वैन गॉफ़

वैन गॉफ़: पूंजीवाद-विरोधी कलाकार

वैन गॉफ़ की “द पटैटो ईटर्स” अपेक्षाकृत अलग है उस धारणा से जो उनकी ज़्यादा लोकप्रिय पेंटिंग के बारे में हमारी रही है। यह पेंटिंग नीदरलैंड में बनायी गयी उनकी “स्टिल लाइफ़” पेंटिंग के शुरूआती उदाहरणों में से एक है और उनकी बाक़ी विशिष्ट, सतर्कतापूर्ण और नवाचारी कला तकनीकों का प्रयोग इसमें नहीं है। यह “स्टिल लाइफ़” सीरीज़ (लगभग 1885) उनके “कृ​षक चरित्र अध्ययन” (लगभग 1883) के साथ ओवरलैप होती है, जिसमें अक्सर इन पेंटिंग के मुख्य विषय के रूप में ‘किसान’ को दिखाया जाता है। वैन गॉफ़ ने गहरे और मिट्टी के रंगों के साथ ‘प्रयोग’ किया, जो पेंटिंग के भीतर की विषयवस्तु के साथ प्रकाश की उपस्थिति और प्रभावों को दर्शाने के लिए रहा।

सौंदर्य की दृष्टि से, पेंटिंग में हरे, काले और भूरे रंग के गहरे रंगों का उपयोग किया गया है इसलिए यह पेंटिंग फीकी और म्यूट टोन में नज़र आती है। तस्वीर में सभी पात्र एक दूसरे से नज़र मिलाने से बचते दिखते हैं, वैन गॉफ़ ने ऐसा करके छवि के भीतर एक ख़ामोशी को दर्शाया है। आसपास की वस्तुओं के साथ प्रकाश और छाया के प्रभाव को उभारने के लिए गहरे रंगों और छटाओं का प्रयोग कर वैन गॉफ़ ने श्रमिक वर्ग के सांसारिक जीवन पर रोशनी डाली है।

वैन गॉफ़ की ‘स्टिल लाइफ़’ शृंखला को स्वीकार करने में समाज ने एक अनिच्छा जतायी थी, जिसके कारण ‘यथार्थवाद’ का अस्तित्व शुरू हुआ लेकिन ‘प्रभाववाद’ की अस्वीकृति के रूप में, जो उस समय पश्चिमी कला का पहला फ़ोकस था। हुआ यह कि ‘किसान चरित्र’ पर काम करना और उस समय बेच पाना मुश्किल हो गया। आरोप लगाया गया कि ‘रंग पट्टिका अत्यधिक गहरी’ थी कारण थी, जिससे इन तस्वीरों को बेचने में कठिनाई हुई। और ये रंग प्रभाववादियों से बिल्कुल मेल न खाते थे।

हालांकि, मेरा मानना ​​है कि मूल प्रश्न केवल रंग के बारे में नहीं है, बल्कि इस बारे में है कि क्या मुद्दा बहुसंख्यकों के जीवन को दर्शाने वाले यथार्थवाद के व्यापक फ़ोकस में निहित है, विशेष रूप से उन लोगों के जीवन को जिन्हें पहले समाज द्वारा अनदेखा किया गया था– श्रमिक वर्ग। “द पटैटो ईटर्स” मज़दूरों के स्थिर, सांसारिक अस्तित्व को चित्रित करता है, जो समाज के एक ऐसे हिस्से पर प्रकाश डालता है, जिसे आमतौर पर कला की दुनिया द्वारा अनदेखा किया जाता रहा।

कार्ल मार्क्स के अनुसार, वर्ग विभाजन को मूल रूप से संसाधनों, विशेष रूप से उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व के ज़रिये परिभाषित किया जाता है। मार्क्सवादी सिद्धांत वर्ग स्तरीकरण में अन्य कारणों की पड़ताल करते हुए श्रम शक्ति और दूसरों के श्रम को नियंत्रित करने की क्षमता की अवधारणा को उकेरता है। सुझाव देता है कि वर्ग केवल वित्तीय स्थिति से ही निर्धारित नहीं होता है, बल्कि संपत्ति के स्वामित्व और श्रम को नियंत्रित करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है।

“लाभ के लिए उत्पादन” के अंजाम क्या हो सकते हैं, इसके दृश्य प्रतिनिधित्व के रूप में “द पटैटो ईटर्स” महत्वपूर्ण है। यह उन लोगों के प्रत्यक्ष श्रम को चित्रित करता है, जो भूमि पर काम करते हैं, अनिवार्य रूप से अपनी श्रम शक्ति बेचते हैं। हालांकि, उनके परिश्रम के बावजूद, उन्हें सबसे कम लाभ मिलता है। विडंबना यह कि खेती और इकट्ठा करने के बाद, श्रमिक वर्ग को फिर सुपरमार्केट जाना पड़ता है और दिये गये वेतन से उन्हें अपने ही श्रम से उत्पादित चीज़ें उनसे ख़रीदना होती हैं, जिन्हें एक तरह से उन्होंने ही बेची थीं। यह पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर शोषण की चक्रीय प्रकृति को रेखांकित करता है।

 

क्या श्रमिक वर्ग का जीवन वास्तव में कभी संतोषजनक हो सकता है?

 

(विन्सेंट वैन गॉफ़ को वैन गो या वैन होह भी पुकारा जाता है। वह 19वीं सदी में नव प्रभाववाद या प्रभाववादोत्तर प्रमुख कलाकारों में शुमार रहे हैं। मीडियम के लिए दग्रेटफ़ाड द्वारा मूलत: अंग्रेज़ी में लिखित लेख का अनुवाद : भवेश दिलशाद)

2 comments on “वैन गॉफ़: पूंजीवाद-विरोधी कलाकार

  1. लेख भी बहुत अच्छा है।
    अनुवाद सराहनीय है।

  2. लेख भी बहुत अच्छा है।
    अनुवाद सराहनीय है।

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