rekha song man anand chhayo
विवेक सावरीकर मृदुल की कलम से....

विजेता में 'आशा' का आनंद बरसाता अहीर भैरव

           पिछले दिनों बॉलीवुड के प्रख्यात कपूर ख़ानदान के एक और चश्मो-चराग़ जहान कपूर को वेब सीरीज़ “ब्लैक वारंट” में सहज अभिनय करते देखा और अचानक दशकों पूर्व उनके दादा शशि कपूर और पिता कुणाल कपूर अभिनीत फ़िल्म विजेता की याद ताज़ा हो आयी। पंजाबी पिता (शशि कपूर) और मराठी माँ (रेखा) के उलझे हुए रिश्तों में अपना अस्तित्व तलाशता पगधारी अंगद (कुणाल कपूर) अतंतः एयरफ़ोर्स में अपनी मंजिल पाता है। ये समानांतर जुमले से नवाज़ी गयी कला फ़िल्मों का दौर था। गोविंद निहलाणी, श्याम बेनेगल जैसे बड़े नाम तो थे ही, पर इनके साथ फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में समर्पित कला साधकों की एक चमकदार शृंखला थी। जैसे विजेता की ही बात लें तो इसमें शशि कपूर निर्माता थे। गोविंद निहलाणी का निर्देशन था, दिलीप चित्रे की पटकथा थी। पं. सत्यदेव दुबे के संवाद थे, अजीत वर्मन का संगीत और गीतकार थे “सांझ ढले गगन तले” और “मन क्यों बहका रे बहका” जैसे अनेक अर्थपूर्ण गीत लिखने वाले साहित्यकार वसंत देव। इस फ़िल्म के लिए उनके लिखे और प्रमुख रूप से रेखा पर फिल्माये गीत “मन आनंद आनंद छायो” को सुनना और इसके फ़िल्मांकन को देखना आज भी मन को अतीव आनंद से भर देता है।

अजीत सिंह वर्मन ने बांग्ला और हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में लंबे समय तक सहायक संगीतकार के तौर पर काम किया। बाद में उन्होंने 1975 से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में काम शुरू किया और वे निहलाणी की फ़िल्मों आक्रोश, अर्धसत्य, विजेता के संगीतकार के रूप में कला समीक्षकों की नज़रों में आये। अजीत वर्मन ने महेश भट्ट की प्रसिद्ध फ़िल्म सारांश का भी संगीत दिया। लेकिन इसके बाद दो-चार फ़िल्में और कुछ टीवी सीरियल्स का संगीत देते-देते कब वे नेपथ्य में चले गये, पता ही नहीं चला। सारांश में उनके स्वरबद्व दो गाने “अंधियारा गहराया” और “हर घड़ी ढल रही शाम ज़िंदगी” भूपेंद्र की आवाज़ में आज भी सुनने में अच्छे लगते हैं। लेकिन संभवतः किसी भी प्रसिद्ध नायक पर न फिल्माये जाने के कारण ये गाने अनसुने रहे।

हालांकि विजेता में रेखा ने इस गाने में जिस बारीक़ी से शास्त्रीय ख़याल गायन को निभाते हुए अदाकारी की है, उसका जवाब नहीं। पूरे परिवार की सुबह आशा भोसले की आवाज़ में अहीर भैरव के संक्षिप्त आलाप से होती है। गुलाबी ज़री किनोर की रेशमी धवल साड़ी में, बड़ी-सी बिंदी लगाये नीलिमा याने रेखा गा रही है। खुले लहराते बाल बताते हैं कि वो अभी-अभी नहाकर रियाज़ करने बैठी है। बहुधा गाढ़े मेकअप में दिखने वाली रेखा यहाँ एकदम हल्के-से पाउडर-काजल-बिंदी वाले घरेलू प्रसाधन में बहुत गरिमामयी और दैवीय लगती हैं। बिना तबले के आशा भोसले की खनकती आवाज़ में गाना शुरू होता है- “मन आनंद आनंद छायो, मिट्यो गगन घन अंधकार, अँखियन में जब सूरज आयो”…

जो बात रसिकों के दिलों में घर कर जाती है, वो है रेखा का एक-एक तान पर सात्विक भाव लिये विशुद्धता से होंठ हिलाना। उनका परफ़ेक्शन ‘दिल एक मंदिर’ में “हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे” में मीनाकुमारी या कोहिनूर में ‘मधुबन में राधिका नाची रे’ गाने में दिलीप कुमार साहब के सितार वादन के स्तर का है। अहीर भैरव राग का फ़िल्मों में ज़्यादातर इस्तेमाल उदासी भरे गीतों के लिए हुआ है। जैसे ‘मेरी सूरत, तेरी आँखें’ में मन्ना दा का गाया “पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई” या लता का गाया “मेरी वीणा तुम बिन रोये” (देख कबीरा रोया) आदि। पर अजीत वर्मन ने इस गाने में आनंद और भक्ति रस की एक साथ सृष्टि की है। गाने के दूसरे अंतरे में नीलिमा के गुरु तबले पर रियाज़ करवाते हैं। यहाँ हम परदे पर मराठी रंगमंच के मंझे हुए चरित्र अभिनेता दाजी भाटवड़ेकर को शास्त्रीय गायक पंडित सत्यशील देशपांडे की आवाज़ में अलंकार और पलटों का अभ्यास कराते देखते हैं.. ध नि सा रे नि सा धनि धम म… इसमें आशा भोसले मधनिसा धनिरेसा.. जोड़ते हुए बहुत ख़ूबसूरत गायकी की बानगी देती हैं। आश्चर्य नहीं कि आशाजी ने इस गाने को अपनी पसंदीदा बीस रचनाओं में स्थान दिया है।

अंतिम छंद अध्यात्मिकता से सराबोर है- “मानसरोवर मगन कंपन, नभदर्पन की झाँकी, ता में अबिकल अधखुल लोचन, प्राण हँस उतर आयो..” इस अंतरे की समाप्ति पर अंगद की बजाई कॉलबैल भी गाने के साथ बजती है और फ़ौजी बेटे के घर लौटने का आनंद पूरे दृश्यबंध में अंकित हो जाता है। गोविंद निहलाणी के कैमरे ने कमाल की वातावरण सृष्टि की है। हॉल में रियाज़ करती नीलिमा, पीछे से चाय की ट्रे लेकर निहाल के कमरे में दबे पाँव जाता नौकर, दादी दीना पाठक का गुरु नानकजी की फ़ोटो के आगे शीश नवाना और बहू के संगीत अभ्यास का पलंग पर बैठकर आनंद लेना, सब कुछ बहुत जीवंतता से परिवार की दिनचर्या को चित्रित करते हैं।

राग अहीर भैरव में जयदेव की संगीतबद्ध एक और रचना “मैं तो कबसे तेरी शरण में हूं” (फ़िल्म रामनगरी) इसी तरह लीक से हटकर है। पर अफ़सोस, न वो फ़िल्म पूरी तरह यूट्यूब पर मिलती है और न ही सुलभा देशपांडे और अमोल पालेकर पर फ़िल्माये इस गीत का वीडियो।

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