tagore, premchand, parsai, history
पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....

तो क्या शांति बिल्कुल असंभव है?

           राष्ट्रगीत में भला कौन वह
           भारत-भाग्य विधाता है
           फटा सुथन्ना पहने जिसका
           गुन हरचरना गाता है

           रघुवीर सहाय के इन शब्दों पर हमारा आज का समाज नज़र घुमाएगा और बड़ी कोफ़्त से कहेगा, “काहे का फटा सुथन्ना! इतना विकास तो हो रहा है, सब चंगा है, तुम लोग फोकट में पुराना राग अलापकर राष्ट्रीय राजनीति और राष्ट्र की अवधारणा की ऐसी-तैसी किये फिरते हो..!” ये हरचरने कौन हैं? हम सबके आस-पास ही हैं ये लोग। विचारकों और लेखकों ने वक़्त-वक़्त पर इन लोगों को समझाया है, लताड़ा भी है और शायरों ने तो इन्हें ‘करोड़ों गधे’ कहकर इनका क़सीदा पढ़ा है। बहरहाल, ऐसे ही लोगों को राष्ट्र की छद्म परिभाषाओं और नैरैटिवों में बांधा जाता रहा है।

ये ‘करोड़ों गधे’ एक हाकिम को चुनते हैं, सर बिठाते हैं। फिर वही ​हुकूमत इन्हें हांकती हुई अपने मुनाफ़े के लिए इन्हीं को जंग में झोंक देती है। और ऐसे महान ‘लोकतंत्रों’ पर गौरवान्वित ये ‘करोड़ों गधे’ ‘जय हो राष्ट्रवाद की’ नारे लगाते हुए जान देने और लेने के ‘पवित्र’ कर्तव्य की भेंट चढ़ते रहते हैं क्योंकि एक काल्पनिक स्वर्ग बांहे पसारे इनका स्वागत कर रहा होता है… वैसे काल्पनिक स्वर्ग क्या आजकल तो सियासतें, हुकूमतें इसके लिए ‘घर बैठे धन पाओ’ स्कीम चलाती हैं ताकि ये लोग ‘धन आ गया तो अब थाली बजाओ’ मुहिम में काम आएं और फिर ‘धन लिया है तो हमारे मोर्चे पर जाकर मर जाओ’ जैसे हुक्म बजाने के लिए भी…

1991 में, हरिशंकर परसाई ने ‘आवारा भीड़ के ख़तरे’ लेख में लिखा, “लक्ष्यहीन, निराश और बेरोज़गार लोगों का समूह ख़तरनाक होता है। कभी नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी जैसे फ़ासीवादियों ने इन्हें आसानी से संगठित किया था। यह कट्टरपंथ और नफ़रत फैलाने वाले किसी भी संगठन का हिस्सा बनने के लिए सबसे अधिक प्रवृत्त होता है। फिर इस समूह को हर तरह के विनाशकारी कृत्यों में लिप्त किया जा सकता है। यही समूह हमारे देश में बढ़ रहा है और सक्रिय भी है। आने वाले समय में, इस समूह को बड़ी संख्या में राष्ट्रीय, मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलने और नष्ट करने के लिए तैनात किया जा सकता है।”

अब ऐसे समूह केवल हमारे शहर, हमारे देश की बात नहीं रहे। ग्लोबल विलेज में यही कैंसर फैल चुका है। इस ब्लॉग में वो तमाम बोल साझा करना हैं, जो पिछले कुछ वक़्त से मैं पढ़ रहा हूं, जिन्हें समझ रहा हूं तो तड़प रहा हूं और हमारे ग्लोबल विलेज के क़ीमती शब्दशिल्पियों/विचारशिल्पियों की जो बातें रह-रहकर भीतर गूंज रही हैं…

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टैगोर ने अपने लेख ‘द नैशनलिज़्म’ में लिखा है, “हालांकि बचपन से ही मुझे सिखाया गया कि राष्ट्र की पूजा करना ईश्वर और मानवता के प्रति श्रद्धा से कहीं बेहतर है, लेकिन मेरा मानना ​​है मैं उस शिक्षा से आगे निकल चुका हूं। यह भी मेरा दृढ़ विश्वास है कि मेरे देशवासी उस शिक्षा के ख़िलाफ़ लड़कर ही वास्तव में अपना भारत प्राप्त करेंगे, जो उन्हें यह सिखाती है कि देश मानवता के आदर्शों से बड़ा है।”
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बेनेडिक्ट एंडरसन ने अपनी पुस्तक ‘इमैजिन्ड कम्युनिटीज़’ में कहा है, “संयोग को नियति में बदलना राष्ट्रवाद का जादू है और यह जादू उपन्यास में सटीक रूप से देखा जा सकता है।”
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जॉर्ज ऑरवेल ने ‘नोट्स टू नेशनलिज़्म’ में लिखा, इस धारणा की आलोचना करना चाहिए कि मनुष्यों को “कीड़ों की तरह वर्गीकृत किया जा सकता है” या “लोगों के पूरे समुदायों को ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहा जा सकता है”।
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वर्नोन ली (असली नाम वायलेट पेज) ने लिखा, “इतिहास का इस्तेमाल नाटकीय प्रवृत्ति को संतुष्ट करने, कारणों और ज़िम्मेदारियों की तलाश करने के लिए किया गया था। वर्तमान को सही ठहराने के लिए अतीत को एक खिलौने की तरह इस्तेमाल किया गया, यह भूलकर कि कोई भी दो घटनाएँ कभी एक जैसी नहीं होतीं।” उन्होंने देशभक्ति और उससे भड़की भावनाओं की आलोचना की, जो “आंशिक रूप से युद्ध के लिए जिम्मेदार थीं”।
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हारुकी मुरकामी “राष्ट्रवाद के हानिकारक प्रभावों” की आलोचना करते रहे, उन्होंने लिखा: “राष्ट्रवाद की सस्ती शराब, पीने वाले को केवल सिरदर्द देती है और उसके बाद कुछ ख़ास लाभ नहीं होता।”… “यह समझ विकसित हो सके कि हम सभी इंसान हैं जो भावनाओं और समझ को साझा करते हैं, भले ही हम अलग-अलग भाषाएँ बोलते हों।”
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एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका टॉयन्बी के विचारों का सारांश यूं प्रस्तुत करती है: “सभ्यताएँ तब पतन की ओर अग्रसर हुईं, जब उनके नेताओं ने रचनात्मक रूप से प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया, और फिर राष्ट्रवाद, सैन्यवाद और अल्पसंख्यक पर निरंकुश अत्याचार के पापों के कारण सभ्यताएँ डूब गयीं…”
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अर्न्स्ट गेलनर कहते हैं, “राष्ट्रवाद राष्ट्रों की आत्म-चेतना का जागरण नहीं है: यह उन जगहों पर राष्ट्रों का निर्माण करता है जहाँ उनका अस्तित्व नहीं है”।
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अल्बर्ट आइंस्टीन ने राष्ट्रवाद को “बचपन की बीमारी” और “मानव जाति का खसरा” बताया था।
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एरिक हॉब्सबॉम ने लिखा, “राष्ट्रों और राष्ट्रवाद का कोई भी गंभीर इतिहासकार प्रतिबद्ध राजनीतिक राष्ट्रवादी नहीं हो सकता… राष्ट्रवाद के लिए ऐसी बातों पर अत्यधिक विश्वास करना होता है जो स्पष्ट रूप से सत्य नहीं हैं। जैसा कि रेनन ने कहा: ‘अपने इतिहास को ग़लत समझना एक राष्ट्र होने का हिस्सा है’। इतिहासकारों का पेशेवर दायित्व है वे इसे ग़लत न समझें।”
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हैंस कोन ने लिखा, “राष्ट्रवाद ऐसी मानसिकता है, जो लोगों के बड़े बहुमत में व्याप्त है और अपने सभी सदस्यों में व्याप्त होने का दावा करती है”।
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कार्ल ड्यूश लिखते हैं, “एक राष्ट्र… उन व्यक्तियों का समूह है, जो अपनी वंशावली के बारे में एक सामान्य त्रुटि और अपने पड़ोसियों के प्रति एक सामान्य नापसंदगी से एकजुट होते हैं”।

पूरी दुनिया को कई तरह के प्रचारित या तथाकथित ‘राष्ट्रवादों’ ने युद्ध में झोंक रखा है। बड़ी ताक़तें कहे जाने वाले राष्ट्र इस समय बड़े सनकियों के हाथ की कठपुतलियां बनकर रह गये दिख रहे हैं। ‘मेक … ग्रेट अगेन’ चीखने वाले इन राष्ट्रों के ‘करोड़ों गधों’ को यही समझ में नहीं आ रहा है कि राष्ट्र और ताक़त का मतलब कोई हुकूमत नहीं बल्कि ये ही हैं।

झकझोरना पड़ेगा ज़मीरे-अवाम को
अब कुछ नहीं मिलेगा सियासत को कोसकर

लेकिन ‘करोड़ों गधों’ को झकझोरना ही तो आज बड़ी मुसीबत बन चुका है। साहित्य, विचार, दर्शन कुछ भी वह हथियार नहीं बन पा रहा, जो यह बीड़ा उठा सके। और यह हमारे वक़्त का बड़ा दुख है। क्या पहले भी रहा है? शायद। तभी तो हमारे लेखकों को भी शांति नामुमकिन लगती रही…

1933 में प्रेमचंद ने एक लेख में लिखा, “राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ साम्प्रदायिकता थी। नतीजा दोनों का एक है। साम्प्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर पूर्ण शान्ति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था, उसको नोचने-खसोटने में उसे जरा भी मानसिक क्लेश न होता था। राष्ट्रीयता भी अपने परिमित क्षेत्र के अन्दर रामराज्य का आयोजन करती है। उस क्षेत्र के बाहर का संसार उसका शत्रु है। सारा संसार ऐसे ही राष्ट्रों या गिरोहों में बॅंटा हुआ है, और सभी एक-दूसरे को हिंसात्मक सन्देह की दृष्टि से देखते हैं और जब तक इसका अन्त न होगा, संसार में शान्ति का होना असम्भव है।”

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

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