
- August 14, 2025
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रति सक्सेना की कलम से....
पोइट्री थेरेपी - शास्त्र, साहित्य और लोक
सतह पर, कविता और विज्ञान बहुत भिन्न प्रतीत होते हैं। कविता में भाषा के स्तर पर शुद्धता का अभाव सामान्य बात है और कई जगह चीज़ें अस्पष्ट भी होती हैं, हालांकि यह एक हद तक अवचेतन से जुड़ी होती हैं, दूसरी ओर विज्ञान स्पष्ट परिभाषाओं के साथ चलता है। विज्ञान में, भाषा शब्दों तक सीमित रहती है और तर्कपूर्ण होती है। हम गणित का उदाहरण दे सकते हैं, जहाँ शब्दों को प्रतीकों में बदल दिया जाता है और प्रतीकों को जोड़ा और परिभाषित किया जा सकता है ताकि वैज्ञानिक संघनित सूत्र को आकार दे सकें। लेकिन इन प्रतीकों का उपयोग करते समय, विस्तृत व्याख्या की आवश्यकता होती है। पाइथागोरस की प्रसिद्ध कहावत है, “समस्त वस्तुएं संख्याएँ हैं”। गणितज्ञ और दार्शनिक गॉटफ्रीड विल्हेम लीबनिज़ ने कभी कहा था- “हमारे तर्कों को सुधारने का एकमात्र तरीक़ा यह है कि हम उन्हें गणितज्ञों के तर्कों की तरह मूर्त बना दें, ताकि हम एक नज़र में अपनी ग़लती ढूंढ़ सकें और जब लोगों के बीच विवाद हो, तो हम बस इतना कह सकें: बिना समय गंवाये गणना करें, और देखें कि कौन सही है।”

भारतीय गणितज्ञ भास्कर द्वितीय ने वर्ष 1150 में गणित पर एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम अपनी बेटी पर रखा “लीलावतीयम”। यह पुस्तक अपनी गणितीय समस्याओं के लिए तो प्रसिद्ध है ही, लेकिन अपनी काव्यात्मक भाषा के लिए अधिक लोकप्रिय है। यह बताना कठिन है कि इसे कविता के रूप में सराहा जाना चाहिए या गणित (अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति) के रूप में। गणितज्ञ इसे अपने समय की महानतम पुस्तकों में से गिनते हैं जबकि कवि इसकी सुंदर काव्यात्मक अभिव्यक्ति से चकित होते हैं।
फ्रिट्ज़ॉफ़ कैपरा का कथन है- “जब हम इस जगत् को देखे हैं तो पाते हैं एक विचित्र प्रकार का सन्तुलन है, मानो कि कोई सिम्फ़नी हो। सब कुछ लयबद्ध है। हम और ब्रह्मांड में भी लयात्मकता है।”
हमारा मन हमारी देह को संचालित करता है इसलिए दैहिक पीड़ा से मुक्ति में मन का स्वस्थ होना ज़रूरी है।
कविता या पोइट्री
प्राचीन ग्रीक भाषा के अनुसार, “कविता” शब्द ποιεω (पोइओ) से निकला है, जिसका अर्थ है “मैं रचता हूँ”। संस्कृत में, दुनिया के रचयिता को “कवि” कहा गया है (ख़ासकर वैदिक साहित्य में)। “कवि” शब्द का प्रयोग “ऋषि” दृष्टा के लिए किया गया है, जो कविता रचता है और कहीं-कहीं “वैद्य” के लिए भी “कवि” शब्द का प्रयोग है, जो इलाज करता है। ऋषि या दृष्टा का अर्थ है वह व्यक्ति, जिसके पास इंद्रियों से परे देखने की क्षमता हो। हिंदी में एक प्रसिद्ध कहावत है, “जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि”। यह कहावत कविता के सभी पहलुओं को समेटे है।
दुनिया के विभिन्न हिस्सों में, बहुत पहले से, कविता की भाषा संगीत थी। यह प्रेम, दुख, वियोग और पुनर्मिलन आदि को व्यक्त करने का एक माध्यम थी। यह अपने देवता या ईश्वर से या कभी-कभी आसपास की प्रकृति से या ख़ुद से बात करने का एक माध्यम थी। बच्चे के जन्म, शादी और यहाँ तक कि मृत्यु समारोह में भी इस तरह साथ गाना आम था। प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद और अथर्ववेद में, मृत्यु समारोह पर एक पूरा अध्याय है, जिसे “मृत्यु सूक्त” कहा जाता है, जिसमें मृत्यु को लेकर ऋचाएं संकलित हैं। शिया मुस्लिम समुदाय में “मर्सिया” का गायन आज भी लोकप्रिय है। अरबी कविता में, “Rithā” स्तुति या विलाप की तरह है।
ग्रीक कविता में महाकाव्य, सुरा गीत, धार्मिक जुलूस में गेय भजन, अंतिम संस्कार गीत, विवाह गीत, प्रेम कविताएँ, नाट्य संवाद और देवों व नायकों की स्तुति को काव्यात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा माना जाता था। हेरोडोटस द्वारा विकसित किये जाने के दशकों बाद तक यूनानियों के पास गद्य के लिए कोई शब्द नहीं था। संस्कृत में भी नाटक या नाट्य शास्त्र “काव्य शास्त्र” का हिस्सा था।
कविता कला कैसे बनी, यह चिन्तन का विषय है, जब भाषा विकसित हो गई, विज्ञान और दर्शन जैसे ज्ञान के भिन्न विषय भी विकसित हो गये तो कविता को कला के रूप में भी प्रस्तुत किया जाने लगा, क्योंकि कविता मानस को आल्हाद भी देने लगी। यह बदलाव दुनिया की अधिकांश महत्वपूर्ण भाषाओं में हुआ। यूरोपीय पुनर्जागरण काल में भी इसी तरह कला और साहित्य का विकास हुआ। यह वही समय था, जब क्लासिक्स लिखे गये जिनका विषय मुख्यत: दर्शन, जीवन, मनुष्यता, प्रेम और विरह था। जबकि दुनिया में तमाम प्रसिद्ध कवि एक अरसे रचनारत थे।
खण्डित राग की अखण्डता का आलाप-लोक की काव्यात्मक अनुभूति
मानव जाति में ज़िन्दगी के प्रति एक विचित्र-सी रागात्मकता रही है। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते हुए, तमाम जाने-अनजाने कष्टों को भोगते हुए भी वे ज़िन्दगी के विछोह को सह नहीं पाते हैं। सम्भवतः इसीलिए उनके लिए मृत्यु सबसे अधिक कष्टकारक क्षण है। यूँ तो अन्य जीव-जन्तुओं के लिए भी मृत्यु कम दुखदायी नहीं होती है। गोरैयाँ, बन्दर और कुत्ते आदि जीव तो मृत्यु से वैसे ही ग़मगीन होते दिखायी देते हैं जैसे कि आदमी, फिर भी मानवीय संवेदना अन्य जीव-जन्तुओं से थोड़ी भिन्न ही होती है। मानव बन्दरिया की तरह मरे बच्चे को चिपटाकर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाता अपितु अपनी संवेदना को इतना तीव्र कर लेता है कि मृत्यु भी उसके लिए पारदर्शी और सहज बन जाती है। मानव जाति में भी मृत्यु को अपनी-अपनी तरह से समझने की कोशिश की गयी है। बौद्धिक-विलास में रुचि रखने वाले नागरी वर्ग ने या तो मृत्यु को अमरत्व का जामा पहनाकर जन सामान्य के लिए जटिल बना दिया या फिर क्रूरता की पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया। किन्तु मानव समुदाय में एक ऐसा वर्ग हमेशा ही रहा है जो अपनी जड़ों औऱ माटी से जुड़ा रहा है। इस वर्ग में अधिकतर वे ही लोग हैं जिन्होंने अपने श्रम से धरती को रहने योग्य बनाया। लोक की सबसे बड़ी विशेषता है ज़िन्दगी में अदम्य आस्था और विश्वास। इसी आस्था और विश्वास के कारण वह बड़ी से बड़ी आपदा को हँसते-हँसते झेल लेता है। मृत्यु इस आस्था को खण्डित करती है। वह ज़िन्दगी के तारतम्य को तोड़ती है। लोक अखण्डता पर विश्वास करता है। उसके लिए ज़िन्दगी चक्राकार घूमती है। जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म। मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच के अवकाश को भरने के लिए भी वह कोई न कोई उपाय सोचता रहता है क्योंकि मृत्यु के बाद के बाद की स्थिति को जीवन से अलग देखना उसे स्वीकार नहीं है। वेद भी, जिन्हें भ्रमवश लोक से परे मान लिया जाता है, मृत्यु के सम्बन्ध में भी लोक की मान्यता का समर्थन करते हैं। इसीलिए ऋग्वेद और अथर्ववेद में मृत्यु के बाद की यात्रा का विस्तार से वर्णन मिलता है। वेदों में निहित यम लोक तो किसी भी दृष्टि से भयानक नहीं है। यहाँ बाँसुरी की धुन बजती है और गीत गुंजित होते हैं- ‘इदं यमस्य सादनं देवमानं यदुच्यते। इयमस्य धम्यते नाळीरयं गीर्भिः परिष्कृतः।।’ (ऋ. 10.135.7) विद्वान् प्रो. नर्मदा प्रसाद गुप्त के विचार उल्लेखनीय हैं- “लोकमन मृत्यु की अनिवार्यता को सहन नहीं कर पाता है। वस्तुत: मृत्यु से पराजय का चेतन अनुभव उसे बार-बार कचोटता है और इस कचोट की प्रतिक्रिया में ही उसने जीव के सूक्ष्म शरीर की यात्रा, उसकी बाधाएँ, उसके पड़ाव और उसका गन्तव्य ठीक वैसा ही बुना है, जैसा कि भौतिक यात्रा में होता है। गंतव्य के लोक की कल्पना भी जागतिक है।” (‘लोक में मृत्यु’, रंगायन जु.- सु. 1997)
लोक न तो अकाल मृत्यु को सहन कर पाता है और न ही दुखदायी मृत्यु को। उसके सहज जीवन में सहज मृत्यु को ही स्थान है। सहज मृत्यु को भी वह अपनी लौकिक बुद्धि से और सहज बना लेता है। पूर्ण जीवन जीने के उपरान्त प्राप्त मृत्यु पुनर्जन्म का आधार होती है, इसलिए लोक ने “पितरों” की स्थिति को स्वीकर किया। ऋग्वेद और अथर्ववेद में भी पितरों की कल्पना है- (ऋ. 10.14.8, अवे-18वाँ काण्ड) मानव पितर देवों के तुल्य तो नहीं किन्तु उनसे हीन भी नहीं होते। वस्तुतः वैदिक अवधारणा में “यम” भी आदि मानव है जिसकी मनुष्यों में सबसे पहले मृत्यु हुई। (अवे.18.3.13) पितरों की संकल्पना ने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को बल दिया। इस तरह लोक का जीवन चक्र अखण्डित रहा।
विश्व की प्रायः सभी जनजातियों ने मृत्यु के उपरान्त पितरों की स्थिति को किसी न किसी रूप में माना है। सृष्टि के आदिम काल से आदिवासियों को दो तत्व परेशान करते थे- एक ‘मृत्यु’ और दूसरा ‘रोग’। उन्होंने दोनों स्थितियों को अपने ढंग से संभालने की कोशिश की। वे प्रकृति से इतने जुड़े हुए थे कि उनके लिए मृत्यु को जीवन का अंत मानना आसान नहीं था इसीलिए वे मृत्यु को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना रहा कि मृत जन कुछ वक़्त के लिए चले जाते हैं फिर पुनः जन्म ले लेते हैं। मूल अफ़्रीकन जनजातियों में पितरों की आत्मा को जाग्रत किया जाता, और उनसे अभय की आकांक्षा की जाती है।
उदाहरण के लिए ओकिरी जनजाति के लोग ओरिकी ओरुनमिला इफ़ा अनुष्ठान में इफ़ा धर्म की स्थापना करने वाले में आह्वान करते हैं:
उरुन्मिला, बारा एगबोनिरेगुन,
हम आपको आपकी शक्ति के नाम से पुकारते हैं
मृत्यु और विनाशक शक्तियों से रक्षा के लिए शक्ति देने के लिए
उस मार्ग के लिए जहां कोई अनजाना न हो
मैं सृष्टि को साक्षी कर आह्वान करता हूँ,
जो सृष्टिकर्ता के बाद दूसरे स्थान पर है
शान्ति के लिए Cheyenne जनजाति की एक प्रार्थना को देखिए:
हम सब शान्ति से रहें
जब तक चांद उगे, तब तक हम जीवित रहें
जब तक नदियां बहें, तब तक हम जीवित रहें
जब तक सूरज जले, तब तक हम जीवित रहें
जब तक घास उगे, तब तक हम जिएं
हम इसी भावना को वेदों में भी पाते हैं, उनकी प्रार्थना का स्वरूप भी इसी तरह का है, देखिए:
बहे नदियाँ सुखकारी
बहे वायु सुखकारी
उड़ें पंछीं सुखकारी
हविषा देते हम यज्ञ में
करें स्वीकार बन सभी सुखकारी
यह हविष पहुँचे सभी देवों को
उत्तम बने सभी की वाणी
बने सुखकारी समस्त पशु
धन सम्पत्ति हमारी
नदियों से जो स्त्रोत उमड़ कर बहते
उन के साथ हम भी संवर्धन करें
करें धन उत्तम रीति से।
जो घी, दूध, जल की
बहतीं धाराएँ
उन सब का वर्धन करें हम
करे सद् उपयोग सभी का। (भावानुवाद-रति सक्सेना)
सं सं स्रवन्तु सिन्धवः सं वाताः सं पतत्रिणः।
इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्राव्येण हविषा जुहोमि।।
अथर्ववेद के आठवें काण्ड के पहले सूक्त के पहले मंत्र को देखकर लगता है कि यह मृत्यु की उपासना में रचा मंत्र है किन्तु दूसरे सूक्त से ही मृत्यु के प्रति वैराग्य की भावना उभरती है, यह विचित्र विरोधाभास लोक का मूल मंत्र है जिसमें पौरुषेय का सम्मान करते हुए ज़िन्दगी के प्रति मोह झलकता है। यहाँ न केवल मृत्यु का विरोध है बल्कि ज़िन्दगी के आशावान पक्षों का विवेचन भी है। लोक में मृत्यु के प्रति क्या भाव हो सकते हैं, उनकी प्रतीति इस मंत्र में होती है।
मौत देहावसान!
तुझे नमस्कार
किन्तु यह आदमी बलपौरुषवान
तुझमें रमते इसके प्राण पान
रहने दे इसे यहीं
मत ले जा अपने साथ
यह ज़मीं जहाँ सूरज चमकता है
यही है मृत लोक इसके लिए
यह आदमी
हमेशा आगे बढ़ा है भाग्य को जीतता हुआ
आगे बढ़ा है सोम की किरणों से भींजता हुआ
बढ़ता रहा है दिव्य शक्तियों को जीतता हुआ
ऊँचा उठा है हवा और आग को अपना बनाता हुआ
फिर क्यों आये यह तेरे लोक में!
ओ आदमी!
यह तेरा बल, तेरी बुद्धि
तेरा मन और आयु
यही रहे, यही रहने दे
तेरे दुर्भाग्य को दूर करेंगे हम
अपनी वाणी की परम शक्ति से
तू उठ,
मत गिर मौत के फंदे में
मत दूर जा इस संसार से
जहाँ सूरज और आग का ताप है
आख़िर किसके लिए यह संसार है
किसके लिए मातरिश्र्वा हवा बहाते हैं?
किसके लिए मृत बरसाती बरसती हैं बरसातें?
किसके लिए बहती हैं जल धाराएँ
किसके तन को ताप देने सूरज तपता है?
तेरे लिए, सिर्फ़ तेरे लिए
फिर क्यों जा रहा है मौत की ओर
छोड़ उस रास्ते को
लौट आ
मेहनत ही तेरा पुरुषार्थ
और जीने की दक्षता
यह ज़िन्दगी है मरणलोक
यहीं हैं ज़िन्दगी के सभी सुख
तू इन सुखों के रथ पर चढ़
तू आगे बढ़
तू विचारों को तीव्र बना
आवाज़ उठा
बन जा अमर इसी लोक में
उठ, तू ऊपर उठ!
देह की बात छोड़
मन से भी न जा उन रास्तों में
जहाँ जाकर नेक जीव
तिरोहित हो जाते हैं
मत सोच कि तेरे पितर गये उस लोक
तो तुझे भी जाना पड़ेगा
तू चाहे तो अपना रास्ता अलग बना
यहीं दिव्य शक्तियाँ सहाय बनेंगी तेरी
मत सोच उन लोगों की जो चले गये
और साथ ले गये साथियों को न जानी जगहों पर
तू उठ! बाहर आ इस गहरे अंधेरे से
तू चला आ उजालों में
हम दोनों हाथों थाम तुझे उठाते हैं।
यम के भेजे कुत्त्ते खड़े हैं रास्ते में
काले और चितकबरे
मत जा उनके क़रीब
लौट आ
लेकिन उदास होकर यहाँ मत रुक
उन रास्तों पर मत चल,
नाइजीरिया में थिएटर कला विभाग के कर्मचारी चार्ल्स ओ. एलुडे पारंपरिक अफ़्रीकी समाजों में म्यूज़िक थेरेपी के बारे में कहते हैं- “थेरेपी को स्वतन्त्र पद्धति की तरह देखने की ज़रूरत है।”
क्रमश:

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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