
- February 14, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
सिल्क गौहर, इंशा का अजीबो-गरीब प्रयोग
“सिल्क गौहर” पहली उर्दू किताब है, जो बिना किसी बिंदी वाले उर्दू अक्षरों से बने शब्दों में लिखी गयी है। इसे इंशाअल्लाह ख़ान इंशा ने लिखा था, जो एक मशहूर उर्दू शायर और लेखक थे और हमेशा कुछ नया करने का जुनून रखते थे। उन्हें पहली उर्दू ग्रामर की किताब, जिसका नाम “दरिया-ए-लताफ़त” है, का क्रेडिट भी दिया जाता है। इसके साथ ही, उन्होंने इल्म-ए-अरूज़ में बताये गये अरक़ान और मीटर को भारतीय नाम देने की कोशिश की, जैसे, उन्होंने “मुफ़ाईलुन” की जगह “परी बेगम” रखने की कोशिश की, जिसका शाब्दिक पदभार एक समान है।
“सिल्क गौहर” एक छोटी-सी कहानी है जिसे इंशाअल्लाह ने सिर्फ़ एक अनोखे प्रयोग के लिए और अपनी क्रिएटिव उपज दिखाने के लिए बिना किसी बिंदी/नुक़्तों वाले अक्षरों से बने शब्दों से लिखने की कोशिश की। ऐसा नहीं है कि वह ऐसा लिखने वाले पहले इंसान थे। उनसे पहले, “मलिकुश-शुअरा-ए-हिंद” (हिंदुस्तान के शायरों का बादशाह) के ख़िताब से नवाज़े गये शायर “फैज़ी” की दो किताबें, अरबी गद्य में “मवारिद-उल-कलाम” और “सौता-उल-इल्हाम” और फ़ारसी शायरी में “दीवान-उल-मदाह”, मशहूर हो चुकी थीं। इंशा ने खुद 1799 में “तुर-उल-असरार” नाम का एक बिना नुक़्ता वाला क़सीदा, एक बिना नुक़्ता वाला दीवान और एक बिना नुक़्ता वाली फ़ारसी मसनवी लिखी थी।
यह उर्दू गद्य में पहला प्रयास है। हालांकि “सिल्क गौहर” की अपने विषय और कंटेंट के हिसाब से कोई ख़ास अहमियत नहीं है, सिवाय इसके कि यह एक ऐसा एक्सपेरिमेंट था जो उर्दू साहित्य में मील का पत्थर साबित हुआ और यह उर्दू भाषा की पहली बिना नुक़्ता वाली किताब है, वरना इसमें भाषा या कहानी का कोई ऐसा स्वाद नहीं है, जो पढ़ने में दिलचस्पी पैदा करे। इसके अलावा, उस समय उन हिंदी शब्दों को शामिल करना मुमकिन नहीं था जिनमें ट, ड और ड़, ढ, ढ़ अक्षर होते थे क्योंकि उस समय इन अक्षरों के ऊपर छोटा आकार का ‘तोए'(ط) बनाने का रिवाज नहीं था, बल्कि उन्हें चार बिन्दुओं से दर्शाया जाता था। इसलिए, उन्हें इन सभी हिंदी अक्षरों वाले शब्दों से भी दूर रहना पड़ा, जिससे लेखन में संकुचन और बाधा आ गयी। इस तरह पूरे क़िस्से में कशिश की कमी पायी जाती है और हर वाक्य नीरस, हर प्रसंग अनाकर्षक हो गया।
इंशाअल्लाह का स्वभाव प्रयोगधर्मी था और उन्होंने कई प्रयोग किये, जिनके वही आविष्कारक थे और उन्हीं पर प्रयोग समाप्त भी हो गये। उन्होंने उर्दू व्याकरण की पहली किताब, “दरिया-ए-लताफ़त” लिखी, “रानी केतकी की कहानी” भी लिखी, जिसमें पूरी तरह से हिंदुस्तानी अल्फ़ाज़ यानी भारतीय शब्दावलियां थीं। कोई अरबी-फ़ारसी या तुर्की शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया था, यानी उनका स्वभाव यूनिक एक्सपेरिमेंट करते रहने का था।
“सिल्क गौहर” भी एक अजीब प्रयोग है क्योंकि उर्दूभाषा के अल्फ़ाबेट (हर्फ़-ए-तहज्जी) में कुल 53 अक्षर हैं (कहीं-कहीं भाषाविदों में मतभेद), जिनमें से 18 अक्षरों में कोई नुक़्ता नहीं है। इतने कम अक्षरों से बने बहुत कम शब्दों का इस्तेमाल करके पूरी कहानी लिखने के लिए बहुत स्किल की ज़रूरत होती है। इतने कम शब्दों से एक छोटा लेख लिखना भी अपने आप में बहुत हैरानी की बात है। लेकिन यह उनकी महारत थी कि उन्होंने न सिर्फ़ सिल्क गौहर लिखी, बल्कि ग़ज़लें, क़सीदे, मसनवियाँ, रुबाइयाँ और यहाँ तक कि मुख़म्मस (उर्दू शायरी की विधाएं) भी बिना नुक़्तों वाले शब्दों से रचे।

सिल्क गौहर के बारे में वे अपनी किताब हिस्ट्री ऑफ़ उर्दू लिटरेचर (तारीख़-ए-उर्दू अदब) के पेज 166 पर डॉक्टर जमील जालिबी लिखते हैं:
“हालांकि, सिल्क गौहर की ऐतिहासिक अहमियत यह है कि यह उर्दू की पहली बिना नुक़्ता वाली कहानी है। इसमें रूस की रानी गौहर आरा की कहानी बतायी गयी है। इस प्रतिबंध की वजह से इंशा की वोकैबुलरी (शब्द संपदा) इतनी कम हो गयी कि वे बार-बार वही शब्द इस्तेमाल करते हैं और ये ऐसे शब्द हैं, जो न तो आम बोलचाल की भाषा का हिस्सा हैं और न ही जाने-पहचाने हैं, बल्कि बिना नुक़्ता वाले होने की बाध्यता के कारण ये अरबी, फ़ारसी और तुर्की भाषाओं से लिये गये हैं, और इसीलिए पूरी रचना में भावों के प्रस्तुतिकरण की सांस क़दम-क़दम पर फूलने लगती है। इंशा के नये प्रयोगों वाले स्वभाव ने बिना नुक़्ता वाली लिखाई का प्रयोग तो किया, लेकिन वह कोई अर्थपूर्ण और सार्थक एक्सपेरिमेंट नहीं बन सका। इसमें न तो कहानी का मज़ा है और न ही कहने का स्टाइल, बल्कि यह शब्दों का एक ऐसा जाल-सा बुना गया है जिसे शब्दों का गोरखधंधा कहा जा सकता है।”
उदाहरण:
समर माह साते मुल्क-ए-रूस-ओ-मलका गौहर आरा।
इत्तिला-ए-इस्म-ए-मोसिस कलाम, सलमह अल्लाह मे’अ-आल-ओ-औलादा।
वाह-वाह, ओ दिल आगाह, ओ मुराद-ए-कलिमा लो आराद अल्लाह, हमसर इमला, वलवला! सिलसिला कलाम को हूर आसा और मुहावरा-ए-उर्दू को अमरद सादा-रू कर दिखा और इस्म इस कलाम का सिल्क गौहर रख और आ।
शेर:
और किसका आसरा हो सर गिरोह उस राह का
आसरा अल्लाह का और आल-ए-रसूलल्लाह का
एक और उद्धरण देखिए:
“रानी गौहर आरा के दिल को इस हालात की ख़बर हो गयी। उसी पल, उन्होंने मुहर्रम असरार, माहेर कारदार, अपनी उम्र से कहा, “यहाँ आओ और उसे ले आओ।” हरगाह मार मेहरा अत्तर अलमास असा पर हमला हुआ, और लिसा मार मद समा का महल काला हो गया, और मदद मर्दक हुर मलाई आला का मुसव्विदा खुल गया और जुनून का कलसारा ज़हर खाकर सो रहा था, और बच्चे मह मुराद का पालना सो रहा था, रूस का राजा एक कलाल मुकल गौहर था, वह हीरे और रूबी रखता था, वह इस ऑर्डर के प्रेसिडेंट का कमांडर था, वह महर से चौंक गया रू ख़ुशबूदार महल में घुसा और कराह उठा।”
इस एक्सपेरिमेंट की सबसे बुरी बात यह है कि कई कोशिशों के बाद भी आप एक भी पैराग्राफ़ का मतलब ठीक से नहीं समझ पाते हैं और ऐसा लगता है कि आप बहुत कन्फ्यूज़ हो गये हैं। बहुत ज़ोर देने के बाद भी शब्द बिल्कुल समझ नहीं आते क्योंकि यह साफ़ है कि बिना नुक़्ते वाले शब्दों के आग्रह से कई जगहों पर उनका स्वरूप भी बदल दिया गया है और ऐसे शब्द भी हैं, जिनसे कोई आम पाठक परिचित नहीं था। इसलिए यह समझ नहीं आता कि कोई शब्द कितना लम्बा है या यह कि हम दो शब्दों एक तो नहीं समझ रहे या एक शब्द को दो भाग में तो नहीं पढ़ रहे।
इंशाअल्लाह ने अपना नाम भी बदला है क्योंकि उनके नामों में “शीन” अक्षर पर तीन नुक़्ते हैं, इसलिए उन्होंने इसे “अराद अल्लाह” से बदल दिया है। इसे एक समस्या वाली स्थिति कहा जाएगा क्योंकि किसी इंसान का नाम ही उसकी पहचान होता है, उस नाम के अर्थ से नहीं। जैसे, अगर नाम शेर मुहम्मद है, तो उसकी जगह असद मुहम्मद नहीं लिखा जा सकता। नाम सूरज कुमार है तो उसे सूर्य कुमार नहीं लिख सकते। बेशक, ये दो अलग-अलग लोगों के नाम हो सकते हैं।
ज्ञान चंद जैन अपनी शोध पुस्तक “उर्दू की नसरी दास्तानें/उर्दू प्रोज़ टेल्स” (पेज 365) में लिखते हैं: “इस किताब की अहमियत सिर्फ़ “कोह कुन्दन-ओ-काह बर आवर्दन” (पहाड़ खोदना और घास/तिन्का बरामद करना)। नुक़्ता रहित शब्दों की बाध्यता ने इतनी बोरियत पैदा कर दी है कि पूरी कहानी पढ़ना लगभग नामुमकिन हो गया है।”
एक नज़र इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
जन्म दिसंबर 1752 मुर्शिदाबाद – मौत 19 मई, 1817 लखनऊ। इंशा बहुत तेज़ दिमाग़ और नये विचारों वाले थे। उन्होंने कई अनोखे प्रयोग किये। इस तरह, उन्होंने साहित्य के इतिहास में अपने लिए एक अहम जगह बनायी। उन्होंने ग़ज़ल, रेख़्ती, क़सीदा और मसनवी लिखीं, उन्होंने एक बे-नुक़्त दीवान (जिसमें ऐसे शब्द हों जिन पर बिंदी न हो) और एक कहानी “सिल्क गौहर” भी लिखी। उन्होंने “रानी केतकी की कहानी” लिखी, जिसमें अरबी या फ़ारसी का एक भी शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया था। “दरिया-ए-लताफ़त” उर्दू भाषा और भाव (व्याकरण) पर पहला काम भी माना जाता है। वे बहुत हाज़िरजवाब थे, जिसकी वजह से वे नवाब सआदत अली खान के पसंदीदा थे। उन्होंने ग़ज़ल में हास्य भी डालना शुरू किया और अपनी शायरी में न सिर्फ़ लखनऊ बल्कि दिल्ली की भाषा का भी तड़का लगाया।

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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