
- July 30, 2025
- भवेश दिलशाद
- 1
भवेश दिलशाद की कलम से....
तुम हमसे दो हाथ आगे निकले... क़तरा-क़तरा फ़हमीदा रियाज़
फ़हमीदा रियाज़ की याद आती है, तो ‘क़तरा-क़तरा’ उठा लेता हूं। एक किताब जो इस सदी के शुरू होते हाथ लगी थी। ‘क़तरा-क़तरा’, सन 2000 में छपा पहला संस्करण। इसमें आख़िरी नज़्म दर्ज है ‘नया भारत’। यह नज़्म यक़ीनन फ़हमीदा रियाज़ ने पिछली सदी में लिखी थी। शायद पिछली सदी के आख़िरी दशक में लिखी हो, जब 1992 गुज़र चुका हो! जब पाकिस्तान बनने की सनक हिंदुस्तान के सर चढ़कर बोल रही हो!
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गँवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई..!
“क्या हाल बना लिया है अपने मुल्क का? हम तो तुम्हारी मिसालें देते थे..” हिंदोस्तान से शायर सैफ़ महमूद जब 2017 में कराची पहुंचे तब फ़हमीदा रियाज़ ने उन्हें देखकर अपनी मायूसी को ये अल्फ़ाज़ पहनाये। एक मुल्क जो जहालत, धर्मांधता, पीछे की सोच, कट्टरता, झूठ, हिंसा, तानाशाही जैसे बहुत-से अज़ाबों में बर्बाद हो रहा था, वहां चन्द लोग थे जो पड़ोसी देश भारत को अपना ख़्वाब बना रहे थे। देख रहे थे कि लकीर के उस तरफ़ तो एक अलग दुनिया है।
हम जिस पर रोया करते थे
बात वही अब तुमने भी की…
कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आई
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
हम दो क़ौम नहीं थे भाई
दोनों मुल्कों में सूरज साथ उगता और ढलता है लेकिन एक तरफ़ रात इतनी लंबी और काली है और एक तरफ़..! ख़्वाब देखने की दिक़्क़त यह है कि जब एक तरफ़ कुआं, एक तरफ़ खाई वाली नौबत हो तो आसमान का ख़याल नहीं आता, सपना यही होता है कि एक सीधी-सादी सड़क, ठीक-ठाक रास्ता मिल जाये बस। पाकिस्तान में कुछ लोग बस यही देख रहे थे कि लकीर के उस तरफ़ ज़िंदगी इस जहन्नुम से बेहतर है। फिर..?
पाकिस्तान से लड़ते-लड़ते भारत ने कब ख़ुद को पाकिस्तान बना लिया, कोई लमहा या कोई दिन तो तय नहीं किया जा सकता, बस यह गिरने और गिरते चले जाने का सिलसिला रहा। और पाकिस्तान ही क्यूं, भारत ने एक सतह पर ख़ुद को कितना अमरीका बना लिया, कितना रूस और… नये भारत में जाने कितने भारत हैं, कहना मुश्किल हो गया है। नये भारत की त्रासदी अब और भी नयी है।
माथे पर सिन्दूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा
क्या हमने दुर्दशा बनाई
कुछ भी तुमको नज़र न आई
भीम ने दो टांगों से फाड़कर जरासंद के दो टुकड़े कर दिये थे, हाल उससे भी बुरा है। हमारा एक पैर अतीत की तरफ़ इतनी बुरी तरह खींचा गया और दूसरा भविष्य की तरफ़ कि देश दो-फाड़ हो चुका। यह खिंचाव लगातार बना हुआ है। हर टुकड़े के और भी टुकड़े होते जा रहे हैं। चौबीस घंटे एक तमाशा जारी है और देश को सिर्फ़ तमाशबीन बनाकर छोड़ दिया गया है।
एक जाप-सा करते जाओ
बारम्बार यही दोहराओ
‘कैसा वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था भारत’
भारत अब वर्तमान से भविष्य की यात्रा के बजाय आज से गुज़रे कल की तफ़रीह ज़ियादा कर रहा है। आप माज़ी के गौरवगान में इतने मसरूफ़ हैं कि ‘सोने की चिड़िया’ वाले हवाई नारे आपको भाने लगे हैं।
प्रेत धर्म का नाच रहा है
क़ायम हिन्दू राज करोगे?
सारे उल्टे काज करोगे…
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिन्दू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी
फ़हमीदा जब ये मिसरे लिख रही थीं, तब वह भविष्य देख रही थीं। और अब हम देख रहे हैं कि शायर कितना कुशल भविष्यवक्ता हो सकता है।
‘विकसित भारत’ की उड़ान किस शाख़ से भरी जा रही है- ‘हिंदू ख़तरे में है’! भारत में यह भले ही ताज़ा नशा है, ठीक इसी तरह का धोका पाकिस्तान में बरसों पहले दिया जा चुका। फ़ौजी तानाशाही का ज़माना था और अवाम को नशे में रखने के लिए ‘इस्लाम ख़तरे में है’ की भांग पिलायी गयी थी। तब वहां एक अवामी शायर थे हबीब जालिब, उन्होंने इस फ़रेब को अपनी नज़्मों में नंगा कर दिया था:
अम्न का परचम लेकर उठो हर इंसाँ से प्यार करो
अपना तो मंशूर है जालिब सारे जहाँ से प्यार करो
ख़तरा है दरबारों को, शाहों के ग़मख़ारों को
नव्वाबों, ग़द्दारों को, ख़तरे में इस्लाम नहीं
जालिब के इस मिसरे ‘इस्लाम’ की जगह सिर्फ़ ‘हिंदुत्व’ रखना है, बाक़ी यह पूरी नज़्म वैसी की वैसी ही अब यहां मंसूब हो जाती है। माने पाकिस्तान की इतनी पिछलग्गू है भारत की सियासत? और देश की जनता? फ़हमीदा की नज़्म में जो बात पोशीदा है और इस दौर में जो ज़ाहिर है, वो यह कि ‘नया भारत’ बोलते/सुनते ही ‘बोसीदा पाकिस्तान’ क्यूं सुनायी देता है! यह तब होता है जब आंकड़े दिये जाते हैं कि पहले इतने स्कूल थे अब इतने हो गये, पहले इतने आईआईटी थे अब इतने हो गये… फिर देश में वैज्ञानिक सोच क्यूं नहीं बढ़ रही? जागरूकता और तमीज़ और मोहब्बत क्यूं नहीं पनप रही… यानी ये बस आंकड़े हैं। असल में आपको उसी मूरखता और उसी घामड़पन के पाठ परोसे जा रहे हैं, जिसमें पाकिस्तान जैसे देशों ने एक उम्र गंवा दी।
भाड़ में जाये शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना
आगे गड्ढा है यह मत देखो
लाओ वापस, गया ज़माना
शिक्षा-विक्षा तो ऐसी भाड़ में गयी कि कला और बुद्धिजीवी वर्ग तक इस तमाशे का समर्थक दिखने लगता है। मीडिया, सिनेमा, थिएटर, साहित्य… सबको जाने एक लक़वा मार गया है। सब पीछे देखते हुए लग रहे हैं..! आगे जंग ही जंग है। लहूलुहान युद्धस्थलों की चीख-पुकार है, ख़ून-ख़राबा है। नवाज़ देवबंदी के मिसरे गूंज रहे हैं-
जलते घर को देखने वालो फूस का छप्पर आपका है
आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुक़द्दर आपका है
उसके क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरी बारी अब आयी
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नम्बर आपका है
ग़ाज़ा से जिस तरह भूख, प्यास से मर रहे बच्चों/औरतों की तस्वीरें रुला रही (कितना भारत रोया?) हैं, वह दिन दूर नहीं जब हम बहुत पास यह सब देखें, अगर इसी तरह जहालत को अपना नैशनल कैरेक्टर बनाये रखने पर आमादा रहे।
हम तो हैं पहले से वहाँ पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ वहाँ से
चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना
नफ़रत इतनी हावी है कि हम पथरा चुके हैं। बच्चों को मरता देखकर भी हम युद्धनीति, कूटनीति के बारे में सोचते हैं! हमारे अहसास पिघलते नहीं। सैफ़ ने लिखा था जब उन्होंने फ़हमीदा रियाज़ से कहा कि आपकी नज़्म “तुम भी हम जैसे निकले भाई..” भारत पर अब तो बहुत मौज़ू हो गयी है, तब फ़हमीदा ने कहा, “अब तो इस नज़्म को बदल देना चाहिए, इस तरह कहना चाहिए कि तुम तो हमसे भी दो हाथ आगे निकले!”
अफ़सोसनाक हक़ीक़त है। हम बेहतर थे, बहुत बेहतर। पड़ोस में जो जहन्नुम था, वहां के मासूम, लाचार हमें अपना ख़्वाब बनाये हुए थे। हमने उन्हें मायूस तो किया ही अपना किर्दार तक तबाह कर लिया, अपने हाथों अपना नरक बना लिया…
रहनुमा राहबर कितना भटकाएंगे
सब जहन्नुम में हैं अब कहां जाएंगे’ (-भवेश दिलशाद)
पाकिस्तान और उसके पीछे की ताक़तें अपने मंसूबे में शायद ख़ुद को कामयाब समझें कि अब एक मुल्क है, जो जहालत, धर्मांधता, पीछे की सोच, कट्टरता, तानाशाही, झूठ, हिंसा जैसे जाने कितने अज़ाब झेल रहा है!
मैं बात करता हूं फ़हमीदा रियाज़ से कि अब यहां से क्या कोई हल नहीं..! ‘क़तरा-क़तरा’ में ही ‘पूर्वा-आंचल’ नज़्म की तरफ़ वह इशारा करती हैं:
जहां हों नफ़रत के घमसान
नहीं रहे उस जा भगवान
नहीं करता है नज़र रहीम
नहीं करते हैं फेरा राम
तुम्हारी मिन्नत करता है
ख़ाक पर सीस झुकाता है
‘कबीरा’ कुछ समझाता है…
अड़े जब दो फ़िरक़ों की आन
तुले हों दे देने पर जान
है असली जीत की ये रीत
कि दोनों जाएं बराबर जीत
हुई जिस युद्ध में एक की हार
वो होता रहेगा बारम्बार
न दोनों जब तक मिट जाएं
न दोनों जाएं बराबर हार
फ़हमीदा की एक नज़्म सटीक भविष्यवाणी साबित हो चुकी है, क्या यह भी हो सकती है? इससे पहले कि हम सब हार जाएं, इससे पहले की जंग की सनक जीत जाये, इससे पहले कि ये ज़मीन लकीर के एक तरफ़ चिता और एक तरफ़ क़ब्र बनती चली जाये… कबीरों की सुनें- जालिबों, फ़हमीदाओं की सुनें।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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क्या कहने!
दो असाधारण मिसरे कोट कर रही हूँ,,
“सब जहन्नुम में हैं अब कहाँ जाएँगे,,,”
,,
कि दोनों जाएँ बराबर जीत,,