
- August 7, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
भवेश दिलशाद की कलम से....
परमाणु हमलों का डर, युद्ध विरोध और हिरोशिमा दिवस
साहिर ने जंग को ही समस्या बताया था समस्याओं का हल नहीं और यह पैग़ाम दिया था कि जंग टलती रहे तो ठीक है। पर यह दुनिया शायराना होती तो बात ही क्या थी! एक नज़्म.. नज़्म भी क्या, यूं ही साहिर से अपनी तनहाई में कुछ कह रहा था (कुछ अरसे पहले), उन्हीं मिसरों से बात शुरू करता हूं:
लाशों की होती है ख़रीद-फ़रोख़्त
अब तो मौतों की भी है GDP
ज़ाइका ख़ून में भी आने लगा
ख़ुशबू बारूद से भी आने लगी
जंग इक मसअला कहां साहिर
जंग अब शौक़ हो चुकी है यहां
हो चुकी ये ज़मीन ज़हरीली
ज़िन्दगी मौत बो चुकी है यहां…
दुनिया के एक बड़े हिस्से में किसी न किसी तरह की जंग चल ही रही है, कुछ हिस्सों में परमाणु हमलों की धमकियां गूंज रही हैं, और ऐसे में हिरोशिमा पर 6 अगस्त 1945 को हुए परमाणु हमले की 80वीं बरसी का दिन आ गया। एक बार फिर परमाणु हमले चर्चा में आ गये। यक़ीन मानिए यह सिर्फ़ एक ही दिन की बात थी, आज के अख़बार या टीवी चैनल पर परमाणु हमलों को लेकर कोई चिंता आपको नहीं दिखायी देगी।
शायद 9 अगस्त को कुछ छुटपुट कवरेज इस चिंता को फिर मिलेगा क्योंकि यह नागासाकी पर परमाणु हमले की बरसी का दिन होगा। फिर कुछ विमर्श हो जाएगा और बात साल भर के लिए फिर टल जाएगी। हम पिछले 80 सालों से यही रस्म अदायगी कर रहे हैं और अब इसके अभ्यस्त हो गये हैं। इस अभ्यास से कहीं कोई फ़र्क दिखायी देता है?
पिछले साल जब जापान के निहोन हिंडाक्यो संस्था को नोबेल पुरस्कार दिया गया था, तब भी यही सवाल उठ खड़ा हुआ था कि इस संस्था की दशकों की मुहिम से फ़र्क क्या पड़ गया? हिबाकुशा की यह संस्था इसलिए बनी थी कि परमाणु हमले की भयावहता को सामने रखकर दुनिया को यह समझाया जाये कि परमाणु हमले विनाशकारी हैं और मानवता के लिए अभिशाप हैं। और हुआ क्या? यह संस्था जिस समय में चलती रही, सक्रियता के चरम पर रही, उन्हीं दिनों में दुनिया के तमाम शक्तिसंपन्न देश एक से एक भयानक परमाणु हथियार बनाते रहे, परमाणु हथियारों की अपनी हवस को घनघोर विस्तार देते रहे। यह संस्था बोलती रही ऐसा नहीं करना चाहिए और दुनिया कहती रही ‘ऐसी की तैसी तुम्हारी, हम तो करेंगे’… और फिर? इस संस्था को नोबेल पुरस्कार थमा दिया गया। जिन्होंने उसकी बात कभी सुनी नहीं, उन्हीं ताक़तों या उन्हीं ताक़तों की पिछलग्गू व्यवस्थाओं के पैरोकारों से इस संस्था ने भी पुरस्कार ले ही लिया।
तो यह एक अभ्यास है। हमें पता है हमारी नींद गहरी होगी और हम उठेंगे नहीं फिर भी हम एक अलार्म लगा देते हैं। हम लगाने की और अलार्म अपने बजने की औपचारिकता निभाता है, हम उसे बंद करके सोये पड़े रहते हैं। हमने भी एक अभ्यास किया। हिरोशिमा दिवस पर बमुश्किल डेढ़ दो दर्जन लोग इकट्ठे हुए भोपाल के रोशनपुरा चौराहे पर। दुनिया में कई जगह हो रहे युद्ध के विरोध में नारे लगाये। पोस्टर लहराये। साम्राज्यवादी और उन्मादी ताक़तों के लिए ‘मुर्दाबाद’, ‘मुर्दाबाद’ बोला। इसी चौराहे पर पिछले बरस भी ऐसा किया गया था। हर साल इस दिन पर कमोबेश यही कुछ लोग तक़रीबन इसी तरह विरोध प्रदर्शन करते हैं। पता नहीं ये आवाज़ कहां पहुंचती है! कहीं पहुंचती भी है कि नहीं? जो लोग चौराहे पर पोस्टर लिये खड़े नारे लगा रहे होते हैं, मन ही मन जानते हैं कि उनकी यह आवाज़ नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ भी हो तो बड़ी बात। फिर भी यह रस्म अदायगी होती है। एक अभ्यास है।
मैं उदासी की ग़ज़ल की हूं रदीफ़
मुझमें बांधो काफ़िया उम्मीद का
दरअसल युद्ध की विभीषिकाओं के बीच कुछ लोगों ने उम्मीद का दामन थामकर रखा है। उन्हें लगता है कि उनके इस अभ्यास से क्या पता कभी कुछ हो ही जाये। कोई तो जाग जाये, कोई तो शांति के पैग़ाम के सफ़र पर साथ आ जाये… हालांकि यह उम्मीद कितनी यथार्थपरक है, एसी कमरों में बैठे बौद्धिक यह सवाल उठाने का क़हक़हा भी नहीं छोड़ पाते, फिर भी साहब, बक़ौल शेक्सपियर “The miserable have no other medicine but only hope”। जिन्हें नामाक़ूल दुनियादारी का अभ्यास है, वो नातवां उम्मीद के अभ्यास पर उंगली उठाते रहें!
फिर एक दिलशिकन बात। इसी उम्मीद की रोशनी में एक बयान… 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा में क़रीबन डेढ़ लाख लोग कुछ ही पलों में ख़ाक हो गये थे और जो बहुत सारे बच गये थे, परमाणु हमला पीड़ितों की शक्ल में, उन ज़ख़्मियों को जापान में हिबाकुशा कहा जाता है। 6 अगस्त 2025 के अख़बार में ऐसी ही 92 वर्षीय हिबाकुशा महिला का बयान छपा है। इसमें यह वृद्धा रूस की यूक्रैन पर परमाणु हमले की धमकी, ट्रंप द्वारा एटमी पनडुब्बी तैनाती की मंशा, उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों के प्रोग्राम आदि पर चिंता और अफ़सोस जताते हुए कहती है, हमारे नरसंहार से दुनिया ने कुछ नहीं सीखा।
यह वृद्धा तब 12 बरस की रही होगी, जब हिरोशिमा पर एटम बम गिरा। उसने 80 बरस में कितनी बार उस त्रासदी को अपने भीतर महसूसा होगा। इतने समय में उसने कितनी ही कोशिशें देखी होंगी (निहोन हिंडाक्यो जैसी कितनी ही संस्थाओं की मुहिम) और एक उम्मीद संजोयी होगी कि कभी तो लोग समझेंगे, कुछ तो फ़र्क पड़ेगा… अब 80 बरस बाद यानी तक़रीबन एक पूरी उम्र जीने के बाद वह मायूस है कि दुनिया ने हमारे त्रासद अध्याय को बस एक केस स्टडी बनाकर छोड़ दिया, न कुछ महसूसा, न कुछ सीखा और न विनाश के विरोध में कुछ रचनात्मक किया…
हो जहां उम्मीद मुश्किल वक्त में
हम वहीं कहते हैं और क्या है चिराग़
उम्मीदों के दीये ऐसे ही बुझते हैं शायद, फिर भी एक दीये से दूसरा बालने का सिलसिला बंद भी तो नहीं होता। यह एक अभ्यास है। एक रिले है जिसमें एक के बाद दूसरा मशाल थाम लेता है। जापान में हिबाकुशा के दर्द, त्रासद अनुभवों को कई तरह की मुहिम के तहत एआई माध्यमों से संजोने के प्रोजेक्ट भी चल रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों को महसूस करवाया जा सके कि वह दर्द क्या था… दुनिया के कई हिस्सों में अपनी-अपनी क्षमता और अपने-अपने तरीक़ों से हिंसा और युद्ध का विरोध किया जा रहा है। एक नाज़ुक और लगभग अनजान उम्मीद का दामन थामे कुछ लोग लैब्स/स्टूडियोज़ में हैं, कुछ सड़क पर, कुछ अपने शब्दों के मोर्चे पर…
फ़र्क़ कब दिखेगा? कितना दिखेगा? इसकी चिंता किये बग़ैर, अभी इस वक़्त जो नेक लगता है, जो मानूस फ़र्ज़ लगता है, बस वही किया जाये। बार-बार कहा जाये युद्ध के विरुद्ध हैं हम।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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