शिक्षक दिवस तुम फिर आना
पाक्षिक ब्लॉग आलोक कुमार मिश्रा की कलम से....

शिक्षक दिवस तुम फिर आना

5 सितंबर यानी कि टीचर्स डे, मतलब शिक्षक दिवस बिना किसी बड़ी आपदा के बीत गया। रस्मी सम्मान के बोझ तले दबे शिक्षक बड़ी कातर नज़रों से आसपास का परिवेश टटोलते रहे। दिखने में तो वैसे सम्मान भरपूर मिलता रहा, पर हकीकत में ईर्ष्या, असम्मान और नफ़रत की जुगलबंदी से बने ताने पूरे दिन रूप बदल-बदलकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हाहाकार मचाते रहे। कोई अपने टीचर को एक बार थप्पड़िया लेने की न पूरी हो पाने वाली इच्छा का रुदन करता रहा तो कोई सरकारी स्कूलों में व्याप्त पिछड़ेपन, निकम्मेपन और अव्यवस्था का एक मात्र दोषी उसे ही ठहराते हुए सारा ठीकरा उसके सिर पर फोड़ता रहा। किसी को नौकरी के कुछ वर्षों में ही मास्टरों द्वारा बाइक या स्कूटी खरीद लेने की प्रवृत्ति से कोफ़्त हो रही थी तो कोई उनमें से कुछ के नकारेपन को मिर्च मसाले लगा- लगाकर परोस रहा था और उसका सामान्यीकरण कर रहा था। बड़े-बड़े साहित्यिक प्लेटफॉर्म भी इन्हें शेयर करते हुए लहालोट हो रहे थे।

इस मामले में सबसे शांत और कूल वे लोग रहे जिन्होंने हजारों-लाखों की फीस भरकर मँहगे प्राइवेट स्कूलों और कॉलेजों से शिक्षा नाम का उत्पाद खरीदा था। उन्हें अपने किसी शिक्षक से कोई शिकायत नहीं थी। न ही उन्हें शिक्षा व्यवस्था में किसी और से कोई गिला था। उनकी समझ यही थी कि जैसी दक्षिणा दी वैसी शिक्षा मिली। वो इस बहस से विरक्त रहे। ऐसी ही आदर्श व्यवस्था की हामी हमारी सरकारें वर्षों से रही हैं। तभी तो उन्होंने पुरजोर कोशिश करके सरकारी स्कूलों का भट्ठा यूँ बिठाया है। वहाँ की सारी कमियों का खलनायक सबसे निरीह प्राणी मास्टर नाम की प्रजाति को बनाया है। अब सबसे बड़ी बात ये हुई है कि जनता का बड़ा हिस्सा उनकी इस कारगुजारी में पूरे मन से उनके साथ है। वो वैसा ही सोच रही है जैसा सरकार बहादुर चाहती रही है। आज़ाद भारत में सरकार की इससे बड़ी कोई दूसरी सफलता हो तो ज़रा कोई याद दिलाए!

ख़ैर, हर बरस की तरह कुछ अच्छा भी हुआ। कहकर प्यार और लगाव जताने का ज़्यादा मौका न देने वाली हमारी महान संस्कृति में विद्यार्थियों ने इस दिन जरा सी छूट ले ही ली। उन्होंने अपने चहते शिक्षकों और शिक्षिकाओं को आदर और प्रेम स्वरूप ग्रीटिंग कार्ड, कलम, चॉकलेट जैसे तोहफ़े ही नहीं दिए बल्कि खुलकर उनके प्रति आभार और कृतज्ञता का भाव भी प्रकट किया। उन्होंने उनके पढ़ाने के तौर-तरीकों, बच्चों से समझदारी और अपनत्व से पेश आने के सलीकों को खुलकर सराहा। सुनकर शिक्षकों का हृदय गदगद हो गया। वो अगले एक साल तक उसी तन्मयता और समर्पण से लैस होकर पढ़ाने के लिए ऊर्जावान हो उठे। भावुकता उनकी आँखों को नम और नथुनों को गुलाबी करने लगी। हालाँकि इस पूरे मामले में सच में निष्क्रिय और विद्याविरोधी रहे गुरुवर जमात को ज़्यादा तवज्जो नहीं मिली। वैसे उन्हें चाहिए भी नहीं था। उन्होंने पहले से ही निर्लिप्तता का उत्कृष्ट आध्यात्मिक स्तर जो प्राप्त कर लिया है।

कुछ सरकारी और गैर सरकारी सम्मान आयोजन भी शिक्षकों को सम्मानित करने के लिए किए गए। शॉल, स्मृति चिन्ह और प्रमाणपत्र बाँटने की होड़ लगी रही। मंच पर जल्दी-जल्दी चढ़ने-उतरने के क्रम में गिरने और चोट खा जाने जैसे जोखिम से शिक्षक दो-चार होते रहे। एक बात रेखांकित किए जाने लायक रही कि वो टीचर जो कक्षा में विद्यार्थियों से अधिक न जुड़ पाए थे और उनसे सम्मान और लगाव अर्जित करने में चूक गए थे, वो इन मंचों से जुड़ने में इस बार भी सर्वाधिक सफल हुए थे। कक्षा में खटने वाले आज भी उधर ही खट रहे थे। इधर ये दूसरी प्रजाति वाले शिक्षक कार्यक्रम उपरांत वाले भोजन का जायका लेने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शिक्षक गौरव सम्मान मिलने का स्टेटस लगाने में मशगूल हो गए थे।

इस तरह एक बेहद सफल शिक्षक दिवस अपने अंत की ओर बढ़ा। बस एक मुद्दे पर सभी तरह के शिक्षकों में आम सहमति थी और वो थी उनकी ये इच्छा कि ऐसे अवसर बार-बार आते रहें।

शिक्षक दिवस तुम फिर आना।

alok mishra

आलोक कुमार मिश्रा

पेशे से शिक्षक। कविता, कहानी और समसामयिक मुद्दों पर लेखन। शिक्षा और उसकी दुनिया में विशेष रुचि। अब तक चार पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। जिनमें एक बाल कविता संग्रह, एक शैक्षिक मुद्दों से जुड़ी कविताओं का संग्रह, एक शैक्षिक लेखों का संग्रह और एक कहानी संग्रह शामिल है। लेखन के माध्यम से दुनिया में सकारात्मक बदलाव का सपना देखने वाला मनुष्य। शिक्षण जिसका पैशन है और लिखना जिसकी अनंतिम चाह।

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