेपन के लिए लताड़ते रहे।

जैसा कि उनके परम मित्र मुक्तिबोध कहते थे— “तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है, पार्टनर?” हम सभी कलमकारों, अदीबों, रंगकर्मियों और कलाकारों को भी यह तय करना होगा कि हम किस तरफ़ हैं। परसाई के न रहने के नतीजे आज हमारी आँखों के सामने हैं। आज देश में आँखों की दो क़िस्म की प्रमुख बीमारियाँ हैं— एक है मोतियाबिंद और दूसरी है मोदियाबिंद! एक से नज़र ख़राब होती है और दूसरी से नज़रिया। जब पूरे कुएँ में ही भाँग पड़ गयी हो, तो परसाई की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। मैं तो उस दिन से डरता हूँ, जब हमारी आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी कि आपके ज़माने में, जब लेखक, पत्रकार और नाटककार अपनी कलम से हाकिम के पैजामे में नाड़ा डाल रहे थे, तब आप क्या कर रहे थे?

पंकज निनाद, pankaj ninad

पंकज निनाद

पेशे से लेखक और अभिनेता पंकज निनाद मूलतः नाटककार हैं। आपके लिखे अनेक नाटक सफलतापूर्वक देश भर में मंचित हो चुके हैं। दो नाटक 'ज़हर' और 'तितली' एम.ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में भी शुमार हैं। स्टूडेंट बुलेटिन पाक्षिक अख़बार का संपादन कर पंकज निनाद ने लेखन/पत्रकारिता की शुरूआत छात्र जीवन से ही की थी।

7 comments on “हरिशंकर परसाई – राजनैतिक व्यंग्य के पुरोधा

  1. व्यंग्य की सबसे बड़ी शक्ति यही है—वह किसी अंतिम सत्य को थोपता नहीं, बल्कि हमारे सामने झूठ, दोगलेपन और पाखंड की परतें उघाड़ देता है।
    परसाई की विरासत यह है कि साहित्य केवल परावर्तन नहीं, बल्कि सत्ता-समाज की संरचनाओं का विडंबनात्मक पुनर्लेखन है। इसे आपके विचारालेख ने बखूबी उकेरा है । बधाई, साधुवाद ।

  2. बहुत शानदार लिखा आपने, हार्दिक धन्यवाद !! लिखते रहिए

  3. पंकज जी आपके लेख में परसाई जी की तरह का ही तीखापन है। सच है आज के समय में हमें यह तय करना ही होगा कि हमारी पॉलीटिक्स क्या है क्योंकि अब तो यह कहना भी अपने आपको मुगालते में रखना होगा कि अब भी नहीं चेते तो तानाशाही दूर नहीं।हम यही सोचते रहे और एक तानाशाह ने कब हमें अपने पिंजरे में क़ैद कर लिया हमें पता ही नहीं चला।परसाई जी सत्ता के बेलगाम होने के इसी खतरे के खिलाफ अपनी कलम से सत्ता और अपने पाठकों को निरंतर कोंचते रहे।आपने हमें इस भूल ग़लती के लिए परसाई जी को याद करते हुए जो कड़वी दवाई पिलाई उसके लिए धन्यवाद।

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