
- August 30, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....
नयी शायरी : तकनीक के ज़ाविये में ढलने का हुनर
शाइरी के अपने तकाज़े रहे हैं। अपने दायरे भी। मगर वक़्त के साथ ये दायरे टूटते भी रहे और शाइरी में उन मुद्दों को भी शामिल किया जाने लगा जिन्हें कभी शाइरी के मुआफ़िक नहीं समझा जाता था। एक दफ़ा बशीर बद्र साहब से इंटरव्यू लेते हुए मैंने यह सवाल किया था कि एक शाइर को अपने विषय का चयन करते समय किन बातों का ख़याल रखना चाहिए?
वे कहने लगे, ‘एक शाइर को यह तय करना चाहिए कि वह अपने वक़्त की सही तस्वीर पेश करे लेकिन उसे आने वाले वक़्त की अक्कासी भी करना होगा। शेर वही ज़िन्दा रहता है जो वक़्त से पहले उन मुद्दों पर कुछ कहे जो आने वाले समय में संभावित हैं। अपने समय को देखने का हुनर एक शाइर के पास होता है। उसे अपने दौर पर नज़र भी रखना पड़ती है और इस दौर में हो रहे बदलावों के आने वाले समय में होने वाले असर का भी अनुमान लगाना पड़ता है। शाइर इस ग़लतफ़हमी में न रहें कि वह जो कह रहा है वह सबसे पहले कह रहा है। ऐसा कुछ नहीं है जो अब तक नहीं कहा गया है। कहा सब-कुछ जा चुका है। हमें तो अपनी शाइरी में अपनी नयी शैली भी गढ़ना होगी।’
इस लिहाज़ से वक़्त से पहले आने वाले वक़्त की बात कहता उनका यह शेर मौज़ूं है-
कम्प्यूटरों से ग़ज़लें लिखेंगे ‘बशीर-बद्र’
‘ग़ालिब’ को भूल जाएगी इक्कीसवीं सदी
दरअसल तकनीक के बढ़ते दख़ल ने शाइरी को एक नया आयाम तो दिया ही, उसे फैलाव का मौक़ा भी दिया। आज की दुनिया रियल से रील की तरफ़ अग्रसर है। ऐसे में एक शाइर ही है, जो दोनों वक़्तों के बीच खड़ी दीवार को देखकर उस इंसान के जज़्बात को समझने की कोशिश करता है कि जो नयी तकनीक के बीच ख़ुद को असहाय महसूस करता है। आज एक बड़ा वर्ग अपने आप को इसलिए उपेक्षित महसूस करता है कि वह आधुनिक तकनीक में अनफिट है। वसीम बरेलवी इस बात को कितनी ख़ूबसूरती से कहते हैं-
इतना बिखराव संभाला नहीं जाता मुझसे
ख़ुद को यूट्यूब पे डाला नहीं जाता मुझसे
रवायती शाइरी के बरअक्स ये विषय अनोखे हैं। हुस्नो-इश्क़ के मफ़हूमों से आगे निकलकर आज का शाइर तकनीक से होने वाले ख़ामियाज़ों को भी अपनी शाइरी में शामिल कर रहा है। यह वक़्त के साथ चलने का माकूल उदाहरण है। अल्ताफ़ हुसैन हाली ने कभी कहा भी था-
सदा एक ही रुख़ नहीं नाव चलती
चलो तुम उधर को हवा हो जिधर की
अपने दौर की शाइरी पसंद भी की जा रही है, यह सुखद है। अब हर दिन नया कुछ सामने आ रहा है। लोगों की जीवन शैली बदल रही है। उसकी ज़िन्दगी के विषय अब शाइरी के भी विषय हो रहे हैं। जैसे राजेश रेड्डी कहते हैं-
है ज़िन्दगी कि कोई टी.वी. सीरियल यारब
बिना कहानी के क्यूँ दास्तान खींचता है
ये नयी ज़िन्दगी के फ़लसफ़े हैं। इनकी रोशनी में बदलाव की शाइरी कुछ नया अहसास करवा रही है।

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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