
- August 14, 2025
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डॉक्टर आज़म की कलम से....
यौम-ए-आज़ादी (स्वतंत्रता दिवस) और उर्दू किताबें
स्वतंत्रता दिवस, देश विभाजन, आज़ादी के बाद के भारत और पाकिस्तान को केंद्र में रखकर कई उर्दू नॉवेल और किताबें लिखी गयी हैं, जिनमें तक़सीम-ए-हिंद (भारत विभाजन), जंग-ए-आज़ादी और इसके प्रभाव को विषय बनाया गया है। इन नाविलों में आज़ादी के जज़बे, क़ुर्बानियों और उस दौर के समाजी और सियासी हालात का चित्रण किया गया है। ऐसे नोवेलों और किताबों की एक ना-मुकम्मल सूची निम्नानुसार है…
“बस्ती”
ये इंतिज़ार हुसैन का लिखा हुआ एक मशहूर नॉवेल है जो तक़सीम-ए-हिंद के विषय पर है। इंतिज़ार हुसैन 21 दिसंबर 1925 को डीबाई ज़िला बुलंदशहर में पैदा हुए। मेरठ कॉलेज से बी.ए. और एम.ए. उर्दू किया। क़याम-ए-पाकिस्तान के बाद लाहौर में मुंतक़िल हो गये और सहाफ़त (पत्रकारिता) विभाग से वाबस्ता हो गये। उन्होंने कई नॉवेल और अफ़साने लिखे।
इस उपन्यास में उपन्यासकार पात्रों के माध्यम से तहज़ीबों (संस्कृतियों) को बयान करते हैं। भगत जी के ज़रिये हिंदू तहज़ीब और अम्मां जी के ज़रिये मुस्लिम तहज़ीब। इसमें हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों का अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत, जलियांवाला बाग़, अमृतसर के पेट्रोल पंप का वाक़िया और 1857 के ग़दर की दास्तान भी शामिल है। हिज्रत का भी दुखड़ा बयान किया गया है। इसमें ढाका विभाजन को भी दर्शाया गया है।
“ख़ुदा की बस्ती”
शौक़त सिद्दीक़ी का लिखा हुआ है यह उपन्यास भी तक़सीम-ए-हिंद की पृष्ठभूमि में लिखा गया है। शौक़त सिद्दीक़ी का ये नॉवेल उर्दू ज़बान के मशहूर नाविलों में से एक है, जो 1958 में पहली बार प्रकाशित हुआ। अब तक 50 से अधिक संस्करण सामने आ चुके हैं और इसका ड्रामाई रूपांतरण भी हो चुका है। 26 से अधिक भाषाओं में अनुवाद भी।
शौकत सिद्दीक़ी ने इस नॉवेल में समाज के उस वास्तविक चित्रण की परम्परा को आगे बढ़ाया है, जिसकी आधारशिला प्रेमचंद थे। आज़ादी, तक़सीम-ए-हिंद, आज़ादी से पहले के हिन्दोस्तान और विभाजन के बाद के हिंदुस्तान व पाकिस्तान के हालात को बड़ी सच्चाई से बयान किया है। मज़हब और गणतंत्र को ढाल बनाकर हर तरह की हवसपरस्ती और धोखाधड़ी को बे-नक़ाब किया है।
“दस्तक न दो”
अलताफ़ फ़ातिमा का ये नाविल तक़सीम-ए-हिंद से पहले के चंद सालों और बाद के दौर की समस्याओं और त्रासदियों को बयान करता है। विभाजन पूर्व भारत के शानदार अतीत का वर्णन है। हिंदू और मुसलमान जहां मिल-जुल के रहते थे। आज़ादी के आस-पास के दौर की ये विस्तृत तस्वीर पेश करता है।
अल्ताफ़ फ़ातिमा उर्दू की अहम अफ़साना और नॉवेल निगार और अनुवादक थीं। पैदाइश 10 जून 1927 लखनऊ और वफ़ात 29 नवंबर 2018 में 91 साल की उम्र में लाहौर में हुई। आपने चार नावेल लिखे निशान-ए-महफ़िल 1960, दस्तक न दो 1964, चलता मुसाफ़िर 1980, ख़ाबगर 2008।
“उदास नस्लें”
अब्दुल्लाह हुसैन का ये उपन्यास भी आज़ादी और विभाजन के विषयों पर लिखा गया एक इतिहास आधारित नावेल है जो पहली बार 1963 में प्रकाशित हुआ। पचास से ज़्यादा ऐडीशन छप चुके हैं।
कहानी का प्रारंभ 1897 की जंग-ए-आज़ादी से होता है। जिसमें जागीरदाराना मानसिकता, कांग्रेस की सियासत और इंडियन मुस्लिम लीग की कशमकश, जलियांवाला बाग़ क़त्ल-ए-आम, मुस्लिम पहचान का सवाल, दूसरे विश्वयुद्ध और इसका भारत पर प्रभाव, हिन्दोस्तान में आज़ादी के प्रयास और पराक्रम, तक़सीम-ए-हिंद के फ़सादात और पाकिस्तान निर्माण के हालात को उजागर किया गया है। अब्दुल्लाह हुसैन 14 अगस्त 1931 मैं पैदा हुए चार जुलाई 2015 में इंतिक़ाल हुआ।
“आख़िर-ए-शब के हमसफर”, “मेरे भी सनम-ख़ाने, “आग का दरिया”
ये सारे उपन्यास कुर्रतुल-ऐन हैदर के लिखे हुए हैं। उनमें तक़सीम-ए-हिंद और आज़ादी के विषयों को छेड़ा गया है। पहले में बाक़ौल नावेल निगार बंगाल की दहशत पसंदी और इन्क़िलाबी तहरीक, 1942 का आंदोलन, पाकिस्तान की मांग, तक़सीम-ए-हिंद और बंगलादेश बनने के परिप्रेक्ष्य में लिखे हुए इस नावेल के तमाम किरदार क़तई फ़र्ज़ी हैं।
दूसरे नावेल का आधार भी भारत विभाजन है। “आग का दरिया” उर्दू अदब का सबसे मशहूर नावेल है, जिसमें हिन्दोस्तान के इतिहास और संस्कृति के ढाई सौ साल को समेटा गया है।
कुर्रतुल-ऐन हैदर 20 जनवरी 1926 में उतर प्रदेश के शहर अलीगढ़ में पैदा हुईं। उनके वालिद सज्जाद हैदर यल्दरम उर्दू के पहले अफ़्साना निगार माने जाते हैं। “आख़िर-ए-शब के हमसफ़र” के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया। भारत सरकार ने पद्मश्री और पद्मभूषण से सुशोभित किया। उनकी वफ़ात 21 अगस्त 2007 को नोएडा में हुई और जामिआ मिल्लिया इस्लामीया देहली के क़ब्रिस्तान में दफ़न हैं।
इन नाविलों के इलावा कई और भी उर्दू नाविल हैं जो यौम-ए-आज़ादी और इससे संबंधित विषयों पर लिखे गये हैं। ये नाविल उर्दू अदब में एक अहम मुक़ाम रखते हैं और पाठकों को आज़ादी की लड़ाई और इसके संघर्षों को समझने में मदद देते हैं।
उर्दू में बाकायदा यौम-ए-आज़ादी पर भी किताबें लिखी गयी हैं। ख़ास तौर से नयी नस्ल को इसकी महत्ता और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से अवगत करने के लिए। कुछ नाम इस तरह हैं:
- “हमारी आज़ादी”, “आज़ादी ए हिंद” मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (इंडिया विंस फ़्रीडम का उर्दू अनुवाद)
- “आज़ादी की छांव में” बेगम अनीस क़िदवई
- “आज़ादी की कहानी” ग़ुलाम हैदर
अलावा इनके “आज़ादी की तारीख़”, “आज़ादी में उल्मा का हिस्सा, “आज़ादी में मुसलमानों का हिस्सा” मज़ीद पढ़ने योग्य किताबें हैं। हिन्दुस्तानी गंग-ओ-जमुनी तहज़ीब और क़ौमी एकता की अहमियत को उजागर करने वाली अनगिनत किताबें मौजूद हैं। इनमें हर मज़हब का सम्मान करने का पाठ मिलता है साथ ही हर मज़हब की नुमाइंदगी, शायरी के माध्यम से की गयी है। इस श्रेणी में सबसे मशहूर किताब है- “हिंदुस्तां हमारा”, जो दो जिल्दों में है। इसे संकलित किया है जाँ निसार अख़्तर ने। हिन्दुस्तानी बुक ट्रस्ट से पहला भाग (526 पृष्ठ) पहली बार जून 1973 में और दूसरा भाग (536 पृष्ठ) सितंबर 1974 में प्रकाशित हुआ। इनमें उर्दू ज़बान की राष्ट्र को समर्पित नज़्मों का इंतिख़ाब है।
“उर्दू शायरी में क़ौमी यकजहती के अनासिर” संकलनकर्ता सय्यद मुजाविर हुसैन (उतर प्रदेश उर्दू अकैडमी, “तहरीक-ए-आज़ादी में उर्दू का हिस्सा” संकलन नासिर नक़वी (हरियाणा उर्दू अकैडमी), “शहीदान-ए-आज़ादी” चीफ़ ऐडीटर डाक्टर पी.एन. चोपड़ा, अनुवादक भगवंत सिंह (नैशनल अकैडमी)… ये कुछ और किताबें भी अहम हैं।
बहरहाल आज़ादी की पृष्ठभूमि में उर्दू ज़बान में अनगिनत किताबें हैं। आवश्यकता है तो उन्हें ढूंढकर पढ़ने और राष्ट्रीय भावनाओं से सरशार होने की। मेरी तरफ़ से हर हिन्दुस्तानी को यौम-ए-आज़ादी की दिली मुबारकबाद!

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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