
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
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मिथलेश रॉय की कलम से....
जय-जय जननी जन्मभूमि, हम बालक हैं तेरे
समय की रहगुज़र से गुज़रते हुए हम कहां चले जा रहे हैं। अक्सर फ़िराक़ गोरखपुरी की ये पंक्तियां ज़ेहन में आ जाती हैं:
फ़िराक़ इक दूसरी दुनिया की कुछ-कुछ याद आती है
नहीं मालूम आये हैं जहाँ में हम कहाँ होकर
इस जानी-पहचानी आवाज़ को सुनकर मैंने पीछे पलटकर देखा, शमशेर भाई किसी बात से खिन्न हो चले आ रहे थे। वैसे तो उनका चेहरा हमेशा खिला-खिला लगता है। पर जब उनके भीतर ही भीतर कुछ बात कुलबुलाने लगती है, वे अक्सर शायर बन जाते हैं। फिर क्या रास्ते चलते सुनते जाइए शायरी दर शायरी..
शमशेर भाई ग़ज़ब के क़िस्सेबाज़ थे, उनकी दुनिया ही अलग थी। वे इतने ज़िंदादिल थे कि उन्हें देखकर, सुनकर रोज़मर्रा के जीवन के सारे तनाव दूर हो जाते। इनके क़िस्से आह-हा इतने रसीले कि कोई भी उसका स्वाद उठा सकता था। इन क़िस्सों को सुनने में उम्र, धर्म जाति का भेदभाव न होता। जब मैं ग्यारहवीं में पढ़ रहा था, उन्हीं दिनों कॉलेज में पढ़ रहे शमशेर भाई से मुलाक़ात हुई थी। फिर यह साथ बहुत दिनों तक बना रहा। शमशेर भाई बड़े अलग आदमी थे। हर तरह का लिबास पहनने का उन्हें बहुत शौक़ था। पठानी सूट, कोट-पेंट, सदरी, धोती कुर्ता और जाने क्या-क्या। आज वे पजामा और गले में कढ़ाईदार मैरून कुर्ता पहने हैं। पक्का वह आज फ़िल्म पर कुछ बोलेंगे। यह अगस्त का शुरूआती सप्ताह है, बारिश अपने चरम पर है, चारों ओर हरियाली ही हरियाली है। हां, आज धूप कुछ ज़्यादा ही चटक है। कॉलेज के बाहर खेल मैदान के एक कोने में मैं फ़िल्म प्रेमी दोस्त और शमशेर भाई, जो क़िस्सा कहने को तैयार बैठे हैं। पास वाले हलवाई की दुकान पर देशभक्ति गाने दिनभर से बज रहे हैं। ये गाने वैसे बजते तो केवल बूंदी और झंडा रिबन बेचने के लिए हैं पर शोर पूरे बाज़ार में रहता है। यह एक तरह का इशारा भी होता है कि हमारे यहां बूंदी उपलब्ध है।
ख़ैर शमशेर भाई आज देशभक्ति के मूड में हैं। उन्हें देखते ही सूरज ने पूछा, ‘कहां भारत कुमार जी, आज राजेश खन्ना बने घूम रहे हैं!’ ‘नहीं भाई ये बंगाली कुर्ता पैजामा है। अब 15 अगस्त, 26 जनवरी के आस-पास इसे पहन लेता हूं।’ ‘क्यों इससे देशभक्ति झलकती है क्या?’ ‘नहीं भाई इससे मैं कलाकार दिखायी देता हूं। कलाकार सबका होता है और हमारे राष्ट्रीय पर्व हमें यही तो सिखाते हैं कि हम सब भारतवासी आपस में एक हैं। वैसे सच तो ये है कि आज हम लोग बहुत कुछ भूल बैठे हैं। किसी महान आदमी ने कभी कहा था, हम भारतीयों में दुष्यंत की तरह अपने स्व को भूलने की आदत है। हम हर बार अपनी शकुन्तला (पुरातन समय) को भुला बैठते हैं। आज बहुत-सी बातें वहीं की वहीं खड़ी हैं। मैं असल में किसी हीरो को देशभक्त के रूप में देखता हूं तो वह है अशोक कुमार।’
‘कहां की बात करने लगे आप भी भाई साहब’, रवि ने कहा और सब हंस पड़े। ‘अशोक कुमार नहीं मनोज कुमार ने सबसे ज्यादा देशप्रेम की फ़िल्में दी हैं।’
‘अरे यार होंगी पर मेरा मानना ज़रा अलग है। मैं कोई मज़ाक़ थोड़े कर रहा हूं। अच्छा बताओ पहली देशभक्ति फ़िल्म कौन-सी है।’ क्रांति, पूरब और पश्चिम, उपकार हम सबने उछलते हुए कहा। ‘नहीं’ – शमशेर भाई ने कहा, ‘पहली देशभक्ति फ़िल्म थी 1936 में बनी फ़िल्म “जन्मभूमि” और उसके हीरो थे अशोक कुमार।’ फिर शमशेर भाई पूरे क़िस्से में खो गये…
“असल में अशोक कुमार की फ़िल्मों में काम करने की चाहत बहुत अधिक थी, उनका जन्म खंडवा में हुआ और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में उन्होंने पढ़ाई पूरी। उनकी फ़िल्मों से चाहत का नतीजा था कि वे शशिधर मुखर्जी से मिले जो आगे चलकर उनके बहनोई बन गये थे। इस तरह अशोक कुमार को शशिधर की सहायता से हिमांशु रॉय के बॉम्बे टॉकीज़ में तकनीशियन के रूप में काम मिल गया था। तब अशोक कुमार का नाम कुमुद कुमार गांगुली था। अशोक कुमार का हीरो बनना भी एक इत्तिफ़ाक़ था। उन दिनों बॉम्बे टॉकीज़ के मालिक हिमांशु रॉय के बैनर तले जर्मन फ़िल्मकार फ्रेंज़ ऑस्टिन के निर्देशन में कई फ़ीचर फ़िल्में बन रही थीं। हुआ यूं कि फ़िल्म “जवानी की हवा” के पूरे होते ही हिमांशु रॉय की पत्नी देविका रानी, जो हिमांशु से 15 साल छोटी थीं, फ़िल्म के हीरो नजमुल हसन के साथ भाग गयीं, बाद में देविका रानी तो आ गयीं पर नजमुल हसन के लिए कोई जगह न रह गयी। अब हिमांशु रॉय के सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि अगली फ़िल्म का हीरो कौन हो? बाद में हिमांशु राय ने कुमुद गांगुली को चुना और उसे नया नाम दिया अशोक कुमार। साल 1936 में अशोक कुमार की ऑस्टिन के निर्देशन में तीन फ़िल्म आयीं, जीवन नैया, अछूत कन्या और जन्मभूमि।
जन्मभूमि ही वह फ़िल्म है, जो देशसेवा के भाव से प्रेरित थी। संभवतः यह पहली व अंतिम फ़िल्म भी थी जिसमें देशप्रेम से ज़्यादा देशसेवा को महत्व दिया गया। फ़िल्म का मुख्य किरदार अजय (अशोक कुमार) डॉक्टर है तथा उसे अपनी मिट्टी, अपने गांव से प्रेम है। फ़िल्म की हीरोइन देविका रानी है, जो अजय की मंगेतर और अजय के कार्यों की प्रबल समर्थक है। डॉक्टर अजय गांव का विकास चाहता है। परंतु इसके लिए सभी गांव वालों का एक होना ज़रूरी है। अतः वह चाहता है गांव स्वच्छ हो, पानी तथा अस्पताल की सुविधा हो परंतु इसके लिए ऊंच-नीच, धर्म के भेदभाव को मिटाना ही एकमात्र उपाय है। और इसका प्रयास करना ही देशप्रेम है। किंतु डॉ. अजय के इस काम के ख़िलाफ़ ज़मींदार, महाजन, वैद्य सभी हैं। डॉ. अजय के ख़िलाफ़ सनातन ख़ूब षड्यंत्र रचता है किंतु अंत में अजय की जीत होती है। इस फ़िल्म का पूरे देश में संदेश गया कि अंग्रेज़ी राज्य से तभी जीता जा सकता है जब समाज का हर तबक़ा साथ आये।
अशोक कुमार को इस फ़िल्म के लिए जनता का पूरा समर्थन और प्रेम मिला, हालांकि इस फ़िल्म के नायक अशोक कुमार थे परंतु, देविका रानी का चरित्र बड़ा दिखाया गया। फ़िल्म के एक दृश्य में देशसेवा के लिए देविका रानी का अशोक कुमार से विवाह करने की जगह यह कहते हुए बूढ़े ज़मींदार से विवाह प्रस्ताव स्वीकार करती हैं कि तन तो नश्वर है, देशसेवा के विचार की रक्षा करना हर देशप्रेमी का असल धर्म है। इस तरह इसे एक स्त्री का देशसेवा के लिए परम त्याग कहा जा सकता है। यहां ग़ालिब का शेर बरबस याद हो आता है:
हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत ‘ग़ालिब’
जिसकी क़िस्मत में हो आशिक़ का गिरेबाँ होना
हालांकि अशोक कुमार ने अछूत कन्या, कंगन, महल, क़िस्मत अनेक ऐसी फ़िल्में दीं, जिन्होंने उन्हें पहले सुपरस्टार का दर्जा दिलाया, परंतु मेरी मानो तो भले ही अशोक कुमार ने जन्मभूमि के बाद कोई और फ़िल्म देशभक्ति पर न आयी हो और कई लोगों ने कितनी ही भावुक फ़िल्म बनायी हो, परंतु इस फ़िल्म ने और अभिनेता के रूप में अशोक कुमार ने ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ की उक्ति को चरितार्थ किया।
इस फ़िल्म ने जिन विषयों को छुआ, वे आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं। आज इतने वर्षों बाद भी हम देशसेवा को ही देशप्रेम मानने से दूर जा रहे हैं। यह जो आज़ादी हमें मिली है, उसे बनाये रखने के लिए देशसेवा के हित में समाज में फैल रही असमानता दूर हो, यही पैग़ाम हमारा…” इतना कहते हुए अचानक शमशेर भाई ने फ़ैज़ की पंक्तियों को कहते हुए सभा समाप्त की:
ये दाग़-दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतिज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं

मिथलेश रॉय
पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।
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