सलीम सरमद, saleem sarmad
सलीम सरमद की कलम से....

शहीद सफ़दर हाशमी के नाम...

            मेरे बचपन को एक आवाज़ ने घेरा था, वो गीत-जिसके स्वर तब मेरी उनींदी दोपहरों में और बुलंद हो जाया करते थे-
पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
क ख ग घ को पहचानो अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार बना कर लड़ना सीखो

सफदर हाशमी, safdar hashmi

स्कूल का बैग जब मेरे कांधों से उतरा तो दूसरी अनगिनत किताबों ने मुझे पकड़ लिया, इसका एक कारण ये भी था कि भोपाल की सेंट्रल लाइब्रेरी की वॉल पर एक पोस्टर चस्पां था जिस पर लिखा था-
किताबें बातें करती हैं
बीते ज़मानों की दुनिया की, इंसानों की
आज की कल की एक-एक पल की

उस पोस्टर पर लिखी कविता के नीचे एक नाम था ‘सफ़दर हाशमी’। इस नाम से मेरी ये पहली मुलाक़ात थी। बचपन का वह गीत भी सफ़दर हाशमी ने ही लिखा था-
ओ सड़क बनाने वालो ओ भवन उठाने वालो
ख़ुद अपनी किस्मत का फ़ैसला अगर तुम्हें करना है
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलाने वालो
अगर देश की बागडोर को क़ब्जे में करना है

क ख ग घ को पहचानो… इस बात की अपील करने की सज़ा सफ़दर को मिली गाज़ियाबाद में 1 जनवरी 1989 की सुबह सड़क पर ‘हल्ला बोल’ नाटक का मंचन करते हुए उन्हें चींटी की तरह मसल दिया गया। रॉड और हॉकी ने सफ़दर को सड़क पर पीट-पीटकर बिछा दिया, फिर भी ग़ुस्सा शांत नहीं हुआ तो हॉस्पिटल में घुसकर मारा। 3 जनवरी 1989 सफ़दर हाशमी की मौत हो गयी। क्या रॉड और हॉकी ने पढ़ा नहीं था-
किताबें करती है बातें ख़ुशियों की, ग़मों की
फूलों की बमों की जीत की हार की प्यार की मार की

सफ़दर हाशमी की मौत के ठीक दो दिन बाद गाज़ियाबाद की उसी झंडापुर सड़क पर उनकी पत्नी मोलायश्री हाशमी ने वही नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ फिर खेला, एक रंगकर्मी की मौत का मातम ऐसे ही मनाया जाता है… हंसते हुए, गाते हुए, नारे लगाते हुए-
हर ज़ोर ज़ुलुम की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है
अभी तो यह अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है

पीड़ित कामगारों, किसानों और ग़रीबों के दिमाग़ों को रोशन करने वाले 34 साल के सफ़दर हाशमी आज होते तो 70 बरस के बूढ़े होते और किसी गांव किसी क़स्बे के चौराहे पर किसी नौजवान की तरह घूम-घूम कर चिल्ला रहे होते-
मैं हूं भाईचारा
हिंदुस्तान की एकता का रखवाला
जब तक मैं ज़िंदा हूँ
तुम्हें नफ़रत के शोले नहीं भड़काने दूंगा

सफ़दर हाशमी अपने बचपन में शर्मीले स्वभाव के थे। चुप-चुप रहने वाले बच्चे बड़े होकर अक्सर सिर्फ़ बोलते नहीं बल्कि आवाज़ उठाते हैं। क्रांति और कला के संगम को समाज सुधार का माध्यम बनाने वाले एक्टिविस्ट, रंगकर्मी, कवि सफ़दर हाशमी आगे कहते हैं-
पूछो मज़दूरी की ख़ातिर लोग भटकते क्यों हैं
पढ़ो तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों है
पूछो मां बहनों पर यूं बदमाश झपटते क्यों है
पढ़ो तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों है
पढ़ो लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा
पढ़ो पोस्टर क्या कहता है वह भी दोस्त तुम्हारा
पढ़ो अगर अंधे विश्वासों से पाना है छुटकारा
पढ़ो किताबें कहती हैं सारा संसार तुम्हारा
पढ़ो कि हर मेहनतकश को उसका हक़ दिलवाना है
पढ़ो अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है

मुझसे बिछड़े सफ़दर हाशमी आख़िरी बार मुझे इस कथन में मिले थे- ‘एक ग़ैर वैज्ञानिक समझ को कितने ही पारंपरिक आवाज़ में क्यों न पेश करें वह समझ ग़लत ही रहेगी’। सफ़दर अपने ज़माने की रॉड और हॉकियों से जो कहना चाहते थे, वही बात आज के पिस्टल और छुरियों पर भी लागू होती है-
क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों की बातें?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं,
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं
किताबों में चिड़ियाँ चहचहाती हैं,
किताबों में खेतियाँ लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं,
परियों के किस्से सुनाते हैं
किताबों में रॉकेट का राज़ है,
किताबों में साइंस की आवाज़ है
किताबों का कितना बड़ा संसार है,
किताबों में ज्ञान का भंडार है
क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे?

(सफ़दर हाशमी की तस्वीर स्टूडियो सफ़दर से साभार)

सलीम सरमद

सलीम सरमद

1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।

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