
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
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विजय कुमार स्वर्णकार की कलम से....
मात्रा पतन: शहरों के नाम
शे’र में शहरों के नाम आते रहे हैं। जैसे सबको अपना नाम बहुत प्रिय होता है, उसी तरह शहर का नाम उसके निवासियों के लिए असाधारण होता है। यह सहज आचरण है कि किसी के नाम को ग़लत उच्चारित नहीं करना चाहिए। शे’र में ग़लत उच्चारण तो नहीं होता लेकिन कहीं-कहीं शहर के नाम की किसी मात्रा को दबाकर पढ़ने के उदाहरण मिलते हैं। ध्यातव्य है कि ग़ज़ल में किसी के नाम के साथ छेड़छाड़ वर्जित है। बोलचाल में “आगरा” को “आगरे” और “पूना” को “पुणे” कर देना अलग विषय है। हम यहां यह छान-बीन कर रहे हैं कि ग़ज़ल में शहरों के नाम के साथ मात्रा पतन का परिदृश्य क्या है और यह कितना सही या ग़लत है। कुछ शे’र देखिए-
हैदराबाद और लंगर याद है
अबके दिल्ली में मुहर्रम क्या करें -दाग़
इस शे’र में मात्रा पतन नहीं है लेकिन वस्ल है। जब बोलेंगे तो “हैदराबादौर” की आवाज़ आएगी तभी शे’र वज़्न में होगा। अगर इसे नाम का बिगड़ना माना जाये, तो यह ज़्यादती होगी। कुछ अन्य शे’र देखिए
शाहिद-ए-मज़्मूँ तसद्दुक़ है तिरे अंदाज़ पर
ख़ंदा-ज़न है ग़ुंचा-ए-दिल्ली गुल-ए-शीराज़ पर
– इक़बाल
हम हैं रुसवा कुन-ए-दिल्ली-ओ-लखनऊ अपनी क्या ज़िंदगी अपनी क्या आबरू
मीर दिल्ली से निकले गये लखनऊ तुम कहां जाओगे हम कहां जाएंगे
– जॉन एलिया
दूसरे शे’र में 212 की आठ आवृत्ति वाली पहली पंक्ति में “दिल्ली” 21 पर है। यहां योजक “ओ” से मनमानी मदद लेकर वज़्न की भरपाई की गयी है। “दिल्ली” बोलने की सूरत यहां उसी तरह बिगड़ी है जैसे कि पहले शे’र में “गुंचा” की। लेकिन यह ट्रिक किसी नाम के मात्रा पतन के लिए किस तरह मान्य है? अब यह शे’र देखिए-
बगदाद दिल्ली मास्को लंदन के दरमियान
बारूद भी बिछाएगी इक्कीसवीं सदी
– बशीर बद्र
इस शे’र में “दिल्ली” और “मास्को” को “दिल्लि” और “मासकु” (साथ ही ‘सकु’ को ‘स’ और ‘कु’ अलग-अलग 11 के वज़्न पर है) पढ़ने पर शे’र वज़्न में आएगा। इस तरह का मात्रा पतन शुद्धतावादियों ने वर्जित माना है। यहाँ क्यों का उत्तर शायद यही हो कि शब्द के उच्चारण बिगड़ने से शब्द को चिह्नित करने में भ्रम हो सकता है। लेकिन इस तर्क पर वस्ल और योजक वाली ट्रिक भी सटीक नहीं है। कुछ और शे’र देखिए-
हम दिल्ली भी घूम आये हैं लाहौर भी घूमे
ऐ यार मगर तेरी गली तेरी गली है
– बशीर बद्र
ऐ ‘मुसहफ़ी’ तू इनसे मुहब्बत न कीजियो
ज़ालिम ग़ज़ब की होती हैं ये दिल्ली वालियां
– मुसहफ़ी गुलाम हमदानी
दिल्ली का ज़िक्र शाइरी में बार-बार आता है। ये दोनों शे’र दिल्ली के उच्चारण को एक सा बरत रहे हैं अर्थात “दिल्लि” की तरह 21 पर। बशीर “बद्र” भले ही व्याकरण प्रेमी न हों लेकिन “मुसहफ़ी” तो उस्तादों के उस्ताद थे और लखनवी थे। तर्क यह दिया जाएगा कि तब व्याकरण ने अपने स्वरूप को प्रगट नहीं किया था। व्याकरण बाद ही की चीज़ होती है अतः ये उदाहरण पर्याप्त हैं कि मात्रा गिर जाने से कुछ नहीं बिगड़ेगा।
अब एक नज़्म के टुकड़े का अवलोकन करते हैं-
…उठो खेलते अपनी ज़ंजीर से
उठो ख़ाक-ए-बंगाल-ओ-कश्मीर से
उठो वादी-ओ-दश्त-ओ-कोहसार से
उठो सिंध-ओ-पंजाब-ओ-मल्बार से
उठो मालवे और मेवात से
महाराष्ट्र से और गुजरात से
अवध के चमन से चहकते उठो
गुलों की तरह से महकते उठो
– अली सरदार ज़ाफ़री
इसमें “मलाबार” (जो वास्तव में मालाबार है) के उच्चारण को देखिए। इस “मलाबार” में ‘ला’ की मात्रा वज़्न की भरपाई के लिए गिरायी गयी है। साथ ही “महाराष्ट्र” को 1221 पर लिया गया है- यह सही है। अब “चकबस्त” का शे’र देखिए। इसमें “महाराष्ट्र” 221 पर है। इसमें ‘मह’ को एक ही अक्षर की तरह बरता है “जैसे” तुम्हें में ‘मह’ को।
मौत महाराष्ट्र की थी या तिरी मरने की ख़बर
मुर्दनी छा गयी इंसान तो क्या पत्थर पर
– चकबस्त
इन सबसे यह तो साफ़ है कि नाम के साथ छेड़छाड़ जैसी स्थिति पहले भी थी और अब भी है। जब शहरों के नाम याद करता हूं तो बहुत से नाम आते हैं, जिनका अंतिम अक्षर मात्राहीन होता है जैसे कानपुर, इंदौर, भोपाल, हैदराबाद, बनारस, अलीगढ़ आदि। ऐसे में बहुत से उदाहरण नहीं मिलते लेकिन जितने मिलते हैं वे पर्याप्त हैं।
कलकत्ता के हसीनों को जब देख लेता हूँ
उस वक़्त दिल में होता है सौदा-ए-लखनऊ
– वाजिद अली शाह अख़्तर
इसमें “कलकत्ता” 222 से छिलकर 221 रह गया है। एक और तरह का ट्विस्ट नाम के साथ देखा गया है।
अगले वक़्तों में लुटा करते थे रह-रौ अक्सर
हम तो इस अहद में भी लुट के मगर जाते हैं
फ़ैज़ाबाद से पहुँचा हमें ये फ़ैज़ ‘अख़्तर’
कि जिगर पर लिये हम दाग़-ए-जिगर जाते हैं
ये दोनों शे’र अख़्तर शीरानी के हैं। पहला शे’र वज़्न की तस्दीक के लिए है। दूसरे शे’र में “फैज़ाबाद” पर ग़ौर कीजिए। यह 2221 की बजाय 21221 पर लिया गया है, फ़ैज़आबाद के उच्चारण पर। एक और शे’र देखिए-
मालूम ही है आपको बंदे का एड्रेस
सीधे इलाहाबाद मेरे नाम भेजिए
– अकबर इलाहाबादी
“एड्रेस” को छोड़ते हैं सीधे “इलाहाबाद” पर आते हैं। यहां “इलाहाबाद” शब्द को ‘इलाहबाद’ की तरह बरता गया है। दो अलग-अलग शब्द जब जुड़ते हैं तो पहले शब्द की मात्रा गिरा दी जाती है जैसे चारागर, कारीगर, ज़िंदाबाद, वंदे मातरम आदि में। यहाँ “इलाहाबाद” में यही तरक़ीब उपयोग में लायी गयी प्रतीत होती है।
इस विषय में बस इतना ही कि मात्रा पतन नाम को विकृत न करे, सुनने वालों को अजीब न लगे, इतना ध्यान अवश्य दिया जाना चाहिए।

विजय कुमार स्वर्णकार
विगत कई वर्षों से ग़ज़ल विधा के प्रसार के लिए ऑनलाइन शिक्षा के क्रम में देश विदेश के 1000 से अधिक नये हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के व्याकरण के प्रशिक्षण में योगदान। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता की भूमिका के साथ ही शायरी में सक्रिय। एक ग़ज़ल संग्रह "शब्दभेदी" भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। दो साझा संकलनों का संपादन। कई में रचनाएं संकलित। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
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