
- May 3, 2025
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ऐनी आपा का ‘आग का दरिया’
“क़ुर्रतुल-ऐन हैदर ने एक ऐसी मुशतर्का तहज़ीब (साझा संस्कृति) के गुण गाये और अपने तहदार किरदारों में ऐसी हिन्दुस्तानी शख़्सियात (व्यक्तित्वों) को उजागर किया, जिनका ख़मीर कई क़ौमों और नस्लों के तहज़ीबी इख़तिलात (सांस्कृतिक मेलजोल) का रहीन मिन्नत (आभारी) है… बिला-शुबहा ऐसे अह्दसाज़ (युग प्रवर्तक) और बाकमाल तख़लीक़कार (रचनाकार) कहीं सदियों में जन्म लेते हैं।” – डाक्टर क़मर रईस
“आग का दरिया” क़ुर्रतुल-ऐन हैदर का सबसे अहम और उर्दू अदब का एक महान नॉवेल है। पहली बार 1959 में पाकिस्तान से प्रकाशित हुआ। उर्दू अदब में एक संग-ए-मील की हैसियत रखता है। इसे बीसवीं सदी में नॉवेलनिगारी का महान कारनामा माना जाता है। इसका कैनवास बहुत फैला हुआ है। भारत के सांस्कृतिक इतिहास के हज़ारों सालों को अपने दामन में समेटे हुए है। दरिया शब्द को समय के प्रतीक के तौर पर प्रयोग किया गया है, जो अपने प्रवाह को समय के साथ बदलता रहता है। इसके किनारे संस्कृतियां जन्म लेती हैं, मिटती हैं फिर बनती हैं। वहीद अख़तर कहते हैं- “उर्दू फ़िक्शन में इतना जानदार और अर्थपूर्ण गद्य शायद ही किसी और ने लिखा हो”।
इस नॉवेल के केंद्रीय पात्र हैं गौतम नीलम्बर दत्त, चम्पा, कमाल और साइरिल। गौतम वेदों के युग का एक छात्र है जो शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपना घर और ऐश-ओ-आराम छोड़कर आत्मिक शांति के लिए जंगलों में घूमता है। वह चम्पा को सरजू नदी के किनारे देखता है तो उसे पसंद करने लगता है। मगर चम्पा को परिस्थितियां एक फ़ौजी से शादी करने के लिए मजबूर कर देती हैं। आगे चलकर वो तवाइफ़ की चौधराइन बनने पर भी विवश हो जाती है जिस पर हर कोई जान छिड़कता है। आख़िरी उम्र में वह स्टेशन पर भीक माँगती है और गौतम की राह देखती है। हर दौर में चम्पा का नाम बदलता रहता है। चंपा वैदिक दौर में, चम्पावती इस्लामी दौर में, फिर चम्पा जां और आख़िर में चम्पा कमाल। गौतम का पात्र आरम्भ से अंत तक है मगर उस का रूप बदलता रहता है। कमाल एक ईरानी फ़लसफ़ी माँ का बेटा है जो ज्ञानियों और पंडितों का सम्मान करता है। नॉवेल के सभी पात्र भारत की विशिष्ट संस्कृति और परम्परा की नुमाइंदगी करते हैं। कुछ जागीरदाराना, कुछ ग़रीब, कुछ ख़ुश-हाल, कुछ हैरान परेशान पात्र आते-जाते हैं।
“आग का दरिया” गौतम नीलम्बर की दास्तान है जो चार कालखंडों में बांटी गयी है। पहला चंद्रगुप्त मौर्या का कालखंड यानी 400 बरस ईसा पूर्व, दूसरा लोधी सल्तनत का अन्त और मुग़लों के आगमन का दौर, तीसरा ईस्ट इंडिया कंपनी का दौर, चौथा और अंतिम दौर 1930 से 1950 तक। क़ुर्रतुल-ऐन हैदर ने इस नॉवेल में वेदांत की सोच, उपनिषदों की शिक्षा, बुद्धिस्ट दीक्षांत, हिंदू धर्म की भिन्न परंपराओं, मिस्र, बाबुल, यूनान के फ़लसफों को अपने लेखन का हिस्सा बनाया है। उनको इतिहास और भारतीय परंपराओं की बड़ी बारीक़ जानकारी थी।
नॉवेल में चेतना की धारा (stream of consciousness) की तकनीक का प्रयोग हुआ है इस तकनीक के तहत कहानी एक ही समय में विभिन्न दिशाओं में चलती है। इस नॉवेल के आते ही पाकिस्तान में हंगामा शुरू हो गया, जिसके कारण क़ुर्रतुल-ऐन हैदर फ़ौरन भारत वापस आ गयीं। यहां पत्रकारिता करती रहीं। Imprint व Illustrated Weekly से सम्बद्ध रहीं। अफ़साने, नॉवेल लिखती रहीं और साहित्यिक अनुवाद भी किये। 300 साल की मुद्दत तक फैले इस नॉवेल में भारतीय उपमहाद्वीप के ढाई हज़ार बरस के इतिहास को समाहित किया गया है।
क़ुर्रतुल-ऐन हैदर
20 जनवरी 1927 को अलीगढ़ में पैदा हुईं। उनके पिता सय्यद सज्जाद हैदर यल्दरम और माता नज़र सज्जाद हैदर थीं। पहले नीलोफ़र नाम था। लोग उन्हें प्यार से “ऐनी” कहते थे। पिता को बतौर कहानीकार काफ़ी प्रसिद्धि हासिल थी और लघु कहानियों का जनक होने का श्रेय भी। उनकी माताजी ने भी कई नॉवेल लिखे थे। सात बरस की उम्र में पहली कहानी लिखने वाली क़ुर्रतुल-ऐन हैदर को साहित्य अकादमी, सोवियत लैंड, ज्ञानपीठ एवं इक़बाल सम्मानों से नवाज़ा गया। 1985 में पद्मश्री और 2005 में पद्मभूषण से भी। उनकी कुल किताबों की संख्या 30 से ऊपर बतायी जाती है। उन्होंने बहुत कम समय में प्रसिद्धि की बुलंदी छू ली। देहांत 21 अगस्त 2007 को नॉएडा में हुआ और वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया के क़ब्रिस्तान में दफ़्न हैं।

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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