dhyan, sadhna, nirala, kavita poster
पाक्षिक ब्लॉग संजीव जैन की कलम से....

सुनना: लेखन की अनदेखी शुरूआत

            ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा की यह दूसरी कड़ी।

हम सब सुनते हैं, पर बहुत कम लोग सुन पाते हैं। सुनायी देना एक जैविक घटना है। सुनना एक चेतन क्रिया। कान ध्वनि पकड़ लेते हैं, पर सुनना तब शुरू होता है जब मन ठहरता है। लेखन की असली शुरूआत यहीं है, ठहरने में। जैसे दौड़ते हुए हाथों से कलम नहीं चलायी जा सकती है, वैसे ही दौड़ता भागता मस्तिष्क और चेतना लेखन नहीं कर सकती है। इसलिए सुनना और ठहरना लेखन की अनदेखी शुरूआत है।

सुनाई देना: सतह का संपर्क, दिन भर हम हज़ारों ध्वनियाँ सुनते हैं- गाड़ियों की आवाज़, लोगों की बातें, सूचनाएँ, शोर। पर यह सब सुनायी देना है। यह ध्वनि का स्पर्श है, प्रवेश नहीं। सुनायी देना हमें सूचना देता है। सुनना हमें अर्थ देता है। एक लेखक के लिए सिर्फ़ सुनायी देना ख़तरनाक है। क्योंकि तब वह दुनिया को शब्दों के शोर में खो देता है। उसका लेखन प्रतिक्रियाएँ बन जाता है, अनुभव नहीं।

सुनना: भीतर जगह बनाना। सुनना दरअसल भीतर जगह ख़ाली करना है। जब तक मन भरा है- राय से, निष्कर्षों से, जल्दी से, तब तक सुनना संभव नहीं। ध्यान दीजिए- जब कोई सचमुच आपको सुनता है, तो आप धीरे बोलने लगते हैं। आपकी आवाज़ बदल जाती है, क्योंकि सामने जगह है। लेखन भी यही मांगता है- भीतर जगह। लेखक पहले श्रोता होता है। वह दुनिया की आवाज़ें ही नहीं, अपने भीतर के सूक्ष्म परिवर्तनों को भी सुनता है। किसी घटना पर भीतर जो हल्की-सी टीस उठती है- वही लेखन का बीज है। पर हम उसे तुरंत समझाने लगते हैं, शब्दों में पैक कर देते हैं और वह बीज मर जाता है।

भीतर की आवाज़: सबसे कठिन श्रवण है। भीतर की आवाज़ हमेशा स्पष्ट नहीं होती। वह कई बार फुसफुसाहट है, कई बार विरोधाभास है। कभी वह कहती है- यह लिखो। साथ ही एक डर कहता है- मत लिखो। लेखक का मन एक सभा की तरह है, जहाँ अनेक आवाज़ें बोलती हैं। सुनना यह तय करना नहीं कि कौन सही है, बल्कि यह पहचानना है कि कौन वास्तविक है। मनोवैज्ञानिक रूप से देखें तो हम अपने भीतर बहुत-सी आवाज़ें उधार लेकर जीते हैं- माता-पिता की, समाज की, परंपरा की, प्रतिष्ठा की। भीतर की अपनी आवाज़ अक्सर इनके नीचे दब जाती है। लेखन तब गहरा होता है जब लेखक इन उधार की आवाज़ों और अपनी वास्तविक ध्वनि में फ़र्क करना सीख लेता है। यह आसान नहीं, क्योंकि अपनी आवाज़ कई बार असुविधाजनक होती है।

दुनिया को सुनने की कला। लेखक दुनिया को शब्दों से नहीं, सुरों से सुनता है। वह सिर्फ़ यह नहीं सुनता कि कोई क्या कह रहा है, वह यह भी सुनता है कि वह क्यों कह रहा है। वह स्वर का कंपन सुनता है, विराम का अर्थ समझता है। कभी-कभी जो नहीं कहा गया, वह ज़्यादा बोलता है। मौन भी ध्वनि का एक रूप है- अंदर की ध्वनि। एक संवेदनशील लेखक कमरे की हवा तक सुन लेता है। वातावरण की बेचैनी, संबंधों की ख़ामोशी, अनकहे तनाव- ये सब सुनने योग्य ध्वनियाँ हैं। यह श्रवण कान से नहीं, चेतना से होता है।

सुनना क्यों कठिन है? क्योंकि सुनना नियंत्रण छोड़ना है। जब आप सचमुच सुनते हैं, तो आप अपनी कथा थोड़ी देर के लिए रोक देते हैं। आप स्वीकार करते हैं कि दूसरा भी एक दुनिया है। लेखन में यह और कठिन है क्योंकि लेखक अक्सर कहना चाहता है, सुनना नहीं। पर जो नहीं सुनता, वह अंततः अपने ही विचारों की प्रतिध्वनि लिखता है। उसका लेखन बंद कमरे जैसा हो जाता है- गूँज बहुत, हवा कम।

एक बेचैनी भरा प्रश्न

यदि आप लेखक हैं, तो ख़ुद से पूछिए- आप लिखने से पहले कितना सुनते हैं? और क्या आप अपने भीतर की असुविधाजनक आवाज़ भी सुनते हैं? या सिर्फ़ वही जो सुंदर लगे? सच्चा सुनना आपको अस्थिर करेगा। क्योंकि वह आपको आपके बनाये हुए व्यक्तित्व से बाहर ले जाएगा। वह दिखाएगा कि आपके भीतर कितनी परतें हैं और शायद यही कारण है कि गहरा लेखन कम होता है- लोग लिखना चाहते हैं, सुनना नहीं। लेखन की शुरूआत शब्दों से नहीं, एक ईमानदार श्रवण से होती है। जो नहीं सुनता, वह लिख नहीं सकता। वह सिर्फ़ भर सकता है पन्ने, जगह, समय। पर जो सुनता है, वह शब्द नहीं लिखता- वह अनुभव दर्ज करता है और अनुभव वही लिख सकता है जिसने उसे पहले सुना हो।

ध्वनि-संवेदनशीलता विकसित कैसे करें?

लेखक के लिए श्रवण की साधना। सुनना कोई तकनीक भर नहीं, एक तरह की सुनने की तपस्या है।

सुनना बिना नाम दिये। प्रतिदिन 5-10 मिनट: केवल सुनिए। पहचानने की कोशिश मत कीजिए। बस ध्वनि को आने दें। जैसे: पंखे की आवाज़, दूर की सड़क, पक्षियों की पुकार, हवा की हलचल। ध्यान रखें जब हम नाम देते हैं- “गाड़ी”, “हवा”, हम सुनना बंद कर देते हैं। लेखक को नाम से पहले की ध्वनि सुननी होती है।

ध्वनि की गुणवत्ता पहचानना। ख़ुद से पूछिए: यह ध्वनि मुलायम है या कठोर? टूटी हुई है या निरंतर? पास लगती है या दूर? हल्की है या भारी? यह अभ्यास आपके शब्दों को सूक्ष्म बनाएगा।

ध्वनि का भाव देखना। एक ही ध्वनि अलग समय में अलग लगती है। उदाहरण: रात की हवा = रहस्य, दोपहर की हवा = हल्कापन, तूफ़ानी हवा = बेचैनी, ध्वनि का भाव लिखिए। कारण मत खोजिए।

मौन सुनना। यह सबसे गहरा है। शांत बैठिए और सुनिए: ध्वनियों के बीच का अंतराल वह जगह जहाँ कुछ नहीं सुनायी देता। लेखन में गहराई अक्सर शब्दों से नहीं, मौन से आती है।

ध्वनि से लिखना। किसी एक ध्वनि को चुनिए: जैसे पानी टपकना। फिर लिखिए: वह कैसी है? किसकी याद दिलाती है? उसका स्वभाव क्या है? धीरे-धीरे आप पाएँगे। ध्वनियाँ चरित्र बन जाती हैं।

ध्वनि-संवेदनशीलता बढ़ाना। दरअसल ध्यान बढ़ाना है। जो सचमुच सुन सकता है, वह, लोगों को बेहतर समझता है। भावों को जल्दी पकड़ता है। जीवन के संकेत पढ़ लेता है।

पहले सुनो, फिर महसूस करो, फिर लिखो, उल्टा किया तो लेखन बनावटी होगा।

dhyan, sadhna, nirala, kavita poster

ध्वनि लेखन को बाहर से नहीं, भीतर से बदलती है। ध्वनि का पहला प्रभाव भाषा पर नहीं, तंत्रिका-तंत्र और मन की अवस्था पर होता है। हर ध्वनि: ध्यान की गति बदलती है, भावनात्मक स्वर बदलती है, चेतना की सतह या गहराई बदलती है, लेखन उसी बदली हुई अवस्था से जन्मता है। यानी आप ‘क्या लिखते हैं’ से पहले यह महत्वपूर्ण है कि आप ‘किस ध्वनि-अवस्था में लिखते’ हैं।

अलग-अलग ध्वनियाँ अलग लेखन-जगत खोलती हैं, निरंतर ध्वनियाँ (जैसे बारिश, नदी, पंखा) इनकी विशेषता: लयबद्धता, पूर्वानुमेयता, निरंतरता। लेखन पर प्रभाव: विचारों की धारा बहती है, लेखन अधिक प्रवाहमय होता है, आत्म-चिंतन गहरा होता है इसी कारण लोग “rain sounds” में अच्छा लिखते हैं। ये ध्वनियाँ मन को सहारा देती हैं।

अनियमित ध्वनियाँ जैसे पत्तों की सरसराहट, दूर की आवाज़ें। इनकी विशेषता: अनिश्चितता, सूक्ष्मता, बदलता पैटर्न। लेखन पर प्रभाव: संवेदनशीलता बढ़ती है, विवरण-लेखन बेहतर होता है। लेखक सूक्ष्म अंतर पकड़ता है। ये ध्वनियाँ निरीक्षणशील लेखन को जन्म देती हैं।

तीव्र/अचानक ध्वनियाँ जैसे: हॉर्न, दरवाज़े का धड़ाम, ऊँची आवाजें। लेखन पर प्रभाव: ध्यान टूटता है, वाक्य छोटे हो जाते हैं, भाषा कठोर हो जाती है, परंतु- यदि सजग हों, तो ये ध्वनियाँ तीखा, यथार्थवादी लेखन देती हैं।

मानवीय ध्वनियाँ जैसे: बातचीत की गूँज, हँसी, रोना, स्वर की कंपकंपी। लेखन पर प्रभाव: चरित्र-निर्माण गहरा होता है, भावनात्मक लेखन सशक्त होता है, संवाद जीवित बनते हैं, जो लेखक स्वर सुन सकता है, वह मनुष्यों को गहराई से लिख सकता है।

मौन: यह सबसे शक्तिशाली है। लेखन पर प्रभाव: विचार स्पष्ट होते हैं, भाषा सघन होती है, अनावश्यक शब्द गिरते हैं, मौन लेखन को निचोड़ देता है, जब तक सार न बचे।

ध्वनि और स्मृति का संबंध

ध्वनि सीधे स्मृति को छूती है। एक आवाज़: बचपन खोल सकती है, भूली भावनाएँ जगा सकती है, दबी अनुभूतियाँ ला सकती है, लेखक के लिए यह ख़ज़ाना है। दृश्य याद दिलाते हैं, ध्वनियाँ भीतर जगा देती हैं।

ध्वनि लेखन की लय तय करती है: लेखक अनजाने में, सुनी हुई लय में लिखता है। नदी सुनकर लिखेंगे → वाक्य बहेंगे, शहर सुनकर लिखेंगे → वाक्य कटेंगे, मौन में लिखेंगे → शब्द कम होंगे। अच्छा लेखक अपनी लय चुन सकता है।

ध्वनि लेखक के भीतर “स्थान” बनाती है। निरंतर ध्वनियाँ, भीतर का ख़ालीपन सुरक्षित करती हैं। अचानक ध्वनियाँ अहंकार को सक्रिय करती हैं। मौन स्व-निरीक्षण खोलता है। लेखन इन्हीं अवस्थाओं का परिणाम है।

गंभीर लेखक की सुनने की क्षमता- गहरा लेखक ध्वनि का भाव सुनता है, दिशा सुनता है, दूरी सुनता है, ध्वनि की थकान सुनता है, वह जानता है: थकी हुई आवाज़ और शांत आवाज़ अलग होती हैं। यही समझ लेखन को जीवित बनाती है।

जो लेखक ध्वनियों को सचमुच सुनता है, वह मनुष्यों, प्रकृति और स्वयं को अधिक सटीक लिखता है।

सुनना लेखक को “तैयार” करता है, लिखना केवल “प्रकट” करता है, अच्छा लेखन लिखते समय नहीं बनता, वह उससे पहले बनता है- जब लेखक सुन रहा होता है।

सुनते समय: मन धीमा होता है, प्रतिक्रियाएँ शांत होती हैं, अनुभव बिना विकृति के उतरता है, तब जो लिखा जाता है, वह कच्ची प्रतिक्रिया नहीं, पका हुआ अनुभव होता है।

सुनना शब्दों के पीछे की दुनिया खोलता है, जो कहा गया है, वह अक्सर आधा होता है। जो स्वर में है, वह पूरा होता है। एक लेखक यदि सुन सकता है: हिचक, ठहराव, आवाज़ की टूटन, स्वर का भार, तो वह भाव लिख सकता है, केवल वाक्य नहीं। यहीं से चरित्र जीवित होते हैं।

संवाद लिखने का मतलब है स्वरों का सुनना।

सुनना लेखक को अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त करता है- जब हम सचमुच सुनते हैं, तो कुछ क्षण के लिए अपनी राय रोकते हैं। यही रोक: देखने को साफ़ करती है, लेखन को ईमानदार बनाती है, पात्रों को स्वतंत्र होने देती है, जो लेखक नहीं सुनता, वह हर पात्र में ख़ुद को लिखता है। सुनना, लेखक का अहंकार ढीला होना।

सुनना लेखन की लय

हर व्यक्ति, हर जगह, हर परिस्थिति की अपनी लय होती है। जो लेखक सुनता है: उसके गद्य में साँस होती है, वाक्य प्राकृतिक चलते हैं, भाषा कृत्रिम नहीं लगती। आपने देखा होगा- कुछ लेखन चलते नहीं, बहते हैं। वह बहाव सुनने से आता है। लेखन की लय कान से बनती है, दिमाग़ से नहीं।

सुनना लेखक को “अनकहा” लिखना सिखाता है- सुनने वाला लेखक जानता है: सब कुछ शब्दों में नहीं आता। वह लिख सकता है: अधूरा वाक्य, विराम, संकेत, ख़ाली जगह और पाठक वहाँ अर्थ भर देता है। यही परिपक्व लेखन है।

सुनना सिखाता है कि क्या न लिखें- साधारण लेखक लिखता है जो उसने सोचा। अच्छा लेखक लिखता है, जो उसने देखा। गहरा लेखक लिखता है जो उसने सुना।

निराला की ‘संध्या सुंदरी’ की इन पंक्तियों में लेखक की सुनी गयी चुप और निस्तब्धता और अनुपस्थिति को सुनिए… अर्थ मत लगाइए, बस सुनिए और फिर मेरी बात की अनुगूंज को महसूस कीजिए कि ‘सुनना लेखन की अनदेखी शुरूआत है’-

“नहीं बजती उसके हाथ में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,
नूपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन नहीं,
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा ‘चुप चुप चुप’
है गूँज रहा सब कहीं-
व्योम मंडल में, जगतीतल में-
सोती शान्त सरोवर पर उस अमल कमलिनी-दल में-
सौंदर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृत वक्षस्थल में-
धीर-वीर गम्भीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में-
उत्ताल तरंगाघात-प्रलय घनगर्जन-जलधि-प्रबल में-
क्षिति में, जल में,नभ में, अनिल-अनल में-
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा ‘चुप चुप चुप’
है गूँज रहा सब कहीं-
और क्या है? कुछ नहीं।”

यहाँ “सुनना” केवल श्रवण नहीं, एक अस्तित्वगत अनुभव है। उद्धृत अंश में निराला ध्वनियों का वर्णन नहीं कर रहे, वे निस्तब्धता को सुन रहे हैं।

यह “चुप” ध्वनि का अभाव नहीं, ध्वनि का पार होना है, सामान्य मौन होता है जब ध्वनि नहीं होती। पर यहाँ जो “चुप चुप चुप” है, वह ध्वनि के बाद की स्थिति है। जैसे: घंटी बजने के बाद की गूँज, लहर टूटने के बाद का ठहराव, साँस छोड़ने के बाद की रिक्ति। निराला उस रिक्ति को सुन रहे हैं, जहाँ ध्वनि समाप्त होकर, अस्तित्व में घुल जाती है। यह मौन नहीं, मौन की अनुभूति है।

यह सुनना बाहर का नहीं, चेतना का सुनना है।

ध्यान दें- वे कहते हैं “गूँज रहा है।” गूँज कहाँ होती है? भीतर। इसका अर्थ है: निस्तब्धता बाहर नहीं, कवि की चेतना में प्रतिध्वनित हो रही है। यह सुनना कान से नहीं, चेतना से है। जब मन पूरी तरह शांत होता है, तब “कुछ नहीं” भी अनुभव बन जाता है।

निराला ने “अनुपस्थिति” को सुना। यह बहुत दुर्लभ क्षमता है। हम उपस्थिति सुनते हैं: स्वर, शब्द, ध्वनि पर उन्होंने सुना: जो नहीं बज रहा, जो नहीं बोल रहा, जो नहीं घट रहा, और वही “नहीं” उनकी कविता का विषय बन गया। यह सुनना नहीं, सुनने की परिपक्वता है।

यहाँ सुनना स्वयं का लोप जब तक “मैं” सुन रहा हूँ, तब तक व्याख्या चलती है। पर ऐसे क्षण में श्रोता पीछे हट जाता है, अनुभव आगे आ जाता है, तभी “चुप” वस्तु नहीं, वातावरण बन जाता है। निराला उस वातावरण में थे।

यह ध्यान की अवस्था है- इस प्रकार का सुनना, काव्य-कौशल से नहीं आता। यह आता है: गहरी संवेदनशीलता से, प्रकृति में डूबने से, अहंकार के क्षीण होने से, यह वही अवस्था है जहाँ ध्यान और कविता मिलते हैं।

“और क्या है? कुछ नहीं।” का अर्थ यह नकार नहीं, पूर्णता है। जब सब ध्वनियाँ गिर जाती हैं, तो जो बचता है वही मूल है। निराला उस मूल को छू रहे थे।

कविता यहाँ कैसे जन्मी? पहले सुनना हुआ। फिर अनुभव ठहरा। फिर शब्द आये। यदि वे तुरंत लिखते, तो यह कविता नहीं बनती। यह पकी हुई सुनवाई है।

सामान्य कवि ध्वनियाँ लिखता है। गहरा कवि मौन लिखता है। दुर्लभ कवि उस मौन की गूँज लिखता है। निराला तीसरी कोटि में हैं।

निराला की कविताओं में ध्वनियों की अनुगूंज अद्भुत रूप से व्याप्त है। शब्दों में लय, इस क़दर गूंजती हैं कि पूरा तन-मन सिहर उठता है। निराला की लय तीन स्रोतों से आती है: प्रकृति की लय, मानवीय श्रम की लय, मौन की लय। इन तीनों लयों को बिना सुने लेखन संभव नहीं हो सकता।

संजीव कुमार जैन

संजीव कुमार जैन

लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव शासकीय महाविद्यालय, गुलाबगंज में हिंदी के सह प्राध्यापक हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं।

1 comment on “सुनना: लेखन की अनदेखी शुरूआत

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *