
- March 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
आधुनिक युद्ध और कराहता पर्यावरण
प्राचीन काल के युद्धों की स्मृति मात्र ही हमें एक ऐसे युग में ले जाती है, जहाँ शस्त्रों का स्वरूप प्राकृतिक और सीमित था। पुराने समय के धनुष बाण से लड़े जाने वाले युद्ध एक प्रकार से ईको फ़्रेंडली कहे जा सकते थे क्योंकि उनमें प्रयुक्त सामग्री सीधे तौर पर प्रकृति से आती थी और पुन: उसी में विलीन हो जाती थी। उस दौर में न तो ज़हरीली गैसों का उत्सर्जन होता था और न ही मिट्टी की उर्वरता को सदा के लिए नष्ट करने वाले घातक रसायनों का प्रयोग किया जाता था। एक योद्धा के तरकश से निकला बाण केवल लक्ष्य को भेदता था। आज की मिसाइलें पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को ही छलनी कर देती हैं।
समय के साथ मनुष्य की विध्वंसक शक्ति बढ़ती गयी और हम लकड़ी के बाणों से निकलकर बारूदी विनाश के उस भयावह युग में आ गये हैं, जहाँ जीत का जश्न मनाने के लिए न तो स्वच्छ वायु बचती है और न ही रहने योग्य भूमि।
आज की बारूदी मिसाइलों और आधुनिक हथियारों से पर्यावरण को जो अपूरणीय क्षति हो रही है, वह किसी भी राजनीतिक विजय से कहीं अधिक महंगी है। जब कोई मिसाइल दागी जाती है, तो वह केवल जीवन ही नहीं लेती बल्कि वातावरण में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फ्यूरिक एसिड जैसे हानिकारक तत्व घोल देती है। युद्ध क्षेत्रों में होने वाले विस्फोटों से निकलने वाला सूक्ष्म गर्द और जहरीला धुआं मीलों दूर तक फैलकर लोगों के फेफड़ों में ज़हर भर रहा है।
बमबारी से होने वाले कंपन और रसायनों के रिसाव के कारण भूजल स्तर न केवल दूषित हो रहा है बल्कि मिट्टी अपनी पैदावार की क्षमता भी खो रही है। यह विनाश केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है, अपितु आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा बंजर संसार विरासत में दे रहा है जहाँ सांस लेना भी एक संघर्ष होगा।
आगे कुआं पीछे खाई!
युद्ध की विभीषिका थमने के बाद नवनिर्माण की चुनौती एक अलग ही आर्थिक और पर्यावरणीय संकट खड़ा करती है। हाल ही गाज़ा के नवनिर्माण हेतु डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एक विशेष समूह के गठन की चर्चा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि युद्ध के बाद खंडहरों को फिर से बसाने में कितनी ऊर्जा और धन का व्यय करना पड़ता है। शोध बताते हैं युद्ध के बाद मलबे को हटाने और नयी इमारतों के निर्माण में लगने वाला सीमेंट और कंक्रीट उद्योग वैश्विक स्तर पर भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करता है। जो संसाधन शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च होने चाहिए थे, वे युद्ध द्वारा फैलायी गयी गंदगी को साफ़ करने और ईंट पत्थर जोड़ने में बर्बाद हो रहे हैं।
यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें पहले हम अरबों डॉलर ख़र्च करके विनाश करते हैं और फिर उसी विनाश को ढंकने के लिए दोबारा अरबों डॉलर का निवेश करते हैं।
पर्यावरण पर युद्ध के प्रभाव को केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित मान लेना हमारी सबसे बड़ी भूल है। समुद्रों में गिरने वाली मिसाइलें और जलमग्न होते जहाज़ समुद्री जीव जंतुओं के आवास को नष्ट कर रहे हैं जिससे पूरी खाद्य शृंखला प्रभावित हो रही है। जंगलों में लगने वाली आग और जैव विविधता का ह्रास हमें उस बिंदु पर ले आया है, जहाँ से वापसी संभव नहीं दिखती।
एक अंतहीन दुष्चक्र
दो उदाहरण यहां अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संघ की रिपोर्ट कहती है, पिछले दशकों में सैन्य सक्रियताओं की वजह से अफ़गानिस्तान ने अपने लगभग 95% जंगल गंवा दिये हैं। इससे जो पर्यावरणीय हानि हो रही है, उसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकेगी। दूसरा उदाहरण इराक का हम देख चुके हैं। कभी मध्य पूर्व की पारिस्थतिकी के ख़ज़ाने के रूप में समझे जाने वाले इराक में 1990 के दशक में हुए खाड़ी युद्ध के कारण दक्षिणी इराक के हरे-भरे दलदली इलाक़े सिर्फ़ 10% रह गये। और अब तक इस नुक़सान की कोई भरपाई नहीं की जा सकी। युद्ध जैव विविधता के लिए बड़े ख़तरे हैं।
2006 में जब इज़राइल ने लेबनान पर हमला किया, तब पावर प्लांट पर बम धमाके के कारण मेडिटेरेनियन सागर में लगभग 15 हज़ार टन तेल रिस गया, जो लेबनानी समुद्री सीमा से सीरियाई समुद्र तक फैला। इससे समुद्री पारिस्थितिकी को हुआ नुक़सान अब तक ठीक-ठीक पूरी तरह समझ पाने के लिए अध्ययन चल रहे हैं।
संधियों एवं नियमों को ताक पर रखकर, आधुनिक हथियारों में प्रतिबंधित रसायनों का प्रयोग अंतरराष्ट्रीय ताक़तें धड़ल्ले से करती हैं। पर्यावरण तहस-नहस होता रहता है और युद्धों के इस दुष्परिणाम को लेकर आवाज़ें मौन हो जाती हैं। ताज़ा उदाहरण गाज़ा का है, जहां युद्ध में 75 हज़ार टन से ज़्यादा विस्फोटक का उपयोग हुआ। हासिल हुआ 45 मिलियन टन दूषित मलबा..! अब इससे निजात पाने में 30 साल तक का समय लग सकता है, मिलियनों डॉलर इस पर ख़र्च होंगे और मशीनों, ईंधनों आदि का प्रदूषण अलग। इतने समय में कितनी पीढ़ियां इन ख़तरनाक रसायनों के दुष्प्रभाव झेलेंगी ही, पर्यावरण प्रदूषण एक अंतहीन दुष्चक्र चलता रहेगा…
भविष्य की राह
मिट्टी, पानी, हवा, जंगल… हर स्तर पर युद्ध के कारण कितना प्रदूषण हुआ है, यह तो फिर भी कोई अध्ययन अनुमान दे सकता है लेकिन मानवता और प्रकृति के सबसे बड़े दोषी के रूप में जवाबदेही कभी किसी की तय हो सकी? दंड किसी ने भोगा? ऐसा कोई इतिहास ही नहीं है।
यदि मानवता को जीवित रहना है तो हमें युद्ध की परिभाषा को बदलना होगा और समझना होगा कि प्रकृति की हार में मनुष्य की जीत कभी नहीं छिपी हो सकती। हमें हथियारों की इस अंधी दौड़ को रोककर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सोचना होगा ताकि भविष्य का मनुष्य केवल इतिहास के पन्नों में ही नहीं बल्कि एक स्वस्थ धरा पर जीवित रह सके।
काश… कि आज के हठधर्मी नेता जो मानवता पर ये युद्ध थोप रहे हैं, अशोक के सदृश होते, तो बुद्ध पुनः बातों से निकलकर जीवन में प्रवेश कर पाते।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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