
- August 11, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे.. मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का एक भाव। इस सिलसिले में लगातार साथी जुड़ रहे हैं। साप्ताहिक पेशकश के रूप में हर सोमवार आब-ओ-हवा पर अमूल्य पुस्तक का साथ यानी 'शुक्रिया किताब'.. इस बार दो किताबों पर संक्षिप्त किंतु सारगर्भित टिप्पणियां -संपादक)
डॉ. अनीता पंडा 'अन्वी' और शेफाली श्रीवास्तव की कलम से....
"मैनी लाइफ मैनी मास्टर्स" और "सपनप्रिया".. दो यादगार किताबें
डाॅ. ब्रायन वीज़ (Dr. Brian Weiss) द्वारा लिखित पुस्तक “मैनी लाइफ़ मैनी मास्टर्स” (Many Life Many Masters) श्रीमद्भगवद्गीता में निहित आत्मा संबंधी धारणा का सत्यापन है। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-
“न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोsरंजना पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।। (अध्याय-2, सांख्ययोग)
अर्थात् यह आत्मा न कभी जन्मती है न कभी मरती ही है। यह जन्मरहित, नित्य,श्वत तथा सनातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।
यह धारणा बचपन से सुनती आ रही थी पर एक प्रश्न सदा बना रहता कि क्या यह वास्तव में सत्य है? पुनर्जन्म होता है? कई घटनाएं पढ़ीं पर तर्क के तराज़ू पर खरी नहीं उतरीं। प्रतिदिन की चुनौतियाँ, संघर्ष, दुःख, निराशा और अस्वस्थता आदि से विचलित मन इन सबका कारण ढूँढ रहा था। उसने ‘मुझे ही क्यों चुना?’ मुझे इसका उत्तर चाहिए था।
मेरी बेटी ने “मैनी लाइफ मैनी मास्टर्स” पुस्तक भेंट की। यह पुस्तक प्रसिद्ध मनोचिकित्सक ब्रायन वीज़ और उनकी युवा रोगी जुलियाना के पास्ट-लाइफ़ थेरेपी की सत्य घटना पर आधारित है। अपने वर्तमान जीवन के कष्टों से मुक्त होने के लिए वह मनोचिकित्सक के पास आती है और उसकी आत्मा कई जन्मों की यात्रा तय करती है। कई सेशन के बाद जब उसे अपने शारीरिक एवं मानसिक दुःख का कारण, जो कि पिछले जन्म से संबंधित था, पता चलता है, तो वह मानसिक रूप से हल्का महसूस करती है।
मैं इस पुस्तक की ऋणी हूँ क्योंकि इसने मेरे प्रश्नों और विचारों को एक रोशनी दी। अक्सर हम अपने दुःख का कारण दूसरों को या अपने भाग्य को देते हैं पर हमें नहीं पता कि जो कुछ घट रहा है, उसका कारण पिछले जन्म से है। इस पुस्तक से जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण बदल गया। अब मैं जीवन में घटित हर घटनाओं के लिए उत्तरदायी स्वयं को मानती हूँ दूसरों को नहीं। इससे हमारे संबंध बेहतर हो गये। ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, क्रोध आदि नकारात्मता कम हो गयी। ख़ुद से ख़ुद की पहचान हुई। सबसे अच्छा परिवर्तन यह हुआ कि मैं वर्तमान में ही जीने लगी और जीवन के शेष समय में उपयोगी कार्यों में व्यस्त रखने का प्रयास करने लगी।
सोचती हूँ कि मेरी पसन्दीदा कालजयी पुस्तकें बहुत हैं, पर इस पुस्तक ने मेरे जीवन की दिशा और दशा ही बदल दी। मुझे सच का आईना दिखाया। शुक्रिया ब्रायन वीज़! आपकी लगभग सभी पुस्तकें पढ़ीं पर “मैनी लाइफ मैनी मास्टर्स” जैसी दूसरी नहीं।
-डाॅ. अनीता पंडा ‘अन्वी’
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किताबों से रिश्ता बहुत कम उम्र में ही जुड़ गया था। चंपक और नंदन से शुरू हुआ यह सफ़र चंद्रकांता संतति, प्रेमचंद के गोदान, ग़बन, कफ़न को पार करता हुआ कब कमलेश्वर, मंटो, शिवानी और अमृता प्रीतम तक पहुंच गया, पता ही नहीं चला। किताबों के इस सफ़र में एक किताब ऐसी भी है जिसे मैं बार-बार पढ़ती हूँ.. किताब का नाम है- सपनप्रिया। लेखक हैं विजयदान देथा।
मूलतः राजस्थानी भाषा के लेखक किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पहेली और परिणति फिल्मों के कहानीकार हैं। कहानियाँ कहने का उनका एक निराला ही ढंग है, लोकभाषा के पुट के साथ-साथ जिज्ञासा निरंतर बहती है। सपनप्रिया की कहानियाँ पढ़ते समय ऐसा अनुभव होता है जैसे दादी या नानी धीरे-धीरे थपकियां देते हुए एक अलग ही दुनिया में लिये जा रहीं हों। जब कभी बचपन को, सुकून भरी नींद को तलाश करें तो एक बार सपनप्रिया की अद्भुत कहानियों से भी मुलाक़ात अवश्य करें।
इस किताब की अनुशंसा इसलिए भी क्योंकि यह किताब हर वर्ग के लिए है, जहाँ बच्चों को राजा-रानी की, पशु-पक्षियों की कहानियों का आंनद आता है तो वहीं बुद्धिजीवी जीवन के गूढ़ रहस्य भी सहज ही पा जाते हैं। रसभरी भाषा कहानी के अंत तक कौतुहल बनाये रखती है।
– शेफाली श्रीवास्तव

डॉ. अनीता पंडा 'अन्वी'
लेखक, रेडियो कलाकार के साथ ही कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन से भी संबद्ध। मेघालय से एक त्रिभाषी पत्रिका के संपादन मंडल में शामिल। हिंदी में लेखन के लिए अनेक पुरस्कार प्राप्त, छह पुस्तकें और 100 से ज़्यादा लेख आपके नाम हैं। आप सामाजिक सरोकारों के लिए भी काम करती हैं और पूर्वोत्तर में हिंदी के प्रचार प्रसार से भी जुड़ी हैं।

शेफाली श्रीवास्तव
पेशे से शिक्षक हैं और साहित्य, संस्कृति व सरोकारों की विरासत को सहेजती हैं। अपने माता पिता प्रतिष्ठित साहित्यकार महेश अनघ एवं प्रमिला अनघ की स्मृति में पुरस्कारों का आयोजन भी करती रही हैं और गाहे ब गाहे लेखनी चलाती हैं लेकिन ख़ुद को साहित्यकार या लेखक नहीं मानतीं।
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किताबों के बारे जानते रहना, ज़रूरी काम है ।
आभार