
- February 22, 2026
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हास्य-व्यंग्य आदित्य की कलम से....
कुत्ते
कुत्तों से संबंधित हाल की कुछ घटनाओं ने भारतीय जनमानस को असमंजस की स्थिति में डाल दिया है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि कुत्तों को दुत्कारें या दुलारें। चूंकि इन दिनों, इन दिनों की हर समस्या का हल अपने गौरवशाली अतीत में खोजने का फ़ैशन चल पड़ा है। सो इस नज़रिये से देखें तो हमारे देश में कुत्ता पालने की सनातन परंपरा रही है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में यत्र तत्र इसके वर्णन मिल जाते हैं। महाभारत की कथा में तो एक कुकुर युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण के समय उनके साथ स्वर्ग के द्वार तक पहुंच गया था। युधिष्ठिर को कुत्ते के साथ स्वर्ग में प्रवेश करने से इंद्र ने रोक दिया। युधिष्ठिर के सामने बिना कुत्ते के स्वर्ग में प्रवेश की शर्त रखी गयी, युधिष्ठिर ने बिना कुत्ते के प्रवेश से इनकार कर दिया। दरअसल वह कुत्ता “धर्मदेव” था, जो युधिष्ठिर की परीक्षा ले रहा था।
ऋग्वेद में एक दैवीय कुतिया “सरमा” का उल्लेख है, जो गायों की रक्षक थी, भटकी हुई गायों को खोज निकालती थी। देश भर में गोरखपंथी, कुत्तों को गोद में या कंधों पर उठाये घूमते रहते हैं, गोरखपंथियों द्वारा काले कुत्ते की बड़ी सेवा की जाती है। कालभैरव का वाहन होने का सौभाग्य भी कुत्ते को प्राप्त हुआ है। परंपरागत कथाओं के अनुसार यमराज ने भी दो कुत्ते पाल रखे हैं, “श्याम” और “सबल”, जो द्वार पर पहरा देते हैं। इन संदर्भों से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि प्राचीन पवित्र ग्रंथों में भी कुत्ता गाय के बाद पशु श्रेणी में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आधुनिक भारतीय सिनेमा ने भी “तेरी मेहरबानियाँ” और “इंटरटेनमेंट” जैसी फ़िल्में कुत्ते की निष्ठा, स्वामीभक्ति, त्याग और बलिदान को समर्पित की हैं।
ग़ौरतलब है कुत्ता बहुआयामी व्यक्तित्व का धनी होता है। निष्ठा, स्वामीभक्ति, त्याग और बलिदान के अतिरिक्त उसमें तलवे चाटने, दुम हिलाने, दुम दबाकर भागने, चरणों में लोटने, गुर्राने, भौंकने और काटने जैसे गुण भी यथेष्ठ मात्रा में पाये जाते हैं, जो मौक़े की नज़ाक़त के हिसाब से प्रकट होते है। “कुत्ते की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी”, “कुत्तों की तरह लड़ना” और “कुत्तों की तरह भौंकना” जैसे मुहावरे उसकी जीवटता को प्रकट करते हैं। मानवों का सहचर होने के कारण उसके इन गुणों का संक्रमण मानव प्रजाति में भी हुआ है। अपने आसपास इन गुणों से युक्त लोगों को आप आसानी से पहचान सकते हैं। गुस्ताख़ी माफ़ हो.. इसकी तलाश आप अपने गिरेबान में झांककर भी कर सकते हैं।
वर्तमान समस्या कुत्तों के काटने से उपजी है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की वक्रदृष्टि पड़ने से डॉग लवर्स, जिन्हें कुत्ते को कुत्ता कहने पर भी ऐतराज़ होता है, सकते में हैं! भरी ठंड में कुत्तों और उनके प्रेमियों दोनों पर तुषारापात हो गया है। कुत्तों द्वारा बच्चों, महिलाओं और बुज़ुर्गों पर हमला करने की प्रवृत्ति हाल के कुछ वर्षों में बढ़ी है। कुत्तों को भी पता लग चुका है देश में अमृतकाल चल रहा है। संभवतः इसी के प्रभाव से आम जनता के टुकड़ों पर पल रहे गली-मोहल्ले के भूरा, कालू, चंपी आदि ने अपने अपने इलाक़ों में वर्चस्व बनाये रखने के लिए आम जनता की नाक में दम कर रखा है, और कुछ ने तो काटना भी शुरू कर दिया है! इससे लोगों में दहशत फैलती है और लोग आड़े नहीं आते। इसे देखते हुए कोर्ट ने आवारा कुत्तों की बेजा हरकतों को गंभीरता से लिया है। कोर्ट की संवेदनशीलता से मैं अभिभूत हूँ। इस देश में लाखों लोग सड़क हादसों में जान गवां रहे है, हज़ारों लोग मॉब लिंचिंग का शिकार हो रहे हैं, सैकड़ों घरों पर बुलडोज़र चलाकर दहशत फैलायी जा रही है, असंवैधानिक सरकारें और जनप्रतिनिधि बिना दंड पाये अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं, संसद में मनमाने तरीक़ों से क़ानून बदले और गढ़े जा रहे हैं…. लेकिन यहां न्यायपालिका का धैर्य अभूतपूर्व है, कभी संवेदनशील मामलों पर स्वतः संज्ञान लेने वाली न्यायपालिका अपनी न्यायिक सक्रियता के गौरवशाली दौर को भुलाकर तारीख़ पर तारीख़ दिये जा रही है… पीड़ित न्याय की गुहार लगा लगाकर हताश और निराश भटकते रहते हैं… पर कुत्तों की बात अलग है… उस पर भी आवारा कुत्ते…. अजी लानत है इन पर, इन्हें सबक़ सिखाना ज़रूरी है। न्यायपालिका कुत्तों की ज़्यादती क़तई बर्दाश्त नहीं करेगी। कुत्तों पर न्यायपालिका के इस एक्शन ने आम जनता के मन में उम्मीद की किरण जगा दी है। संभवतः किसी दिन आम जनता को त्रस्त करने वाले विशिष्ट स्थान प्राप्त तबक़े के ख़िलाफ़ भी इसी तरह कार्यवाही की जाएगी, जिन्होंने लोगों का जीना हराम कर रखा है।
इससे पहले सरकार कुत्तों पर कड़ा रुख़ अपनाती, यूपी में बिजनौर के पास नंदगांव में एक आस्थावान कुत्ते का अवतरण हो गया। इस संत स्वभाव के कुत्ते ने एक मंदिर में हनुमान जी और दुर्गा जी की परिक्रमा कर देश भर में अपने भाइयों के प्रति सहानुभूति की लहर दौड़ा दी। इसके दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी है। उसे ठंड से बचाने के लिए रज़ाई ओढ़ायी जा रही है, तिलक लगाकर पूजा की जा रही है और अच्छे दिनों की आस में मन्नतें मांगी जा रही हैं। यह दीगर बात है कि पशु चिकित्सक उसे गंभीर बीमारी से ग्रसित मानकर उससे बचने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन “अंध श्रद्धा कुत्ते की दुम की तरह होती है।” कल तक जो श्रद्धालु देवताओं से मन्नतें मांगने मंदिर जा रहे थे, आज उन्हीं देवताओं के सामने एक कुत्ते से मनोकामना पूर्ण होने की आस में मंदिर पहुंच रहे हैं। कुत्ता देवताओं के चक्कर लगा रहा है और भक्त कुत्ते के। कुछ लोगों में मांगने की सनातन परम्परा इतनी गहरी पैठ जमा चुकी है कि उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता सामने देवता है, नेता है या कुत्ता।

ख़ैर जो भी हो…हमारी चिंता कुत्तों को लेकर है। देश भर में कुत्तों ने आतंक मचा रक्खा है। कुत्तों की बेजा हरकतों के कारण गालियों में भी इनके नाम का इज़ाफ़ा हुआ है। हाल ही सरकार ने करोड़ों रुपये बहाकर दिल्ली में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मिट (शिखर सम्मेलन) का आयोजन किया। इस सम्मिट में इस क्षेत्र के जानकारों को तो बुलाया गया, साथ ही साथ तमाशबीनों को भी आमंत्रित कर लिया गया जिससे यहां की व्यवस्थाएं चौपट हो गयीं। सरकार को भीड़ पसंद है, अतः सरकार के नुमाइंदों को भीड़ जुटाने की ज़िम्मेदारी दी गयी, देश में सड़क पर घंटों खड़े रहकर झाड़ू लगाने वाली मशीन को निहारने वालों की कमी नहीं है, जिनके दम पर प्रगति मैदान में महाकुम्भ का दृश्य पैदा कर दिया गया।
सुना है इस अफ़रातफ़री के दौरान गलगोटिया के नान बॉयोलॉजिकल कुत्ते ने सरकार को ही काट लिया। शायद वह अपना विदेशी नाम (ओरियन) रख दिये जाने से नाराज़ था! अब सरकार अपने ज़ख़्मों को सहलाते रेबीज़ का इंजेक्शन खोजते फिर रही है। ऐसा अहसान फ़रामोश कुत्ता..! जो मालिकों को ही काटने से बाज़ नहीं आ रहा..! नमक हरामी की भी हद होती है। जिस गलगोटिया को सरकार ने सम्मान दिया, अपना धंधा जमाने के लिए जगह दी, उसी के कुत्ते ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने सरकार के कपड़े फाड़कर शर्मसार किया और काटा सो अलग। लोग कह रहे हैं कुत्ता चीनी है। जबकि गलगोटिया इसे देशी बताकर करतब दिखा रहे थे। बात की सच्चाई जानने के लिए मैंने गहराई से कुत्ते के वीडियो फुटेज देखे और मुझे घोर निराशा हुई। यक़ीनन यह कुत्ता चीनी है वरना ऐसी हिमाक़त न करता। कमबख़्त! कहीं से भी हमारे देशी कुत्तों के लक्षण प्रदर्शित नहीं कर रहा था। अगर यह कुत्ता तलवे चाटने, क़दमों में लोटने, दुम हिलाने, दुम दबाकर भागने, गुर्राने, भौंकने और काटने जैसे लक्षणों के साथ-साथ खुजलाने के गुणों से लैस होता, तो इसे बिना आपत्ति के सार्वभौमिक रूप से हमारे द्वारा विकसित स्वीकार कर लिया जाता।
अरे! नक़ल ही करनी थी तो थोड़ी अक़ल से काम लेते। किसी नेता, नौकरशाह या सेठ के यहाँ रख कर 8-10 दिन की ट्रेनिंग करवा लेते, नॉन बॉयोलॉजिकल कुत्ते के गले में नींबू मिर्ची लटका देते, तो शायद बुरी नज़र से बच जाता, फिर देखते कमाल..! चीनी मुँह ताकते रह जाते। गलगोटिया का ए.आई. सम्मिट से बोरिया-बिस्तर बंधने के बजाय लाल कारपेट पर स्वागत हो रहा होता। गलगोटिया ने कहा था वो नेताजी के विज़न को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं, यहीं वो चूक कर गये। उन्हें इस काम के लिए नेताजी के पुराने पड़ चुके घिसे-पिटे हथकंडों को ही आज़माने की क्या ज़रूरत थी..? यह कोई आम जनता के लिए बनायी गयी योजना थोड़े ही थी, जिसका नाम बदलकर लोगों की आँखों में धूल झोंक देते। सम्मिट को इवेंट बनाने वाले शायद यह भूल गये कि यह बुद्धिजीवियों और तकनीकी महारथियों का समागम था, नेताजी की चुनावी सभा नहीं। ख़ैर! जो भी हो गलगोटिया के कुत्ते ने काटा बड़ी ज़ोर से है, अभी तक चीखें सुनायी दे रही हैं।

आदित्य
प्राचीन भारतीय इतिहास में एम. फिल. की डिग्री रखने वाले आदित्य शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न एनजीओ के साथ विगत 15 वर्षों से जुड़े रहे हैं। स्वभाव से कलाप्रेमी हैं।
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