
हिंदी लेखक मनोज रूपड़ा के साथ एक कुलपति के आपत्तिजनक बर्ताव के बाद साहित्य जगत में प्रतिवाद का क्या हाल रहा? प्रतिक्रियाओं पर प्रतिक्रियाओं का आलम क्या रहा? इस पूरे परिदृश्य के संबंध में एक चिट्ठी मिली…
साहित्य के ठेकेदारों के नाम एक चिट्ठी
प्रति,
श्री साहित्याचार्य जी,
आत्मग्रस्त अपार्टमेंट,
खाऊ गली…
देश का संपूर्ण कोना
विषय: प्रवृत्ति पर लिखने के लिए अनुमति प्रदान किये जाने बाबत
महोदय,
मैं एक अदना सा जर्नलिस्ट हूं। हालांकि अब इस देश में जर्नलिस्टों का वह सम्मान नहीं बचा जो होना चाहिए बावजूद इसके कुछ अच्छे जर्नलिस्टों के कामकाज को देखकर राहत मिलती है और यह गर्व हमेशा मेरे साथ चस्पा रहता है कि जर्नलिस्ट भी कुछ बेहतर कर सकते हैं। यदि हिंदी समाज उन्हें मौक़ा देगा तो थोड़ा-बहुत लिख-पढ़ भी सकते हैं।
एक बार की बात है, मैंने एक कॉलम में सीधे-सीधे कुछ लोगों का नाम लिख दिया था, तब मेरे संपादक रहे श्री राजनारायण मिश्रा जी ने मुझसे कहा- जब कोई आदमी शक्कर खाकर शुगर का पेशेंट हो सकता है और मर सकता है तो जानबूझकर उसे ज़हर क्यों दिया जाये?
आदरणीय राजनारायण जी तो अब इस पापी संसार को देखने के लिए मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका दिया हुआ सबक़ अब भी काम आ रहा है। अब भी मैं गपशप या इधर-उधर की बातों में अथवा किसी कॉलम में लोगों का नाम नहीं लिखता।
राजनारायण जी ने हमें यह भी समझाया है कि कोई भी मनुष्य बुरा नहीं होता है, उसकी प्रवृत्ति बुरी होती है, इसलिए जब चोट करो तो प्रवृत्ति पर किया करो। आत्मग्रस्तता के शिकार और केवल अपने परिवार को ही आगे बढ़ाने वाले लोगों की प्रवृत्ति पर चोट करना कोई अपराध तो नहीं है? राजनारायण जी कहते थे जब भी कोई प्रवृत्ति पर चोट करता है तो आत्ममुग्ध व्यक्ति घायल होकर फड़फड़ाने लगता है।
लेकिन इधर लगता है कि प्रवृत्ति पर लिखने से पहले भी अनुमति लेने का कोई क़ानून आ गया है। मैं क़ानून पर भरोसा करता हूं इसलिए साहित्याचार्य जी यह आवेदन पत्र आपको लिख रहा हूं।
मुझे किसी ने बताया है कि आप ग़ज़ल लिखते हैं, आप कविता लिखते हैं, कहानी लिखते हैं, आप उपन्यास लिखते हैं, आप आत्मकथा लिखते हैं और अनुवाद का काम भी करते हैं। जब आप साहित्य की सेवा करते-करते थक जाते हैं तो वायलिन भी बजाते हैं।
साहित्य की दुनिया के एक कथित आचार्य को कुछ न कुछ तो बजाना ही चाहिए क्योंकि जब रोम जल रहा था तब नीरो भी बांसुरी बजाया करता था। यह बात मैं इसलिए लिख रहा हूं साहित्याचार्य जी कि मैंने कभी आपको व्यवस्था के ख़िलाफ़ लिखते-पढ़ते और बोलते हुए नहीं देखा है। आपके सारे विषय आमोद-प्रमोद से भरे हुए क्यों रहते हैं?
इधर ज्ञात हुआ है कि आपने स्वयं को और परिवार वालों को लिखने-पढ़ने वालों की दुनिया में स्थापित करने के लिए कोई संस्था भी खोल ली है। यह आपने बहुत अच्छा काम किया है। यह आपके लिए बहुत आवश्यक भी था क्योंकि जब तक आप लोगों से वाह-वाह… क्या बात है… क्या बात है… यानी ट्रक भरकर तारीफ़ को ख़ुद के भीतर समाहित नहीं कर लेंगे, तब तक चैन से सो भी नहीं पाएंगे। अब खाये-पिये और अघाये लोगों को चैन की नींद नहीं आएगी तो भला किसे आएगी?
लगता है आपकी तरह मैं भी विषय से भटक गया हूं। मेरे अभिन्न मित्र मनोज रूपड़ा कहते हैं किसी भी समझदार आदमी को विषय पर ही बोलना चाहिए।
मैं विषय पर केंद्रित करता हूं।

तो विषय यह है कि कोई भी लेखक अपनी रचना से बड़ा होता है… ख़ुद को या अपने परिवार वालों को प्रोजेक्ट करने से नहीं इसलिए अगर आप अपनी रचना पर ध्यान देंगे तो पाठक को कुछ लाभ होगा। अपने दोस्त मनोज रूपड़ा को मैंने कभी ख़ुद की किताब के विमोचन समारोह में नहीं देखा है। उनके लिखे हुए के ताप को समझने के लिए आपको एक दूसरा जन्म लेना पड़ सकता है।
अब एक छोटा सा सवाल है- मैंने तो कोई पोस्ट प्रवृत्ति पर चोट करते हुए लिखी थी, किसी का नाम भी नहीं लिखा था, आपको कैसे पता चला कि वह पोस्ट आप पर ही है?
आपको इसलिए पता चला साहित्याचार्य जी…क्योंकि जिस प्रवृत्ति का मैंने उल्लेख किया है वह प्रवृत्ति आपकी ही है। आप जैसे और भी कई लोगों की है।
प्रवृत्ति पर चोट करने से कोई छटपटाने लगे तो यह माना जाना चाहिए कि तीर निशाने पर लगा है।
आजकल लोग किताब-विताब तो लिख लेते हैं, पैसा देकर छपवा भी लेते हैं, लेकिन जब कोई किताब की चर्चा नहीं करता तो फिर अपने किताब के बारे में अपनी समीक्षा ख़ुद ही लिखकर ख़ुद को महान साबित करने की चेष्टा भी करते रहते हैं। किताब कैसे चर्चा में रहे इसके लिए उपाय खोजते रहते हैं।
अरे चचा…. अगर कोई कवि जनता का कवि होगा तो जनता के बीच अपनी जगह ख़ुद ही बना लेगा। काहे बेमतलब का प्रोजेक्ट करना? अगर कोई किताब दमदार होगी तो पाठक उसे खोजकर मंगवा लेगा और पढ़ लेगा।
एक अच्छे लेखक को अपनी किताब को चर्चा में लाने के लिए बाबूलाल चतुर्वेदी वाली स्टाइल में वार्षिक कैलेंडर छापने की ज़रूरत नहीं होती है चचा।
एक बात और…
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। बात को जाना भी चाहिए, लेकिन बात तो तब जाएगी न जब बात में दम होगा?
बिलासपुर में मनोज रूपड़ा के अपमान वाली बात में दम था इसलिए वह बात दूर तक गयी। दूर-दूर तक यह बात पहुंची कि देखो एक संघी कुलपति किस ढंग से एक लेखक का अपमान कर रहा है। यह बात भी दूर तक पहुंची कि कार्यक्रम में शामिल कुछ लेखक बेशर्मी के साथ मंच पर विराजमान रहे और उन्होंने प्रतिरोध करना आवश्यक नहीं समझा। यह बात तो अब दूर देश तक पहुंच गयी है कि कैसे कुछ लोग अब भी सफ़ाई और बचाव कार्य में जुटे हुए हैं। लोगों को यह भ्रम होता है कि जनता कुछ नहीं समझती है।
ये पब्लिक हैं पब्लिक
पब्लिक सब जानती है
सच तो यह है कि कोई ऐसी बात जिसमें जनता का सरोकार निहित नहीं होता है वह बात निकलने के पहले ही दम तोड़ देती है।
एक और बात जो मुझे ख़ुशी दे रही है, वह यह है कि आजकल लोग एक अदने से पत्रकार को केंद्र में रखकर लंबी-लंबी पोस्ट लिख रहे हैं। सच में इस मेहनत को देखकर दिल गार्डन-गार्डन हो गया है।
मैं उन सबका शुक्रिया अदा करता हूं जो मेरे लिए मेहनत कर रहे हैं। उन हरिरामों का भी शुक्रिया जो मुझे चर्चा के केंद्र में बनाये रखने के लिए निरन्तर संघर्षरत हैं।
[विशेष: यह आत्ममुग्धता के शिकार लोगों ध्यान में रखकर लिखा गया व्यंग्य जैसा कुछ है। पता नहीं व्यंग्य है भी या नहीं? यदि व्यंग्य है तो ठीक और अगर नहीं है तब भी… इसका किसी भी तरह के जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है. यदि कोई संबंध बनता है इसे संयोग मात्र माना जाये]
बहरहाल साहित्याचार्य जी…मुझे प्रवृत्ति पर लिखने के लिए आपके अलावा और कहां-कहां आवेदन करना होगा? इसकी जानकारी आप प्रदान करेंगे तो आभारी रहूंगा।
आपका आज्ञाकारी
राजकुमार सोनी (रायपुर)
