
- March 15, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....
एक अध्ययन: कैरिकेचर और कार्टूनिंग से मीम्स तक
परंपरागत रूप से व्यंग्य को शब्द-केंद्रित विधा माना जाता रहा है लेकिन इसके सामानांतर व्यंग्य को रेखाओं, रंगों और आकृतियों के माध्यम से भी अभिव्यक्त किया जाता रहा है। यद्यपि व्यंग्य की मुख्यधारा में इस चित्रात्मक अभिव्यक्ति की अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है। व्यंग्य के इस चित्रात्मक स्वरूप को सामान्यतः कैरिकेचर और कार्टूनिंग के नाम से जाना जाता है। व्यंग्य की ये शैलियाँ भी प्रतीकों और संकेतों के माध्यम से वही कटाक्ष करती हैं, जो गद्य अथवा पद्य व्यंग्य में शब्दों के माध्यम से किया जाता है। ये देखने वाले को तात्कालिक हास्य और चिंतन के अवसर प्रदान करती हैं। आधुनिक संदर्भ में कैरिकेचर और कार्टूनिंग को ‘दृश्य व्यंग्य’ या ‘ग्राफिक व्यंग्य’ की श्रेणी में रखा जा सकता है।
कैरिकेचर व्यक्ति या घटना के अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण पर आधारित व्यंग्य शैली है, जिसमें किसी व्यक्ति की विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं या व्यवहारगत लक्षणों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है। इसके विपरीत कार्टूनिंग अपेक्षाकृत व्यापक शैली है जिसमें राजनीतिक कटाक्ष, सांस्कृतिक आलोचना अथवा सामजिक विसंगतियों को चित्रों तथा संक्षिप्त पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। अंग्रेज़ी साहित्य में इस प्रकार की प्रभावपूर्ण, संक्षिप्त और तीक्ष्ण पंक्तियों को एपिग्रामाटिक (epigrammatic) और इनके व्यंग्यात्मक प्रभाव को ‘एपिग्रामाटिक सटायर’ कहा जाता है। हिंदी में इसका भावार्थ ‘सूक्तिपूर्ण व्यंग्य’ के रूप में लिया जा सकता है। व्यंग्य की तरह इन शैलियों का उद्देश्य भी विसंगतियों को उजागर करना और सत्ता, व्यवस्था व समाज को आईना दिखाना होता है।
इन शैलियों की प्रमुख विशेषताएँ इनकी प्रतीकात्मकता, संक्षिप्तता और रूपकात्मक प्रस्तुति है। कम शब्दों और संकेतों में गहरी बात कह जाना इन्हें विशेष बनाता है। उदाहरण के तौर पर, किसी राजनेता को बहुत बड़े जूतों में दिखाया जाये, तो यह उसके ‘अहंकार’ या ‘पदलोलुपता’ का प्रतीक हो सकता है। इसी प्रकार किसी नेता की अत्यधिक भाषणबाज़ी को दिखाने के लिए उसका मुँह असामान्य रूप से बड़ा बनाया जा सकता है, या लालच और अवसरवादिता को दिखाने के लिए पेट को बड़ा तथा हाथों को लंबा चित्रित किया जा सकता है।
कैरिकेचर व्यंग्य का एक प्रकार से ‘व्यक्तिकेंद्रित स्वरूप’ है। कैरिकैचर कलाकार यह कार्य मुख्यतः इसे ‘अतिशयोक्ति’ के माध्यम से करते हैं। इस शैली में किसी व्यक्ति की विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं जैसे लंबी नाक, बड़े कान, उभरा हुआ पेट, विशिष्ट हेयरस्टाइल या विशेष पहनावे को बढ़ा-चढ़ाकर चित्रित किया जाता है। यह अतिशयोक्ति उस व्यक्ति के व्यक्तित्व, चरित्र अथवा सार्वजनिक छवि को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए की जाती है। उदाहरण के रूप में इंदिरा गांधी के कैरिकेचर प्रायः उनकी लंबी नाक और विशिष्ट केशविन्यास के साथ बनाये जाते रहे हैं, जबकि लालू प्रसाद यादव को उनकी विशिष्ट हेयरस्टाइल और चेहरे की बनावट के साथ चित्रित किया जाता रहा है। इसी प्रकार एक साधारण गोलाकार रेखा और पतले फ्रेम का चश्मा बनाकर जिस व्यक्ति का चित्र बनाया जाता है, उसे लोग बिना किसी शब्द के ही सहजता से पहचान लेते हैं कि वह महात्मा गांधी का कैरिकेचर है। इसी प्रकार अचकन और गांधी टोपी के साथ चित्रित पंडित जवाहरलाल नेहरू के कैरिकेचर भी एक नज़र में पहचाने जा सकते हैं। यह कैरिकेचर कला की सबसे बड़ी शक्ति है जो स्थापित करता है कि चित्र, शब्दों की अपेक्षा अधिक त्वरित और प्रभावी ढंग से संप्रेषित होते हैं।
कार्टून: इतिहास और परंपरा
कार्टूनिंग को व्यंग्य का ‘सामाजिक-राजनीतिक स्वरूप’ कहा जा सकता है। यह एकल चित्र, चित्र-शृंखला या संवादयुक्त दृश्य के रूप में प्रस्तुत होती है, जिसमें प्रतीकात्मकता प्रमुख होती है। कार्टूनिंग को एक प्रकार का ‘नैरेटिव व्यंग्य’ भी कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें दृश्य के माध्यम से एक संक्षिप्त कथा या परिस्थिति का संकेत मिलता है। यही कारण है कि कैरिकेचर और कार्टून आज के समय में जनसंचार और सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी के अत्यंत प्रभावी माध्यम बन चुके हैं।

कैरिकेचर एवं कार्टूनिंग की आधुनिक परंपरा विशेष रूप से यूरोप में पुनर्जागरण काल और उसके बाद विकसित हुई, किंतु चित्रों के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति मानव सभ्यता में अत्यंत प्राचीन है। प्राचीन काल से ही मनुष्य रेखाचित्रों और प्रतीकात्मक चित्रों के माध्यम से अपने विचारों और अनुभवों को अभिव्यक्त करता रहा है। विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में ‘भित्तिचित्र’ और ‘शैलचित्र’ के प्रमाण मिलते हैं।
लगभग 3000 ईसा पूर्व की मिस्र सभ्यता में भित्तिचित्रों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। ये चित्र प्रायः पिरामिडों और कब्रों की दीवारों पर बनाये जाते थे। विशेष रूप से तूतनख़ामेन की क़ब्र पर उकेरे गये चित्र इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ग्रीस में, विशेषकर लगभग 1600 ईसा पूर्व की मिनोअन सभ्यता के समय, भित्तिचित्रों का उल्लेखनीय विकास हुआ। इन चित्रों में प्रकृति, समुद्री जीवन और खेलकूद के दृश्य प्रमुखता से दिखायी देते हैं। इसके बाद रोमन सभ्यता में पहली शताब्दी के आसपास भित्तिचित्रों की अत्यंत विकसित परंपरा मिलती है। इटली के पोंपेई में प्राप्त भित्तिचित्रों में रोमन समाज के दैनिक जीवन, संस्कृति और मनोरंजन का सजीव चित्रण मिलता है। चीन में चौथी शताब्दी के आसपास विकसित दुनहुआंग गुफा चित्रों में बौद्ध धर्म और रेशम मार्ग से जुड़े सांस्कृतिक आदान-प्रदान की सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है। इसी प्रकार पाँचवीं शताब्दी में श्रीलंका के सिगिरिया भित्तिचित्र, अपने कलात्मक सौंदर्य और शैली के लिए प्रसिद्ध हैं, जिनमें प्रकृति, दरबारी जीवन और अलंकृत स्त्री आकृतियों का सुंदर चित्रण मिलता है।
इन प्राचीन सभ्यताओं के समानांतर भारत में भी भित्तिचित्रों और शैलचित्रों की अत्यंत प्राचीन परंपरा मिलती है। मध्यप्रदेश स्थित भीमबैठका के शैलचित्र विश्व की सबसे प्राचीन चित्रकलात्मक विरासतों में गिने जाते हैं, जिनका काल लगभग 10,000 ईसा पूर्व या उससे भी पूर्व का माना जाता है। ये चित्र प्रागैतिहासिक मानव के जीवन और संस्कृति के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं तथा मानव सभ्यता के विकास को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत भी हैं। इन चित्रों में शिकार के दृश्य, युद्ध, पशु-पक्षियों जैसे हाथी, हिरण, बाघ और घोड़े, के चित्रण के साथ-साथ नृत्य और उत्सव के दृश्य भी मिलते हैं।
इसके बाद भारत में लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से विकसित अजंता की गुफाओं में बौद्ध धर्म और जातक कथाओं का अत्यंत सुंदर चित्रण मिलता है। वहीं 6वीं से 9वीं शताब्दी के बीच की एलोरा गुफाओं में भित्तिचित्रों और शिल्पकला का अधिक परिष्कृत रूप देखने को मिलता है। यदि व्यंग्य के परिप्रेक्ष्य में इन चित्रों का अवलोकन किया जाये, तो अजंता के कुछ भित्तिचित्रों में राजाओं और अभिजात्य वर्ग के जीवन का ऐसा चित्रण दिखायी देता है जिसमें हल्की व्यंग्यात्मकता के संकेत मिलते हैं, यद्यपि इस संदर्भ में अभी तक कोई सर्वमान्य और प्रामाणिक व्याख्या उपलब्ध नहीं है।
आधुनिक संदर्भों की भूमिका
आधुनिक अर्थों में कैरिकेचर की जड़ें 16वीं-17वीं शताब्दी के इटली में मानी जाती हैं, जहाँ कलाकारों ने मानव मुखाकृतियों को अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से चित्रित करने का प्रयोग किया। ‘ब्रिटैनिका’ के अनुसार ‘कैरिकेचर’ शब्द इतालवी क्रिया-शब्द ‘कैरिकेयर’ से बना है, जिसका अर्थ है “भार डालना” या “अतिशयोक्तिपूर्ण विवरण के साथ किसी चीज़ को प्रस्तुत करना।” इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले मोसिनी ने 1646 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘डाइवर्स फ़िगर’ में किया था। संभव है कि संज्ञा के रूप में ‘कैरिकेयर’ शब्द पर इतालवी शब्द ‘कैरेटेरे’ (शाब्दिक अर्थ चरित्र) और स्पेनिश शब्द ‘कैरा’ (शाब्दिक अर्थ चेहरा) का भी कुछ प्रभाव रहा हो क्योंकि अधिकांश कैरिकेचरों की शुरूआत प्रायः चेहरे से ही होती है।
लियोनार्डो द विंची ने भी कुछ विकृत अथवा अतिरंजित मुखाकृतियों के रेखाचित्र बनाये थे, जिन्हें कैरिकेचर की प्रारंभिक प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता है। आगे चलकर इटली के कैरेच्ची परिवार के कलाकारों ने भी इस शैली को विकसित करने में योगदान दिया। 18वीं शताब्दी में जब कैरिकेचर का विचार और व्यवहार इटली और फ्रांस से ग्रेट ब्रिटेन पहुँचा, तो यह एक व्यापक अर्थ वाला शब्द बन गया। वहाँ यह शैली, विशेष रूप से राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य के रूप में विकसित हुई।
इस दौर में विलियम हॉगार्थ को चित्रात्मक व्यंग्य की परंपरा को लोकप्रिय बनाने का प्रमुख श्रेय दिया जाता है। हॉगार्थ ने अपने चित्रों के माध्यम से 18वीं सदी के अंग्रेज़ी समाज की नैतिक पतनशीलता, पाखंड, भ्रष्टाचार और सामाजिक समस्याओं पर तीखा व्यंग्य किया। उनके चित्रों में समाज की बुराइयों – जुआ, शराबख़ोरी, वेश्यावृत्ति और सामाजिक भ्रष्टाचार पर करारे व्यंग्यात्मक प्रहार के साथ-साथ समाज को सुधारने का संदेश भी मिलता है। उनके प्रमुख चित्रात्मक कार्यों में ‘ए हर्लोट’स प्रोग्रेस’ (एक ग्रामीण लड़की के लंदन आने और धीरे-धीरे वेश्यावृत्ति में फँसने की कहानी), ‘मैरिज ए ला मोड’ (अभिजात्य वर्ग की स्वार्थपूर्ण विवाह व्यवस्था पर व्यंग्य) तथा ‘जिन लेन’ (शराब की लत से बर्बाद हो रहे समाज का चित्रण) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कृतियों के माध्यम से हॉगार्थ ने चित्रों को सामाजिक आलोचना और व्यंग्य का प्रभावशाली साधन बनाया।
‘कार्टून’ को कैरिकेचर से विकसित हुई शैली माना जाता है। ‘कार्टून’ शब्द का आधुनिक अर्थ में प्रचलन 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ। कला के पारंपरिक संदर्भ में कार्टून का अर्थ था, एक रेखाचित्र या पूर्ण आकार का प्रारूप, जिसे चित्रकला, टेपेस्ट्री या मोज़ेक जैसे कार्यों के लिए प्रारंभिक नमूने के रूप में बनाया जाता था। 1840 के दशक में, ‘कार्टून’ शब्द चित्रात्मक पैरोडी या व्यंग्यचित्र के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। यह ऐसा रेखाचित्र होता था, जो विरोधाभास के माध्यम से, संवाद या टिप्पणी के साथ, किसी समकालीन घटना, सामाजिक प्रथा या राजनीतिक-सामाजिक प्रवृत्ति पर व्यंग्य करता था। 1841 में प्रारंभ हुई ब्रिटिश पत्रिका ‘पंच’ ने ‘कार्टून’ शब्द को वह अर्थ दिया, जिसे आज हम राजनीतिक या सामाजिक व्यंग्यचित्र के रूप में जानते हैं। पंच पत्रिका के प्रमुख कार्टूनिस्टों में जॉन लीच का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनके कार्टूनों ने पत्रिका को अत्यधिक लोकप्रिय बनाया। इसी अवधि में स्विट्ज़रलैंड के कलाकार रॉडोल्फ टॉपफ़र ने चित्रों की क्रमबद्ध शृंखला के रूप में कथात्मक रेखाचित्र तैयार किये, जिन्हें आधुनिक ‘कॉमिक स्ट्रिप्स’ का प्रारंभिक रूप माना जाता है। इस प्रकार टॉपफ़र को आधुनिक कार्टूनिंग और कॉमिक कला के विकास में एक महत्वपूर्ण पथप्रदर्शक माना जाता है।
भारत में व्यंग्य-चित्रों की यात्रा
अंग्रेज़ी पत्रिका ‘पंच’ की परंपरा से प्रेरित होकर भारत में भी व्यंग्य-चित्रों की परंपरा विकसित हुई। 1877 में लखनऊ से “अवध पंच” पत्रिका की शुरूआत हुई। यह पत्रिका उर्दू में प्रकाशित होती थी तथा इसके संस्थापक और संपादक मुंशी सज्जाद हुसैन थे। यह पत्रिका लगभग पचास वर्षों तक प्रकाशित होती रही। उर्दू पत्रकारिता और व्यंग्य साहित्य में इसका विशेष स्थान माना जाता है। इसे भारत की प्रारंभिक और अत्यंत प्रभावशाली व्यंग्य पत्रिकाओं में गिना जाता है, जिसने व्यंग्यात्मक लेखों के साथ-साथ कार्टूनों और कैरिकेचर के माध्यम से औपनिवेशिक शासन की नीतियों तथा सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया। अवध पंच की यह परंपरा आगे चलकर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की व्यंग्य पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों के लिए प्रेरणा बनी। बाद के समय में भारतीय पत्रकारिता में जो सशक्त कार्टून परंपरा विकसित हुई, उसकी प्रारंभिक आधारभूमि तैयार करने का श्रेय काफी हद तक अवध पंच जैसी पत्रिकाओं को ही जाता है।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पत्रिकाओं के प्रसार के साथ कैरिकेचर और कार्टून कला का विकास आरंभ हुआ। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में समाचार पत्रों ने भी कार्टून को नियमित रूप से प्रकाशित करना शुरू किया। 1906 में मद्रास के अंग्रेज़ी साप्ताहिक पत्र “इंडिया वीकली” में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कार्टून प्रकाशित हुआ, जिसे भारतीय समाचार पत्रों में कार्टून प्रकाशन के प्रारंभिक उदाहरणों में गिना जाता है। यह कार्टून उस समय के औपनिवेशिक शासन और भारतीय राजनीतिक परिस्थितियों पर केंद्रित था। इससे भारतीय पत्रकारिता में चित्रात्मक व्यंग्य को एक प्रभावी अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार्यता मिलने लगी।
1910 के दशक में गगनेन्द्रनाथ ठाकुर, जो बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट से संबंधित थे, इस विधा को नया आयाम देने वाले प्रणेता के रूप में उभरे। उन्हें आधुनिक भारतीय कैरिकैचर और व्यंग्यचित्र परंपरा का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने अपने व्यंग्यात्मक चित्रों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों और औपनिवेशिक व्यवस्था पर तीखे कटाक्ष किये। उनके व्यंग्यचित्र ‘इंडियन सोसाइटी ऑफ़ ओरियंटल आर्ट’ की पत्रिका “रूपम” एवं “मॉडर्न रिव्यू” में प्रकाशित हुए। उनके कार्टून संग्रह “द रील्म ऑफ़ द एब्सर्ड” तथा “रिफ़ॉर्म्स स्क्रीम्स” भारतीय कार्टून कला के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ माने जाते हैं।
इसके बाद अनेक भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर कार्टून प्रकाशित होने लगे, जिससे यह विधा धीरे-धीरे जनचेतना और जनमत निर्माण का प्रभावी माध्यम बनने लगी।
1920 के दशक में प्रकाशित प्रसिद्ध पत्रिका “मतवाला” ने हिंदी व्यंग्य और हास्य लेखन को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। यद्यपि इस पत्रिका में चित्रात्मक कार्टून बहुत नियमित रूप से नहीं छपते थे, फिर भी इसमें व्यंग्यात्मक चित्रों और रेखाचित्रों का प्रयोग किया जाता था, जो सामाजिक रूढ़ियों, पाखंड और औपनिवेशिक मानसिकता पर कटाक्ष करते थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में, विशेषत: 1930 के दशक के बाद, भारतीय कार्टून पत्रकारिता को एक सशक्त पहचान मिलने लगी। समाचारपत्रों में नियमित रूप से राजनीतिक कार्टून प्रकाशित होने लगे। इस दौर के प्रमुख विषय थे- औपनिवेशिक शासन, स्वतंत्रता आंदोलन, द्वितीय विश्वयुद्ध, नौकरशाही और सामाजिक विसंगतियाँ।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय कार्टून कला का व्यवस्थित विकास हुआ। इस दौर में कार्टूनिस्टों ने देश के निर्माण, राजनीति और आम आदमी की समस्याओं को अपनी रेखाओं का विषय बनाया। के. शंकर पिल्लै को भारतीय राजनीतिक कार्टूनिंग का शलाकापुरुष माना जाता है। उन्होंने 1932 में हिंदुस्तान टाइम्स में कार्टून बनाना शुरू किया और 1948 में व्यंग्य पत्रिका “शंकर्स वीकली” की स्थापना की, जिसने कार्टून कला को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलायी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी का प्रसिद्ध कथन “डोंट स्पेयर मी, शंकर!” भारतीय कार्टून परंपरा में विशेष रूप से उद्धृत किया जाता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्टून की स्वतंत्र आलोचनात्मक भूमिका को रेखांकित करता है। नेहरू जी का प्रसिद्ध टोपी-चित्र उन्होंने ही बनाया था।

शंकर पिल्लै के बाद आर.के. लक्ष्मण, अबू अब्राहम, ओ.वी. विजयन, मारियो मिरांडा जैसे कार्टूनिस्टों ने भारतीय समाज, राजनीति और नौकरशाही पर व्यंग्यपूर्ण कार्टून बनाकर इस विधा को अत्यंत लोकप्रिय बनाया। आर.के. लक्ष्मण ने ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के लिए प्रसिद्ध पात्र ‘द कॉमन मैन’ (आम आदमी) का सृजन किया जो भारतीय लोकतंत्र की विसंगतियों का मूक साक्षी बनकर सामने आता है। अबू अब्राहम अपनी सरल और तीखी रेखाओं के लिए जाने जाते थे और विशेषकर आपातकाल के दौर में उनके कार्टून लोकतांत्रिक प्रतिरोध के महत्वपूर्ण प्रतीक बने। इस प्रकार भारतीय कार्टूनिंग ने धीरे-धीरे पत्रकारिता, जनसंचार और लोकतांत्रिक विमर्श में एक सशक्त और प्रभावशाली दृश्य व्यंग्य के रूप में अपना स्थान स्थापित किया।
हिंदी पत्रकारिता में भी कार्टूनिंग परंपरा काफ़ी समृद्ध रही है। हिंदी समाचार पत्रों और पत्रिकाओं ने व्यंग्य को केवल ‘बौद्धिक विमर्श’ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आम आदमी की भाषा और मुहावरों से जोड़कर प्रस्तुत किया। हिंदी कार्टूनिस्टों ने अपनी रेखाओं में ‘देसीपन’ और ‘लोक-तत्व’ को प्रधानता दी। साप्ताहिक हिंदुस्तान और धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं ने कार्टून को साहित्य से जोड़ा। दोनों ही पत्रिकाओं में सामाजिक जीवन, राजनीति, पारिवारिक संबंधों और बदलती जीवनशैली पर आधारित कार्टून प्रकाशित होते थे। इन कार्टूनों में हल्का हास्य, सूक्ष्म व्यंग्य और समकालीन परिस्थितियों पर टिप्पणी का सुंदर संयोजन देखने को मिलता था।
हिंदी कार्टून को लोकप्रियता के शिखर तक पहुँचाने वालों में प्राण कुमार शर्मा, आबिद सुरती, सुधीर तैलंग, राजेंद्र धोड़पकर, टी.एन. नदीन, बाला साहब ठाकरे, वसंत सरवटे आदि प्रमुख नाम हैं। हिंदी कार्टूनिंग के इतिहास में प्राण कुमार शर्मा का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वह प्रायः प्राण नाम से कार्टून बनाते थे। उन्होंने 1960 के दशक में अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए कई लोकप्रिय कार्टून पात्रों का सृजन किया। उनके द्वारा रचित ‘चाचा चौधरी’, ‘साबू’, ‘पिंकी’ और ‘बिल्लू’ जैसे पात्र हिंदी भाषी समाज में अत्यंत लोकप्रिय हुए और भारतीय कॉमिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बने। उनके कार्टूनों में सामाजिक विसंगतियों पर बहुत ही सरल लेकिन मारक चोट होती थी।
सुधीर तैलंग हिंदी के उन गिने-चुने कार्टूनिस्टों में से थे, जिनकी रेखाओं का लोहा अंग्रेज़ी जगत ने भी माना। उन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’, ‘द एशियन एज’ आदि प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में काम किया। उनके कार्टूनों में राजनीतिक कटाक्ष अत्यंत तीखा और प्रभावशाली होता था। वर्ष 2004 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तक ‘नो, प्राइम मिनिस्टर’ उनके राजनीतिक व्यंग्य का बेहतरीन उदाहरण मानी जाती है।
आबिद सुरती एक बहुआयामी कलाकार, लेखक और कार्टूनिस्ट हैं। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता, विशेषकर ‘धर्मयुग’ पत्रिका के लिए ‘ढब्बू जी’ नामक एक कालजयी चरित्र बनाया। ढब्बू जी का चरित्र एक ऐसे व्यक्ति का था, जो अपनी अजीबो-ग़रीब हरकतों और तर्कों से समाज और व्यवस्था के पाखंड को उघाड़ देता था। राजेंद्र धोड़पकर हिंदी पत्रकारिता के एक गंभीर और बौद्धिक कार्टूनिस्ट माने जाते हैं। उन्होंने ‘जनसत्ता’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के लिए लंबे समय तक कार्टून बनाये। उनकी रेखाओं में एक तरह की दार्शनिकता, बौद्धिक दृष्टि और समकालीन राजनीति की गहरी समझ दिखायी देती है।
आज के दौर में भी कई कार्टूनिस्ट हिंदी समाचार पत्रों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों के माध्यम से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। इरफ़ान ‘जनसत्ता’ और ‘नवभारत टाइम्स’ जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं। उनके कार्टूनों में भाषा का प्रयोग और व्यंग्यात्मक संवाद विशेष रूप से बहुत सशक्त होता है। काक के कार्टून ‘जनसत्ता’ तथा ‘हरिभूमि’ में प्रकाशित होते रहे हैं। उनके कार्टूनों में एक ख़ास तरह का देसी मिज़ाज और तीखा राजनीतिक कटाक्ष मिलता है। मंजुल समकालीन भारत के प्रमुख राजनीतिक कार्टूनिस्टों में से हैं। वे हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों माध्यमों में सक्रिय रहे हैं तथा इंडिया टुडे और डिजिटल मंचों से भी जुड़े रहे हैं। उनकी शैली में रेखाओं की सादगी और राजनीतिक टिप्पणी की तीक्ष्णता प्रमुख विशेषताएँ हैं।
अन्य समकालीन चर्चित कार्टूनिस्टों में रंगा, संदीप राशिनकर, देवेंद्र, हरिओम तिवारी, सागर कुमार, माधव जोशी, राजेन्द्र पुरी, शेखर गुरेरा, ईपी उन्नी, सतीश आचार्य, किशोर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। संदीप राशिनकर अपने साहित्यिक रेखाचित्रों के लिए जाने जाते हैं। उनके रेखाचित्र आज की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं के पन्नों पर देखे जाते हैं। नयी दुनिया समाचार पत्र से जुड़े देवेंद्र को खेलों से संबधित रेखाचित्र बनाने में महारत हासिल है। सागर कुमार और हरिओम तिवारी व्यंग्य की लोकप्रिय पत्रिका अट्टहास से जुड़े हुए हैं। शेखर गुरेरा का संबंध पंजाब केसरी व दैनिक भास्कर से रहा है वहीं रंगा दैनिक जागरण से जुड़े रहे हैं।
कार्टून कला को समर्पित पत्रिकाओं में त्रयंबक शर्मा द्वारा प्रकाशित “कार्टून वॉच” का विशेष उल्लेख किया जा सकता है। यह कार्टून और कैरिकेचर को समर्पित भारत की अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट पत्रिका मानी जाती है, जिसने भारतीय कार्टून परंपरा के संरक्षण और विकास में उल्लेखनीय भूमिका निभायी है।
वर्तमान डिजिटल युग में कैरिकैचर और कार्टून से शुरू हुआ दृश्य व्यंग्य आज मीम्स, डिजिटल आर्ट और एआई निर्मित चित्रों के रूप में नये आयाम ग्रहण कर चुका है। ये सामान्यतः किसी चित्र, वीडियो या वाक्यांश के साथ बनायी गयी हास्यात्मक या व्यंग्यात्मक सामग्री होती है। आज उपलब्ध उन्नत तकनीकी सुविधाओं के कारण ये दृश्य व्यंग्य कई बार अत्यंत तीखे और प्रभावी रूप में सामने आता है।
‘मीम’ शब्द भले आज इंटरनेट संस्कृति के कारण नया प्रतीत होता हो लेकिन इसका प्रयोग पहले से प्रचलित रहा है। ‘मीम’ शब्द का प्रयोग सबसे पहले ब्रिटिश जीवविज्ञानी रिचर्ड डॉकिंस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द सेल्फ़िश जीन’ में 1976 में किया था। उन्होंने इसे सांस्कृतिक विचारों या प्रतीकों के ऐसे रूप के रूप में परिभाषित किया था, जो समाज में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैलते हैं। इंटरनेट के युग में यही शब्द उन चित्रों, वाक्यांशों और लघु वीडियो के लिए प्रयुक्त होने लगा, जो हास्य और व्यंग्य के साथ वायरल होते हैं।
कार्टून्स की तरह ही राजनीतिक घटनाएँ, सामाजिक विसंगतियाँ और रोज़मर्रा की परिस्थितियाँ, मीम्स के प्रमुख विषय होते हैं। मीम्स की विशेषता यह है कि इन्हें केवल पेशेवर कलाकार ही नहीं बल्कि सामान्य उपयोगकर्ता भी तैयार कर सकता है और इंटरनेट के माध्यम से व्यापक स्तर पर साझा कर सकता है। इसी प्रकार एआई जनित कैरिकैचर भी तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे हैं। एआई टूल्स और एडिटिंग एप्लिकेशनों की मदद से किसी व्यक्ति का अतिरंजित चित्र आसानी से बनाया जा सकता है। कई बार वीडियो या छवियों में परिवर्तन कर व्यंग्यात्मक संदर्भ निर्मित किए जाते हैं। हालाँकि ऐसे परिवर्तित वीडियो या चित्रों को सामान्यतः डीपफ़ेक तकनीक से जोड़ा जाता है, जिसका प्रयोग मनोरंजन के साथ-साथ कभी-कभी भ्रामक सूचना फैलाने के लिए भी किया जा सकता है। इसलिए इस तकनीक के उपयोग को लेकर नैतिक और क़ानूनी प्रश्न भी उठते हैं।
मीम्स को साहित्यिक व्यंग्य की श्रेणी में रखा जाये या नहीं, इस विषय पर समय-समय पर चर्चा होती रही है। अनेक हिंदी आलोचक और मीडिया विश्लेषक इस प्रश्न पर भिन्न-भिन्न मत रखते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार मीम्स को जनसंचार का त्वरित व्यंग्यात्मक माध्यम माना जा सकता है, क्योंकि वे तत्काल प्रतिक्रिया और जनभावना को अभिव्यक्त करते हैं। वहीं कुछ आलोचक मानते हैं कि मीम्स बदलते समय की हास्य-व्यंग्य परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके बावजूद यह भी देखा जाता है कि सोशल मीडिया पर लोकप्रिय अनेक मीम्स में पारंपरिक व्यंग्य की गहराई और गंभीरता का अभाव भी दिखायी देता है। कई बार वे तात्कालिक मनोरंजन तक ही सीमित रह जाते हैं। भविष्य में उनकी साहित्यिक स्वीकृति किस रूप में विकसित होगी, यह अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
इसके विपरीत कैरिकेचर की डिजिटल दुनिया अत्यंत संभावनाशील दिखायी देती है। आज अनेक वेबसाइटों, ऑनलाइन पत्रिकाओं और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों के माध्यम से कैरिकेचर व्यापक रूप से प्रसारित हो रहे हैं। डिजिटल तकनीक के कारण कैरिकेचर बनाना, प्रकाशित करना और पाठकों तक पहुँचाना पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और तेज़ हो गया है। इन कैरिकेचरों में समकालीन घटनाओं, नेताओं, नीतियों और सामाजिक समस्याओं पर व्यंग्य प्रस्तुत किया जाता है तथा चित्रों के साथ संक्षिप्त टिप्पणी, शीर्षक या संवाद जोड़कर व्यंग्य को अधिक प्रभावशाली बनाया जाता है।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने कैरिकेचर कलाकारों को वैश्विक मंच प्रदान किया है। अब कलाकार अपनी वेबसाइट, ब्लॉग या डिजिटल गैलरी बनाकर अपने कैरिकेचर सीधे दर्शकों तक पहुँचा सकते हैं। इसके अतिरिक्त ऑनलाइन प्रतियोगिताएँ, वर्चुअल प्रदर्शनी और डिजिटल संग्रहालय भी कैरिकेचर कला के प्रसार में योगदान दे रहे हैं। इस प्रकार वेबसाइटों और डिजिटल माध्यमों ने कैरिकेचर कला को एक नया आयाम प्रदान किया है। इससे न केवल इस कला की पहुँच बढ़ी है, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी के रूप में कैरिकेचर की भूमिका भी पहले की तुलना में अधिक व्यापक और प्रभावशाली हो गयी है। आज टून्स मैग (Toons Mag), पॉलिटून्स (Politoons), द अनरियल टाइम्स (The Unreal Times) जैसी अनेक वेबसाइटें और मंच कैरिकेचर कलाकारों को सहज अवसर उपलब्ध करा रही हैं।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतीय साहित्य और पत्रकारिता में व्यंग्य की एक समृद्ध परंपरा रही है। इसी परंपरा ने आगे चलकर दृश्य व्यंग्य के रूप में कार्टून और कैरिकेचर को जन्म दिया, जहाँ शब्दों के स्थान पर रेखाओं और चित्रों के माध्यम से व्यंग्य व्यक्त किया जाने लगा। समाचारपत्रों और पत्रिकाओं ने इस दृश्य व्यंग्य को व्यापक पाठक-स्वीकृति दिलायी। समय के साथ अनेक प्रतिभाशाली कार्टूनिस्टों ने अपनी विशिष्ट शैली और दृष्टि से इस विधा को समृद्ध किया। वर्तमान डिजिटल युग में वेबसाइटों, ऑनलाइन समाचार पोर्टलों और सोशल मीडिया ने दृश्य व्यंग्य को और अधिक व्यापक मंच प्रदान किया है, जहाँ कार्टून और कैरिकेचर त्वरित सामाजिक-राजनीतिक प्रतिक्रिया के सशक्त माध्यम बन गये हैं। इस प्रकार पारंपरिक साहित्यिक व्यंग्य से लेकर आधुनिक डिजिटल दृश्य व्यंग्य तक, यह विधा निरंतर समाज की विसंगतियों को उजागर करते हुए जनचेतना को जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
संदर्भ
भारत डिस्कवरी.ओआरजी
आर्टइनकॉन्टेक्स्ट.ओआरजी
बैंगलोर मिरर समाचार पत्र
द इंडियन कार्टून एन ओवरव्यू – ले. ई पी उन्नी
कैरिकेचर कल्चर इन इंडिया – ले. रितु गिरौला खंडूरी
सहपीडिया.ओआरजी
ब्रिटैनिका.कॉम
विकिपीडिया
मीडिया समग्र – जगदीश्वर चतुर्वेदी
(चित्र परिचय: 1.शंकर का कार्टून www.theheritagelab.in से साभार। 2.इमरजेंसी के दौरान मीडिया के रेंगने पर लक्ष्मण का प्रसिद्ध कार्टून, द पल्स इंडिया के एक्स हैंडल से साभार। 3.समकालीन कार्टून विभिन्न स्रोतों से साभार।)

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
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