
- July 30, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
रति सक्सेना की कलम से....
पोइट्री थेरेपी- भूत, वर्तमान और भविष्य
विषय प्रवर्तन
साल 2014 की बात है, मैं कृत्या अन्तर्राष्ट्रीय फेस्टीवल के लिए आमन्त्रित विदेशी कवियों का बायोडेटा देख रही थी, तभी आयरलैंड की केट न्यूमेन के बारे में जानकारी मिली कि वे एक अस्पताल में बतौर पोइट्री थेरेपिस्ट काम करती हैं। केट की मां भी कवि हैं और वे प्रेस भी चलाती हैं, लेकिन पोइट्री थेरेपिस्ट कर रूप में काम करते हुए वे कविता से भिन्न स्तर पर जुड़ रही थीं। मैंने पोइट्री थेरेपी के बारे में इधर-उधर पढ़ा था और विभिन्न कवि मित्रों से उनके अनुभवों से भी गुज़री थी। यह समझ में आने लगा था कि कविता मानसिक अवसाद से छुटकारा तो दिलाती ही है, देह के कष्ट को भी कम कर सकती है।
2016 में मुझे म्यूनिख में रेज़िडेन्सी मिली तो मैंने इसी विषय पर काम करना चाहा। हालांकि हमारा कृत्या पोइट्री फेस्टीवल भी इसी विषय की गवेषणा कर रहा था। मैंने मित्रों में ही पाया कि अमेरिकन चीनी कवि वून वून बायपोलर बीमारी से कविता के सहारे ही सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं। अर्जेन्टीना मूल की अमेरिकन कवि एलिसिया पार्टनोई को जब इक्कीस वर्ष की अवस्था राजनैतिक बवंडर के चलते डेढ़ महीने कन्सन्ट्रेशन कैम्प और ढाई साल जेल में रहना पड़ा, जहां उनके सामने ही उनके मित्रों की हत्या हो रही थी, कविता ने उन्हें बचाया। वहां से छूटकर आने के बाद भी अवसाद से बचने के लिए कविता ने सहारा दिया। ऐसे तमाम क़िस्से दुनिया मे बिखरे पड़े हैं, उन सबको एकत्रित करके, भूत में जाने की कोशिश की तो ज्ञात हुआ कि कविता या गीत सदियों से थेरेपी का काम कर रहे हैं।
मैं इस शृंखला में इसी विषय को संक्षिप्त में रखने की कोशिश करूंगी।
जो है सब मन में है…
नहीं जानता हूँ, कौन हूँ मैं? मन के गुप्त बोझ से जकड़ा भटकता हूँ मैं
प्रथम उत्पन्न ऋत की वाणी से अपने अंश को प्राप्त करता हूं मैं
(न वि जा॑नामि॒ यदि॑वे॒दमस्मि॑ नि॒ण्यः संन॑द्धो॒ मन॑सा चरामि।
य॒दा माग॑न्प्रथम॒जा ऋ॒तस्यादिद्वा॒चो अ॑श्नुवे भा॒गम॒स्याः॥ ऋग्वेद 1.164.37)
ऋग्वेद का ऋषि अपने मन के बोझ को ढोते हुए सत्य से उत्पन्न वाणी का सहारा लेता है।
रेने डेसकार्टे ने भी कहा है, “मैं सोचता हूँ, इसलिए मेरा अस्तित्व है- “Cogito ergo sum”…
एक ओर मानव चिन्तन के बोझ से मानसिक थकावट भी महसूस करता है, दूसरी ओर वह समझता है कि चिन्तन ही उसका बौद्धिक लक्ष्य है। सृष्टि के आरंभ से मानव की जिज्ञासा दो स्तर पर जागृत रही है, एक दार्शनिक पक्ष दूसरा भौतिकी पक्ष। यद्यपि दोनों के सवाल यहीं से उत्पन्न होते थे, कि हम कौन हैं, यह जो जगत् कहलाता है, इसकी उत्पत्ति कैसे हुई?
जो व्यवस्थित या व्यवस्थाजनित चिन्तन था, जिसे तर्क से साबित किया जा सकता था, भौतिक विज्ञान माना गया, जहां चिन्तन का दायरा बड़ा था और परिणाम पाने की तीव्रता नहीं थी, वह दर्शन कहलाने लगा। दोनों ही विद्याएं एक ही सोच के परिणामस्वरूप स्थान पा सकीं।
भौतिकविदों के तर्क आरंभिक वर्षों में तर्कसंगत ज्ञान पर आधारित थे। पर क्वांटम सिद्धांत और सापेक्षता के सिद्धांत की खोज के बाद, वे ब्रह्मांड में गहन अथवा रहस्यमय तत्वों को को समझने की कोशिश करने लगे, जो दार्शनिकों का भी लक्ष्य था। उदाहरण के लिए समय और स्थान की अवधारणा दार्शनिकों के बीच चर्चा का विषय थी। पूरब के दार्शनिक इस विषय में काफ़ी रुचि ले रहे थे। ऋग्वेद के प्रसिद्ध नासदीय सूक्त में ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर विचार किया गया है और “काल” या “समय” की उत्पत्ति पर सवाल उठाया गया है। विज्ञान भी इन दो मूल्यों पर चिन्तन करता है।
इस तरह आध्यात्मिक दर्शन और भौतिकी विज्ञान भिन्न होते हुए भी विपरीत नहीं है। ईश उपनिषद् में दो तरह के ज्ञान का उल्लेख है- एक है ‘विद्या’ जो आध्यात्मिक विकास से संबंधित है और दूसरी ‘अविद्या’ है, जो मृत्यु पर विजय पाने में मदद करती है। माना जाता है “जो इन दोनों को जानता है, विद्या और अविद्या को एक साथ, वह अविद्या के माध्यम से मृत्यु को जानकर विद्या के माध्यम से अमरता को प्राप्त करता है। यहाँ अविद्या का अर्थ ज्ञान का अभाव नहीं है, यह तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान को दर्शाता है, जो हमें उस नश्वर दुनिया के बारे में अधिक समझने में मददगार है जिसमें हम रहते हैं।” ऐसे दार्शनिक विचारों की झलक अन्य दर्शनों में भी मिलती है। हाल ही में दलाई लामा ने कहा- “ऊपरी स्तर पर, हालांकि कुछ मतभिन्नताएं दिखायी देती हैं, लेकिन, मुझे लगता है कि बौद्ध दर्शन और क्वांटम यांत्रिकी दुनिया के बारे में अपने दृष्टिकोण पर साथ आ सकते हैं।”
“आधुनिक वैज्ञानिक भी तर्क देते हैं कि ब्रह्मांड और मानव मन के बीच संबंध को समझने के लिए अध्यात्म और विज्ञान का संयोजन महत्वपूर्ण है।”
अब हम कविता पर आते हैं, बहुत प्राचीन काल से दर्शन की भाषा कविता रही है, क्योंकि उसमें सूत्रात्मक प्रवृत्ति होती है। विज्ञान भी अपने विचारों को सूत्र में बद्ध करके संक्षिप्त में रखता है। यह सूत्रात्मकता ही कविता है। यही कारण है कि दुनिया के प्रचीनतम दार्शनिक ग्रन्थ काव्यात्मक भाषा में रचे गये हैं। लोक जीवन गीतों में दर्शन खोजता है। कबीर के पद जिस गहनता से समझे जा सकते हैं, उसके लिए उनकी गेयता को महत्व देना होगा। दुनिया की सभी सभ्यताओं में गीत भाव को महत्व दिया गया है।
रेने डेसकार्टे ने दर्शनशास्त्र के समग्र दृष्टिकोण का वर्णन करने के लिए वृक्ष के रूपक का इस्तेमाल करते हुए कहा है- “जड़ें तत्वमीमांसा हैं, तना भौतिकी है, और तने से निकलने वाली शाखाएँ अन्य विज्ञान हैं, जिन्हें तीन मुख्य विज्ञानों में समेटा जा सकता है, जैसे- चिकित्सा, यांत्रिकी और नैतिक” (AT IXB 14: CSM I 186)।
यदि दर्शन और विज्ञान की भाषा कविता है तो मन के विज्ञान की क्यों नहीं? लियोन ईसेनबर्ग ने कहा है, “जो है सब मन में है, और मन का इलाज दवा से नहीं हो सकता।”
आयुर्वेदिक चिकित्सक सबसे पहले यह पता लगाता है कि शरीर वात प्रकार का है या पित्त प्रकार का या कफ़ प्रकार का। दवा हमेशा शरीर के प्रकार के अनुसार दी जाती है इसलिए एक ही बीमारी के लिए अलग-अलग लोगों को अलग-अलग दवा दी जाती है। इसके अलावा, रोगी के मनोविज्ञान पर भी विचार किया जाता है। ख़लील जिब्रान कहते हैं- यदि दूसरों को प्रकाश नहीं देता तो यह जीवन बेकार है। वे कहते हैं-
“मेरे दीपक में तेल भर दो ताकि मैं इसे अपनी खिड़की पर रख सकूं जिससे वह अजनबी को अंधेरे में रास्ता दिखा सके। मैं ये सब इसलिए करता हूँ क्योंकि मैं इनके मध्य में रहता हूँ; और यदि नियति मेरे हाथ बाँध दे और मुझे ऐसा करने से रोक दे, तो मृत्यु ही मेरी एकल इच्छा होगी। मैं एक कवि हूँ, और यदि मैं दे नहीं सकता, तो मैं लेने से भी इनकार कर दूँगा”
कविता और विज्ञान
कविता एक सकारात्मक दृष्टिकोण देती है जिसमें व्यक्ति पूरे ब्रह्मांड में अपनी स्थिति को समझ सकता है और अन्य तत्वों के साथ एक मजबूत संबंध विकसित कर सकता है। यह व्यक्ति को दो तरह से मदद करती है- एक अपनी स्थिति को समझने में मदद करती है और दूसरे हर प्रतिक्रिया को चाहे वह दर्द की हो या दुख की उसे तटस्थ होकर देखने को प्रवृत करती है। वास्तव में, ब्रह्मांड के प्रति प्रेम उसे अधिक मानवीय बनाता है और इस प्रकार यह समग्र निदान के एक भाग के रूप में एक सकारात्मक भावना है। आयुर्वेदिक दर्शन के अनुसार, हमारा शरीर पाँच तत्वों से निर्मित है- वायु, अग्नि, आकाश, जल और पृथ्वी। इस तरह हमारा शरीर इस ब्रह्मांड का लघु संस्करण है।
प्रत्येक जीवित वस्तु में एक स्व-विनियमन प्रणाली होती है। मन शरीर से अलग नहीं है। वे परस्पर संबंधित हैं। यह अंतर्संबंध मनुष्य और उसके आस-पास के अन्य जीवित और निर्जीव चीज़ों के बीच भी मौजूद है। यह रिश्ता जटिल होते हुए भी एक तरह की निरंतरता और सापेक्षता रखता है।
आधुनिक विज्ञान किसी भी बीमारी को ठीक करने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण के महत्व पर ज़ोर देता है। इसे मनोचिकित्सा का हिस्सा माना जाता है। काव्यात्मक अनुभव भी भावनाओं के विभिन्न रंगों की अभिव्यक्ति हैं। यह कविता लिखने वाले और उसे अपने शब्दों में समझने वाले पाठक दोनों के लिए हीलिंग पावर हो सकता है।
क्रमश:

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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कविता या गीत मानव सभ्यता की विकास यात्रा के आरंभ से ही सहभागी रहे हैं। मनोवेगों को सँभालने में गीतों की या कविता की महत्वपूर्ण भूमिका की बात भी पुरानी है किन्तु गहन ज्ञान और अनुसंधान से युक्त लेख बहुत सराहनीय है।
कविता मनुष्य के साथ ही जन्म लेती है। मनुष्य की प्रारंभिक भाषा कविता ही रही है, सांकेतिक और अर्थ गर्भित। शायद इसी कारण हर भाषा कविता में ही अपनी अभिव्यक्ति की है।