
- March 15, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग शम्पा शाह की कलम से....
लोककला में क्या कुछ नया होता ही नहीं?
पिछली कड़ी में हमने कलावंत कुम्हार कालीपद जी के उस प्रसंग पर दृष्टि डाली कि उन्होंने संथाली युवकों की इच्छा पर बोंगादेव के लिए मिट्टी का एक ऐसा हाथी रचा, जिसे रचने का अनुभव न तो उनके पास पहले से था और न ही इच्छा करने वाले संथालियों की स्मृति में वैसा शिल्प रहा। पारंपरिक कलाएं बनाम नयी अभिव्यक्ति के चिंंतन की यात्रा पर यहां से आगे चलते हैं।
किसी भी बड़े आधुनिक कलाकार के काम के सम्पूर्ण फ़लक को ग़ौर से देखने पर हम जिसे उसकी ‘शैली’ उसकी ‘पहचान’ कहते हैं, उसमें आने वाले बिम्ब, रूपाकार, उनके संयोजन, उनकी विषयवस्तु और उसके सम्प्रेषण के तरीक़े में निश्चित पैटर्न की आवृत्ति तथा पुनरावृत्ति नज़र आती है, चाहे अम्बादास या गायतोण्डे, रज़ा, प्रभाकर, बर्वे या ज्योति भट्ट के काम हों। कहा यह जा सकता है कि यह तो उनके अपने सिरजे हुए नितान्त मौलिक पैटर्न्स हैं, जिनसे उनकी अस्मिता गढ़ी जाती है तथा दूसरे तमाम आधुनिक कलाकारों से ये सर्वथा भिन्न हैं। यह कथन ठीक भी है और ग़लत भी। ठीक इसलिए कि हर सच्चा कलाकार अपनी परम्परा, फिर वह आधुनिक चित्रकला की परम्परा ही क्यों न हो, उसमें कुछ जोड़ता-घटाता है और ग़लत इसलिए कि फिर वह आधुनिक चित्र परम्परा ही क्यों न हो उसके पास भी विषयवस्तु, भाव संवेदन, संवेग की तथा इन्हें सम्प्रेषित करने की परिसीमित चित्रभाषा और उससे उपजे ‘पैटर्न्स’ हैं, जिनकी अपनी वंशावली है।
शब्दों, सुरों या रंगों को साधने वाला हर बड़ा कलाकार स्वयं किसी रहस्य, किसी सत्य के उद्घाटित होने का माध्यम या निमित्त बनता है। उसके रंगों, सुरों को साधने की प्रक्रिया में कोई चिरन्तन सत्य बिल्कुल नयी तरह से विन्यस्त होता है। कई बड़े कलाकारों ने सर्जना के इस अभूतपूर्व क्षण को साक्षी-भाव से देखा और दर्ज किया है। यहाँ कुछ नया रचने का भाव उतना नहीं होता जितना उसका साक्षात्कार करने का होता है। इसीलिए जब एक दर्शक उस चित्र या शिल्प को देखता है, तो वह उसमें अपने किसी अनजाने पहलू का साक्षात् करता है। कलाकार किसी जादूगर के मानिन्द सबके भीतर गड़े रहस्यों को न सिर्फ़ देख-सुन पाता है बल्कि उन्हें उजागर कर सबके लिए उपलब्ध बनाता है। एक कलाकार के काम में उसके परिवेश, उसके समय की सम्पूर्ण चेतना झंकृत होती है तथा उसका समय केवल उसके जीवनकाल तक सीमित नहीं होता, उसमें, अतीत की स्मृतियाँ और भविष्य के स्वप्न-दुःस्वप्न गुंथे रहते हैं। कला की अभिलाषा एक कलाकार की अभिलाषा न होकर मानव मात्र की अभिलाषाओं का सपुंज है। उसका एक ध्येय संशय के घेरे में घिरे मूल्यों को गर्त से खींचकर लाना और स्थापित मूल्यों को संशय के घेरे में पहुँचाना है।

कृति एक आत्मचेतन कलाकार के माध्यम से एक बृहत्तर चेतना की संवाहक होने का स्वप्न देखती है। व्यक्ति-चेतना का, निजता का ज़बरदस्त महत्त्व है क्योंकि वह स्वयं को खाद की तरह उस समग्र चेतना में झोंककर उसे नित उर्वरा बनाती है। कला के मर्म, उसके उद्देश्य को इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर आधुनिक-पारम्परिक या कला-शिल्प आदि द्वैत गौण जान पड़ते हैं। बल्कि तब कुछ मामूली-से जान पड़ने वाले प्रश्न अधिक नियामक भूमिका में नज़र आते हैं। मसलन, आप रंग, मिट्टी, कपड़ा इत्यादि किस विधा को अभिव्यक्ति के साधन के बतौर चुनेंगे, यह बहुत हद तक इस ग्लोबीकृत दुनिया के बावजूद आप जहाँ रहते हैं, वहाँ उसकी उपलब्धता और उस पर आने वाले आर्थिक प्रभार पर निर्भर करता है। शहरों में रहते हुए और आधुनिक शिक्षा से लैस दिमाग़ इस ख़ामख़याली में ज़रूर रहता है कि उसने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम स्वयं चुना है किन्तु यह चुनना किस क़दर सीमित होता है इसकी पोल थोड़े-से वस्तुपरक विश्लेषण से खुल जाती है।
मसलन, भोपाल शहर या कि कहें समूचे मध्यप्रदेश से आज छापा या सिरेमिक माध्यम में जितने कलाकार काम कर रहे हैं, उसकी तुलना में पच्चीस वर्ष पूर्व, भारत भवन के बनने के पहले इन माध्यमों में इक्का-दुक्का कलाकार थे। इसलिए यह ठीक है कि हमारे लिए मिट्टी में काम करने के लिए कुम्हार परिवार में पैदा होना आवश्यक नहीं है किन्तु कुम्हारों का, मिट्टी-ईंधन का पास होना या शहरों में अनुभवी माटी कलाकार, सिरेमिक स्टूडियो का होना आवश्यक है। वस्तुनिष्ठ होकर देखें तो यही समझ में आता है हम माध्यम को नहीं बल्कि माध्यम हमें चुनता है। गाँव-कस्बों में तो उपर्युक्त बात स्वयंसिद्ध रूप में विद्यमान रहती है- जिस इलाक़े में मिट्टी काम करने लायक़ न हो, वहाँ कुम्हार नहीं पाये जाते और जहाँ मिट्टी इतनी अच्छी हो कि उसे न छानने की आवश्यकता हो न रेत-आदि मिलाने की, वहाँ पूरा मोहल्ला या पूरा गाँव ही कुम्हारों का हो सकता है।
हमारे देश में जहाँ असंख्य महिलाओं का दायरा सिर्फ़ घर की चौखट तक बल्कि घर में भी रसोई या भीतरी आँगन तक सीमित है वहाँ रसोई में उपलब्ध अनाज, गुड़-नमक, केरी-नींबू या फिर रंगीन ऊन-धागे, कपड़ों की कतरन आदि ही वो उपलब्ध सामग्री हैं जिसमें वे बरसो-बरस ख़ुद को उड़ेलती आयी हैं। इन उपलब्ध सामग्रियों से वे जो कुछ करती आयी हैं क्या उसे येन-केन-प्रकारेण ‘कला’ की चौहद्दी में लाया जा सकता है? फ़िलहाल इस प्रश्न को यहीं हवा में झूलता छोड़ते हैं, यह अपने आप अलग से विचार और विस्तार की माँग करता है, जो इस लेख में सम्भव नहीं है।
कलाकार और उसके काम के लिए आवश्यक वस्तुओं की प्रचुर व सस्ते दामों पर उपलब्ध होने की ज़रूरत की बात चल रही थी। मसलन बाँस या बेंत के बसोड़ कारीगरों को सस्ता बाँस चाहिए। हम सभी जानते हैं कि अब उसे अपनी टोकरी या चटाई बनाने के लिए एक बाँस 18-24 रुपये का पड़ता है जबकि पेपर मिल वालों को एक रुपये से भी कम क़ीमत पर। अब प्लास्टिक के तार ही उसे सस्ते पड़ रहे हैं लिहाज़ा अब डलिया, सूप, चटाई सब प्लास्टिक में ही मिलेंगे और फिर इनकी चमक भी सम्भवत: ग्राहकों को अधिक भाएगी।
बाँकुरा ज़िले के पचमुरा गाँव में सरकार ने सामाजिक वानिकी के नाम पर नीलगिरी के ख़ूब पेड़ लगवाये। मेरे लिए यह देखना चमत्कार से कम नहीं था कि वहाँ के सभी कुम्हार इसकी सूखी पत्तियों-टहनियों को अपने मिट्टी के काम को पकाने के लिए ईंधन के बतौर इस्तेमाल कर रहे थे। उन्होंने भट्टी के आकार में अब ऐसा परिवर्तन कर डाला है कि वे एक लम्बी झाड़न की मदद से लगातार भट्टी में पत्तियाँ डालते रहते हैं और इस तरह से लगभग नौ सौ डिग्री सेंटीग्रेड का तापमान पैदा कर पाते हैं। बाँस न मिलने पर प्लास्टिक के तार से काम चला पाना, लकड़ी नहीं तो नीलगिरी की पत्तियों से काम ले पाने की क्षमता एक खोजी, उद्यमी दिमाग़ बताता है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि ये दोनों ही सामग्रियाँ हमारे परिवेश में बहुत पुरानी नहीं हैं इसलिए इन्हें बरतने का पुराना कोई अनुभव इन लोगों के पास नहीं था।
अपने परिवेश में आने वाले परिवर्तन को जाँचने-परखने, उससे भिड़ने और उसे अपने हेतु साध पाने की कोशिश में ही पारम्परिक कला अपने को नवीन, करती चलती है। पर चूँकि यहाँ कलाकार का मुख्य उद्देश्य कुछ ‘नया’ या ‘अलग’ करना नहीं है इसलिए यह भ्राँति बनी रहती है कि यहाँ कुछ नया होता ही नहीं है।
यह ठीक है कि सहदेव राणा के बनाये मिट्टी के घोड़े में वर्षों पहले उनके किसी पूर्वज के बनाये घोड़े की टाप सुनायी देती है; रुद्रैया के बनाये मँदर में बहुत पहले के किसी माँदर की थाप सुनायी देती है; नीलमणी देवी का बनाया मटका इस धरती पर बने पहले मटके से मिलता-जुलता है किन्तु इन्हें वही घोड़ा या माँदर या मटका समझने की भूल मत कर बैठियेगा, क्योंकि जब-जब मिट्टी किसी नीलमणी या कालीपद के हाथों का संस्पर्श पाती है तो वह पूरी तरह से रूपान्तरित हो जाती है: अलबत्ता, वह इसके साथ पूर्व के कुम्हारों के हाथ की गरमाहट और छुअन को भी अपने में सँजोये रखती है।

शम्पा शाह
कला की दुनिया में रमी हुई यह कलाकार सिरैमिक की लोक कला और आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाती रही है और मृदा कला के संरक्षण/संवर्धन में योगदान देती रही है। भारत के अनेक शहरों सहित अनेक देशों में कला प्रदर्शनियां आपके नाम हैं। आपकी शिल्प कला में मानवीय, प्राकृतिक एवं मिथकीय रूपों का एक अंतर्गुम्फन एक थीम की तरह प्रतिध्वनित होता है। भोपाल स्थित मानव संग्रहालय में 20 और कला के क्षेत्र में 30 से अधिक सालों तक सेवाओं के साथ ही साहित्य, संगीत व सिनेमा जैसे कलाक्षेत्रों में भी ख़ासा दख़ल।
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