
- August 4, 2025
- आब-ओ-हवा
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(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे.. मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का एक भाव। इस सिलसिले में लगातार साथी जुड़ रहे हैं। साप्ताहिक पेशकश के रूप में हर सोमवार आब-ओ-हवा पर एक अमूल्य पुस्तक का साथ यानी 'शुक्रिया किताब'... -संपादक)
मधु सक्सेना की कलम से....
ज़िंदगी, जिसे तेज़ाब (एसिड अटैक) भी गला नहीं सका
पुस्तक का नाम – सीरत (आत्मकथा)
लेखिका – मंगला कपूर; प्रकाशक – बोधि प्रकाशन
मेरा कोई इरादा नहीं इस किताब की समीक्षा करने का या इस पर अपनी बेबाकी से लिखने के लिए गर्व करना है। आज सिर्फ़ नतमस्तक होकर मंगला जी को प्रणाम कर रही हूँ। नहीं देखना और जानना है मुझे कथानक, भाषा का सौंदर्य, प्रवाह, विम्ब, प्रतीक का सटीक प्रयोग या पाठक को मोहने की कला… क्योंकि सच का भाव पक्ष या कला पक्ष नहीं होता। उसे ज़रूरत नहीं पाठक की प्रशंसा की; बड़े-बड़े कार्यकम और बड़े-बड़े साहित्यकारों की हस्ताक्षर भरी विमोचित किताब की…
सच को अपने खड़े रहने के लिए किसी के पाँव की ज़रूरत नहीं। सच को साथ लेकर जीने के हौसले किसी और से नहीं मिलते बल्कि उसके रिसते घावों के मवाद से बने होते हैं। जलन और दर्द उस हौसले का खाद पानी बन जाता है।
12 साल की उम्र में एसिड अटैक की शिकार मंगला कपूर ने 18 साल की उम्र तक असहनीय दर्द, जलन और पीड़ा को पाया… इस दौरान 36 से भी अधिक ऑपरेशन हुए उनके। कैशोर्य से यौवन के बीच सपने और उड़ान की जगह अस्पताल, दवा, इंजेक्शन झेले। जो उम्र अपने ही सौंदर्य पर रीझने की होती है, उस समय ने बदसूरती का चोला पहना दिया जीवन भर का… ‘अपनी बात’ में लिखती हैं मंगला कपूर-
“ये मेरी कहानी है। जली हुई सूरत, सिकुड़ी हुई खाल, चारों तरफ से बरसता तिरस्कार और किसी की आँखों द्वारा दो मिनट भी न देखा जाने वाला रूप-रंग, शरीर में एक-एक करके उतरती व्याधियाँ, उनका संताप, अकेलापन… सब कुछ बहुत ज़्यादा और अनवरत, मगर प्राण थे कि हारे नहीं… यह सब था इससे कहीं बहुत ज़्यादा था, जिसे इसलिए नहीं लिखा कि केवल अपनी व्यथा कथा नहीं सुनाना था, शायद इसलिए कि उस जीवट को बताना था जो सिर्फ़ मेरा नहीं था, तो वह सब याद करते हुए कहती हूँ अपनी कहानी… ‘सीरत’ नाम दे रही हूँ, इसे आप सूरत का अभाव मत समझिएगा।”
मंगला जी की यह आत्मकथा बहुत-से सवाल लेकर साथ चलती है.. क्यों निर्दोष को सज़ा दी जाती है? आपसी ईर्ष्या या दुश्मनी के शिकार बच्चे ही क्यों? डॉक्टर कभी-कभी क्रूर क्यों हो जाते हैं? सिर्फ़ सूरत को ही महत्व क्यों मिलता है, सीरत की क्यों नहीं? तो बहुत-से सवालों का जवाब भी देती है यह पुस्तक.. जैसे धैर्य, आत्मशक्ति, हौसला और प्रेम ही हर सवाल का जवाब है।
कला इंसान की सबसे बड़ी ताक़त है। लेखिका को भी अपनों के साथ लेखन, संगीत और गायन कला ने थामा। रोज़ी-रोटी दी और मान-सम्मान के साथ अपनी चेतना को उस स्तर पर लाने हेतु सेतु बनी उनकी कला, जिसमें मनुष्यता क़ायम रहे। हालांकि उनकी गायन प्रतिभा को भी धोखे से सिंदूर खिलाकर क्षति पहुंचाने की असफल कोशिश की गयी थी।
इक्कीस परिशिष्ट में अलग-अलग शीर्षक से लिखी यह आत्मकथा सुख-दुख, आशा-निराशा, अपनों-परायों का मार्मिक दस्तावेज़ है, जो जीने के रास्ते की चमक है। मृत्यु की हार का झुका सिर है, तो जीवन की जीत का ताज है।
यह आत्मकथा तरतीब से लिखी गयी है। बढ़ा-चढ़ाकर अपना दुख लिखकर उससे संवेदनाएं भुनाने का प्रयास क़तई नहीं किया गया बल्कि पाठक ख़ुद समझ जाता है कि जितना था दुख, उतना लिखा ही नहीं गया..। शब्द के बीच में और उन शब्दों के पीछे जो अलिखित-सा लिखा गया है, वही सच है। बार-बार टूटना और फिर जुड़ना मंगला जी के जीवन को एक सामान्य मनुष्य से अलग खड़ा कर देता है। रविन्द्र नाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-
विपदाओं से मुझे बचाना
यह नहीं प्रार्थना मेरी
विपदाओं में न होऊं भयभीत…
जब दुखी हूँ, चित्त व्यथित हो
न भी दो सांत्वना
दुखों को बस कर पाऊं जय मैं…
मुझे दुखों से बाहर निकालो
यह नहीं मेरी प्रार्थना
तैरने का बल कर पाऊं संचय..
ईश्वर पर असीम आस्था रखने वाली मंगला जी की यही प्रार्थना रही हो शायद… किताब की भूमिका में लिखते हुए प्रोफेसर चंद्रकला त्रिपाठी जी लिखती हैं- “सीरत नाम की इस आत्मकथात्मक किताब में सीरत की देह, आत्मा और आकांक्षाओं पर बेहिसाब ज़ख्म मिले… सचमुच बहुत कम अवसर मिलते हैं, जब जीने और संघर्ष करने की पवित्रता महसूस होती है। इस किताब की जान यह पवित्रता है।”
मंगला जी ने सीरत में एक जगह लिखा है- “तेज़ाब में गलती हुई बारह साल के बचपन की देह अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी-पड़ी अठारह साल की हो गयी। यहाँ-वहाँ से घाव भरने के लिए पेट पीठ से त्वचा निकाली जाती रही और घाव नये होते रहे। शायद ही किसी की देह पर वसंत ऐसे आया हो।”
अपनी तरफ़ से कहने लायक़ कुछ नहीं है, जो भी कहा है मंगला जी की कलम ने कहा है… उनकी दो कविताओं में सिमटी हुई है उनकी कहानी। उनकी एक कविता ‘तोड़ो’ की ये पंक्तियां देखिए…
तुम मुझ पर चोटें आज़मा रहे हो
जैसे लोहे पर धम-धम गिरता है हथौड़ा
वहां फूटती हैं चिंगारियां
मेरी जली हुई देह में, आग अब भीतर रहने लगी है
मैं सोचती हूँ मृत्यु ने मुझे तब क्यों छोड़ दिया
तेज़ाब के झरने के नीचे गल-गल कर
टपक रही थी मेरी खाल
आंखें छोड़ गयी थी वह
भीतर बाहर देखने के लिए
एक शरीर की जब-तब भर आती आँखें
उन्हें आंसुओं को रोकने की भी ज़रूरत नहीं
पलकों में भी कहाँ कुछ बचा है?
बार-बार आज़माइश, मगर अब कहाँ क्या बचा हुआ तोड़ना है?
…अब जब सब कुछ याद करना है तब
फिर से पूरी देह में तेज़ाब घूमने लगा है
सोचती हूँ
ज़हर को काम करना ही होता तो
अब तक क्या बची होती?
प्राणों में जागता बैठा कोई उमगकर कहता रहता है
मंगला उठो
खून में मिलते गये तेज़ाब और सिंदूर को झार दो
उठो..
और ज़्यादा मीठा गाने के लिए उठो
इसके साथ ही अपनी बात ख़त्म करती हूँ पर यह बात कभी ख़त्म होती नहीं.. आब-ओ-हवा की ‘शुक्रिया किताब’ शृंखला के बारे में जब सोचा तो यही किताब याद आयी। हालांकि यह किताब मेरे जीवन के आरंभ में नहीं बल्कि अभी कुछ ही समय पहले आयी है पर जबसे आयी है, तबसे सोच-समझ पर छायी है। हम छोटे-छोटे दुखों, कष्टों से हार जाते हैं, टूट जाते हैं। आजकल आत्महत्याएं जिस तरह के कारणों से हो रही हैं, ख़बरें पढ़कर जी बैठ जाता है। ऐसा लगता है कि हम इतने छुईमुई होते जा रहे हैं कि एक खरोंच तक हमसे सही नहीं जाती। जो कुछ सह लेता है, वह जीवन के छोटे-छोटे संघर्षों के गुणगान ऐसे करता है जैसे एवरेस्ट फ़त्ह की हो।
ऐसे में मंगला जी की ‘सीरत’ हमें बहुत-से पाठ देती है। हमें आत्ममंथन के लिए झकझोरती है। हमें टूटने से बचा ले जाती है। यह किताब एक हौसले और एक प्रेरक के रूप में हमारे साथ चलती है। मुझे नहीं पता इसका साहित्यिक मूल्यांकन क्या हो या लेखन की कसौटी पर इस किताब को कैसे कसा जाये, पर मुझे लगता है कि मेरे और मेरे जैसों के लिए यह किताब जीवन की कठिनाइयों में होने वाली घबराहट के लिए अचूक दवा है।
(क्या ज़रूरी कि साहित्यकार हों, आप जो भी हैं, बस अगर किसी किताब ने आपको संवारा है तो उसे एक आभार देने का यह मंच आपके ही लिए है। टिप्पणी/समीक्षा/नोट/चिट्ठी.. जब भाषा की सीमा नहीं है तो किताब पर अपने विचार/भाव बयां करने के फ़ॉर्म की भी नहीं है। [email protected] पर लिख भेजिए हमें अपने दिल के क़रीब रही किताब पर अपने महत्वपूर्ण विचार/भाव – संपादक)

मधु सक्सेना
मूलत: कविता में मन रमता है और गाहे-ब-गाहे मधु सक्सेना गद्य लिखती हैं। कभी व्यंग्य तो कभी लेख, समीक्षा और कहानी का रुख़ करती हैं। तक़रीबन आधा दर्जन काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और अनेक मंचों से काव्य पाठ कर चुकी हैं। समवेत संकलनों में कविता, कहानी संकलित हो चुकी हैं। कतिपय संकलनों के संपादन से भी आप संबद्ध हैं। अपने दिवंगत पति एवं परिजनों की स्मृति में आपने साहित्यिक/सामाजिक सम्मान भी स्थापित किये हैं।
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