
- February 14, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग शम्पा शाह की कलम से....
सोनाबाई और उनके मौन का विस्तार
…तो मैं बता रही थी 1983 में सोनाबाई को राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने की ख़बर आसपास के गांव में आग की तरह फैल गयी। उनकी अमेरिका यात्रा भी हुई। 1986 में उन्हें मध्य प्रदेश सरकार के राष्ट्रीय तुलसी सम्मान से नवाज़ा गया। इन दोनों पुरस्कारों से पूरे इलाक़े में धूम मच गयी। गांव-बिरादरी में उनका मान बढ़ा। अंबिकापुर और रायपुर से निकलने वाले पत्र-पत्रिकाओं में उनके बारे में लेख छपे। लेकिन सोनाबाई को डर सताये रहता था कि कहीं कोई फिर से बाहर जाने के लिए न बुला ले!
जगदलपुर ऑफिस ने 1989-90 में तथा नेहरू युवा केंद्र अंबिकापुर ने 1994 में पंद्रह-बीस लोगों को छह माह के लिए सोनाबाई के पास ट्रेनिंग दिलवायी, जिसमें ₹250 प्रतिमाह सीखने वालों को वज़ीफ़ा भी मिला। इन लोगों ने सोनाबाई से, उनके घर आकर काम सीखा, कुछ समय तक किया भी, लेकिन बाद में उनमें से केवल दो-तीन लोग ही यह काम करते रहे। बिना प्रोत्साहन या आर्थिक लाभ के अपने हाथ में चिखला धरे, ऐसा कोई बिरला ही होता है। वैसे यह बात भी है कि ज़्यादातर घर में गृहस्थी का काम ही इतना है और आर्थिक संकट भी है, जिसके चलते इस तरह के काम के लिए जो मानसिक शांति और इत्मीनान चाहिए वह अक्सर स्त्रियों को उपलब्ध नहीं होता।
जिस अर्थ में भारत में अनेक शिल्प परम्पराएँ हैं, मसलन, कुम्हार कला, लुहार कला, हथकरघा आदि जिनसे उस कलाकार की सामाजिक, जातिगत पहचान होती है, आय होती है, घर संसार चलता है, सोनाबाई का काम इस कोटि में नहीं आता। सोनाबाई ने अपने घर में जो कृतियां रचीं थी, उन्हें रचते हुए उन्हें इस बात का भूलकर भी एहसास नहीं था कि उससे आमदनी हो सकती है। सोनाबाई का काम जिस कोटी में आता है उसकी भी एक देशव्यापी परंपरा है जिसमें स्त्रियां हर साल, बरसात के बाद घर की मरम्मत करती है, लीपती हैं, रंगती हैं। वे तरह-तरह के उपाय करती हैं जिससे घर और उसके रहवासी महफूज़ रहे, देवता प्रसन्न हों, कीड़े-मकोड़े, साँप-बिछू घर के भीतर न आएं। कहीं इसे लीपन, कहीं अल्पना, कहीं छोहा लिपाई कहते हैं। कहीं सिर्फ़ लाल-काली रेखा घर के चारों ओर क़िलेबंदी करते हुए बना दी जाती है लेकिन इन कामों से आमदनी होने का या मान-सम्मान मिलने का सवाल ही नहीं उठता था। जैसा कि अर्चना वर्मा और सोनाबाई ने स्वयं बताया, कुछ लोग उनका घर देखकर तारीफ़ भी करते थे, तो कई ऐसे लोग भी थे जिनकी नज़र में वे एक खब्ती, अजीब-सी औरत थीं, जिसका मन घर-परिवार, लोगों में न लगकर मिट्टी में लगता था!

स्पष्ट है कि सोना बाई यह काम शोहरत के लिए भी नहीं कर रही थीं। यह काम वे दरअसल, नितांत अपने लिए कर रही थी, अपने भीतर के कुएं में झांकते हुए वे सब कुछ उलीच रही थीं, जो उनके भीतर था और बाहर जिसका मात्र अभाव था।
1993 में सोनाबाई ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में ‘चरैवेति’ नामक देशज ज्ञान पद्धतियों पर केंद्रित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के समय लगायी गयी प्रदर्शनी के लिए एक बड़ा कमरा तैयार किया था। वहां उन्होंने जाली, दोंदकी (अनाज रखने का कुठार), घरसी-चूल्हा, मानव और पशु मूर्तियां, भित्ति चित्रांकन सभी कुछ बनाये थे। पूरे कमरे के फ़र्श और दीवार पर सरगुजा की पारंपरिक छोहा लिपाई की थी। बाद में क्राफ़्ट्स म्यूज़ियम, दिल्ली द्वारा आयोजित बहुचर्चित प्रदर्शनी- ‘दि अदर मास्टर्स’ में उनका भी काम चुनिंदा पाँच कलाकारों में से था। इसे लोगों, कलाप्रेमियों द्वारा बहुत सराहा गया था। सोना बाई के काम में कुछ भी अलंकारिक या सजावटी नहीं होता, कुछ भी अतिरिक्त नहीं होता है। यह एक ऐसे व्यक्ति का काम है जिसके यहां भटकाव नहीं है। जब मैं सरगुजा उनके घर गयी, तो वे मुझे अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठी मिली थीं।
बरसात के दिन थे, घर के बेटे-बहू बल्कि आस-पड़ोस के सारे स्त्री-पुरुष खेतों में रोपा लगाने गये हुए थे। सोनाबाई सामने फैले खेतों के विस्तार को देखती हुई चबूतरे पर प्रकृतिस्थ बैठी थीं- वैसे ही जैसे खेतों के उस पार पिल्खा पहाड़ बैठा था। कुछ देर उनके पास बैठने के बाद मैं उनका काम देखने भीतर चली गयीं।
भीतर उनके काम में भी वही मौन विस्तार पा रहा था। जाली पर बैठे चिरई-चुनमुन, फन फैलाये नाग डरावने लगना तो दूर, चौड़ी पत्तियों से लग रहे थे! छोटी-छोटी दो खिड़कियों की चौखट पर बैठे बकरी और शेर पुराने मित्र से आस-पास बैठे थे। खिड़की के नीचे दीवार पर बना पेड़ था, जिसमें पत्तियों से ज्यादा चिड़िया थीं। पत्तियां नीचे को झुकी हुई और चिड़िया चहक कर ऊपर देखती हुई मानो अभी-अभी इस पेड़ पर ही उग आयी हों।
एक तरफ़ तो आंगन में किसी मेले-सी रौनक़ थी, रंग था, और दूसरी तरफ़ इसमें वही मौन विश्रांति भी थी, जो घर के बाहर चित्रवत फैले खेत, दूर खड़े पिलखा पहाड़ में थी, जिसे देखती बैठी सोनाबाई दरअसल उस दृश्य का हिस्सा थीं।
(चित्र परिचय: सोनाबाई अपने घर में ही विभिन्न मुद्राओं में। छायाकार: राजुला शाह)

शम्पा शाह
कला की दुनिया में रमी हुई यह कलाकार सिरैमिक की लोक कला और आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाती रही है और मृदा कला के संरक्षण/संवर्धन में योगदान देती रही है। भारत के अनेक शहरों सहित अनेक देशों में कला प्रदर्शनियां आपके नाम हैं। आपकी शिल्प कला में मानवीय, प्राकृतिक एवं मिथकीय रूपों का एक अंतर्गुम्फन एक थीम की तरह प्रतिध्वनित होता है। भोपाल स्थित मानव संग्रहालय में 20 और कला के क्षेत्र में 30 से अधिक सालों तक सेवाओं के साथ ही साहित्य, संगीत व सिनेमा जैसे कलाक्षेत्रों में भी ख़ासा दख़ल।
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