dev anand, raj kapoor, amitabh bachchan, guru dutt, dilip kumar
15 अगस्त 2025 को भारत की आज़ादी को 78 बरस पूरे हुए तो यह प्रश्न उठता ही है कि सिनेमा की आज़ादी की आब-ओ-हवा क्या है? ऐसे सवालों के इर्द-गिर्द एक पत्रकार, लेखक की क़लम सिनेमा के इतिहास को टटोलती है
राकेश कायस्थ की कलम से....

जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं?

          आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी यानी भारत विभाजन के दो साल पूरे हो चुके थे। दिल्ली में नफ़रत की आग अब लगभग ठंडी पड़ चुकी थी। उधर भगत सिंह का शहर लाहौर बाक़ी रंगों के मिटाये जाने और सिर से पांव तक एक ही रंग में रंगे जाने के बाद बदरंग हो चुका था। ऐसे में लाहौर में रहने वाला एक नौजवान मज़हबी कट्टरता वाली ज़हरीली हवा में सांस लेने से इनकार करता है।

वह पहले दिल्ली पहुंचता है और फिर वहां से बंबई का रुख़ करता है। लुधियाना में जन्मे उस नौजवान का नाम था-अब्दुल हई, जिसे दुनिया शायर साहिर लुधियानवी के तौर पर पहचानती है। भारत में बसने के कुछ अरसे बाद साहिर ने एक सवाल किया— जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं?

सवाल पूरे हिंदुस्तान का था, सवाल पूरे हिंदुस्तान से था और अब भी है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि नये नवेले आज़ाद भारत में लाहौर से आकर बसने और सवाल पूछने वाले एक मुसलमान को तब किसी ने देशद्रोही नहीं कहा था। यह दौर आज़ादी के अमृतकाल का है। ऐसे में यह मुड़कर देखना बनता है कि हम कहां-कहां से गुज़रते हुए यहां तक आये हैं। बात साहिर से शुरू हुई है लेकिन समय को रेखांकित वाले हिंदी सिनेमा में आये बदलाव तक जाएगी।

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ऊपर जिस नज़्म का ज़िक्र है वो 1957 में आयी गुरुदत्त की क्लासिक फ़िल्म ‘प्यासा’ में शामिल है। हिंदी सिनेमा के लिए 1957 एक बेहद अहम साल था। इस दौरान आयी चार बड़ी फ़िल्में प्यासा, मदर इंडिया, नया दौर और दो आंखें बारह हाथ तात्कालिक भारतीय समाज से जुड़े लगभग हर बड़े बौद्धिक, नैतिक और व्यवस्थागत प्रश्न से रू-ब-रू कराती हैं। ये फ़िल्में बताती है कि आज़ादी के फौरन बाद हिंदी सिने जगत की सामूहिक चेतना का स्तर क्या था।

‘प्यासा’ सड़ांध भरे सिस्टम में दम तोड़ते एक शायर की कहानी है, जो अपनी नज़्में प्रकाशित करवाने के लिए दर-दर भटकता है। उसे हर जगह से तिरस्कार मिलता है। शायर को जीते-जीते मुर्दा घोषित कर दिया जाता है लेकिन कथित रूप से मर जाने के बाद शायर का काम अचानक दुनिया के सामने आता है और दिलों पर छा जाता है। फ़िल्म के आख़िरी हिस्से में शायर सबको चौंकाता हुआ अपने ही श्रद्धांजलि समारोह में प्रकट होता है, ज़िंदा होने का प्रमाण देने के लिए नहीं बल्कि इस बात के ऐलान के लिए कि उसे ज़िंदा न समझा जाये क्योंकि इस दुनिया में संवेदनशील लोगों के लिए कोई जगह नहीं बची है। बेदिल दुनिया के प्रति बग़ावत का स्वर देकर गुरदत्त और साहिर लुधियानवी ने विजय के किरदार को हमेशा के लिए अमर कर दिया-

जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम्ही संभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

परिवार और समाज जैसी संस्थाओं के स्वार्थ के आगे व्यक्ति कितना असहाय है। वह ज़िंदा रहकर भी रोज़ मरता है। ‘प्यासा’ देखते हुए फ्रेंज़ काफ़्का की कालजयी कहानी मेटामोरफॉसिस याद आती है, तो महबूब खान की फ़िल्म मदर इंडिया का ज़िक्र आते ही आंखों के सामने गोदान से लेकर सवा सेर गेहूं तक प्रेमचंद साहित्य जीवंत हो उठता है, लेकिन कहानी थोड़ा और आगे जाती है।

कर्ज़ में फंसे किसान परिवार की महात्रासदी एक नौजवान को बाग़ी बनने पर मजबूर करती है। लेकिन जब वही नौजवान शोषक महाजन की बेटी को अगवा करने पर उतारू होता है तो उसकी माँ अपने ही बेटे की जान लेती है। नर्गिस का संवाद कौन भूल सकता है— “मैं मां हूं लेकिन औरत भी हूं। मैं बेटा दे सकती हूं लेकिन लाज नहीं दे सकती।” आज के दौर में औरतों पर होने वाले यौन हमले देखिए तो आपको ‘मदर इंडिया’ ज़रूर याद आएगी।

सिनेमा पहले ही आज़ाद था

बी.आर. चोपड़ा की फ़िल्म ‘नया दौर’ आज़ाद भारत के उस बुनियादी सवाल का हल ढूंढने की कोशिश है कि एक दिन जब सारे काम मशीनें करेंगी तो फिर कामगार हाथ क्या करेंगे? व्ही. शांताराम की फ़िल्म ‘दो आंखे बारह हाथ’ क़ैदियों को सुधारने में लगे जेलर के ज़रिये मनुष्यता को सर्वोच्च नैतिक मूल्य के रूप में स्थापित करती है। यह फ़िल्म ‘पाप से घृणा करो पापियों से नहीं’ वाली ईसा की उस सीख को स्थापित करती है, जिसे गांधी ने अपना जीवन दर्शन बनाया था।

देश राजनीतिक रूप से 1947 में आज़ाद हुआ। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत का सिनेमा पहले से आज़ाद था। स्वतंत्रता की बयार बही तो हिंदी सिनेमा जगत ने ढोल-ताशे नहीं बजाये, ना ही तात्कालिक राजनेताओं का चरणवंदन किया। अलबत्ता सरकार, व्यवस्था से सवाल ज़रूर किये। देशभक्ति गीतों “आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की”, “साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल” जैसे गीतों से सजी 1954 की फ़िल्म जागृति को छोड़ दें, तो देश के रूप में भारत की महानता का बखान करने वाली फ़िल्में भी पचास और साठ के दशक में नहीं के बराबर मिलती है। गीतों में सरकार और व्यवस्था पर तीखे तंज़ के बीसियों नमूने आपको मिल जाएंगे “चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा, रहने को घर नहीं सारा जहां हमारा” ऐसा ही एक उदाहरण है। इस आधार पर एक आसान निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है, उस दौर की राजनीति जैसी थी, सिनेमा भी वैसा ही था।

पचास के दशक में राज कपूर जैसे सितारे का उदय हो चुका था, जिनका अंदाज़ कुछ-कुछ चार्ली चैपलिन जैसा था और विचारों पर रूसी बोल्शेविक क्रांति का असर था। अपने प्रिय गीतकार शैलैंद्र को राज कपूर भारत का पुश्किन कहते थे। जिस दौर में नेहरू के प्रभामंडल का तेज पूरे भारत पर छाया था, उसी दौर में शैलेंद्र फ़िल्म आवारा में लिखते हैं-

होंगे राजे-राजकुंवर हम बिगड़े दिल शहज़ादे
हम सिंहासन पर जा बैठें जब-जब करें इरादे

हिंदी सिने जगत आज़ाद भारत के सपनों का साझीदार था, लेकिन उसके भविष्य के लिए भी उतना ही चिंतित था। 1953 में आयी बिमल रॉय की फ़िल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था के उस स्याह पक्ष को उद्घाटित किया, जहां अपनी ज़मीन रखने वाले किसान को भूमिहीन मज़दूर में तब्दील कर दिया जाता है। दो बीघा ज़मीन के लगभग छह दशक बाद ‘पीपली लाइव’ आयी लेकिन कहानी वही की वही रही। खेती पेट नहीं भर पाती और किसान को गांव से बेदख़ल होकर शहर में मज़दूर बनना पड़ता है।

सवाल, चुनौती, समस्याएं, सब अपनी जगह थीं। लेकिन आज़ाद भारत के शुरूआती दिनों के हिंदी सिनेमा के केंद्रीय तत्व आशावाद और सकारात्मकता ही थे। विभाजन और उससे जुड़ी हिंसा से बड़ा प्लॉट शायद कोई और नहीं हो सकता। लेकिन हिंदी फ़िल्मों के परिदृश्य से ये विषय पूरी तरह ग़ायब रहा। धार्मिक उन्माद और मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह के चिह्न आप लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मों में नहीं ढूंढ़ सकते हैं। मुस्लिम समाज पर केंद्रित फ़िल्में भी उसी तरह बनती रहीं, जिस तरह आज़ादी से पहले बनती थीं। अस्सी के दशक में आकर निकाह के बाद ये सिलसिला धीमा को क्यों पड़ा? और फिर रुक क्यों गया? यह सवाल एक लंबे सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण की मांग करता है, जो इस लेख में संभव नहीं है। लेकिन मोटे तौर पर ये कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा का कैरेक्टर पूरी तरह सेक्यूलर था और बदले जाने के तमाम व्यवस्थित प्रयासों के बावजूद इसका मूल स्वभाव कुछ हद तक बचा हुआ है। लेकिन बाक़ी बदलाव कई स्तरों पर हुए।

सिनेमा में क्रमिक बदलाव

आज़ादी के बाद से भारत का समाज और सिनेमा किस तरह बदले अगर ये समझना हो तो हमें सबसे बड़े शोमैन राज कपूर की रचना यात्रा पर नज़र डालनी चाहिए। राज कपूर ने पचास के दशक में ‘आवारा’ और ‘श्री-420’ जैसी लोकप्रिय और सार्थक फिल्मों के साथ ‘जागते रहो’ जैसी बड़े संदेश वाली फ़िल्में बनायीं लेकिन साठ के आते-आते उनका सफ़र ‘संगम’ और ‘मेरा नाम जोकर’ (1970) तक पहुंच गया। उसके बाद ‘बॉबी’, फिर ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ और करियर के उत्तरार्ध में ‘राम तेरी गंगा मैली’। ये फ़िल्में बताती हैं कि भारतीय समाज और सिनेमा में आ रहा क्रमिक बदलाव किस तरह का था।

सिनेमा बरसो-बरस तक भारत के लोगों के मनोरंजन का एकमात्र ज़रिया था। इस उद्योग पर भारत के इलीट का नियंत्रण था। राज कपूर ख़ुद को कम पढ़ा लिखा बताते थे लेकिन सच ये था कि उन्हें बौद्धिकों की संगत पसंद थी। कवि सम्मेलन और मुशायरों में उनका नियमित रूप से आना-जाना था। गुरुदत्त जैसे लोग तो ख़ालिस इंटलेक्चुअल थे ही। दर्शकों का दिल जीतने और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में शामिल चोटी के फ़िल्मकारों में जो बात आम थी, वह था उनका बौद्धिक स्तर। सिनेमा पूरी तरह बाज़ार के हवाले नहीं था और मनोरंजन परोस रहे बड़े फ़िल्ममेकर अपने संपादकीय विवेक का भरपूर इस्तेमाल करते थे।

दर्शकों की बदलती रुचि, बदलता सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य और इन सबके बीच मुनाफ़ा बढ़ाने की संभावना साठ के दशक से आगे हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री की ड्राइविंग फ़ोर्स बननी शुरू हो गयी। देश की जनता ने उम्मीद के साथ आज़ादी के बाद के बीस साल गुज़ारे लेकिन सरकार के प्रति उसके सब्र धीरे-धीरे टूटने लगा। महंगाई और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों की छाया फ़िल्मों पर नज़र आने लगी। सत्तर का दशक रोमैंटिक हीरो राजेश खन्ना के नाम था। लेकिन इसी दौर में इमरजेंसी से ठीक पहले ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ जैसी फ़िल्म आयी, जिसका गीत “बाक़ी जो बचा वो महंगाई मार गयी” जनता के दिल की आवाज़ बन गया।

इसी दौर में ज़ंजीर के साथ ‘एंग्री यंगमैन’ अमिताभ बच्चन का अवतरण हुआ। एक ऐसा नायक जिसे सिस्टम से कोई उम्मीद नहीं है। वह अपने तरीक़े से तुरत-फुरत समस्याओं का हल चाहता है। इंस्टेंट जस्टिस का ये आइडिया चल निकला और अमिताभ बच्चन महानायक बन गये। सत्तर के दशक में और भी बहुत कुछ हुआ।

‘शोले’ ने बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी का एक नया फॉर्मूला दिया और कम बजट में बनी ‘जय संतोषी मां’ की रिकॉर्डतोड़ सफलता ने बता दिया कि समाज आने वाले दौर में किधर जाएगा। क्लासिक्स वाला पचास का दशक अब बहुत पीछे छूट चुका था। सत्तर और अस्सी के दशक के कमर्शियल सिनेमा ने कुछ ऐसा फॉर्मूला ढूंढने की कोशिश की, जहां मुद्दे तो बड़े हों लेकिन फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर कामयाब भी हो जाएं। इसी कोशिश में राज कपूर ने ‘सत्यम शिवम सुंदरम’, ‘प्रेमरोग’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी फ़िल्में बनायीं। बॉक्स ऑफ़िस पर चाहे जो हुआ हो लेकिन इन फ़िल्मों से राज कपूर की प्रतिष्ठा कतई नहीं बढ़ी।

देव आनंद अपने छोटे भाई विजय आनंद के साथ मिलकर हिंदी सिनेमा को कई बेहतरीन फ़िल्में दे चुके थे लेकिन करियर के आख़िरी दौर में अकेले कमर्शियल सक्सेस का नया फॉर्मूला ढूंढने निकले और ‘लूटमार’, ‘स्वामी दादा’, ‘अव्वल नंबर’ और ‘सौ करोड़’ जैसी वाहियात फ़िल्में बनाकर हंसी के पात्र बने। हिंदी सिनेमा में देशभक्ति फ़िल्मों के इकलौते ब्रांड मनोज कुमार ‘शहीद’, ‘उपकार’, ‘पूरब और पश्चिम’ और ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी कामयाब फ़िल्मों से होते हुए ‘क्लर्क’ तक पहुंचे और अपनी पर्याप्त जगहंसाई करवायी।

पिछले कुछ दशकों का हासिल

उद्योग के तौर पर हिंदी सिनेमा आकार अब बड़ा हो चुका था। लेकिन अस्सी के आते-आते पचास के दशक में दिखायी देने वाली प्रखरता की जगह बौद्धिक दिवालियापन ले चुका था। हॉलीवुड की फ़िल्मों को सीन बाई सीन कॉपी करना और आइडिया के लिए विदेश या दक्षिण भारत की तरफ़ देखना हिंदी सिनेमा जगत की ख़ास पहचान बन चुकी थी। अस्सी का दशक प्रस्थान बिंदु था, जिससे आगे बढ़कर हिंदी सिनेमा को एक नई शक्ल अख्तियार करना था।

मिक्स्ड इकॉनमी के पिंजरे में क़ैद परिंदा जब 1992 में आज़ाद हुआ और परिदृश्य रातो-रात बदलने लगा। देखते-देखते सिर्फ़ एक दशक में कई मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स भारत से निकलकर विश्व पटल पर छा गयीं और तीसरी दुनिया का सबसे बड़ा मुल्क एक अनंत संभावनाओं वाला बाज़ार बनने की तरफ़ तेज़ी से आगे बढ़ चला। हिंदी सिनेमा पर इस बदलाव का व्यापक असर हुआ।

हॉलीवुड की नक़ल में अपनाये नाम बॉलीवुड को हिंदी सिनेमा ने अपनी नयी पहचान के तौर पर आत्मसात कर लिया। शहरी बोल-चाल में अमेरिकन स्लैंग्स का इस्तेमाल बढ़ने लगा, ग्लोबल ब्रांड भारतीय मध्यमवर्ग को लुभाने लगे। फ़िल्मों के बजट बड़े हो गये, हीरो की फ़ीस महंगी हो गयी। लेकिन कंटेंट?

कंटेंट में कई स्तर पर बदलाव हुए। नब्बे के दशक में द्विअर्थीय अश्लील गानों का महाविस्फोट हुआ। जो हिंदी सिनेमा बेहतरीन गीतों के लिए पहचाना जाता था, वो अचानक खटिया सरकाने लगा और चोली के पीछे झांकने लगा। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह थी, एक उपभोक्ता समूह के रूप में हिंदी सिनेमा के दर्शकों के अनुपात में बदलाव। हिंदी सिनेमा का दर्शक वर्ग सिर्फ मिडिल क्लास नहीं था बल्कि उसका अभूतपूर्व विस्तार हो चुका था। औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के बाद उभरा एक नया और विशाल मध्यमवर्ग और निम्न-मध्यम वर्ग हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा ख़रीदार था। ताज्जुब नहीं अगर नब्बे के दशक में गोविंदा और डेविड धवन की जोड़ी सफलता के नये कीर्तिमान रचे।

आज हिंदी फ़िल्मों का पैमाना सौ करोड़ और हज़ार करोड़ का बॉक्स ऑफ़िस कलेक्शन है। टेक्नोलॉजी का असाधारण रूप से विस्तार हुआ है। दर्शक की रुचि को फ़िल्ममेकर उसी तरह परिभाषित करता है, जिस तरह कोई राजनेता अपने कोर वोट बैंक को करता है। वोटर और दर्शक दोनों भगवान हैं।

अगर बाज़ार के अपने तिकड़म होते हैं तो उसका लोकतंत्र भी होता है। इसी लोकतंत्र ने दर्शक को अपने हिसाब से फ़िल्में चुनने की आज़ादी दी है। राजनीतिक समर्थन से कुछ प्रोपैंगडा फ़िल्में भी मोटा पैसा कमा रही हैं लेकिन अच्छी फ़िल्में अपनी जगह बना रही हैं।बड़े बजट की फ़िल्में बन रही हैं तो दूसरी तरफ़ कुछ फ़िल्ममेकर छोटे बजट वाली उन फ़िल्मों पर भी पैसा लगा रही हैं, जो एक समय अपनी फ़ंडिंग के लिए एनएफ़डीसी जैसी सरकारी संस्थाओं पर निर्भर थी। मेनस्ट्रीम सिनेमा और आर्ट फ़िल्म के बीच का विभाजन लगभग मिट सा गया है।

सवाल और चिंतन का समय

माना कि मल्टीप्लेक्स में जाने वाले दर्शक सिनेमा के टिकट से ज़्यादा ख़र्च पॉपकॉर्न पर करते हैं लेकिन अच्छा सिनेमा ढूंढ रहे दर्शकों के रास्ते बंद नहीं हुए हैं। उनके लिए अब ओटीटी जैसे प्लेटफॉर्म है। फ़ेस्टिव सर्किल में घूमने वाली फ़िल्में अब आम दर्शकों तक पहुंच रही हैं और अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। हिंदी सिनेमा के लिए मौजूदा दौर नाउम्मीदी का नहीं है बल्कि यहां बहुत कुछ अच्छा भी हो रहा है। लेकिन क्या जो अच्छा हो रहा है, वो इतना अच्छा है कि उससे संतुष्ट हुआ जा सके?

फ़िल्मों की संख्या के लिहाज़ से भारत दुनिया की सबसे बड़ी फ़िल्म इंडस्ट्री होने का दावा कर सकता है। इसमें सबसे बड़ा योगदान हिंदी सिनेमा का है, जिसने बॉलीवुड का आयातित पट्टा बड़ी शान से अपने गले में पहन लिया है। ये अलग बात है कि हिंदी सिने जगत से जुड़े ज्यादातर लोगों को ख़ुद ये नाम पसंद नहीं है। श्याम बेनेगल से लेकर हंसल मेहता और अनुराग बसु तक कई बड़े फ़िल्ममेकर इस नाम पर अपना ऐतराज़ जता चुके हैं। लेकिन बॉलीवुड नाम अब चिपक चुका है।

पचास और साठ के दशक तक हिंदी सिनेमा जो अपनी मौलिकता थी, वह अगले स्तर पर नहीं पहुंच पायी बल्कि कहीं रास्ते में गुम हो गयी। आप इस बात पर ख़ुश होते हैं कि शाहरुख़ ख़ान को दुनिया भर में लोग पहचानते हैं और ‘दंगल’ जैसी आमिर ख़ान की फ़िल्म चीन तक में अच्छा कारोबार करती है। लेकिन ये बातें संतुष्ट होने के लिए पर्याप्त नहीं है। सत्यजित रे के लाइफ़टाइम अचीवमेंट ऑस्कर अवार्ड से लेकर भानु अथैया और रसेल पुकुट्टी तक भारत को जो भी ऑस्कर मिले हैं, वो हिंदी फ़िल्म के खाते में नहीं हैं। स्लमडॉग मिलेनियर के जिस ‘जय हो’ गीत के लिए गुलज़ार को ऑस्कर मिला, उसे भी हिंदी सिनेमा के हिस्से में नहीं डाला जा सकता है।

हिंदी सिने जगत के पास न तो साधन की कमी है, न प्रतिभा की। फिर क्या वजह है कि दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी फ़िल्म इंडस्ट्री होने के बावजूद हम वर्ल्ड सिनेमा में ईरान जैसा कोई मुकाम हासिल नहीं कर पाये। चलिए मान लिया कि हिंदी का ज़ोर मसाला फ़िल्मों पर ज़्यादा है। लेकिन क्या हमने कमर्शियल सिनेमा का कोई ऐसा मानक गढ़ा जिसकी नक़ल बाकी दुनिया कर सके?

सच ये है कि सत्तर के दशक के बाद का हिंदी सिनेमा लंबे समय तक नक़ल पर आश्रित रहा है और अब रीमेक के सहारे है। हिट फॉर्मूला ढूंढने और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में दक्षिण भारत का सिनेमा बॉलीवुड से मीलों आगे है। यानी नाम से लेकर काम तक हिंदी सिनेमा के पास बहुत कम चीज़े ऐसी हैं, जिसे पर वो अपना दावा जता सके। जिन लोगों को सिनेमा ने अपार दौलत और अभूतपूर्व सम्मान दिया, उन्हें थोड़ा ठहरकर सोचना चाहिए। संदर्भ अलग है लेकिन साहिर लुधियानवी की पंक्तियां उन पर भी फिट बैठती हैं-

ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे, ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं?

राकेश कायस्थ, rakesh kayastha

राकेश कायस्थ

पेशे से पत्रकार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रोफेशनल राकेश कायस्थ ने लेखन की लगभग हर विधा में कलम चलायी है। व्यंग्य संग्रह 'कोस-कोस शब्दकोश', फ़ैंटेसी नॉवेल 'प्रजातंत्र के पकौड़े' और उपन्यास 'रामभक्त रंगबाज़' चर्चित कृतियां हैं। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'ओपन' ने 'रामभक्त रंगबाज़' को 2022 की दस सर्वश्रेष्ठ भारतीय किताबों की सूची में शामिल किया। किताब का अंग्रेज़ी अनुवाद 'आरामगंज 1990' से लोकप्रिय हुआ। साहित्यिक लेखन से इतर ऑडिबल के लिए 'दिल लोकल' और 'टुकटुक की कहानियां' जैसे ऑडियो बुक और लोकप्रिय टेलिविज़न शो 'मूवर्स एंड शेकर्स' की स्क्रिप्टिंग भी खाते में दर्ज है।

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