
- July 30, 2025
- आब-ओ-हवा
- 3
प्रीति निगोसकर की कलम से....
कला साधक शोभा पत्की का कला संसार
शोभा पत्की, पुणे (महाराष्ट्र) बेस्ड आर्टिस्ट हैं। पारम्परिक सौन्दर्य बोध को साथ ले आधुनिकता में एब्स्ट्रैक्ट रूपाकंन करने में विशेष माहिर। लोक कला का संगीत, धार्मिक संदर्भ और पारम्परिक नृत्य, शास्त्रीय संगीत के साथ रामायण, महाभारत, ब्रह्मांड, गणेश पुराण जैसे पौराणिक अध्ययन को कैनवास पर उतारती इस कलाकार ने भगवान, रथ, घोड़े, पेड़, मानवाकृतियों के आकार को माध्यम बनाया है। आकृतियाँ लोककला के समीप हैं मगर विषय को उद्धरित करती आकृतियाँ चित्र में सफ़ेद रंग छोड़ते हुए कहीं कैनवास पर न डॉमिनेट करती हैं, न ही बहुत जगह घेरती हैं।
समय के साथ बड़े कैनवास पर संयोजन की विविधता और आकारों का खेल नीले रंग के शेड्स और कत्थई रंग डल शेड्स का उपयोग किया है। वहीं जामुनी रंग से चित्र में डिटेलिंग की है।
शोभा पत्की ने प्रत्येक प्रदर्शनी में एक विषय लेकर पूरी सीरीज़ प्रस्तुत की है। संगीत, नृत्य, प्रकृति को लेकर ‘Sylvan Ballet’ नृत्य करते पेड़ों को समर्पित की। जिसमें सशक्त रेखाओं का मुख्य आकर्षण रहा। भारतीय लोक नृत्य प्रदर्शनी में आकृतियों को रंग, रेखा और आकारों द्वारा चेहरे के हावभाव भी उभारे गये। इन चित्रों की पृष्ठभूमि के रंग नृत्य को गति और भावों को सशक्त करते हुए से लगाये गये हैं।
प्रसिद्ध सीरीज़
‘ब्रह्मांड’ की पौराणिक कथा पढ़कर जो सीरीज़ बनायी गयी, उसमें ब्रह्मांड नाम से एक बड़ा-सा अण्डा रूप लेता और उसके फूटने पर बहुत सारे अण्डे निकलते हैं। उन अण्डों के फटने पर हरेक अण्डे में एक-एक जीव निकलता है। जितने जीव निकलते हैं उतने सारे जीव भी ब्रह्मांड में पाये जाते हैं। जीव को प्रत्येक अण्डे के अंदर बहुत भड़कीले रंगों में प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। रंगों का उपयोग नैसर्गिक और मायथोलॉजी अनुसार उभारने वाला है।
‘रागमाला’ प्रदर्शनी सीरीज़ शास्त्रीय संगीत को समर्पित है। इसमें लकीरें, रंग और आकारों के सम्मिश्रण से राग और लय को आधुनिक शैली में चित्रित किया है।
प्रतीक हैं रंग
शोभा अपने चित्रों में ऑइल रंग उपयोग करती हैं, इनमें थोडा ईनामेल रंग मिलाकर चित्रों को चमकीला बनाती हैं, जिससे विशिष्ट टेक्स्चर्स भी उभरते हैं। चित्र के विशेष मोटिफ़ को अलग दिखाने के लिए एक्रेलिक रंग का थोड़ा इस्तेमाल करती हैं। इस तरह रंगों के सम्मिश्रण से कैनवास पर जो भी प्रयोग किये हैं, उनमें कहीं कहीं ऑइल ट्यूबस का उपयोग है। रंगों को घोलने के लिए कलाकार ने केरोसिन और थिनर का उपयोग किया, जिससे ऑइल रंगों में भी वाॅटर रंगों जैसा इफ़ेक्ट दिखता है। शोभा ये प्रयोग 25 साल से कर रही हैं। इनके चित्रो मे जो रंग शामिल हैं, वे निम्न भाव प्रदर्शित करते हैं जैसे:
- नीला रंग — शांत, सहज, खुशी आदि के मिश्रित भाव
- जामुनी रंग — जादुई असर दिखाने, काल्पनिक, आश्चर्य, जैसे भाव दर्शाने हेतु
- कत्थई रंग — स्थिरता, वज़न, काॅन्फीडेन्स और अतिसहजता के भाव दर्शाता है
कलाकार की विशेषता आकृतियों को एब्सट्रेक्शन में चित्रित करना और टेक्स्चर के साथ विभिन्न माध्यम जैसे प्लास्टर, मिट्टी, इपॉक्सी, फायबर ग्लास और इनामेल का कैनवास पर उपयोग किया गया है।
इनके बने म्युरल्स पूना शहर में कई मुख्य जगहों पर देखे जा सकते हैं। बॉम्बे आर्ट सोसायटी, हैदराबाद आर्ट सोसायटी का गोल्ड मेडल, ललित कला अकादमी अवार्ड, नाशिक ललित कला अकादमी अवार्ड से सम्मानित कलाकार शोभा पत्की के चित्र देश विदेश में अनेक स्थानों पर संग्रहित हैं। आप स्टेज आर्टिस्ट भी हैं, साथ ही शास्त्रीय संगीत की विद्यार्थी भी। शहर में कई म्युरल्स बनाने के अलावा राजा रवि वर्मा के चित्रों का इंस्टालेशन वर्क भी आपने किया है।

प्रीति निगोसकर
पिछले चार दशक से अधिक समय से प्रोफ़ेशनल चित्रकार। आपकी एकल प्रदर्शनियां दिल्ली, भोपाल, इंदौर, उज्जैन, पुणे, बेंगलुरु आदि शहरों में लग चुकी हैं और लंदन के अलावा भारत में अनेक स्थानों पर साझा प्रदर्शनियों में आपकी कला प्रदर्शित हुई है। लैंडस्केप से एब्स्ट्रैक्शन तक की यात्रा आपकी चित्रकारी में रही है। प्रख्यात कलागुरु वि.श्री. वाकणकर की शिष्या के रूप में उनके जीवन पर आधारित एक पुस्तक का संपादन, प्रकाशन भी आपने किया है। इन दिनों कला आधारित लेखन में भी आप मुब्तिला हैं।
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यह सुखद है कि प्रीति निगोस्कर हिन्दी कला लेखन की ओर भी निरंतर अग्रसर होती जा रही हैं। उनके कई आलेख मैंने पढ़ें हैं जो यह आश्वस्त कराते हैं कि वे जिस कलाकार पर लिख रही होती हैं उसकी कला-शैली पर उनकी पैनी दृष्टि होती है। यह बड़ी बात है, और यह काम वही कला लेखक बेबाकी से कर सकता है, जो स्वयं कला-शैलियों की विषयगत जानकारी ढूंढ़ता से रखता हो। आज का अधिकांश, और तथाकथित भी, कला लेखक इससे बचता है! वह एक सामान्य लेखक की भांति शब्दों की लफ्फाजी करता नज़र आता है। हां,उसमें नयी कविता जैसा तो कुछ जरुर पढ़ने को मिल जाता है पर उसे हम कला लेखन की शास्त्रीय की श्रेणी में नहीं ला सकते। कारण ऐसे कला लेखकों के पास कला का कोई प्रशिक्षण या शिक्षा नहीं होती। यही कारण है कि अब कला समीक्षा नहीं, केवल लेखन होता है। वहीं एक दुखद स्थिति यह भी है कि आज अधिकांश कलाकार शब्दों में केवल अपने आभामंडल को सिर्फ चमकता हुआ द
प्रीति निगोस्कर के आलेख पर मेरी टिप्पणी अभी अधूरी और संपादित होनी है। वह त्रुटिवश पोस्ट हो गयी है। उसे पूर्ण और संपादन हेतु तलाश रहा हूं परंतु अभी मिली नहीं। इस तकनीक (मोबाइल) का मैं विशेषज्ञ भी नहीं हूं।
अतः अभी प्रकाशनार्थ उसे स्वीकृत न करें। संभव हो तो उसे मेरी ई-मेल पर संशोधन आदि हेतु भिजवा दीजिए।धन्यवाद।
आपका साहित्य से जुड़ा पोर्टल के बारे में आज ही जानने को मिला, और उज्जैन की प्रीति निगोसकर का कला साधक शोभा पत्की का कला संसार पर समीक्षात्मक लेख पढ़ने को मिला. 1997 से 2000 के बीच प्रीति जी के संपर्क में आया था जब मैं भारत सरकार के एक स्वायत्त संस्थान में काम करता था. उनकी कला प्रदर्शनियाँ देखी है लेकिन उनके शब्द संसार को आज जान पाया.
शुक्रिया