
- August 24, 2025
- आब-ओ-हवा
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केन्द्रीय विधानसभा के अध्यक्ष रूप में प्रथम भारतीय के निर्वाचित होने के शताब्दी वर्ष पर विशेष टिप्पणी...
प्रमोद दीक्षित मलय की कलम से....
अध्यक्षीय आसंदी पर विट्टलभाई पटेल ही थे, जब भगत सिंह ने फेंका था बम
24 अगस्त, भारतीय राजनीतिक इतिहास की गौरवशाली गरिमामय परम्परा का स्मरणीय दिवस, जब कोई भारतीय निर्वाचित होकर अंग्रेज़ी सत्ता की नीति निर्धारक संस्था सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली की अध्यक्षीय पीठ पर विराजमान हुआ था। मैं स्मरण कर रहा हूं, 24 अगस्त 1925 की उस महत्वपूर्ण घटना को जब बैरिस्टर, प्रखर वक्ता, विचारक और स्वराज्य पार्टी के सह-संस्थापक तथा वल्लभभाई पटेल के अग्रज विट्ठलभाई पटेल सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली (केंद्रीय विधानसभा, जिसे अब लोकसभा कहा जाता है) के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हो शपथ ग्रहण की थी। यह असेम्बली के गठन हेतु द्वितीय आम चुनाव था।
यह उल्लेख करना भी समीचीन होगा कि तब केंद्रीय विधानसभा के अध्यक्ष को प्रेसीडेंट और उपाध्यक्ष को वाइस प्रेसिडेंट कहा जाता था। प्रथम वाइस प्रेसिडेंट सच्चिदानन्द सिन्हा थे। आज देश किसी भारतीय के रूप में विट्ठल भाई पटेल के केंद्रीय विधानसभा के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने का शताब्दी वर्ष गर्व, गरिमा और गम्भीर उत्साह-उल्लास से मना रहा। स्मरणीय है कि 22 अगस्त, 1925 को हुए चुनाव में स्वराज्य पार्टी के प्रत्याशी विट्ठलभाई पटेल ने अंग्रेज़ समर्थित दीवान बहादुर टी. रंगाचारी को 54 के मुकाबले 56 मत प्राप्त कर पराजित किया था और 1902 में निर्मित वाइसरीगल लॉज (वायसराय का आवास सह कार्यालय) में आयोजित असेम्बली में 24 अगस्त, 1925 को अध्यक्ष पद की शपथ ली थी। वह अध्यक्ष पद पर अप्रैल 1930 तक रहे। तब अध्यक्ष का कार्यकाल एक वर्ष का होता था और आम चुनाव तीन वर्ष में होते थे। वाइसरीगल लॉज सन् 1933 में दिल्ली विश्वविद्यालय को दे दिया गया।
विट्ठलभाई पटेल का सबसे महत्वपूर्ण कार्य असेम्बली की बैठक के लिए अलग सचिवालय बनवाने का था। अध्यक्ष पीठ पर आसीन होने के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर दिल्ली विधानसभा में 24 अगस्त, 2025 को आयोजित भारत के राज्यों की विधानसभाओं के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष एवं विधानपरिषदों के सभापति और उप सभापतियों के सम्मेलन में गृहमंत्री अमित शाह विट्ठलभाई पटेल पर एक स्मारक डाक टिकट का अनावरण करेंगे।
राजनीति और इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि ईस्ट इंडिया कम्पनी के राबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के विरुद्ध 23 जून, 1757 को प्लासी युद्ध लड़ा गया और कंपनी ने नवाब को हराकर उसके सेनापति मीर जाफ़र को नवाब बनाया, जो कठपुतली नवाब सिद्ध हुआ, भारत में कम्पनी का शासन स्थापित हुआ। समय का पहिया अपनी गति से बढ़ता रहा और कंपनी का आधिपत्य क्षेत्र का विस्तार भी। वर्ष 1857, लाल क़िले तक सिमटकर रह गयी मुगल सत्ता के सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र के नेतृत्व में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया और मंगल पांडे फांसी पर चढ़ने वाले पहले क्रांतिकारी बन इतिहास के पृष्ठों में अमर हो गये। ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन-प्रशासन की बागडोर खींच कर ब्रिटेन के सम्राट ने अपने हाथों ले ली। वर्ष 1885 में अंग्रेज़ अधिकारी ए.ओ. ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना की और कांग्रेस के माध्यम से राजनीतिक गतिविधियां आरम्भ हुईं। वर्ष 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ किंतु 12 दिसम्बर, 1911 को आयोजित दिल्ली दरबार में जार्ज पंचम के आदेश से रद्द होकर पूर्ववत् स्थिति बहाल हुई। कांग्रेस में लाल, बाल, पाल की राष्ट्रवादी विचारधारा का उदय, 1915 में महात्मा गांधी का स्वदेश आगमन हुआ और देश भर में भ्रमण कर जनता से संवाद प्रारंभ किया। सन् 1917 में चंपारन सत्याग्रह से उपजा अंग्रेजों के विरुद्ध देशव्यापी आक्रोश। भारत में स्व-शासन की मांग बढ़ने लगी। अंग्रेज़ सरकार यह सब देख-समझ रही थी और आमजन और विद्रोहियों में अंग्रेज़ी सत्ता का भय और हनक बनाये रखने के लिए कड़े कदम उठा अत्याचार कर रही थी, तो राजनीति में रुचि रखने वाले समूहों को सुधार का झुनझुना भी पकड़ा रही थी। वर्ष 1919 में मॉन्टग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार बिल, जिसे भारत सरकार अधिनियम भी कहा गया और जिससे भारत सरकार में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने, इम्पीरियल लेजिस्लेटिव असेम्बली में द्विसदनीय व्यवस्था करने तथा प्रांतों में द्वैध शासन स्थापित करने सम्बंधी अधिनियम ब्रिटिश संसद में पारित हुआ और सम्राट जार्ज पंचम द्वारा 23 दिसम्बर, 1919 के आदेश से असेम्बली के गठन की प्रक्रिया गतिमान हुई। तब नवम्बर 1920 में पहली बार सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली की 145 सीटों ( 104 सीट सामान्य निर्वाचन, 41 सीट मनोनीत) आम चुनाव हुए और वायसराय द्वारा सर फ़्रेडरिक ह्वाइट असेम्बली के प्रथम अध्यक्ष नामित हुए, तत्पश्चात वर्ष 1923, 1926, 1930, 1935 और 1945 में आम चुनाव हुए। विधानसभा में रियासतों का कोई सदस्य नहीं था क्योंकि रियासतें ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थीं। वर्ष 1935 में निर्वाचन सम्बंधी एक व्यापक सुधार बिल पेश कर निर्वाचित सदस्यों की संख्या 250 और रियासतों, व्यापारियों, ज़मींदारों एवं अधिकारियों के लिए 125 मनोनीत सीटों की व्यवस्था की, किंतु इस व्यवस्था योजना पर कभी चुनाव नहीं हो सका। पहले आम चुनाव 1920 से ही कांग्रेस ने चुनावों का बहिष्कार किया था, किंतु 1935 के चुनाव में शामिल हुई और 42 सीटें जीतीं। राज्यों में सरकार बनायी।
केंद्रीय विधानसभा की इमारत वास्तव में अपने पुराने संसद भवन की इमारत ही थी, जिसकी नींव 12 फरवरी, 1921 को ड्यूक ऑफ कनॉट ने रखी थी और उद्घाटन 18 जनवरी, 1927 को वायसराय लार्ड इरविन ने किया था। इसी इमारत में सदन की कार्यवाही के दौरान 8 अप्रैल, 1929 को सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरोध में बम फोड़ पर्चे फेंककर इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे लगाये थे, तब अध्यक्षीय आसन पर विट्ठलभाई पटेल आसीन थे। नया संसद भवन बन जाने के पहले लोकसभा और राज्यसभा की बैठकें यहीं होती थीं।
यह भवन 19 सितम्बर, 2023 तक प्रयोग में था और अब संग्रहालय के रूप में शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण जगह बन गया है। क्रांतिकारियों के असीम बलिदान, आज़ाद हिंद फ़ौज के प्रयास और स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ती जन सामान्य की सहभागिता और द्वितीय विश्व युद्ध से उपजे हालात से ब्रिटेन ने भारत को स्वतंत्र करने का मन बनाया। तब भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अनुसार भारत की केंद्रीय विधानसभा और राज्य परिषद (प्रांतों की निर्वाचित असेम्बली) का अस्तित्व समाप्त हो गया और निर्वाचित भारतीय संविधान सभा केंद्रीय विधायिका बन गयी। 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली और 26 जनवरी, 1950 को गणतांत्रिक स्वरूप ग्रहण कर विश्व के सम्मुख विकास पथ पर बढ़ने लगा। एक सौ वर्ष की यह ऐतिहासिक यात्रा हमारी लोकतंत्र के प्रति गहरी समझ, आस्था और निष्ठा की परिचायक है। हमारे मन-मस्तिष्क लोकतंत्र के पावन भावों से सुरभित रहें, यही कामना है।

प्रमोद दीक्षित मलय
प्रमोद दीक्षित मलय की दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जबकि वह क़रीब एक दर्जन पुस्तकों का संपादन कर चुके हैं। इनमें प्रमुख रूप से अनुभूति के स्वर, पहला दिन, महकते गीत, हाशिए पर धूप, कोरोना काल में कविता, विद्यालय में एक दिन, यात्री हुए हम आदि शामिल हैं। कविता, गीत, कहानी, लेख, संस्मरण, समीक्षा और यात्रावृत्त लिखते रहे मलय ने रचनाधर्मी शिक्षकों के स्वैच्छिक मैत्री समूह 'शैक्षिक संवाद मंच' स्थापना भी 2012 में की।
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इस गरिमामय लेख में सम्मानित मलय जी ने अपने बेहतरीन विचारों के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन में जन सामान्य की महत्वपूर्ण भागीदारी और क्रांतिकारियों के अमर इतिहास का सजीव चित्रण किया है।