
- February 27, 2026
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शख़्सियत को जानें अलकनन्दा साने की कलम से....
कुसुमाग्रज होने का अर्थ
कुसुमाग्रज, एक बहुमुखी व्यक्तित्व ने मराठी साहित्य प्रेमियों को जो अमर और विशाल साहित्यिक उपहार दिया है, उसे शब्दों में व्यक्त करना सरल काम नहीं है। मराठी साहित्य के आसमान में चमकने वाला यह चमकता सितारा भले ही असल में डूब गया हो, लेकिन दुनिया के असली तारों भरे आसमान में इसने एक मज़बूत जगह बना ली है। उनकी सुनहरी किरण से निकली अनमोल रचनाओं ने साहित्य की दुनिया में एक शानदार इतिहास रच दिया है। मराठी मिट्टी की शान को गर्व से दिखाने वाला और विशाल तारों भरे आसमान में कभी न ख़त्म होने वाले सितारे की तरह बसा वह नाम है कवि कुसुमाग्रज यानी साहित्य शिरोमणि विष्णु वामन शिरवाडकर।
चार दशकों से ज़्यादा समय तक मराठी भाषा पर राज करने वाले कुसुमाग्रज का जन्म 27 फरवरी 1912 को पुणे में हुआ था और उनकी पढ़ाई-लिखाई नासिक में हुई। बाद में भी उन्होंने एक लम्बा जीवन नासिक में ही व्यतीत किया। पद्म भूषण और साहित्य अकादमी अवॉर्ड पाने वाले कुसुमाग्रज ने न सिर्फ़ मराठी साहित्य में बहुत क़ीमती योगदान दिया, बल्कि मराठी भाषा को सही सम्मान दिलाने के लिए, जागरूकता फैलाने के लिए भी बहुत मेहनत की। उनके इसी अवदान के सम्मान में तारामंडल में ‘मृत्योपरांत स्वर्गद्वार’ (Gateway of Heaven) नामक एक तारे का नाम कुसुमाग्रज रखा गया है। उनके जन्मदिन 27 फरवरी को ‘मराठी राजभाषा दिवस’ के तौर पर मनाया जाना, यही मराठी प्रेमियों की तरफ़ से इस असाधारण प्रतिभाशाली लेखक को दी गयी सच्ची श्रद्धांजलि है। महान लेखक वि.स. खांडेकर के बाद, वे साहित्य के सबसे बड़े पुरस्कार ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित होने वाले दूसरे मराठी लेखक रहे।
उन्होंने सामाजिक अन्याय और असमानता की कड़ी आलोचना की और इस विचार की वकालत की कि साहित्य को एक सामाजिक ज़िम्मेदारी माना जाना चाहिए। वे कहते थे किसी भी कलाकार का काम उसके अनुभव के आधार पर ही जाना जाता है, इसलिए लेखक को अपने साहित्य में नूतनता लाने के लिए सामाजिकता को अपनाना चाहिए। उनका पक्का मानना था कि जातिवाद को ख़त्म कर देना चाहिए, ताकि हाशिये पर पड़े लोगों के अनुभवों को साहित्य में शामिल किया जा सके। इन विचारों को उन्होंने प्रत्यक्ष रूप में अपने जीवन में उतारा, जंगल में रहने वाले उपेक्षितों की सेवा की और अनगिनत ज़रूरतमंद लोगों का सहारा बने। उन्होंने सन 1932 में बाबासाहेब आम्बेडकर के द्वारा नासिक के कालाराम मंदिर में अछूतों के प्रवेश की मांग के समर्थन में किये गये सत्याग्रह में भी भागीदारी की थी।
कुसुमाग्रज कहते थे इंसान मरता है, लेकिन उसके द्वारा उच्चारित साहित्यिक शब्द अमर होते हैं। यह धरती के नाशवान विस्तार में एकमात्र ऐसी शक्ति है, जिसे हमेशा रहने का आशीर्वाद मिला है। साहित्य शब्दों पर आधारित होता है, इसलिए यह ज़रूर किसी न किसी तरह का संस्कार उत्पन्न करता है और इस सांस्कृतिक प्रवाह को आगे बढ़ाने का काम करता है।
नाम और काम
कुसुमाग्रज का मूल नाम गजानन रंगनाथ शिरवाडकर था। उनके चाचा वामन शिरवाडकर ने उन्हें गोद लेने के बाद उनका नाम बदलकर विष्णु वामन शिरवाडकर कर दिया। कुसुमाग्रज के पिता एक वकील थे। उन्होंने वकालत करने के लिए पिंपलगाँव बसवंत गाँव चुना, जहाँ कुसुमाग्रज ने अपना बचपन बिताया। कुसुमाग्रज के छह भाई और कुसुम नाम की एक छोटी बहन थी। इकलौती बहन से सभी प्यार करते थे, इसलिए उन्होंने कुसुम के बड़े भाई के रूप में कुसुमाग्रज नाम अपना लिया। तब से वि.वा. शिरवाडकर को कवि कुसुमाग्रज के नाम से जाना जाने लगा और यही नाम लोकप्रिय हुआ।

विविधांगी विचारों एवं प्रतिभा के धनी कुसुमाग्रज ने स्नातक की उपाधि लेने के बाद, कुछ समय तक फ़िल्म क्षेत्र में काम किया, पटकथाएँ लिखीं और फ़िल्मों में छोटी भूमिकाएँ भी निभायीं। उसके बाद सोबत, स्वराज्य, प्रभात, नवयुग, धनुर्धारी आदि अलग-अलग पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों का सम्पादन करने के साथ-साथ, उन्होंने विभिन्न साहित्यिक विधाओं को अपनी लेखन कला से ऊँचाई पर पहुँचाया। उनके महान काम का अंदाज़ा 24 कविता संग्रह, 25 नाटक, 16 कथा संग्रह, 5 उपन्यास, 4 लेख संग्रह, 2 छोटे निबंध संग्रह और अन्य साहित्य से लगाया जा सकता है। उनके ‘विशाखा’ कविता संग्रह को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ था। कुसुमाग्रज ने उस समय समाप्त प्राय: रंगभूमि को फिर से जीवित करने के लिए कई नाटक लिखे। उन्होंने शेक्सपियर के कई नाटकों को मराठी में रूपांतरित किया, उनमें से ‘नटसम्राट’ नाटक आज तक लोकप्रिय है। इस नाटक पर आधारित फ़िल्में भी बनीं। सन 70 के दशक में पहली बार श्रीराम लागू अभिनित ‘नटसम्राट’ फ़िल्मी परदे पर आया और बाद में सन 2016 में नाना पाटेकर ने भी यही भूमिका साकार की।
काव्य, कला चिंतन
एक ओर संत जिस अभिमान को विसर्जन योग्य मानते हैं, अपनी विशिष्ट विचार शैली के लिए विख्यात कुसुमाग्रज, उसी अहंकार को कला में आवश्यक मानते हैं। उनका कहना है लिखने वाले का अभिमान जब एक अनन्य साधारण रूप धारण करता है, तभी वह लेखन की ओर प्रवृत्त होता है। यह अभिमान अंतस को व्यक्त करने की दृढ़ आंतरिक इच्छा उत्पन्न करता है। अभिमान जतन करने की यह आदत मात्र आविष्कार से नहीं बल्कि वर्चस्व से पूरी होती है। यह वर्चस्व लेखक को किसी भी रूप में, प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े पाठक से प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में, उनका कहना है कला पाठक पर वर्चस्व की भावना से पल्लवित होती है। इस वर्चस्व की भावना को स्पष्ट करते हुए वे आगे कहते हैं कि पढ़ने वाला शब्दों के माध्यम से लेखक की दुनिया में आता है और उतनी अवधि के लिए स्व को छोड़कर लेखक के अधीन हो जाता है। यह ‘समानुभूति’ का एक स्वरूप है। यह अनुभूति ही साहित्यकार के लिए प्रेरणा का काम करती है।
इसके बाद कुसुमाग्रज कला के आविर्भाव के सिद्धांत की व्याख्या करते हैं। वे कहते हैं कि साहित्य का साहित्यिक स्वरूप आविर्भाव और अनुभव के सिद्धांतों से सिद्ध होता है। जो निराकार या विकृत है, उसे प्रभावी रूप देने की प्रवृत्ति ‘आविर्भाव’ है। अनुभव मूलतः निराकार और आकारहीन है। आविर्भाव शब्दों की सहायता से उसे आकार और रूप देता है। शब्द इस साहित्यिक आविर्भाव का साधन हैं। कुसुमाग्रज के अनुसार साहित्यिक रूप भी इसी दृष्टिकोण से पैदा होते हैं। यह दृष्टिकोण विचारों के प्रवाह को सुगम बनाने के लिए साहित्यिक रूपों को जन्म देता है। कुसुमाग्रज इस दृष्टिकोण को समय के साथ साहित्यिक रूपों में होने वाले परिवर्तनों का कारण भी मानते हैं। उनके अनुसार ये परिवर्तन आविर्भाव के प्रयोग और नवीनता के आग्रह के कारण होते हैं। आविर्भाव समय की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न कालखंडों में विभिन्न साहित्यिक रूपों को जन्म देता है।
कुसुमाग्रज के अनुसार साहित्य का रूप आविर्भाव से और उसका आशय अनुभव से तय होता है। अनुभव शब्द का अर्थ यथार्थ से जुड़ाव नहीं है, बल्कि लेखक के मन में पैदा होने वाली जागरूकता की स्थिति है अर्थात सांसारिक अनुभव के बाद लेखक की भावनिक स्थिति कलाकृति का आंतरिक भाव तय करती है।
कविता की अनुपम परिभाषा देते हुए कुसुमाग्रज कहते हैं कविता मनुष्य और उसके परिसर के मध्य एक संवाद निश्चित करती है। हालांकि कविता कवि का स्वयं को प्रस्तुत करना होता है, लेकिन वह तभी सामने आती है, जब यह प्रस्तुति शब्दों के माध्यम से संवाद में बदल जाती है।
नाटककार कुसुमाग्रज
उनके नाटकों में भी एक लेखक सापेक्षता है। एक नाटक के किरदार लेखक के स्व को दिखाते हैं, उसके स्वयं के होने का एक सूत्र दर्शाते हैं। एक नाटक में कई भूमिकाएं होती हैं, लेकिन वे लेखक की दृष्टि से अनेक ‘मैं’ होते हैं। लेखक के भीतर का ‘मैं’ अन्य साहित्यिक विधाओं के मुक़ाबले नाटक में अधिक होता है। उनके अनुसार एक लेखक मनुष्य में, उसके स्वभाव धर्म में, उसके संघर्षों में नाटक ढूँढ़ता है।
कुसुमाग्रज साहित्य और समाज के बीच के रिश्ते में विश्वास करते हैं। उनकी साहित्यिक सोच लौकिकतावादी है, जीवनवादी है। वे कहते हैं एक लेखक की प्रतिभा कितनी भी आसमानी क्यों न हो, उसकी पूरी ज़िंदगी ज़मीन पर टिकी होती है। कुसुमाग्रज प्रतिबद्धता से अधिक सहभागिता को महत्व देते हैं और यही वैचारिकता उन्हें ‘कुसुमाग्रज’ बनाती है।
एक असाधारण व्यक्तित्व
उनकी साहित्यिक यात्रा के साथ-साथ, अगर हम एक व्यक्ति के रूप में उनके अनोखे व्यक्तित्त्व को जानना चाहते हैं, तो हमें उन्हें कई पहलुओं से देखना होगा। वे नासिक में कई आंदोलनों के प्रणेता थे। उन्होंने सन 1950 में लोकहितवादी मंडल शुरू किया। वे 1962 से 1972 तक नासिक के ‘सावाना’ नाम से प्रसिद्ध सार्वजनिक वाचनालय के अध्यक्ष रहे। उस दशक को वाचनालय का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। उन्होंने वैयक्तिक, सामाजिक कई परियोजनाओं का मार्गदर्शन किया। कोई किसी भी तरह का मार्गदर्शन मांगने आता, तो वे उस व्यक्ति की क्षमता को पहचानकर तुरंत उसकी सहायता करते थे, लेकिन सफलता के समारोहों में पीछे रहना पसंद करते थे।
एक जानकारी के अनुसार मराठी साहित्य में अमर साहित्य रचने वाले वि.वा. शिरवाडकर “कुसुमाग्रज” का बहुत सारा साहित्य आज भी अप्रकाशित है। उसे प्रकाशित करने का औदार्य कहीं भी दिखायी नहीं देता है। इसमें 189 कविताएँ और 13 बाल कविताएँ सम्मिलित हैं। वि.वा. शिरवाडकर नाम से लिखने से पहले, कुसुमाग्रज ने पूर्वाश्रम के गजानन रंगनाथ शिरवाडकर नाम से भी बहुत कुछ लिखा था।
कुसुमाग्रज की असाधारण प्रतिभा ने स्वाभाविक रूप से उन्हें अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किया। कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों का उल्लेख अवश्यम्भावी है। सन 1974 में ‘नटसम्राट’ के लिए साहित्य अकादमी अवॉर्ड, 1966 में नाटक “ययाति आणि देवयानी” और 1967 में म्यूज़िकल नाटक “वीज म्हणाली धरतीला” (बिजली ने धरती से कहा) के लिए राज्य सरकार का सम्मान मिला। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार से पद्मभूषण अवॉर्ड (1991), अखिल भारतीय रंगमंच परिषद से “राम गणेश गडकरी” सम्मान भी मिले। पुणे यूनिवर्सिटी द्वारा 1986 में उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि प्रदान की गयी। सन 1964 में मडगांव में आयोजित 45वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद का भार वहन किया। वे 1970 में कोल्हापुर में हुए 51वें मराठी नाट्य सम्मेलन के अध्यक्ष थे। सन 1990 में मुंबई में हुए पहले विश्व मराठी सम्मेलन के अध्यक्ष थे।
मराठी साहित्य के इस अग्रगण्य साहित्यकार ने 10 मार्च 1999 को अंतिम सांस ली। यहां कुसुमाग्रज की एक प्रसिद्ध कविता ‘कणा’ (रीढ़ की हड्डी) का भावानुवाद, उन्हें मेरी श्रद्धांजलि:
सर! मुझे पहचाना क्या?
भारी बारिश में कोई आया था
गीले कपड़े और बालों में पानी
एक पल बैठा
फिर धीरे-से मुस्कुराया
ऊपर देखकर बोला
गंगा माई मेहमान बनकर आयी थी
चार दिन झोपड़ी में रहकर गयी
ठीक मायके आयी
बिटिया की तरह
चारों दीवारों को
पकड़-पकड़कर
नाचती रही
ख़ाली हाथ कैसे जाती?
दीवार धसक गयी
चूल्हा बुझ गया
जो भी था सब चला गया
बस! पत्नी बच गयी
और वह प्रसाद की तरह
हमारी पलकों में
थोड़ा-सा पानी छोड़ गयी
सर! अब मैं लड़ रहा हूँ
जीवन संगिनी के साथ जीवन से
कीचड़ मिट्टी साफ़ कर रहा हूँ
टूटी हुई दीवार बना रहा हूँ
मेरा हाथ जेब की ओर
जाता देखकर
वह हँसते-हँसते उठा
और बोला-
मुझे पैसे नहीं चाहिए सर!
ज़रा अकेलापन लग रहा था
सर! पूरी दुनिया उजड़ गयी
पर रीढ़ की हड्डी अभी साबुत है
सर! आप रहेंगे ना मेरे साथ
मुझसे कहेंगे ना डटकर
सामना करने के लिए
सर! कहिए ना
मुझे सिर्फ़ यह आशीर्वाद आपसे चाहिए
कि डटे रहो!
और कुछ नहीं।

अलकनंदा साने
मध्य प्रदेश की पहली मैदानी महिला पत्रकार (रिपोर्टर), प्रदेश के विभिन्न समाचार पत्रों में लगभग 20 वर्ष कार्य। पत्रकारिता के दौरान 100 से अधिक कला समीक्षाएं, सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर लेखन, दिग्गजों के साक्षात्कार आदि प्रकाशित। लगभग 50 सालों से हिन्दी-मराठी में समान रूप से लेखन। कुल तीन काव्य-संग्रह, एक हिन्दी काव्य-संकलन "जब धूप नहीं थी, उन दिनों"। प्रचुर मात्रा में अनुवाद। लेखन एवं अनुवाद का नियमित और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशन। प्रवासी साहित्यकारों के समूहों "आम्ही रचनाकार" व "मायमावशी" का संचालन। अनेक समवेत संकलनों में रचनाएं। कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित। संपर्क: 98260 59934
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कुसुमाग्रज पर इतना सारगर्भित लेख इसके पहले पढ़ा याद नहीं आता।गागर में सागर समाने की अनुभूति हुई।फक्त लढ़ म्हणा का हिंदी भावानुवाद भी बहुत सुंदर लगा। हार्दिक अभिनन्दन ताई।