
- February 14, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....
पंचवाक्य: जहाँ ठहरकर चोट करता है व्यंग्य
व्यंग्य साहित्य केवल हँसी-मज़ाक या तात्कालिक मनोरंजन की विधा नहीं है, बल्कि वह समाज के अंतर्विरोधों, विडंबनाओं और विसंगतियों को उजागर करने का एक सशक्त साहित्यिक माध्यम है। अपनी प्रकृति में यह जितना सहज और संप्रेषणीय है, अपने प्रभाव में उतना ही तीखा और विचारोत्तेजक। व्यंग्य की सार्थकता भाषा की चपलता या विषय की प्रासंगिकता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह उस बिंदु पर जाकर पूर्ण होती है जहाँ रचना अपने पाठक को ठिठककर सोचने के लिए विवश कर दे। इस प्रक्रिया की सबसे धारदार और निर्णायक इकाई है ‘पंचवाक्य’, अर्थात वह निर्णायक वाक्य जो अत्यल्प शब्दों में पूरे व्यंग्य या विडंबना का सार निचोड़कर प्रस्तुत कर दे। पंचवाक्य व्यंग्य को धार देता है, उसे स्मरणीय बनाता है और पाठक के मन में लंबे समय तक गूँजने वाला प्रभाव छोड़ता है। कहा जा सकता है कि व्यंग्य में पंचवाक्य वही भूमिका निभाता है, जो मुक्तक में अंतिम पंक्ति या शास्त्रीय संगीत में समापन स्वर, अर्थात भाव का शिखर-बिंदु।
आदर्श पंचवाक्य न तो उपदेश देता है और न ही निष्कर्ष थोपता है। वह संकेत करता है, चौंकाता है, गुदगुदाता है और पाठक को अपने निष्कर्ष तक स्वयं पहुँचने के लिए विवश करता है। यही कारण है कि वर्षों पूर्व लिखे गये अनेक व्यंग्य आज भी स्मृतियों में जीवित हैं। इसका श्रेय केवल उनके सरोकारयुक्त विषयों को ही नहीं जाता, बल्कि उससे भी अधिक उन पंचवाक्यों को जाता है, जो समय की परतों में दबने के बजाय स्मृति में स्थायी रूप से अंकित हो चुके हैं।
पिछली शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में, जब हिंदी व्यंग्य साहित्य अपने स्वरूप और स्वायत्त पहचान को स्थापित करने की दिशा में अग्रसर हो रहा था, उसी समय पंचवाक्यों के महत्व और उनकी निर्णायक भूमिका भी स्पष्ट हो चुकी थी। उस दौर के व्यंग्यकारों ने यह भली-भाँति समझ लिया था कि सत्ता से सीधा टकराव करने की अपेक्षा, संकेत और व्यंजना से कही गयी एक सटीक पंक्ति कहीं अधिक प्रभावी और दीर्घजीवी सिद्ध होगी। इस संदर्भ में बाबू बालमुकुंद गुप्त के “शिवशंभू के चिट्ठे” हिंदी व्यंग्य की परंपरा में एक सशक्त और ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में सामने आते हैं। इन चिट्ठों में प्रयुक्त पंचवाक्य न केवल तत्कालीन औपनिवेशिक सत्ता की नीतियों पर तीखा प्रहार करते हैं, बल्कि व्यंग्य को एक वैचारिक हथियार के रूप में भी प्रतिष्ठित करते हैं।
‘वैसराय का कर्त्तव्य’ शीर्षक चिट्ठे में गुप्त जी लिखते हैं- “यद्यपि आप कहते हैं कि यह कहानी का देश नहीं, कर्त्तव्य का देश है, तथापि यहाँ की प्रजा ने समझ लिया है कि आपका कर्त्तव्य ही कहानी है।” यह वाक्य सत्ता के दावे और यथार्थ के बीच की दूरी को अत्यंत संक्षिप्त किंतु तीखे व्यंग्य के साथ उजागर करता है। इसी प्रकार ‘बंग-विच्छेद’ संबंधी चिट्ठे में उनका यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है- “अंगरेजी सत्ता अब राजा–प्रजा के मेल की नहीं, ज़िद और ज़ुल्म की बीन बजा रही है।” यह पंचवाक्य औपनिवेशिक शासन की मानसिकता को रूपक और व्यंजना के माध्यम से बेनकाब करता है। ऐसे ही स्मरणीय और मारक पंचवाक्यों के कारण “शिवशंभू के चिट्ठे” को हिंदी व्यंग्य का उठान-बिंदु, यानि कि एक तरह से ‘लॉन्चिंग पैड’ माना जाता है, जहाँ से व्यंग्य ने हास्य से पृथक, वैचारिक प्रतिरोध की विधा के रूप में अपनी यात्रा आरंभ की।
भारतीय समाज में हर कालखंड में अनेक प्रकार की विसंगतियाँ, विद्रूपताएँ और पाखंड मौजूद रहे हैं। इनमें से कुछ विसंगतियाँ समाज-सुधारकों के निरंतर प्रयासों के बावजूद न केवल यथावत बनी हुई हैं, बल्कि कई बार अधिक विकृत और जटिल रूप में आज भी उपस्थित दिखायी देती हैं। राजतंत्र और औपनिवेशिक काल की सत्ता-संरचनाओं में निहित अनेक विसंगतियाँ आज लोकतंत्र के आवरण में भी उतनी ही दमनकारी और निरंकुश प्रतीत होती हैं, जितनी वे अतीत में थीं। धार्मिक पाखंड कम होने के स्थान पर निरंतर विस्तार पाता जा रहा है, और जातिगत विद्रूपताएँ आज भी सामाजिक व्यवहार का कठोर यथार्थ बनी हुई हैं। धार्मिक सहिष्णुता, जो कभी भारतीय सामाजिक चेतना की पहचान मानी जाती थी, अब मानवीय व्यवहार का स्वाभाविक गुण न होकर एक विद्वेषपूर्ण भावना प्रतीत होने लगी है।
इसके साथ ही आधुनिक समय की अनेक नई विसंगतियाँ, जैसे उपभोक्तावाद, सूचना- विस्फोट, मीडिया-प्रभाव, और नैतिक द्वंद्व, जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित कर रही हैं और समाज के सामने एक भयावह तथा असहज चित्र उपस्थित कर रही हैं।
हिंदी के व्यंग्यकार इन समस्त विसंगतियों से केवल विचलित ही नहीं हुए, बल्कि उन्होंने अपनी सजग, संवेदनशील और प्रतिबद्ध लेखनी के माध्यम से समाज को सचेत करने तथा आत्ममंथन के लिए प्रेरित करने का दायित्व भी निभाया है। विशेष रूप से यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने इन विसंगतियों को किस दृष्टि से देखा, किस गहराई से समझा और किस कलात्मक कौशल के साथ पंचवाक्यों के माध्यम से उन्हें जन-चेतना पर दस्तक देने योग्य बनाया। यहाँ हम चयनित पंचवाक्यों के माध्यम से व्यंग्यकारों की वैचारिक दृष्टि, उनके शिल्पगत कौशल और व्यंग्य की मारकता को समझने का प्रयास करेंगे।
राजनीतिक सत्ता की विसंगतियाँ हिंदी व्यंग्यकारों का प्रिय विषय रही हैं। हों भी क्यों न, सत्ता समाज, जीवन और समय को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है। इन विसंगतियों के दायरे में सत्ता का चरित्र, उसका छल, भ्रष्ट आचरण, नैतिकता के दावे, अहंकार, दमनकारी नीतियाँ और अंतर्निहित दोगलापन, सब कुछ शामिल है। व्यंग्यकारों ने इन्हीं अंतर्विरोधों को अपनी पैनी दृष्टि और मारक भाषा के माध्यम से उद्घाटित किया है।

सियासत पर पंचवाक्य
‘सदाचार का ताबीज़’ में हरिशंकर परसाई का यह कथन- “सत्ता जब मुस्कराकर बोलती है, तब सबसे ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत होती है।” सत्ता के सौम्य मुखौटे और उसके भीतर छिपे दमनकारी चरित्र की ओर संकेत करता है।
इसी तरह रवीन्द्रनाथ त्यागी आधुनिक सत्ता के मनोवैज्ञानिक नियंत्रण को रेखांकित करते हुए ‘यह कौन सा लोकतंत्र है’ में कहते हैं- “लोकतंत्र में डर ग़ैर-कानूनी नहीं है, बस उसका स्रोत बदल गया है।” यह वाक्य सत्ता के बदलते रूपों के बावजूद उसके मूल स्वभाव की निरंतरता को उजागर करता है और हर काल पर समान रूप से सटीक बैठता है।
श्रीलाल शुक्ल अपने कालजयी उपन्यास ‘राग दरबारी’ में एक स्थान पर लिखते हैं- “समाज में शोर मचाने वाले कम हैं, चुप रहकर सब सहने वाले ज़्यादा।” यह कथन सामाजिक उदासीनता और सत्ता-समर्थित मौन की उस संस्कृति को रेखांकित करता है, जो इस उपन्यास-लेखन के पाँच दशक बाद भी न केवल बनी हुई है, बल्कि और अधिक जटिल तथा गहरी हो गई है।
समकालीन राजनीति की भाषिक चालाकी पर प्रेम जनमेजय ‘नेताजी कहिन’ में टिप्पणी करते हैं- “नेताजी का हर बयान सच से ज़्यादा रणनीति होता है।” यह वाक्य राजनीति की उस भाषा को उजागर करता है, जहाँ कथन का उद्देश्य संवाद नहीं, बल्कि दिशा-भ्रम पैदा करना होता है।
इसी क्रम में सुदर्शन मजीठिया का यह पंचवाक्य- “सरकार गरीबी मिटाने की नहीं, हटाने की बात करती है; वह आपकी गरीबी हटाकर दूसरों को दे देगी।” सरकारी नीतियों के छल को तीखे व्यंग्य के साथ सामने रखता है।
केशवचन्द्र वर्मा नेताओं के अमर्यादित आचरण पर टिप्पणी करते हैं- “समस्या का उत्पादन नेता के लिए संजीवनी बूटी है, जो नेता समस्या नहीं उठा पाता, वह मर जाता है।”
राजनीतिक सत्ता की विसंगतियों पर ऐसे सैकड़ों पंचवाक्य हिंदी व्यंग्य साहित्य में बिखरे पड़े हैं। ये पंचवाक्य न केवल अपने समय की सत्ता को आईना दिखाते हैं, बल्कि भविष्य के लिए भी चेतावनी बनकर सामने आते हैं। व्यंग्यकारों की यह दृष्टि सिद्ध करती है कि सत्ता चाहे रूप बदले, भाषा बदले या चेहरे बदले, उसके मूल अंतर्विरोधों को पहचानने और उजागर करने का कार्य व्यंग्य निरंतर करता आया है और आगे भी करता रहेगा। इस अर्थ में पंचवाक्य, व्यंग्य का केवल शिल्प नहीं, बल्कि उसका सबसे सशक्त और दीर्घजीवी अस्त्र है।
राजनीति से इतर धार्मिक पाखंड, आडंबर, ऊँच-नीच और मानवीय असमानता भी हिंदी व्यंग्यकारों के स्थायी विषय रहे हैं। धर्म जब आस्था के स्थान पर सत्ता, स्वार्थ और वर्चस्व का उपकरण बन जाता है, तब वह समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने लगता है। व्यंग्यकारों ने इस पाखंड को न केवल उजागर किया, बल्कि उसकी अंतर्निहित क्रूरता और दोगलेपन को भी तीखे पंचवाक्यों के माध्यम से सामने रखा है।
धार्मिक पाखंड पर निशाना
नरेंद्र कोहली ‘कर्तव्यनिष्ठ पड़ोसी’ में धर्म के नाम पर मिलने वाली तथाकथित स्वतंत्रताओं पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं- “धर्म के नाम पर लोगों को नंगे रहने, सशस्त्र रहने और एक से अधिक पत्नियाँ रखने का अधिकार है।”
इसी क्रम में लतीफ़ घोंघी धार्मिक कानूनों के स्वार्थपूर्ण उपयोग पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं – “हाजी साहब की वह चौथी बीवी थी। मुस्लिम क़ानून का पूरा फ़ायदा उन्होंने जीते-जी उठा लिया था।” यह कथन आस्था, सुविधा और नैतिकता के बीच के अवसरवादी रिश्ते को रेखांकित करता है।
धार्मिक व्यवहार की क्रूर विडंबना पर मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी का यह प्रसिद्ध पंचवाक्य अत्यंत मारक है- “इस्लामिक वर्ल्ड में आज तक कोई बकरा नैचुरल डेथ नहीं मरा।” यह वाक्य धार्मिक अनुष्ठानों में करुणा के अभाव पर तीखा कटाक्ष करता है।
धर्म और अर्थशास्त्र के गठजोड़ पर हरिशंकर परसाई लिखते हैं- “अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़कर बैठता है, तब गोरक्षा आंदोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं।” यह कथन धार्मिक आंदोलनों के भीतर छिपे आर्थिक स्वार्थ को रेखांकित करता है।
व्यवस्था पर व्यंग्य
भ्रष्टाचार, अफ़सरशाही और तंत्र की कार्यशैली भी हिंदी व्यंग्य का अत्यंत उपजाऊ विषय रही है। व्यवस्था की जड़ता, लालफीताशाही और संस्थागत भ्रष्टाचार को व्यंग्यकारों ने साधारण अनुभवों को भी असाधारण ढंग से उजागर किया है।
बालेंदु शेखर तिवारी ठेकेदारी-प्रणाली पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं – “अनुभवी जनसेवक ठेकेदार इतनी ख़ूबसूरती से सड़क बनाते हैं कि आगे सड़क बनती जाती है और पीछे-पीछे मरम्मत का काम भी शुरू हो जाता है।” यह वाक्य विकास और भ्रष्टाचार की समानांतर यात्रा को सटीक रूप में सामने रखता है।
सरकारी दफ्तरों की कार्यसंस्कृति जिसे अक्सर लालफीताशाही कहा जाता है, पर मुज्तबा हुसैन का यह कथन अत्यंत प्रसिद्ध है- “जब तक फाइलें किसी सरकारी दफ्तर में घूमना बंद नहीं कर देतीं, तब तक आप यह नहीं कह सकते कि आप वाकई ज़िंदा हैं, फाइलों का घूमना ही जीवन का असली प्रमाण है।”
विधायिका और नेताओं के गिरते नैतिक स्तर पर हरिशंकर परसाई का व्यंग्य और अधिक तीखा हो जाता है- “रोज़ विधानसभा के बाहर एक बोर्ड पर ‘आज का बाज़ार भाव’ लिखा रहे, साथ ही उन विधायकों की सूची चिपकी रहे जो बिकने को तैयार हैं।”
किरदार कठघरे में
जीवनशैली, आचार-विचार, चारित्रिक दुर्बलताएँ, शिक्षा-व्यवस्था और भाषाई दुराग्रह जैसे विषय भी हिंदी (तथा भारतीय भाषाओं के) व्यंग्यकारों को बेहद उर्वरा भूमि उपलब्ध करते हैं। ये वे क्षेत्र हैं जहाँ व्यक्ति का निजी आचरण सामाजिक बनावट से टकराता है और जहाँ विडंबनाएँ सबसे सहज, लेकिन सबसे तीखी शक्ल में सामने आती हैं। व्यंग्यकारों ने इन कमज़ोरियों को नैतिक उपदेश के बजाय सूक्ष्म कटाक्ष और स्मरणीय पंचवाक्यों के माध्यम से व्यक्त किया है।
शंकर पुणतांबेकर व्यक्तित्व के खोखलेपन पर पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं – “उनका व्यक्तित्व फाइव-स्टार होटल की तरह भव्य और ऊँचा है, उसमें किराया देकर कोई भी ठहर सकता है, स्मगलर भी, वेश्या भी।”
मानवीय स्वभाव की एक और स्थायी दुर्बलता, परनिंदा और आलोचना, पर श्याम गोयनका का यह व्यंग्य अत्यंत सटीक है- “आदमी भोजन के बिना दो महीने, पानी के बिना दस दिन निकाल सकता है, लेकिन परनिंदा और आलोचना के बिना एक दिन भी निकालना मुश्किल है।”
इसी क्रम में, ‘व्यंग्य और ईर्ष्या का पात्र समझा जाना इस समाज में महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में मान्य हो जाने की निशानी है’ जैसा पंचवाक्य अपने उपन्यास ‘कसप’ में लिखकर मनोहर श्याम जोशी यह रेखांकित करते हैं कि सार्वजनिक जीवन में पहचान योग्यता से नहीं, रुतबे और जलन से तय होने लगती है।
व्यक्तित्व की दोहरी संरचना पर मराठी व्यंग्यकार पु.ल. देशपांडे का यह कथन बहुचर्चित है- “हर इंसान के भीतर दो हिस्से होते हैं – एक जो वह सच में है, और दूसरा जो वह दोस्तों को बताता है कि वह है, और दूसरा हिस्सा हमेशा ज़्यादा शिक्षित होता है।”
इसी तरह, उम्र और समझ के संबंध पर तेलुगु व्यंग्यकार मुल्लपूडी वेंकट रमण का यह कथन अत्यंत मारक है- “बड़े लोग हमेशा कहते हैं, ‘जब तुम बड़े होगे तब समझोगे’; लेकिन जब वे सच में बड़े हो जाते हैं, तब भी उन्हें कुछ समझ में नहीं आता, बस वे दिखावा करना सीख जाते हैं।”
पंचवाक्यों का बड़ा दायरा
इनके अतिरिक्त भी जीवन को प्रभावित करने वाले असंख्य विषय हैं, जिन सबकी चर्चा न तो एक साथ संभव है और न ही आवश्यक। किंतु वर्तमान समय के कुछ ऐसे विषय अवश्य हैं, जिनकी विसंगतियाँ पूर्ववर्ती दशकों में इस रूप में उभरकर सामने नहीं आई थीं। ये मूलतः इक्कीसवीं सदी की विसंगतियाँ हैं और इनके केंद्र में तकनीक पर बढ़ती निर्भरता, सूचनाओं का विस्फोट और पूरी दुनिया का मुट्ठी में सिमट जाना शामिल है।
तकनीक ने मनुष्य के जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन उसी अनुपात में उसे आश्रित, अधीर और सतही भी किया है। सूचनाओं की प्रचुरता ने ज्ञान का भ्रम रचा है, जबकि विवेक और समझ कई बार पीछे छूटते दिखाई देते हैं। दुनिया का ‘मुट्ठी में सिमटना’ वास्तव में भौगोलिक निकटता से अधिक मानसिक दूरी का कारण बन रहा है। यह एक ऐसी नई स्थिति है, जिस पर हिंदी व्यंग्य ने अभी अपेक्षित गहराई और व्यापकता के साथ कलम नहीं चलायी है, जितनी समय की माँग है।
इसी कारण तकनीक, डिजिटल व्यवहार, सोशल मीडिया और आभासी संवेदनाओं पर उद्धरणीय पंचलाइनों की संख्या सीमित है। जिन व्यंग्यकारों ने इन विषयों पर लिखा है वे भी अभी विषयों की गहराई में झाँकने की प्रक्रिया में ही हैं।
इस संदर्भ में गिरीश पंकज की पुस्तक ‘इमोजी वाली बधाइयाँ’ की यह पंचलाइन ध्यान खींचती है- “क्योंकि अब हम मनुष्य कहाँ रहे, हम तो अब ई-मनुष्य हो गये हैं।” यह एक पंक्ति तकनीक-निर्भर जीवन, डिजिटल भावनाओं और मानवीय संवेदना के आभासीकरण को अभिव्यक्त कर देती है।
अनूप शुक्ल का फैंटेसी शैली में लिखा गया व्यंग्य ‘आदमी रिपेयर सेंटर’ मोबाइल रिपेयर सेंटर की अवधारणा के माध्यम से मानवीय मानसिकता और सामाजिक नियंत्रण पर तीखा प्रहार करता है। हल्की-फुल्की कल्पना के आवरण में यह व्यंग्य बार-बार गंभीर सामाजिक सच्चाइयों की ओर संकेत करता है। यह पंक्ति विशेष रूप से ध्यान खींचती है- “पिता लोग अपनी बेटियों को जमा कराएँगे- ‘इसके दिमाग़ से प्यार का भूत इरेज़ कर दो। खानदान की इज़्ज़त का सवाल है।’ यह पंक्ति तकनीकी शब्द ‘इरेज़’ के माध्यम से पितृसत्तात्मक सोच, प्रेम-विरोध और तथाकथित सामाजिक मर्यादा की विद्रूपता को एक झटके में उजागर कर देती है।
इसी क्रम में इस आलेख के लेखक अरुण अर्णव खरे ने भी इक्कीसवीं सदी की विसंगतियों पर अनेक व्यंग्य लिखे हैं। ‘दिन फिरे अंगूठे के’ में सोशल मीडिया के प्रति बढ़ते रुजहान पर तंज़ कसते हुए वे लिखते हैं- “ये भूतपूर्व नौजवान, जो काम जवानी में नहीं कर सके थे, वही काम बुढ़ापे में विदेशी ललनाओं से चैट कर निपटा रहे हैं।” यह वाक्य उम्र, कामना और तकनीक के त्रिकोण से उपजी विडंबना को एक व्यंग्यात्मक विस्फोट की तरह सामने रखता है। इसी तरह ‘रचना की मार्केटिंग’ नामक व्यंग्य में उनका कथन- “आत्ममुग्धता के इस दौर में भी तुम मार्केटिंग के गुर नहीं सीख सके।” समकालीन साहित्यिक परिदृश्य की एक झलक पेश करता है। यह पंचलाइन प्रश्न उठाती है कि क्या आज साहित्य का मूल्य लेखन से अधिक उसकी पैकेजिंग से तय होने लगा है।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि हिंदी व्यंग्य में पंचलाइन केवल हास्य का उपकरण नहीं, बल्कि वह सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक विडंबनाओं को अभिव्यक्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। ये पंचवाक्य पाठक को अपने भीतर झाँकने के लिए भी विवश करते हैं और यही व्यंग्य की सबसे बड़ी ताकत और उसकी स्थायी प्रासंगिकता है।

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
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