मख़दूम, makhdoom
प्रगतिशील आंदोलन के प्रसिद्ध शायर मख़दूम मोहिउद्दीन (4 फरवरी 1908–25 अगस्त 1969) की याद के दिन श्रद्धांजलि स्वरूप यह चर्चित लेख...
अली सरदार जाफ़री की कलम से....

मख़दूम: सुर्ख़ सवेरे का शायर

          रात एक दोस्त के घर में दावत थी, जिसमें तीन सीलोनी, एक पंजाबी, चार गुजराती, एक बंगाली और पाँच हिंदुस्तानी शरीक थे। एक छोटी-सी टोली में कई ज़बानों के अदीब-ओ-फ़नकार थे। जिसमें लंका का सबसे बड़ा चित्रकार भी शामिल था। उसकी बनायी हुई चंद तस्वीरें दीवारों पर लगी हुई थीं। खाने के बाद इधर-उधर की बातें हो रही थीं कि किसी ने बंगाली मेहमान से गाना सुनाने की फ़रमाइश की। उसने टैगोर के कई गीत और नज़्में सुनायीं। फिर ख़ुद ही ये प्रस्ताव पेश किया कि कोई ऐसी चीज़ गायी जाये, जिसमें सब शरीक हो सकें। पहले टैगोर का ‘जन-गण-मन’ शुरू हुआ। एक हिंदुस्तानी और एक सीलोनी ख़ातून ने अपनी आवाज़ गाने वाले की आवाज़ के साथ मिला ली। कुछ और लोग होंठों ही हांठों गुनगुनाते रहे। बंगाली मेहमान ने कहा, ‘‘अच्छा अब हम इक़बाल का तराना-ए-हिन्दी गाएंगे। ‘‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा।’’

अबकि गाने वाला तन्हा था। उसकी आवाज़ कमरे में अकेली फड़फड़ा रही थी। दो-तीन शे’रों के बाद, वो चुप हो गया। फिर यकायक जैसे सूखी डाली से हरी कोंपल फूट निकली। उसने मख़दूम का गीत ‘जंग-ए-आज़ादी’ छेड़ दिया। कई आवाजे़ं और बुलंद हुईं और धीमी पड़ गयीं। गीत कई बार शुरू हुआ और कई बार बीच से टूट गया। आख़िर कई कोशिशों के बाद, सब एक साथ गाने लगे।

ये जंग है जंग-ए-आज़ादी
आज़ादी के परचम के तले
हम हिंद के रहने वालों की
महकूमों की मज़बूरों की
आज़ादी के मतवालों की
दहक़ानों की मज़दूरों की
ये जंग है जंग-ए-आज़ादी

सारा कमरा गूँज रहा था। दीवार पर लगी लंका की शांत और स्थिर तस्वीर के रंगीन होंठों में भी जान-सी पड़ गयी। और वो भी गाने लगीं। खिड़की के बाहर साहिल से टकराती हुई समंदर की मौजों ने थोड़ी देर ताल दी। फिर इस गीत के सुरीले अल्फ़ाज़ को अपनी गोद में उठा लिया। अजनबी देश के अजनबी साहिलों पर हिंदुस्तान की आवाज़ को फैलाने चली गयीं।

सारा संसार हमारा है, पूरब पच्छिम उत्तर दक्कन
हम अफ़रंगी हम अमरीकी हम चीनी जांबाज़ाने वतन
हम सुर्ख़ सिपाही ज़ुल्म शिकन, आहनपैकर फ़ौलादबदन
ये जंग है जंग-ए-आज़ादी
आज़ादी के परचम के तले…
वो जंग ही क्या वो अमन ही क्या दुश्मन जिसमें ताराज न हो
वो दुनिया दुनिया क्या होगी जिस दुनिया में स्वराज न हो
वो आज़ादी आज़ादी क्या मज़दूर का जिसमें राज न हो
ये जंग है जंग-ए-आज़ादी
आज़ादी के परचम के तले…
लो सुर्ख़ सवेरा आता है, आज़ादी का आज़ादी का
गुलनार तराना गाता है, आज़ादी का आज़ादी का
देखो परचम लहराता है, आज़ादी का आज़ादी का
ये जंग है जंग-ए-आज़ादी
आज़ादी के परचम के तले…

समंदर की मौजों के हर थपेड़े में ये मिसरे गूँज रहे थे। आज से तीन बरस पहले जब मख़दूम ने यह नज़्म ‘नया अदब’ के लिए भेजी थी, तो लिखा था, ‘‘वो दिन बहुत जल्द आने वाला है, जब ये नज़्म सारे हिंदुस्तान की ज़ुबान पर होगी।’’

उसके बाद एक साल बाद, सिब्ते हसन ने मख़दूम को एक ख़त में लिखा था, ‘‘तुम्हें मालूम है कि वो कौन-सी नज़्म है, जिसने तुम्हें हिंदुस्तान के अवाम का महबूब और मक़बूल शायर बना दिया है। लाखों किसानों और मज़दूरों को तो ये भी मालूम नहीं कि इस नज़्म का लिखने वाला कौन है? जलसों की जो रिपोर्ट हमारे अख़बार में शाए होने के लिए यहाँ आती है, उसमें अक्सर लिखा होता है कि जलसे की कार्यवाही ‘जंग-ए-आज़ादी’ से शुरू हुई। जिसे पाँच लड़कों और एक जत्थे ने या दस लड़कियों की एक टोली ने मिलकर गाया। शायद रिपोर्टर को इसकी ख़बर नहीं कि ये नज़्म मख़दूम की है। आम लोगों में नज़्म की यह स्वीकार्यता हज़ारों साहित्यिक आलोचनाओं पर भारी है। मैंने ख़ुद ऐसे कई जलसों में शिरकत की है। और मैंने देखा है कि जब गाने वालों की टोली इस बंद पर पहुँची है कि ‘लो सुर्ख़ सवेरा आता है, आज़ादी का आज़ादी का’, तो अक्सर ऐसा हुआ कि जलसे के अलग-अलग कोनों से यही मिसरे दोहराये गये हैं। और सुनने वाले ख़ुद सुनाने वालों में बदल गये हैं।’’

सिब्ते हसन के इस बयान पर हिंदुस्तान का हर कोना गवाही देगा। हैदराबाद के उस गर्ल्स कॉलेज का तो ज़िक्र बेकार है, जिसमें लड़कियों ने एक स्थायी ‘मख़दूम कॉर्नर’ बना लिया है। जहाँ हफ़्ते में एक बार सब लड़कियाँ जमा होकर, ‘जंग-ए-आज़ादी’ ही नहीं गातीं, बल्कि मख़दूम की दूसरी नज़्मों का भी कुरआन की तरह से पाठ करती हैं। हैदराबाद में तो खै़र मख़दूम की पूजा होती है। उसकी ज़ुबान-ओ-क़लम से निकला हुआ एक-एक लफ़्ज़ वहाँ के बाशिंदों के दिलों पर नक़्श हो गया है। लेकिन मैंने बंगाल में, चटगाँव में, कर्नाटक के क़स्बों में, यूपी के देहात में, बंबई के मज़दूर इलाके़ में, हर तरह के आदमियों को ‘जंग-ए-आज़ादी’ गाते सुना है। शुरू-शुरू में मख़दूम का तराना सुनकर, बहुत-से यौन संबंधी और मानसिक रोगों के शिकार मनोवैज्ञानिक अदीबों और शायरों ने कहा था कि ‘‘ये प्रोपगेंडा है। इसका विषय स्थायी नहीं है। जंग ख़त्म होने के बाद किसी को एक लफ़्ज़ भी याद नहीं रहेगा।’’

मख़दूम, makhdoom

यूरोप की भयानक जंग ख़त्म हो गयी, लेकिन हमारी जंग-ए-आज़ादी जारी है, बल्कि और ज़्यादा चरम पर पहुँच गयी है। मख़दूम की नज़्म आज भी हिंदुस्तान की फ़िज़ाओं में गूँज रही है। उसमें इंक़लाब-ए-फ्रांस के मशहूर तराने ‘ला मार्सिलेज़’ की-सी शिद्दत और अंतरराष्ट्रीय मज़दूर आंदोलन के गीत, ‘इंटरनेशनल’ का-सा जोश-ओ-ख़रोश और उठान है। ज़ाहिर है कि इसको सिर्फ़ हिंदुस्तान की तहरीक-ए-आज़ादी ने नहीं, बल्कि सारी दुनिया की जंग-ए-आज़ादी ने मुतास्सिर किया है। फिर भी इसमें हिंदुस्तान के दिल की धड़कन ज़्यादा तेज़ है। टैगोर के ‘जन-गण-मन’ में पहाड़ी झरनों की गुनगुनाहट और उसका नग़मा मिल गया है। जैसे शीशे की तरह चमकते हुए पारदर्शी पानी की मुसलसल धार पड़ रही हो। इक़बाल के तराना-ए-हिंदी में एक दरिया का-सा बहाव है। जिसका पानी हिचकोले खा-खाकर आगे बढ़ रहा हो। लेकिन मख़दूम की ‘जंग-ए-आज़ादी’ में आँधियों की सनसनाहट, तूफ़ानों का जोश-ख़रोश और तलवारों की झंकार सुनायी देती है। इक़बाल और टैगोर के मुक़ाबले में मख़दूम की शायराना हैसियत कुछ भी नहीं है। वो दोनों हिमालय पहाड़ों की तरह सरबुलंद हैं। जिनके साये में खड़ा होकर, मख़दूम अपने साज़ पर गा रहा है। फिर इक़बाल और टैगोर की नज़्म और गीत का हिंदुस्तान छोटा और सीमित है। वो दुनिया के नक़्शे में एक अलग भौगोलिक भाव लिये हुए है। लेकिन मख़दूम की ‘जंग-ए-आज़ादी’ का हिंदुस्तान विस्तृत और बेकिनारा है। उसकी सरहदें कहीं ख़त्म ही नहीं होतीं। वो सारी दुनिया में फैली हुई हैं। उसकी आज़ादी के सिपाही सिर्फ़ हिंदुस्तानी नहीं, बल्कि अमरीकी, अफ्रीकी, चीनी, रूसी सभी हैं। उसकी आज़ादी के सुर्ख़ सवेरे का गुलनार परचम पश्चिम और पूरब में एक साथ लहरा रहा है। इक़बाल और टैगोर की नज़्मों की उत्प्रेरक हिंदुस्तान की ‘क़ौमी तहरीक-ए-आज़ादी’ थी। मख़दूम की नज़्म की उत्प्रेरक सारी इंसानियत की अंतरराष्ट्रीय जद्दोजहद है।

(पुस्तक अंश : गार्गी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और ज़ाहिद ख़ान द्वारा संपादित ‘मख़दूम मोहिउद्दीन सुर्ख़ सवेरे का शायर’ पुस्तक से यह वैचारिकी आब-ओ-हवा के लिए विशेष रूप से प्राप्त)

1 comment on “मख़दूम: सुर्ख़ सवेरे का शायर

  1. लाजवाब नज़्म,,,,जो हिंदुस्तान ही नहीं सारे जहां के आजाद खयालों की पैरवी करती है।

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