
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....
व्यंग्य-पत्रिकाओं की विरासत
साहित्य की जिन विधाओं ने समय-समय पर लोकप्रियता के नए आयाम स्थापित किए, उन विधाओं के इर्द-गिर्द केंद्रित पत्रिकाएँ भी निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। कविता और कहानी इसके सबसे सशक्त उदाहरण हैं। इन दोनों ही विधाओं की अनेक विशिष्ट पत्रिकाएँ आज भी नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। व्यंग्य भी अपनी विशिष्ट अभिव्यंजना, व्यापक पाठक-समर्थन और सामाजिक प्रभावशीलता के कारण एक अत्यंत लोकप्रिय विधा है, पर इसके अनुरूप व्यंग्य-केंद्रित पत्रिकाओं की संख्या हमेशा सीमित ही रही। यह संतोष का विषय है कि मुख्यधारा की अधिकांश पत्रिकाएँ व्यंग्य की उपादेयता से सदैव परिचित रही हैं और उसे लगातार प्रमुखता देती आई हैं। इस संदर्भ में भारतेंदु युग से लेकर आधुनिक काल तक प्रकाशित प्रमुख पत्रिकाओं की स्थिति कमोबेश समान रही है, जिसकी विस्तृत चर्चा अन्य अध्यायों – “व्यंग्य की लोकधर्मी परंपरा: भारतेंदु युग से वर्तमान परिदृश्य तक” तथा “हिंदी व्यंग्य स्तंभ-लेखन की परंपरा और समकालीन परिदृश्य” में की गई है। यहाँ उनकी पुनरावृत्ति अपेक्षित नहीं है। इस आलेख का उद्देश्य व्यंग्य-केंद्रित पत्रिकाओं का परिचय देना और व्यंग्य विधा के विकास में उनके योगदान पर विचार करना है।
भारत में प्रकाशित व्यंग्य-केंद्रित पहली पत्रिका के रूप में “पंच” का उल्लेख किया जाता है, जिसमें कार्टूनों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों, विडंबनाओं और संकीर्णताओं पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत किया जाता था। यह पत्रिका अंग्रेज़ी में प्रकाशित होती थी और ब्रिटिश “पंच” पत्रिका से प्रेरित थी। 1850 से 1857 के बीच दिल्ली से प्रकाशित “स्केचबुक” पत्रिका को भी इसका समकक्ष माना जाता है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में चित्र-आधारित अनेक व्यंग्य पत्रिकाएँ सामने आईं, जैसे “गुजराती पंच”, “हिंदी पंच”, “हिंदू पंच”, “बसंतक”, “अवध पंच” आदि। इन पत्रिकाओं का प्रभाव भारतेंदु युग की मासिक और पाक्षिक पत्रिकाओं पर स्पष्ट रूप से देखा गया। 1873 में प्रकाशित हरिश्चन्द्रचंद्रिका (वाराणसी), 1878 में भारतमित्र (कलकत्ता), 1883 में मासिक ब्राह्मण (कानपुर), तथा रसिक पंच (लखनऊ) जैसी पत्रिकाओं में भी व्यंग्य-चित्र अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम रहे। इन पत्रिकाओं में गद्य-व्यंग्य रचनाएँ भी प्रकाशित होती थीं लेकिन इन पत्रिकाओं का उद्देश्य जन जागरण और स्वाधीनता की चेतना को प्रस्फुटित करना था।
इसके पश्चात इलाहाबाद से प्रकाशित “मदारी”, बनारस से “करेला”, तथा इंदौर से “हजामत” जैसे साप्ताहिक पत्र भी व्यंग्य-चित्रों को विशेष महत्व देते हुए सामने आए और उन्होंने इस विधा को व्यापक पहचान प्रदान की। पं. बालकृष्ण भट्ट द्वारा संपादित “हिंदी प्रदीप” का स्वर भी व्यंग्य और विनोद के सम्मिश्रण से निर्मित था। इस पत्रिका ने व्यंग्यात्मक शैली को अपनाते हुए जन-जागरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हिंदी की पहली व्यंग्य-केंद्रित पत्रिका “मतवाला” को माना जाता है, जिसका प्रकाशन एक अहिंदीभाषी नगर कलकत्ता से हुआ था। इसका प्रथम अंक 26 अगस्त 1923 को प्रकाशित हुआ। आठ पृष्ठों का यह साप्ताहिक अंक अपने कलेवर और प्रस्तुति में किसी समाचारपत्र जैसा लगता था। इस पत्रिका के प्रकाशन का श्रेय महादेव प्रसाद सेठ को जाता है जो उस समय बालकृष्ण प्रेस के स्वामी थे।
‘मतवाला’ के प्रकाशन के पीछे एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। एक दिन मुंशी नवजातिक लाल श्रीवास्तव बांग्ला में प्रकाशित हास्य-व्यंग्य साप्ताहिक ‘अवतार’ लेकर सेठ महोदय के पास पहुँचे। ‘अवतार’ को देखने के बाद सेठ जी के मन में हिंदी में भी इसी प्रकार की व्यंग्य-प्रधान पत्रिका निकालने का विचार अंकुरित हुआ। साथियों से विचार-विमर्श हुआ और एक नई पत्रिका प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया। पत्रिका का नाम “मतवाला” रखा गया जिसे मुंशी नवजातिक लाल श्रीवास्तव ने ही सुझाया था।
पत्रिका के संपादकीय मंडल में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, शिवपूजन सहाय तथा नवजातिक लाल श्रीवास्तव जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार शामिल थे। इस कारण ‘मतवाला’ को एक समूहगत संपादकीय प्रयास माना जाता है। महादेव प्रसाद सेठ ने सभी से विचार-विमर्श कर तय किया कि पत्रिका में क्या प्रकाशित होगा और कौन व्यक्ति, कौन-सा कार्य करेगा। ‘निराला’ को कविता एवं समालोचना, मुंशी जी को व्यंग्य–विनोद तथा शिवपूजन सहाय को अग्रलेख लिखने की जिम्मेदारी दी गई।

‘मतवाला’ के प्रथम अंक ने ही हिंदी साहित्यिक जगत में हलचल मचा दी। इसके मुखपृष्ठ पर निराला द्वारा रचित निम्न उद्देश्य-वाक्य काव्यात्मक रूप में प्रकाशित हुआ था –
अमिय-गरल, शशि-शीकर, रवि-कर, राग-विराग भरा प्याला।
पीते हैं जो साधक, उनका प्यारा है यह मतवाला।
पहले अंक का अग्रलेख ‘आत्मपरिचय’ शीर्षक से शिवपूजन सहाय ने लिखा था। पत्रिका ने अपने आगमन के साथ ही चुटीले अंदाज़, तीखे व्यंग्य और तंजपूर्ण तेवरों से पाठकों, विशेषकर युवाओं के बीच उल्लेखनीय लोकप्रियता अर्जित कर ली। साहित्य-जगत में उत्तरोत्तर इसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होती रही जिस कारण उस समय के अनेक प्रमुख लेखक इससे जुड़ते चले गए। इनमें गयाप्रसाद शुक्ल ‘स्नेही’, मैथिलीशरण गुप्त, राधामोहन गोकुल, नाथूराम शर्मा ‘शंकर’, लाला भगवानदीन, गोपालशरण सिंह, अन्नपूर्णानंद, परिपूर्णानंद, जी.पी. श्रीवास्तव, रामनाथ ‘सुमन’, अनूप शर्मा, हरिजी, नरदेव शास्त्री, गांगेय नरोत्तम शास्त्री, माधव शुक्ल, बदरीनाथ भट्ट, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, लक्ष्मण नारायण गर्दे, श्रीधर पाठक और प्रफुल्लचंद ओझा ‘मुक्त’ आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। यह तथ्य भी विशेष उल्लेख के योग्य है कि भगतसिंह भी ‘मतवाला’ के लेखकों में शामिल थे, और वे ‘बलवंत सिंह’ के छद्म नाम से लिखा करते थे। निराला ने भी गर्जन सिंह वर्मा, मतवाले, जनाब अली, शौहर आदि अनेक छद्म नामों से लेखन किया। ‘निराला’ स्वयं उनका एक छद्म नाम था, जो आगे चलकर स्थायी उपनाम के रूप में स्थापित हो गया।
‘मतवाला’ अपने समय की सर्वाधिक पढ़ी जानेवाली पत्रिकाओं में शुमार थी। पत्रिका ने राजनीति, समाज, धर्म, शिक्षा और साहित्य, हर क्षेत्र में व्याप्त पाखंड, रूढ़िवाद और अन्याय पर बिना संकोच प्रहार किया। कथ्य और व्यंग्य की दृष्टि से ‘मतवाला’ तत्कालीन व्यंग्य-साहित्य की दिशा निर्मित करने वाली पत्रिका बन गई। ‘मतवाला’ का संपादकीय स्वर किसी व्यक्ति या संस्था के प्रति अनुरंजक न होकर सत्य और सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध था। इस निर्भीकता ने उसे युवा साहित्यकारों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों में अत्यधिक लोकप्रिय बनाया।
‘मतवाला’ की प्रतिष्ठा का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रेमचंद ने ‘हंस’ के ‘आत्मकथा’ अंक में ‘मतवाला’ के दस वर्ष पूर्ण होने पर उसकी आत्मकथा का विवरण प्रकाशित किया था, जिसे शिवपूजन सहाय ने लिखा था। कुछ समय पहले हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक कर्मेंदु शिशिर ने ‘मतवाला’ के साहित्यिक-पत्रकारिक अवदान तथा व्यंग्य को स्थापित करने में उसकी भूमिका पर तीन खंडों में एक विस्तृत व शोधपरक ग्रंथ संपादित किया था। हिंदी की किसी भी पत्रिका पर इससे अधिक व्यापक और गंभीर अध्ययन इससे पहले नहीं हुआ था। यह तथ्य हिंदी साहित्य, विशेषतः हास्य–व्यंग्य के इतिहास में ‘मतवाला’ की अद्वितीय और ऐतिहासिक भूमिका का सशक्त प्रमाण है।
लगभग डेढ़ दशक तक नियमित रूप से प्रकाशित होने के बाद ‘मतवाला’ का प्रकाशन बंद हो गया। इसके बंद होने के प्रमुख कारण कठोर सरकारी सेंसरशिप और बढ़ती आर्थिक कठिनाइयाँ थीं। ‘मतवाला’ के बंद होने के पश्चात लगभग तीन दशकों तक ऐसी कोई पत्रिका प्रकाशित नहीं हुई, जिसे पूर्णतः व्यंग्य-केंद्रित कहा जा सके। 1964 में ‘दीवाना’ का प्रकाशन, हास्य–व्यंग्य पर आधारित एक उल्लेखनीय घटना अवश्य थी, किंतु इसका मूल स्वर व्यंग्य की अपेक्षा हास्य-प्रधान अधिक था। हास्य-प्रिय पाठकों के बीच इसकी काफी लोकप्रियता रही जिस कारण यह पत्रिका लगभग बीस वर्षों तक निरंतर प्रकाशित होती रही।
इसके बाद जनवरी 1977 में जबलपुर से ‘व्यंग्यम’ पत्रिका का प्रकाशन हिंदी व्यंग्य-साहित्य की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना गया। इसके संपादक मंडल में श्री रमेशचंद्र शर्मा ‘निशिकर’, श्रीराम अयंगर और महेश शुक्ल जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार शामिल थे। पत्रिका के कुल नौ अंक प्रकाशित हुए, और प्रत्येक अंक अपनी उत्कृष्ट सामग्री और सशक्त प्रस्तुति के कारण संग्रहणीय माना गया। दुर्भाग्यवश, निशिकर जी के अस्वस्थ हो जाने के बाद पत्रिका का प्रकाशन स्थगित करना पड़ा लेकिन बाद में भी इसका पुनर्प्रकाशन संभव नहीं हो सका। अनेक व्यंग्यकारों का मत है कि ‘व्यंग्यम’ स्वतंत्र भारत की पहली ऐसी पत्रिका थी, जो पूर्णतः व्यंग्य विधा को समर्पित थी।
1989 में डॉ. मधुसूदन पाटिल के संपादन में प्रकाशित त्रैमासिक “व्यंग्य विविधा” व्यंग्य साहित्य की दुनिया में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरकर सामने आई। इस पत्रिका ने विचारशील, संतुलित और गंभीर व्यंग्य लेखन की परंपरा को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि व्यंग्य विधा को एक सम्मानजनक और विशिष्ट साहित्यिक स्वरूप प्रदान करने में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। अपने समय की यह पत्रिका व्यंग्य–धर्मिता, सामग्री की गुणवत्ता और चिंतनशीलता के कारण विशेष रूप से चर्चित रही। इसमें समाज, राजनीति, प्रशासन तथा दैनिक जीवन की विसंगतियों पर तीखे, संवेदनशील और विवेकपूर्ण व्यंग्य प्रकाशित होते थे। संपादन में डॉ. पाटिल की दृष्टि, वैचारिक स्पष्टता, गंभीरता और व्यंग्य के प्रति अनन्य समर्पण स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता था। “व्यंग्य विविधा” का प्रकाशन लगभग एक दशक तक निरंतर और सार्थक रूप से चलता रहा।
इसके बाद यदा-कदा कुछ और व्यंग्य-केंद्रित पत्रिकाएँ आरंभ हुईं। उनकी चर्चा भी हुई, परंतु प्रकाशन की अनियमितता और आर्थिक-संगठनात्मक चुनौतियों के कारण वे अधिक समय तक टिक नहीं सकीं। ऐसी अल्पजीवी पत्रिकाओं में ‘शगूफा’, ‘हास्यम-व्यंग्यम’, ‘गुपचुप’, ‘विदूषक’ आदि का उल्लेख किया जा सकता है। जमशेदपुर से अरविंद विद्रोही के संपादन में प्रकाशित ‘विदूषक’ को व्यंग्य-जगत में विशेष रूप से सराहा गया था, किंतु अज्ञात कारणों से यह पत्रिका अचानक बंद हो गई।
इसके पश्चात ‘रंग चकल्लस’ और ‘नई गुदगुदी’ जैसी पत्रिकाओं ने व्यंग्य लेखन की परंपरा को आगे बढ़ाने का दायित्व संभाला। दोनों पत्रिकाएँ लंबे समय तक अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रहीं। “नई गुदगुदी” हाल ही में बंद हुई है, जबकि असीम चेतन के संपादन में मुंबई से प्रकाशित ‘रंग चकल्लस’ आज भी अपनी सक्रिय और जीवंत उपस्थिति बनाए हुए है। उल्लेखनीय है कि “रंग चकल्लस” का प्रकाशन प्रारंभ में असीम चेतन के पिता रामावतार चेतन के संपादन में होता था। बीच में यह पत्रिका कुछ समय तक अनियमित रही, परंतु अब यह पुनः नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है।
वर्तमान में हिंदी व्यंग्य-लेखन की मशाल दो प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ – ‘अट्टहास’ और ‘व्यंग्ययात्रा’ -सफलतापूर्वक थामे हुए हैं। दोनों ही पत्रिकाएँ पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से निरंतर प्रकाशित होकर व्यंग्य-परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। दोनों पत्रिकाएँ समकालीन साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्यों पर संवेदनशील, तर्कपूर्ण और प्रखर टिप्पणियाँ प्रस्तुत करती हैं तथा पाठकों को चिंतन और मनन की दिशा में प्रेरित करती हैं।
‘अट्टहास’, मासिक पत्रिका, हिंदी की उन दुर्लभ पत्रिकाओं में से है जिसने व्यंग्य को एक सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने का सतत और गंभीर प्रयास किया है। तीखे व्यंग्य, सामाजिक विसंगतियों पर धारदार लेखन और विनोदात्मक अंतर्ध्वनि इसकी विशिष्ट पहचान रहे हैं। इस पत्रिका ने स्थापित व्यंग्यकारों के साथ-साथ उभरती प्रतिभाओं को भी समान रूप से मंच प्रदान किया, जिससे व्यंग्य-लेखन की एक नई और समर्थ पीढ़ी विकसित हुई। ‘अट्टहास’ ने व्यंग्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक चेतना और परिवर्तन का प्रभावी उपकरण समझकर अपनी सामग्री में उसकी सार्थकता बनाए रखी। सीमित संसाधनों के बावजूद इसके संस्थापक-संपादक अनूप श्रीवास्तव की व्यंग्य-निष्ठा और जिजीविषा ही इसके सतत प्रकाशन का आधार रही। पिछले वर्ष उनके निधन के उपरांत रामकिशोर उपाध्याय ने पत्रिका के संपादन का दायित्व ग्रहण कर उसकी गरिमा को बनाए रखा है।
दूसरी ओर, ‘व्यंग्ययात्रा’, एक त्रैमासिक पत्रिका है, जिसने हिंदी व्यंग्य साहित्य के क्षितिज को और विस्तार दिया। यह पत्रिका अपने नाम के अनुरूप, व्यंग्य की यात्रा को समय के बदलावों के साथ जोड़ते हुए उसे आधुनिक संदर्भों में परखती और प्रस्तुत करती है। इसमें प्रकाशित विविध स्तंभ – ‘पाथेय’, ‘चिंतन’, ‘त्रिकोणीय’, ‘इधर जो पढ़ा गया’ – व्यंग्य की बहुआयामी प्रकृति को उभारते हैं और पाठकों को अनेक स्तरों पर समृद्ध करते हैं। ‘व्यंग्ययात्रा’ ने न केवल उच्च-स्तरीय सामग्री का निरंतर प्रकाशन सुनिश्चित किया है, बल्कि व्यंग्यकारों के लिए ऐसा सृजनात्मक मंच भी उपलब्ध कराया है जहाँ वे नए प्रयोग कर सकें और समकालीन चुनौतियों पर अपनी व्यंग्यात्मक दृष्टि और पैनी कर सकें। इस पत्रिका के संपादक प्रेम जनमेजय आज के अग्रणी और प्रखर व्यंग्यकारों में शुमार किए जाते हैं, और उनके संपादन में यह पत्रिका व्यंग्य की गरिमा, गंभीरता और रचनात्मकता के नए प्रतिमान स्थापित करती आ रही है।
इन दोनों पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी व्यंग्य साहित्य को नया रूप, नई ऊर्जा और अधिक व्यापक पाठक-वर्ग प्राप्त हुआ है। व्यंग्य की परंपरा को समृद्ध, सशक्त और प्रासंगिक बनाए रखने में इनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन्होंने व्यंग्य के साहित्यिक तथा सामाजिक मूल्य को न केवल स्थापित किया, बल्कि उसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का कार्य भी किया है।
इन पत्रिकाओं की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा ने समय-समय पर कुछ और व्यंग्य-केंद्रित पत्रिकाओं के प्रकाशन को प्रोत्साहित किया। कोटा (राजस्थान) से डॉ. अतुल चतुर्वेदी के संपादन में ‘व्यंग्योदय वार्षिकी’ के कुछ उल्लेखनीय अंक प्रकाशित हुए। जयपुर से आदर्श शर्मा के संपादन में ‘व्यंग्य वार्षिकी’ भी निकली, जिसकी साहित्यिक चर्चाएँ लंबे समय तक होती रहीं। कोरोना काल में पत्रिका बंद हो गई और फिर आदर्श जी के आकस्मिक निधन ने इसके प्रकाशन पर पूर्ण विराम लगा दिया।
कुछ वर्ष पूर्व डॉ. सुरेश कान्त के संपादन में ‘हैलो इंडिया’ के तीन या चार अंक प्रकाशित हुए थे, जिन्होंने व्यंग्य लेखन में नए प्रयोगों का संकेत दिया। हाल ही में रामस्वरूप दीक्षित एक ऑनलाइन पत्रिका ‘व्यंग्यलोक’ लेकर आए हैं, जिसके अब तक तीन अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इसका प्रारंभिक अनुभव आशाजनक है और उम्मीद की जानी चाहिए कि यह पत्रिका व्यंग्य-सृजन की सशक्त परंपरा को आगे बढ़ाएगी।
हिंदी व्यंग्य-पत्रिकाओं का यह सफर न केवल व्यंग्य विधा के विकास की गवाही देता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि व्यंग्य सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम है। ‘मतवाला’ से लेकर ‘अट्टहास’ और ‘व्यंग्ययात्रा’ तक की यात्रा यह दिखाती है कि समय बदलता रहा, चुनौतियाँ बदलती रहीं, पाठकीय रुचियाँ बदलती रहीं, पर व्यंग्य की प्रासंगिकता कभी कम नहीं हुई। आज, जब अभिव्यक्ति के नए डिजिटल मंचों का विस्तार हो रहा है, तब भी व्यंग्य-पत्रिकाएँ अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने में सफल रही हैं। भविष्य में यह यात्रा किस रूप में आगे बढ़ेगी, यह समय तय करेगा, पर इतना निश्चित है कि जब तक समाज में विसंगतियाँ, विडंबनाएँ, अन्याय और छल–कपट मौजूद रहेंगे, व्यंग्य की चिंगारी बुझने वाली नहीं। इन्हीं कारणों से हिंदी व्यंग्य-पत्रिकाएँ केवल साहित्यिक धरोहर नहीं, बल्कि हमारे समय की वैचारिक जरूरत भी हैं। उम्मीद की जाती है कि यह परंपरा आने वाले वर्षों में और अधिक परिपक्व, सशक्त और व्यापक रूप लेकर आगे बढ़ेगी और पाठकों को नई दृष्टि, नई ऊर्जा और नया विचार देती रहेगी।
संदर्भ:
कैरीकेचरिंग कल्चर इन इंडिया कार्टून्स एंड हिस्ट्री इन द’ मॉडर्न वर्ल्ड (ऋतु गेरोला खंडूरी)
‘अपनी माटी वेब पत्रिका’, ‘व्यंग्ययात्रा’ पत्रिका, ‘ई अभिव्यक्ति’ वेब पत्रिका

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky

इस लेख में रामावतार चेतन जी की पत्रिका रंग का उल्लेख छूट गया है, रंग चकल्लस बाद में असीम ने निकाली थी जो उसका विस्तार थी. रंग में सभी शिखर के व्यंगकारों का योगदान रहा. बम्बई में चककल्स का आयोजन भी उनका ही सफल प्रयोग था