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"था "और "है" की गुत्थी

ये मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता
एक ही शख़्स था जहान में क्या

यह एक प्रसिद्ध शे’र है। मनुष्य अपनी संवेदनाओं को खंगालकर यह जानना चाहता ही है कि मन की अशांति का स्रोत क्या है और क्यों है? शे’र में उस प्रश्न की ओर संकेत है। सकारात्मक सोच और दृष्टिकोण समस्याओं के हल सरल कर देती है। शे’र में तर्कसंगतता के साथ साथ मासूमियत है, यही इसे तग़ज़्ज़ुल से मालामाल कर रहा है। इस शे’र को केंद्र में रखकर विचार कीजिए कि अगर दूसरी पंक्ति में “था” के स्थान पर “है” रखकर पढ़ा जाये तो शे’र में क्या परिवर्तन हो रहा है। पहली पंक्ति में “ये” स्पष्ट करता है कि समस्या वर्तमान में भी है और सामने है। तभी “ये” का औचित्य है। अन्यथा बात कुछ यूं कही जाती – “वो मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता था”। दूसरी पंक्ति में “था” का आना उस शख़्स से कालजनित दूरी की ओर संकेत है। जुड़ना मनुष्य की स्वभावगत प्रवृति है। शे’र का एक आशय यह है कि बीते समय में अगर और लोग होते तो उनसे जुड़कर चैन का सामान जुटाया जा सकता था या बेचैनी का बंटवारा हो सकता था। क्या सृष्टि की रचना भी किसी ने अपने अकेलेपन की बेचैनी को तोड़ने के लिए की थी? क्या उसी के कारण आज की बेचैनी है? इससे यह समझा जा सकता है वह शख़्स अब सामने नहीं है। अब तो उसकी यादें हैं और उनके कारण उत्पन्न बेचैनी है। यह बेचैनी स्वयं शायर के भीतर सतत पकती रहती है और वह एक लंबे समय से इस बेचैनी से ग्रस्त है। अगर वह शख़्स सामने होता या वर्तमान में कुछ गतिविधि कर रहा होता तो बेचैनी के नये सामान जुटते।

अब “एक ही शख़्स है जहान में क्या” पर विचार करते हैं। इससे अर्थ में विविधता की संभावनाएं जागती हैं। अब यह शख़्स शायर स्वयं भी हो सकता है।

इस विवेचना का उद्देश्य यह है कि “था” का प्रयोग कई बार शे’र के दायरे को सीमित कर देता है। ऐसे अनेक शे’र देखने में आते हैं जहां शे’र के टैक्स्ट में “था” की जगह “है” का आना कथ्य को व्यापक बनाता है।

एक उदाहरण देखिए:

हिज्र को हौसला और वस्ल को फ़ुर्सत दरकार
इक मुहब्बत के लिए एक जवानी कम है

इस शे’र में “है” कि जगह “थी” पढ़कर देखिए। “इक मुहब्बत के लिए एक जवानी कम थी”। यह एक विशिष्ट घटना ही की ओर संकेत कर सकेगा। यह अनुभव है अनुभव का निचोड़ नहीं है और अगर है तो आज भी यही सत्य है इसकी पुष्टि नहीं होती। “है” का प्रयोग काल से परे, व्यक्ति विशेष से परे भी एक सत्य का बोध देता है।

एक और शे’र देखिए:

संसार का मालिक जो बना फिरता था कल तक
वह उड़ गया था बन के धुआं कुछ नहीं बचा

शे’र में वज़्न की गड़बड़ पर बात नहीं करेंगे। इस शे’र की पहली पंक्ति में उपस्थित “था” अपनी जगह सटीक है लेकिन दूसरी पंक्ति के “था” पर ध्यान दें तो लगता है कि यहां “है” अधिक उपयुक्त होता।

एक और शे’र देखिए:

आंखों में झूमती हैं बहारों की तितलियां
कैसा नशा ये गांव की पुरवाइयों में था

इस शे’र की दूसरी पंक्ति में उपस्थित “था” पर ध्यान दीजिए। यह “था” इंगित करता है कि शे’र गांव से लौटने के बाद कहा गया है। अब देखिए अगर “था” के स्थान पर “है” आता है तब अर्थ भले न बदले शेर के कहने का क्षण अवश्य बदल जाएगा। “है” आने पर शे’र गांव में उपस्थित रहते हुए ही कहा जा सकता है। अब विचार कीजिए कि “ये नशा” (और ऐसा नशा कि बहारों की तितलियां आंखों में झूमती हुई नज़र आएं) गांव में रहते हुए अधिक महसूस होगा कि वहां से निकल जाने के बाद। यह मूल शे’र भी अर्थवान है लेकिन “है” के प्रयोग होने पर अधिक तर्कसंगत होता।

एक अन्य शे’र देखिए:

अब उसी की चल रही
भीड़ में काना सा था

यहां तो दूसरी पंक्ति में “था” के स्थान पर “है” आवश्यक है। यह गड़बड़ कभी कभी रदीफ़ के कारण हो जाती है। मैंने यह भी देखा है कि पूरी ग़ज़ल में “था” रदीफ़ के स्थान पर “है” आने से लगभग सभी शे’र प्रासंगिक और तर्कसंगत बने रहते हैं। ऐसे में “था” का प्रयोग करके शे’र से व्यापकता क्यों छीनी जाये?

तात्पर्य यह है कि सही शब्द के चुनाव के साथ साथ सहायक क्रियाओं के प्रयोग पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है अन्यथा शे’र प्रभावी नहीं हो पाता है।

विजय कुमार स्वर्णकार, vijay kumar swarnkar

विजय कुमार स्वर्णकार

विगत कई वर्षों से ग़ज़ल विधा के प्रसार के लिए ऑनलाइन शिक्षा के क्रम में देश विदेश के 1000 से अधिक नये हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के व्याकरण के प्रशिक्षण में योगदान। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता की भूमिका के साथ ही शायरी में ​सक्रिय। एक ग़ज़ल संग्रह "शब्दभेदी" भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। दो साझा संकलनों का संपादन। कई में रचनाएं संकलित। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

1 comment on ““था “और “है” की गुत्थी

  1. था और है की समस्या केवल यहीं नहीं है । सभी प्रकार की विधाओं में था और है की सत्ता बहुत दमदार होती है। लेखन कार्य में अनेक बार ठहर कर इन दोनों के प्रभाव पर विचार करना पड़ता है।इस गैरमामूली दिखाई देती उलझन को आपने बारीकी से समझाया।
    बहुत प्रशंसनीय लेखन है।

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