
- December 22, 2025
- आब-ओ-हवा
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गणित दिवस पर प्रमोद दीक्षित मलय की कलम से....
रामानुजन... शून्य से 'शून्य' के रहस्य तक
लेख का आरम्भ आज से लगभग 125 साल पहले एक गांव के विद्यालय की कक्षा तीन की गणित की बेला के एक दृश्य से करता हूं। शिक्षक बच्चों से बातचीत करते हुए कहते हैं कि तीन केले यदि तीन लोगों में या एक हजार केलों को एक हज़ार लोगों में बराबर बांटा जाये तो प्रत्येक को एक-एक केला मिलेगा। अर्थात् किसी दी हुई संख्या में उसी संख्या से भाग देने पर भागफल एक आता है। तभी एक बच्चे ने सवाल किया कि क्या शून्य को शून्य से भाग देने पर भी भागफल एक आएगा। कक्षा में मौन पसर गया। इस बालक ने कक्षा पांचवीं में पूरे ज़िले में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर अपने माता-पिता और विद्यालय को गौरवान्वित किया। इतना ही नहीं, कक्षा सातवीं में पढ़ते हुए कक्षा बारहवीं और बी.ए. के बच्चों को गणित पढ़ाया करता था। आगे चलकर यही बालक विश्व का महान गणितज्ञ सिद्ध हुआ जिसे सभी श्रीनिवास रामानुजन आयंगर के नाम से जानते हैं और जिनके प्रमेय आधारित सूत्र गणितज्ञों के लिए आज भी रहस्य एवं अबूझ पहेली बने हुए हैं और शोधकार्य का आधार भी, तथा जिनके नाम पर रामानुजन अभाज्य, रामानुजन स्थिरांक सिद्धांत विश्व विश्रुत हैं।
वास्तव में रामानुजन गणित की दुनिया के प्रखर भास्कर थे जिनके ज्ञान, मेधा और अंकशास्त्र की समझ से विश्व चमत्कृत है। वह गणितीय कर्म कौशल के फलक का कोहिनूर माणिक्य हैं। गणित के आकाश का दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी आभा से गणित-पथ प्रकाशित है, जिनके महनीय अवदान से गणित-कोश समृद्ध, समुन्नत और सुवासित हुआ है।
रामानुजन का जीवन-पथ कंटकाकीर्ण था। तमाम अभावों और दुश्वारियों से जूझते हुए वह गणित के शोधकार्य में मृत्युपर्यन्त साधनारत रहे। अंतिम घड़ी तक रोगशैय्या पर पेट के बल लेटे औंधे मुंह वह गणित के सूत्र रचते रहे। रामानुजन का जन्म तमिलनाडु के निर्धन ब्राह्मण परिवार में पिता श्रीनिवास आयंगर के कुल में माता कोमलताम्मल की कोख से 22 दिसम्बर, 1887 को जनपद इरोड में हुआ था। पिता एक दूकान में मुनीम अर्थात् खाता-बही लेखन का काम करते थे। एक वर्ष बाद पिता परिवार के साथ कुंभकोणम् आ गये। मज़ेदार बात यह कि बालक तीन वर्ष तक कुछ बोला ही नहीं। सभी समझे कि वह गूंगा है। पर आगे वाणी प्रस्फुटित हुई तो परिवार में खुशी छायी।
शुरूआती शिक्षा का दौर
रामानुजन का बचपन कुंभकोणम में बीता और यहीं पर ही प्राथमिक शिक्षा भी पूरी हुई। आगे की शिक्षा के लिए टाउन हाईस्कूल में प्रवेश लिया। यहां पढ़ने का बेहतर वातावरण मिला। स्थूलकाय रामानुजन की आंखों में नया सीखने की उत्कट उत्कंठा की चमक थी। स्कूल के पुस्तकालय में त्रिकोणमिति आधारित सूत्रों की एक पुस्तक मिली। बालक रामानुजन उन सूत्रों को हल करने में जुटे रहते। न प्यास की चिंता न भोजन का ध्यान। सूत्रों को हल करने की ललक से रामानुजन गणितीय संक्रियाओं को समझने और हल करने में पारंगत हो गये। वह अंकों से खेलने लगे, उनके गुण-धर्मों पर सोचने लगे। पर इसके कारण अन्य विषयों के अध्ययन के लिए समय न बचता। फलतः वह अन्य विषयों में पिछड़ते गये। हाईस्कूल उत्तीर्ण कर लिया और गणित एवं अंग्रेज़ी में अधिक अंक प्राप्त करने के कारण आगे के अध्ययन के लिए सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति मिली और कालेज में 11वीं कक्षा में दाखिला ले लिया। यहां प्रोफ़ेसर जार्ज शुब्रिज की गणित पुस्तक पढ़ी, जिससे गणित के प्रति रुचि प्रगाढ़ हुई। 11वीं में गणित में सर्वोच्च अंक लाकर अन्य विषयों में अनुत्तीर्ण हो गये। छात्रवृत्ति बंद हो गयी और कालेज छूट गया। परिवार की आर्थिक स्थिति डांवाडोल और ज़रूरतें मुंह बाये खड़ी थीं। गणित का ट्यूशन शुरू किया तो पांच रुपये महीना मिलने लगे। 1907 में बारहवीं की परीक्षा में व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में बैठे पर फिर अनुत्तीर्ण हो गये, हालांकि गणित में पूरे अंक प्राप्त किये। परिणाम यह हुआ कि कालेज हमेशा के लिए छूट गया।

गणितज्ञ की पहचान तक
अगले पांच वर्ष जीवन की कड़ी परीक्षा का काल था। पढ़ाई छूट चुकी थी, कोई काम-धंधा था नहीं। गणित में काम करने का असीम उत्साह तरंगें मार रहा था पर किसी विद्वान शिक्षक या प्रोफ़ेसर का साथ नहीं था। ऐसे दु:सह विकट संकटकाल में एक भाव था, जो रामानुजन को अनवरत् ऊर्जा प्रदान कर रहा था और वह था ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्था और विश्वास। कुलदेवी नामगिरि के प्रति अनंत असीम श्रद्धा और समर्पण भाव उनके हृदय को ज्योतित किये हुए था, जिसका उल्लेख रामानुजन ने प्रो. हार्डी के साथ बातचीत में करते हुए कहा था कि गणित में शोध भी मेरे लिए ईश्वर की ही खोज है। इसी दौरान 1909 में पिता ने 12 वर्षीय कन्या जानकी से रामानुजन का विवाह करवा दिया। अब पारिवारिक ज़िम्मेदारियां बढ़ गयीं तो आजीविका की तलाश में मद्रास (अब चैन्नै) की राह पकड़ी। पर 12वीं अनुत्तीर्ण युवक को नौकरी पर कौन रखता। जैसे-तैसे एक साल गुज़रा, स्वास्थ्य भी गिरने लगा तो कुंभकोणम् लौटना पड़ा। एक साल बाद फिर मद्रास लौटे।
अबकी बार अपने गणित के शोधकार्य का रजिस्टर साथ लाये और रजिस्टर दिखाकर काम मांगने लगे। संयोग से एक शुभचिंतक ने रजिस्टर देखा तो रामानुजन को डिप्टी कलेक्टर से मिलने की सलाह दी। डिप्टी कलेक्टर वी. रामास्वामी अय्यर स्वयं गणित के विद्वान थे। वह रामानुजन के काम से प्रभावित हुए और ज़िलाधिकारी रामचंद्र राव से अनुशंसा कर 25 रुपये मासिक मानधन का प्रबंध करवा दिया। इससे रामानुजन को आर्थिक झंझावात से आंशिक मुक्ति मिली और वे शोधकार्य में अधिक ध्यान देने लगे।
इसी अवधि में वह इंडियन मैथमेटिक्स सोसायटी में काम करते हुए उसके जर्नल के लिए प्रश्न बनाने और हल करने का काम भी करने लगे थे। इसी जर्नल में आपका 17 पृष्ठों का पहला शोध-पत्र ‘बरनौली संख्याओं का गुण’ प्रकाशित हुआ, जिसकी चतुर्दिक भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। आगे मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क के पद पर काम करने लगे। यह समयावधि रामानुजन के शोध के लिए उपयुक्त थी। रात भर स्लेट पर सूत्र बनाते, हल करते, फिर रजिस्टर पर उतारते और थोड़े आराम के बाद कार्यालय निकल जाते। अब एक गणितज्ञ के रूप में पहचान बनने लगी थी।
शेष तो इतिहास है…
मित्र की सलाह पर अपने काम को इंग्लैंड के गणितज्ञों के पास भेजा पर कोई महत्व न मिला। संयोग से 8 फरवरी, 1913 को एक पत्र प्रो. जी.एच. हार्डी को भेजते हुए उनके एक अनुत्तरित प्रश्न को हल करने के सूत्र खोजने का संदर्भ देकर अपने कुछ प्रमेय भी भेजे। पहले तो हार्डी ने पत्र पर ध्यान न दिया पर अपने शिष्य लिटिलवुड से परामर्श कर रामानुजन के काम की गम्भीरता समझी और रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय से छात्रवृति दिला कालांतर में शोध हेतु अपने पास लंदन बुलवा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश दिला दिया। दोनों साथ शोधकार्य करते रहे। यहां रामानुजन के कई शोध-पत्र प्रकाशित हुए। ऐसे ही एक विशेष शोधकार्य पर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने बी.ए. की उपाधि प्रदान की।
समस्या तब बढ़ी, जब वहां की जलवायु, रहन-सहन, खान-पान और सामाजिक व्यवहार से शर्मीले, संकोची, आत्मनिष्ठ शाकाहारी रामानुजन तादात्म्य न बैठा सके। स्वयं भोजन पकाने और शोधकार्य के अत्यधिक मानसिक श्रम से शरीर क्षीण होने लगा। चिकित्सकों ने क्षय रोग बता आराम करने की सलाह दी। पर रामानुजन पर काम की धुन सवार थी। इसी काल में आपको रॉयल सोसायटी का फ़ेलो चुना गया। आज तक सबसे कम उम्र में फ़ेलो चुने जाने वाले वह पहले व्यक्ति थे और पहले अश्वेत भी। ट्रिनिटी कालेज से फ़ेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय बने।
इधर, रोग बढ़ने के कारण आप 1919 में जन्मभूमि भारत लौट आये। मद्रास विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए। पर स्वास्थ्य तेज़ी से गिरने लगा। रोग शैय्या पर लेटे-लेटे ही आप काम करते। कालपाश रामानुजन के प्राणों की ओर बढ़ रहा था। 26 अप्रैल, 1920 को गणित का यह जगमगाता दीप अपना प्रकाश समेट अनंत की यात्रा पर निकल गया।
रामानुजन का काम आज भी गणितज्ञों की परीक्षा ले रहा है। ट्रिनिटी कॉलेज के पुस्तकालय में 1976 में रामानुजन का हस्तलिखित 100 पन्नों का रजिस्टर मिला था, जिसमें उनके प्रमेय और सूत्र लिखे हैं। जिसे टाटा फ़ंडामेंटल रिसर्च सेंटर ने रामानुजन नोटबुक नाम से प्रकाशित किया है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक फ़िल्म ‘द मैन हू न्यू इन्फ़िनिटी’ भी बन चुकी है। भारत सरकार ने 2012 में 125वीं जयंती के अवसर पर रामानुजन पर डाक टिकट जारी करते हुए उनकी जयंती 22 दिसम्बर को गणित दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। 1962 में भी एक डाक टिकट जारी किया गया था। गूगल ने डूडल बनाकर श्रद्धाभाव अर्पित किया।
जब तक गणित है, तब तक उनकी खोज ‘रामानुजन संख्याएं’ (1729, 4104, 39312 आदि), थीटा फलन और संख्या सिद्धांत पर उनका विशेष काम विद्यार्थियों को प्रेरित करता रहेगा। रामानुजन हमेशा गणित के पृष्ठों में विद्यमान रहेंगे।

प्रमोद दीक्षित मलय
प्रमोद दीक्षित मलय की दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जबकि वह क़रीब एक दर्जन पुस्तकों का संपादन कर चुके हैं। इनमें प्रमुख रूप से अनुभूति के स्वर, पहला दिन, महकते गीत, हाशिए पर धूप, कोरोना काल में कविता, विद्यालय में एक दिन, यात्री हुए हम आदि शामिल हैं। कविता, गीत, कहानी, लेख, संस्मरण, समीक्षा और यात्रावृत्त लिखते रहे मलय ने रचनाधर्मी शिक्षकों के स्वैच्छिक मैत्री समूह 'शैक्षिक संवाद मंच' स्थापना भी 2012 में की।
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वाक़ई,
हमारे गणितज्ञ रामानुजन irreplaceable personality हैं।
बहुत ख़ूब!