
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
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राजा अवस्थी की कलम से....
कविता की आज़ादी का पर्व?
15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस, आज़ादी का पर्व जब हम मना रहे हैं, तो यह सोचने की बात है, कि क्या इसका कोई संबंध साहित्य अथवा कविता से भी है। यह पर्व हमें न सिर्फ़ यह याद दिलाता है कि हम आज़ाद हैं, हम 1947 में इसी दिन आजाद हुए थे, बल्कि यह भी याद दिलाता है, कि आज़ादी के लिए किया जा रहे युद्ध में, आंदोलन में, संघर्ष में सेनानी-योद्धाओं और पूरे देश के मन में संघर्ष की आग जलाये रखने के लिए वे वाणी पुत्र कौन थे, जो लगातार आज़ादी के तराने लिख रहे थे, गा रहे थे। कहीं कोई राम प्रसाद बिस्मिल “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” गा रहा था, तो कहीं कोई माखनलाल चतुर्वेदी जैसा कवि जेल में रहते हुए ‘क़ैदी और कोकिला’ और ‘पुष्प की अभिलाषा’ जैसे गीत लिख रहा था। कोई कवि “झंडा ऊंचा रहे हमारा” लिख रहा था, जिसे पूरे देश ने गाया। जयशंकर प्रसाद “हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती” जैसा गान लिख रहे थे। यानी तत्कालीन कवि लगातार देश की आज़ादी के लिए अपनी बेचैनी को, देश की बेचैनी को कविता में उतार रहा था, जिसे देश गा भी रहा था। कवि है, तो लिखेगा भी और यदि जन-मन की बात जन की भाषा में, जन के तरीक़े से लिखेगा, तो जन-मन उसे गाये-गुनगुनाएगा भी। यहांँ यह प्रश्न उठना चाहिए कि आज़ादी के पहले, जिस कविता ने जन-मन को आंदोलन के लिए उद्वेलित रखने में बड़ी भूमिका निभायी, वह कविता कौन-सी थी।

गद्य कविता मात्र को कविता कहने और कविता के नाम पर गद्य-कविता मात्र की स्थापना में आलोचना के सत्तर साल पचा लेने वालों ने आश्चर्यजनक रूप से इस प्रश्न पर कभी विचार नहीं किया कि आज़ादी के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाने वाली कविता का रूप कैसा था! यदि इस सवाल का जवाब देना हो, तो निस्संदेह यही जवाब आएगा कि वह कविता गीत और सिर्फ़ गीत थी, चाहे उसका रूप ग़ज़ल का रहा हो या किसी और छंद के रूप में रहा हो, लेकिन था वह गीतात्मक ही। प्रगतिशील कविता आंदोलन में भी वही कविताएंँ लोगों की ज़ुबान पर चढ़ीं और आज भी ज़िंदा हैं, जो गीतात्मक थीं।
देश आज़ाद हुआ और अचानक साहित्य संस्थानों पर बाबू राज की स्थापना ने ज़ोर पकड़ लिया। गीत-कविता को कविता कहने से अस्वीकार किये बिना ही उसे अस्वीकार कर दिया गया। इसका एक अर्थ यह भी लिया जा सकता है कि देश को आज़ादी मिलने के साथ आज़ादी के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाने वाली गीत-कविता को बंदी बनाने की कोशिश की जाने लगी। अंततः निराला की स्वच्छंद छंद और मुक्त छंद वाली कविता का छोर पकड़कर या कहें कि इसकी आड़ लेकर स्वच्छंद छंद, मुक्त छंद और छंदमुक्त को छोड़कर गद्य को ही काव्य रूप में न सिर्फ़ अपना लिया गया, बल्कि गद्य से इतर किसी और काव्य-रूप को कविता कहने-मानने से ही इनकार कर दिया गया। कविता के नाम पर हो रही किसी चर्चा के किसी मंच पर गीत, नवगीत, ग़ज़ल आदि का नाम न लेने की सौगंध उठा ली और उसे निभाया भी।
इस सब का एक डराने वाला परिणाम यह हुआ कि गद्य कविता तो जन से दूर थी ही, जन-समाज भी कविता से दूर होता गया। गीत-कविता उस तक पहुंच नहीं रही थी या यह कहें पहुंँचने नहीं दी जा रही थी और जो गद्य कविता उस तक पहुंँचाई जा रही थी, उसने उसे कविता से लगातार दूर ही किया। इस तथ्य को पूरा कवि समाज जितनी जल्दी स्वीकार ले, उतना अच्छा है। इस स्वतंत्रता दिवस पर चाहिए कि गद्य-कविता स्वयं को गद्य से आज़ादी की ओर लेकर चले। ऐसा करके हम आम आदमी को उसकी सबसे प्रिय चीज़ कविता पुनः उसे दे पाएंगे।

राजा अवस्थी
सीएम राइज़ माॅडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कटनी (म.प्र.) में अध्यापन के साथ कविता की विभिन्न विधाओं जैसे नवगीत, दोहा आदि के साथ कहानी, निबंध, आलोचना लेखन में सक्रिय। अब तक नवगीत कविता के दो संग्रह प्रकाशित। साहित्य अकादमी के द्वारा प्रकाशित 'समकालीन नवगीत संचयन' के साथ सभी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय समवेत नवगीत संकलनों में नवगीत संकलित। पत्र-पत्रिकाओं में गीत-नवगीत, दोहे, कहानी, समीक्षा प्रकाशित। आकाशवाणी केंद्र जबलपुर और दूरदर्शन केन्द्र भोपाल से कविताओं का प्रसारण।
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