
- August 18, 2025
- आब-ओ-हवा
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(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे.. मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का एक भाव। इस सिलसिले में लगातार साथी जुड़ रहे हैं। साप्ताहिक पेशकश के रूप में हर सोमवार आब-ओ-हवा पर अमूल्य पुस्तक का साथ यानी 'शुक्रिया किताब'.. इस बार पढ़िए कमलाकान्त त्रिपाठी की बहुचर्चित पुस्तक का एक विस्तृत पाठ -संपादक)
शमीम ज़हरा की कलम से....
हिंदोस्तानी तहज़ीब का दस्तावेज़ है 'सरयू से गंगा'
‘सरयू से गंगा’ (लेखक-कमलाकान्त त्रिपाठी) मेरा सर्वप्रिय उपन्यास है। इसे मैंने कई बार पढ़ा और यह हर बार मुझे पहले से अधिक प्रिय लगा है। यह इस उपन्यास की साहित्यिक समीक्षा नहीं है, बस एक पाठक की तरह दिल छू लेने वाली अनुभूति को शब्द देने का प्रयास मात्र है।
इस अनुपम कृति के कथ्य की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक है, जो इसमें वर्णित कालखण्ड के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक हर पहलू को इतने विश्वसनीय रूप से साकार करने में सक्षम है कि उसे पढ़ते हुए उस समय को जी लेने जैसी अनुभूति होती है। इतिहास स्वयं इस उपन्यास में एक पात्र है, जो समय-समय पर उपस्थित होकर अपने अन्दर छिपे रहस्यों और वास्तविकताओं से रूबरू कराता है। कथा के सूत्र उसी के घटित का हाथ थामे आगे बढ़ते हैं।
मुझे जिन बातों ने गहरे प्रभावित किया, वह शुद्ध हिन्दी के साथ जहाँ-तहाँ स्थानीय शब्दों की मिट्टी जैसी सोंधी ख़ुशबू से महकती भाषा है, नदी के प्रवाह जैसी काव्यात्मक शैली है, अवध क्षेत्र का ग्रामीण परिवेश है, उस क्षेत्र की प्राकृतिक सुषमा का अद्भुत सौन्दर्य वर्णन है, पात्रों के चरित्र चित्रण तथा भौतिक जगत से लेकर मनोभावों तक के सूक्ष्मतम बयान से स्वत: स्थापित होते मूल्य व मर्यादाएं हैं, जाति व धर्म से परे मानवीय रिश्ते व आपसी सद्भाव है, जिनके प्रति लेखक का प्रेमभाव व आग्रह सर्वत्र परिलक्षित है।
कथानक एवं पात्र
उपन्यास के पहले भाग के अध्याय चार एवं पाँच तक आते हुए पाठक को आगामी लेखन के सूत्रों के साथ घटनाक्रम का परिचय मिल जाता है। परिदृश्य अठारहवीं शताब्दी का अवध है। बक्सर युद्ध हो चुका है, जिसमें खेत रहे दो हज़ार हिन्दू-मुस्लिम सैनिकों में 19 साल का एक नौजवान चैहार्जा भी शामिल था। उसकी प्रताड़ित होती हुई युवा गर्भवती पत्नी सावित्री को उसका रिश्ते का देवर लेखीपति हज़ार कठिनाइयाँ झेलकर भी उसकी ससुराल लोनापार से उसके मायके भानेपुर सुरक्षित पहुँचाता है। पारिवारिक उपेक्षा का शिकार होने पर भी अपने पौरुष से लेखीपति अनुकूल व प्रतिकूल परिस्थितियों से गुज़रकर राह बनाता है। यह येनकेन प्रकारेण तैंतालीस गाँवों पर उसके द्वारा किये गये क़ब्ज़े की दास्तान नहीं है, यहाँ सर्वजनहिताय का लक्ष्य निहित है, जो बिना किसी ख़ूनखराबे के पाना है और जान जोखिम में डालकर मिली उस उपलब्धि को व्यवस्था की ज़्यादतियों के शिकार किसानों और समाज के कमज़ोर वर्ग तक पहुँचा देना है।
अवध क्षेत्र के तत्कालीन परिदृश्य में मानवीय मूल्यों और सम्वेदनाओं को जीने वाले प्रमुख पात्रों में से सबसे प्रिय उपन्यास का सज्जन व संवेदनशील नायक लेखीपति है, जो दोस्त व मौसेरे भाई की विधवा पत्नी को सुरक्षित उसके मायके पहुँचाता है; भाई द्वारा उपेक्षित माँ को और बाद में मौसी को भी सम्मान सहित साथ ले जाता है; भाई के अन्याय पर भी शत्रुता भाव से परे है; गुरू (मामा) की अनुमति के लिए चिन्तित व उनके अहं को चोट न पहुँचे इसके लिए सावधान है; जीवन से सदा के लिए विदा हो चुके मित्र के बेटे का संरक्षक है; दाम्पत्य जीवन के सभी दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करता है; रिश्तेदारों की बड़ी ग़ल्तियों को भी सहज ही दरगुज़र करते हुए उनकी बेटियों के भविष्य के लिए चिन्तित और सहायक बन जाता है; दुश्मन पक्ष की मानवीय संवेदनाओं को भी समझता है और जाति व धर्म के भेद से परे सच्चा मित्र है; लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित होकर सार्वजनिक हित के कार्यों में संलग्न है परन्तु उपलब्धियों के बाद भी किसी अहंकार से मुक्त है… और उसी ताने-बाने में ‘सबित्रा” और नायक के बीच की कुछ अनाम कोमल भावनाएँ हैं और उनकी पवित्रता और गरिमा को बनाये रखते हुए नायक का उसके हित में किया गया हर सम्भव प्रयत्न है, उस महिला का आत्मसम्मान है और वापस जाते नायक की उसके श्रमिक रूप के लिए मान देने वाली निगाह भी है।
लेखक ने मूल कथा के जिन पात्रों को तरतीब दिया है, उनमें कोई पूर्णतया नायक या प्रतिनायक नहीं है, कई जगह जमील सहनायक होने पर भी अपने चारित्रिक विशेषताओं, दोस्ती, वफ़ादारी, बहादुरी व जाँनिसारी के जज़्बे से नायकत्व पा लेता है। कमाल यही है कि एक एक पात्र कथा में हीरे जैसा यथास्थान जड़ा हुआ है, प्रमुख रूप से मामा जैसा दुनियादार, दूरदृष्टा, और प्रबन्धक चरित्र है जिनके बिना कथा हो ही नहीं सकती थी। धार्मिक प्रवृत्ति के खिरोधर, अल्लाह पर भरोसे वाले जमील के अब्बा, हर दम सहायता को तत्पर रज़्ज़ाक़, आयुर्वेदिक उपचार में पारंगत वैद्यराज, सही सलाह देने वाले शेख़, धार्मिक कार्यों के ज्ञाता लेखीपति के पिता और मौसा हैं, मामा के दोनों किसान बेटे हैं, तो चैहार्जा का पत्नी के सामने कुछ न बोल सकने वाला भाई और अपने अपने स्वभाव में बिल्कुल अलग लेखीपति के दोनों भाई भी हैं। सभी अपनी मानवीय अच्छाइयों और कमियों के अनुपात के अन्तर सहित सामान्य इंसान हैं, जो हमारे चारों तरफ़ के जाने-पहचाने चेहरे लगते हैं।
उपन्यास की नायिका सोलह सत्रह वर्षीय विधवा किशोरी सावित्री है। इस अत्यन्त कठिन पात्र की रचना इतनी उत्कृष्ट है कि प्रारम्भ की वह अभागी मासूम किशोरी धीरे-धीरे अन्त में एक आत्मसम्मान रखने वाली संस्कारशील और श्रमजीवी महिला बनकर दिल पर अपनी छाप छोड़ती है। मायके पहुँचने पर उसकी पुत्र जन्म के समय की अति सूक्ष्म और भावपूर्ण मन:स्थिति और बच्चे के बीमार होने पर मातृत्व की बढ़ती ज़िम्मेदारी के एहसास का विकसित होना इतना स्वाभाविक है कि स्त्री शरीर और मन पर घटित को इस हद तक जान लेना और ऐसे लिखा जाना दंग कर देता है।
स्त्री पात्रों में चैहार्जा के बड़े भाई की कर्कशा पत्नी के अतिरिक्त माँ और मौसी सहित अधिकाँश सहनशील विनम्र स्त्रियाँ हैं, जो घरेलू दायित्वों को भली-भाँति निभा रही हैं, लेकिन उनमें भी सबकी स्वभावगत विशिष्टताएँ हैं। मामी हैं, जो विषम परिस्थिति को भी सम्भाल सकती हैं। गाँव की पुरखिन अय्या हैं, जो जच्चा-बच्चा की सम्भाल और घरेलू जड़ी बूटियों से बीमारियों का इलाज करने में पारंगत हैं।
उपन्यास की लेखन-कला
उपन्यास मानवीय स्वाभाविकताओं के साथ-साथ भावुक पलों में भी रिश्तों की मर्यादाओं को पोषित करता है। एक उदाहरण चूड़ियों के बिना सूनी-सी लगती पतली, नर्म ज़नाना कलाइयों को देखने का उपन्यास का वह अहम और भावुक पल है, जब नायक की अदम्य निडरता, बेबाक दृष्टि, व्यक्तित्व का निर्बाध खुलापन सब जाने कहाँ गुम हो जाते हैं।
लेखक की अवध क्षेत्र के प्रति रागात्मकता से यह उपन्यास आदि से अन्त तक परिपूर्ण है। प्रथम अध्याय में ही अपने इतिहास और वर्तमान के साथ तेज़ प्रवाह से बहती ख़ास अवधवालों की नदी सरयू का स्नेहसिक्त शब्दों में किया गया वर्णन स्थानीय प्रकृति के प्रति उस स्नेह की बानगी है।
भानेपुर की यात्रा में सरयू के कछार के इस ओर के ऊसर, बीच-बीच के नख़्लिस्तान, उससे गुज़रकर अवध का ज़रख़ेज़ इलाक़ा, दोमट मिट्टी, घास की ऊँचाई, आम और महुआ के छतनार पेड़, ओस भीगी जौ, सरसों और मटर की फ़सलों का विवरण इतना सजीव और सटीक है कि स्वयं के उस रास्ते गुज़रने का गुमाँ होने लगता है।
उस दिन मनहूस-सी लगती धुन्ध का वह मौसम और पात्रों की मन:स्थिति का साम्य, भौतिक और अन्तर्जगत में साम्य रच देने की लेखन कला के दर्शन भी करा देता है। यात्रा के आख़िरी सिरे पर फसलों और बाग़ों से गुज़रते हुए आगे पीछे चलते लठैतों .. पालकी उठाये कहारों.. फ़िरंगियों की दहशत से लुक-छिपकर अपना माल बाज़ार में बेचने के लिए ले जाते जुलाहों के विवरण के साथ जब शेख़ द्वारा बतायी गयी जौनपुर की शर्क़ी सल्तनत के समय बनी सड़क आती है, तब यहाँ इसे पार करते समय इलाक़े के इतिहास और कहीं कहीं भविष्य की झलक लिए वर्तमान के राई रत्ती बयान में छिपकर पुलकित करता लेखक का एक राग, एक विशेष उत्साह जैसे छलक उठता है। यह प्रतापगढ़ परगना है, जहाँ तक आने के लिए यह यात्रा हुई, जहाँ के भानेपुर का नाम सुनते ही बहू के ब्याज से एक चिहुँक पाठक तक भी सहज ही चली आती है कि अपनी जान जोखिम में डालकर गर्भ में छिपे जिस बीज को बहू भानेपुर ले जा रही है, भविष्य में उसी की दूर-दूर तक फैली शाखाओं मे कोई इस यात्रा को पुन: दृश्यवत् कर देने में सक्षम कभी कोई आएगा और हम पाठकगण भी सहयात्री हो जाएँगे।
पुस्तक में अवध के मैदानी इलाक़ों के शहरों ही नहीं गावों, क़स्बों, बाज़ारों, नदियों, पहाड़ों, जंगलों के छोटे से छोटे सटीक भौगोलिक विवरण हैं। कहानी फ़िल्म की तरह चलती है। सत्तू खाने के लिए कुएँ की जगत पर एक ओर झुंड बनाकर बैठे या पालकी लेकर चलते कहार, गोमती किनारे ढलता दिन, दूर से दिखाई देता शिवाला, गाँव की बस्ती… शब्दों ने दृश्य रच दिये हैं।
वैसे तो उपन्यास के प्रारम्भ से ही लेखनी का जादू चमत्कृत करता है अवलोकन और निरीक्षण की बारीकियां शब्दों में ढलती चली जाती हैं, नदियाँ, जंगल, खेत, खलिहान, घर सब सामने से गुज़रते लगते हैं, मौसमों के रंग स्वयं पर बीतने की अनुभूति होती है, घटित साक्षात हो जाते हैं और पात्र इतने परिचित हो जाते हैं कि पाठक स्वयं उनके सुख दुःख में सम्मिलित हो जाता है। माघ मेले के प्रसंग में वाह्य दृश्यावली और मन:स्थितिजन्य आख्यान कमाल के हैं।
कमाल की दृश्यात्मकता
अवध क्षेत्र की ग्रामीण सामाजिक संरचना और व्यवहार, मर्यादाएं, रीति-रिवाज, लोकगीत, बीमारियों के घरेलू इलाज और औषधि रूप में उपयोग में लायी जाने वाली जड़ी बूटियों की सूक्ष्म जानकारियाँ मौसमों के साथ कृषक मन के भाव और कृषि कार्य की अनाज बुवाई से उठाने-रखने तक की गतिविधियों की एक-एक बारीक़ी तक सब यहाँ उपस्थित है। यह धान की बुवाई का दृश्य है-
- “औरतें क़तार में झुकी, बाएँ हाथ में बैरन की ‘आँटी’ पकड़े, दाएँ हाथ से तीन-तीन चार-चार पौधे अलग करती, फिर उन्हें मिलाकर पानी के भीतर जड़ की ओर से मिट्टी में खोंसती पीछे हटती जाती हैं और समवेत स्वर में गाती जाती हैं।”
पुरुषों के अपने काम हैं, खेत का मेड़ दुरुस्त करना, खेत जोतना, पाटा चलाना, बेरन उखाड़ना, आँटियाँ बनाना और गट्ठर बनाकर रोपाई वाले खेत तक ले जाना। एक अन्य दृश्य है-
- “चैती की मड़ाई होने के बाद से ढीला पड़ा किसान आसाढ़ की पहली बारिश होते ही एकदम से चैतन्य हो जाता है..”
उपन्यास से मौसमों के साथ रूप बदलती प्रकृति के चित्रण के ये कुछ उद्धरण हैं-
- “क्वार शुरू हो गया है। कुंआरी धान की फसल फूटने से सिवान की हरियाली अपने निखार पर है। बालों में दाने पड़ गये हैं और उनके भार से वे झुक आयी हैं। पर अभी हरी हैं, पत्तियों के ही रंग की हरी-हरी बालों से फ़सल और भी प्रफुल्लित, गदराई और भरी-पूरी दिखती है। हवा चलती है तो लगता है जैसे पूर्ण युवा माँ बच्चे को उठाये, उसे झुला रही हो और उसके उल्लास से उल्लसित ख़ुद भी झूमती हो। बालों के पकने के साथ-साथ पत्तियाँ भी रंग बदलेंगी- उनसे मेल खाता धूसर रंग चढ़ेगा। माँ का दायित्व पूरा, दाने को पकाकर ख़ुद सूख जाएगी फ़सल।”
- “पूस बीत रहा है। गोधूलि होते ही ओस पड़नी शुरू हो जाती है। उजली रात में धरती-आकाश को जोड़ता धुन्ध का एक झीना-सा बादल ऊपर से नीचे टंगा रहता है, अछोर तक। दूर पास का सब कुछ उस में घुलकर अदृश्य हो जाता है।”
- “रात में पहली बार एक लहरा जमकर बरसा, बाक़ी रितुएँ धीरे-धीरे, गुपचुप दबे पाँव आती हैं। बारिश पूरे धूम धड़ाके से, गाजे-बाजे के साथ एकदम से फट पड़ती है और देखते-देखते सब कुछ बदल जाता है।”
- “अब दोपहर होने को है। अगल-बगल की पहाड़ियों को ऊपर से नहलाती चमकदार धूप ने सुबह वाली ठण्ड को पिघलाकर ख़ुशनुमा कर दिया है। हवा चलने पर घास और झाड़ियों की फ़ुन्गियाँ हिलती हैं तो लगता है जैसे धूप में एक दूसरे से सटकर सोयी पहाड़ियां कुनमुनाती हों। पर छाया में पड़ने वाली पश्चिमी ढलानें अभी तक गुलाबी ठंड में लिपटी अलसाई-सी सो रही हैं।”
‘सरयू से गंगा’ उपन्यास तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त आपसी सौहार्द्र का एक अनमोल दस्तावेज़ है। इलाक़े के शर्क़ी इतिहास के उल्लेख के आगे गंगा-जमुनी तहज़ीब का जो रंग है, वह भावुक कर देने वाला है। माहौल में रची-बसी शराफ़तें, बिना किसी दुराग्रह या भ्रम के समस्त जातियों व धर्मों के बीच उनकी सीमाओं का सहज स्वीकार व आदर, कार्यों व दायित्वों का बँटवारा उसका पालन, स्त्री की सुरक्षा का एहसास, इंसानी हमदर्दी, एक उभरती हुई विदेशी स्वार्थी शक्ति की ज़्यादतियों के प्रति संयुक्त दहशत और हिफ़ाज़त की यथासम्भव व्यवस्था की चिन्ता गहरे टीस जगाती है।
‘सरयू से गंगा’ का कथानक अपने आप में जटिल है। और तब और भी ज़्यादा जब लेखक ने एक विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र के ऐतिहासिक कालखण्ड को उसके ग्रामीण सामान्य जनजीवन से जोड़कर लिखने का संकल्प लिया हो, फिर तो राजनीतिक उठापटक, अर्थव्यवस्था, कृषि, आवागमन के साधन आदि से लेकर घर परिवार के रोज़मर्रा से जुड़े व्यवहार, रीति रिवाज या ये कहें कि पूरी लोक संस्कृति को शामिल करना आवश्यक ही था जो किसी चुनौती से कम नहीं रहा होगा। उसमें भी अलग-अलग चरित्रों के स्वभाव तथा परिवेश को ध्यान में रखते हुए, उनकी घटनाओं से प्रभावित मन:स्थितियों संवेदनाओं और प्रतिक्रियाओं को इतनी कुशलता से लिख देना असम्भव को सम्भव कर देना है। संक्षेप में ‘सरयू से गंगा’ बार-बार पठनीय एक उत्कृष्ट ऐतिहासिक उपन्यास है। (पुस्तक अमेज़ान पर उपलब्ध है।)
(क्या ज़रूरी कि साहित्यकार हों, आप जो भी हैं, बस अगर किसी किताब ने आपको संवारा है तो उसे एक आभार देने का यह मंच आपके ही लिए है। टिप्पणी/समीक्षा/नोट/चिट्ठी.. जब भाषा की सीमा नहीं है तो किताब पर अपने विचार/भाव बयां करने के फ़ॉर्म की भी नहीं है। [email protected] पर लिख भेजिए हमें अपने दिल के क़रीब रही किताब पर अपने महत्वपूर्ण विचार/भाव – संपादक)

शमीम ज़हरा
अदब से वाबस्ता परिवार में पैदाइश के बाद शादी एकदम विपरीत परिवार में होने के बावजूद शमीम ज़हरा उच्च शिक्षा (उर्दू, हिंदी, संस्कृत पर समान अधिकार) हासिल कर प्रशासनिक सेवा में गयीं। डिप्टी कलेक्टर के पद से रिटायर होने के बाद लेखन और अदब की ख़िदमत में वक़्त देने के साथ ही युवतियों को प्रतियोगी परीक्षाओं के अध्ययन में निशुल्क परामर्श एवं मार्गदर्शन देती हैं।
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