विविधता और ताज़गी का अहसास

विविधता और ताज़गी का अहसास

        “दूध की जाति” आलोक कुमार मिश्रा का पहला कहानी संग्रह है। आलोक मूलतः कवि हैं।आपने बच्चों के लिए भी कविताएँ लिखी हैं और उनका बाल-कविता संग्रह ‘क्यों तुमसा हो जाऊँ मैं’ सम्मानित हुआ है। कविताओं की विवेचना और मूल्यांकन पर आप लगातार लिखते रहे हैं।

      इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इन कहानियों में विविधता है। अधिकतर कहानियों का परिवेश ग्रामीण जीवन है, जो उनके मानस में रचा-बसा है। अंचल विशेष के लोक-जीवन से उठाये गये कथानक स्थानीय संस्कृति से परिचय कराते हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए एक ताज़गी का एहसास होता है।

      संग्रह की शीर्षक कहानी ‘दूध की जाति’ दलित और सवर्ण जातियों के परस्पर संबंधों पर आधारित है, जो विशेषकर गांव के जीवन में हर क़दम पर दिखायी देता है। इसे पढ़ते हुए बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में लगभग इसी तरह के कथानक पर लिखी गयी प्रेमचंद की कहानी ‘दूध का दाम’ याद आती है। आज इक्कीसवीं सदी में भी जाति समीकरण नहीं बदले हैं। अस्पृश्यता का रूप बदल गया है लेकिन मानसिकता नहीं बदली है। कहानी में परमेसर की मिसिराइन के चार बच्चे हुए लेकिन कोई जीवित नहीं। एक साल के भीतर काल कवलित हो जाते हैं। अब पांचवी संतान को जन्म देते समय मिसिराइन स्वर्ग सिधार जाती है। नवजात शिशु जीवित रहे, इसके लिए प्रचलित टोटके के कारण परमेसर प्रसव कराने वाली गोड़इताइन को, जो परंपरागत रूप से अछूत जाति की है, अपना बालक पालन-पोषण के लिए सौंप देता है। बच्चा भी गोड़इताइन को ही माँ समझता है। एक दिन गांव में दलित-सवर्ण के झगड़े में गोड़इताइन की कुएँ में गिर कर मौत हो जाती है। बाद में माँ को ढूँढ़ते हुए वह बालक भी कुएँ में गिर कर मर जाता है।

        कहानी में जातिगत माहौल का सशक्त चित्रण है लेकिन इसके साथ लेखक ने कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु भी उठाये हैं। मसलन, बच्चे जिंदा नहीं रहते तो मिसिराइन जल्दी जल्दी गर्भधारण करने को विवश है, जो उसके स्वास्थ्य की क़ीमत पर है। प्रसव के दौरान दर्द से चीखती हुई मिसिराइन को औरतों की नसीहत- “एतना आवाज न निकारो, बाहर मरद बैठे हैं।” दिलचस्प बात यह कि ब्राह्मण की संतान को जीवित रखने का टोटका उसे अछूत जाति के परिवार को ही प्रतीकात्मक रूप से बेचना है। यानि सुरक्षा कवच छोटी जात का और आम जीवन में उनका स्पर्श भी वर्जित। पूरे सामाजिक पाखंड को उजागर करती यह एक महत्वपूर्ण दलित विमर्श की कहानी है।

       इसके विपरीत ‘भोलेबाबा’ कहानी में सामूहिक जीवन है, जहाँ पुरानी पीढ़ी की समझदारी से माहौल में सांप्रदायिक तनाव नहीं पनपता और भोलेबाबा का मंदिर स्थानांतरित हो जाता है। ‘मंझली फरार है’ स्त्री जीवन की त्रासदी पर आधारित है, जहां निस्संतान होना एक अभिशाप है और इसका ज़िम्मेदार केवल पत्नी को समझा जाता है। एक ओर परिवार का दबाव और दूसरी ओर भविष्य की असुरक्षा के बीच स्त्री द्वारा लिया गया निर्णय उसे अर्थवान बनाता है। इसी तरह स्त्री केंद्रित ‘तन भीतर मन’,  ‘मुँहनोचनी’,  ‘बुआ चली गयी’  कहानियाँ  ग्रामीण समाज की पृष्ठभूमि में जीवन के विविध पक्षों पर हैं, जहां स्त्री जीवन की त्रासद स्थितियाँ लेखकीय संवेदना का हिस्सा बनती हैं। इन कहानियों का सशक्त पक्ष इनकी भाषा है। पूर्वांचल की भाषा का सधा हुआ प्रयोग संवादों में हुआ है और ये कथानक में महक की तरह हैं।

         एक सिद्धहस्त कथाकार के रूप में आलोक कुमार मिश्रा पाठकों के बीच उपस्थित होते हैं।उनके अगले कहानी संग्रह की प्रतीक्षा है।

नमिता सिंह

नमिता सिंह

लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।

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