
- February 23, 2026
- आब-ओ-हवा
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(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे.. मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का एक भाव। आब-ओ-हवा पर 'शुक्रिया किताब'.. इस बार एक उपन्यास जो हिंदी साहित्य में कल्ट का दर्जा हासिल कर चुका है- संपादक)
शरद देवस्थले की कलम से....
राग दरबारी: पिता ने मुझे दी, मैंने बेटे को...
जब भी किसी ने पूछा है कि तुम्हारी मनपसंद किताब कौन सी है, बिना एक पल गंवाये ‘राग दरबारी’ ही कहा है मैंने। किताबों की कई श्रेणियाँ हो सकती हैं। शिक्षाप्रद, रोचक, प्रेरणा देने वाली, उच्च साहित्यिक कृति, पौराणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, कविता, हास्य-व्यंग्य, रोमांटिक, दर्शन शास्त्र, पाकशास्त्र आदि-आदि। किसी भी श्रेणी में रखें, राग दरबारी ही मेरा जवाब होगा।
कौन-सा रस, कौन-सा दर्शन, फ़लसफ़ा नहीं है इस महान उपन्यास में। एक महाकाव्य है यह उपन्यास। श्रीलाल शुक्ल जी की महानतम रचना। भूतो ना भविष्यत है राग दरबारी। पता नहीं क्या बात है कि सिर्फ़ मैं ही नहीं बहुतों ने इसे दस, बीस, तीस बार पढ़ा है। हर पन्ना, हर वाक्य कंठस्थ हुआ करता था।
सन 1968 में छपे इस उपन्यास के लिए सन 1969 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार श्रीलाल शुक्ल जी को मिला। तबसे अब तक इसके न जाने कितने संस्करण छप चुके हैं। मेरे पिताजी ने मुझे यह किताब पढ़ने के लिए दी थी और कहा था इसे ज़रूर पढ़ो। शायद सन 74 के आसपास मिली इस किताब को अब तक मैंने बीसियों बार पढ़ा है। अपने दोस्तों को दी यह किताब। हमारा एक ग्रुप बन गया था, जहां हम ‘गंजहे’ होने की कोशिश करते थे। शिवपालगंज हम सबके दिलो-दिमाग़ में बस चुका था।
शिवपालगंज, उसके निवासी, वैद्य जी हों या लंगड़ या बद्री पहलवान, प्रिंसपल साहब, खन्ना मास्टर, सब अपने-अपने-से लगते थे। एक तो हमारी तबकी उम्र और रहना ज़िला मुख्यालय में था, सो अपने को रंगनाथ की श्रेणी में रखते थे। रंगनाथ जब छुट्टी बिताने या स्वास्थ्य लाभ के लिए अपने मामा वैद्य जी के गाँव शिवपालगंज पहुंचता है तो उसके सामने जो शिवपालगंज खुलता है… तो हमें लगा था कि हमारे सामने ही यह तिलस्म खुल रहा है।
एक क़स्बे के लोग, उनकी बोलचाल, उनकी राजनीति को कुछ ऐसा लिखा है कि राष्ट्रीय ही क्यों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सही लगता है। शिवपालगंज के वैद्य जी, जो क़स्बे की हर संस्था को अपनी मर्ज़ी से चला रहे हैं, जाने कितनी जगहों पर हैं। प्रादेशिक स्तर पर वो कोई मंत्री है, जो कई विभाग संभाले है, साथ ही किसी खेल अकादमी का अध्यक्ष भी है। चौधरी हर जगह हैं, भोपाल हो या दिल्ली। विश्व का चौधरी अमेरिका या रूस हो। विरासत संभालने के लिए बैल-बुद्धि बद्री पहलवान हों या बिगड़ैल छोटे नवाब रुप्पन बाबू हों, देश-विदेश की राजनीति की बिसात पर भी ये लोग दिख जाएंगे। हम आमजन लंगड़ जैसे हैं जो सत की लड़ाई लड़ रहे हैं और मौत के बाद ही खसरे की नक़ल मिलती है।
जब प्लानिंग कमीशन की कार्यप्रणाली पर लिखते हैं शुक्ल जी तो वो अर्थशास्त्र के गूढ़ सिद्धांतों को बता रहे अर्थशास्त्री-से प्रतीत होते हैं। जब पुलिस थाने का वर्णन करते हैं, लगता है लोक प्रशासन का विद्वान बोल रहा है। राजनीति का वर्णन करते हैं तो प्लेटो के समकक्ष लगते हैं। जीवन का हर व्यवहारिक पहलू जीवंत कर दिया है। हँसते-खेलते बड़ी-सी बात कह जाते हैं इस उपन्यास में।

मेरे पिताजी ने मुझे दी थी यह पढ़ने के लिए। वो पढ़ते वक़्त ज़ोर-ज़ोर से हंसा करते थे। मैं भी ज़ोर-ज़ोर से हंसा इसके हर वाचन में। फिर अपने बेटे को दी यह किताब, वो भी हँसता हुआ दिखा। शायद कालजयी रचना इसे ही कहते हैं। अभी हाल ही एक नौजवान, जो भारतीय है मगर अभी न्यूजीलैंड में अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी चला रहा है, को राग दरबारी पढ़ने को दी। उसका बचपन भारत में ही बीता मगर अभी एक अलग ही दुनिया में है। पढ़ने के बाद उसने कहा, ‘अंकल, क्या चीज़ दे दी आपने, आज तक ऐसा कुछ नहीं पढ़ा।’ फिर उसने कहा, ‘अंकल इन सभी पात्रों को अब मेरे आफ़िस के लोग भी जानते हैं। जब भी कोई नेगोसिएशन हो या प्रेज़ेंटेशन हो और हम कोई एक-आध संवाद बोलकर अपने लोगों की स्ट्रैटजी पूरी कर लेते हैं। यार ये तो रुप्पन बाबू जैसी बात है कहने से सामने वाला गोरा सोचता रह जाता है और मेरा दोस्त समझ जाता है आगे क्या करना है..’
सच, ऐसी ऐसी उपमाएँ हैं कि हमारे बातों में रही हैं बरसों तक। जुआ खिलवाने वाले को शुक्ल जी ने कहा- शिवपाल गंज के जुवाड़ी संघ के मैनेजिंग डाइरेक्टर, टूटे-फूटे ट्रक को- मानो इस ट्रक का जन्म सड़कों पर बलात्कार करने के लिए हुआ हो, वहीं आरटीओ की जीप से उतरते हुए कर्मचारियों को कुछ यूं लिखा- जीप में से एक अफ़सरनुमा चपरासी और एक चपरासीनुमा अफ़सर उतरा… फुट्टफैरि, लासेबाज़ी, यही तुम्हारी इंसानियत है जैसे कई वाक्यांश हैं जो अद्वितीय हैं।
राग दरबारी के लिए सिर्फ़ यही कहना है कि ‘झाड़े रहो बेटा कलेक्टरगंज’…
(क्या ज़रूरी कि साहित्यकार हों, आप जो भी हैं, बस अगर किसी किताब ने आपको संवारा है तो उसे एक आभार देने का यह मंच आपके ही लिए है। टिप्पणी/समीक्षा/नोट/चिट्ठी.. जब भाषा की सीमा नहीं है तो किताब पर अपने विचार/भाव बयां करने के फ़ॉर्म की भी नहीं है। edit.aabohawa@gmail.com पर लिख भेजिए हमें अपने दिल के क़रीब रही किताब पर अपने महत्वपूर्ण विचार/भाव – संपादक)

शरद देवस्थले
हिंदुस्तान पेट्रोलियम में 34 वर्षों की सेवा के बाद दिसंबर 2017 में सेवानिवृत्त होकर आजकल महेश्वर में जैविक खेती और ज्योतिष के क्षेत्र में मसरूफ़ हैं। तकनीकी शिक्षा के बावजूद कला, साहित्य से अगाध प्रेम रहा। मन कवि और संवेदनशील है। क्रिकेट, बैडमिंटन के खिलाड़ी होने के साथ ही नया कुछ सीखने का शौक़ है। ख़ुद को जैक ऑफ़ ऑल की श्रेणी में रखते हैं और किसी एक क्षेत्र में निपुणता न पा सकने का अफ़सोस जताते हैं।
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बहुत खूब । किताबें पढ़ना ,उनके झरोखों से दुनिया को देखना और सीखना यह विरासत अवश्य सहेज कर आगे बढ़ाने योग्य है । आशा है कि राग दरबारी से आरंभ कर अब इसे और विस्तार देंगे।आपके विचार व लेखन सराहनीय हैं।