
- October 30, 2025
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पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....
युद्ध और हिटलर के यातनाघर से उपजती कविता
युद्ध और आपदा के हालात में कविता किस तरह ताक़त बनती है, पिछले अंक में हमने मिकलोस रैडनोटी के उदाहरण से समझा। इस अंक में एक और मिसाल के बाद यातना शिविरों की बात करते हैं।
मॉरीशियो रोसेनकॉफ़
रोसेनकॉफ़ उरुग्वे के एक पोलिश, यहूदी कवि हैं, जो एक पत्रकार, लेखक और एक साहित्यिक व कला निर्देशक भी हैं। वे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के सदस्य थे। उन्हें 1972 में गिरफ़्तार किया गया था और तेरह साल तक दो वर्गमीटर की कोठरी में बंद रखा गया। उन्होंने कई उपन्यास और सॉनेट लिखे हैं। वे मूल रूप से एक थिएटर कलाकार थे। जेल में रहते हुए उनका मानसिक स्वास्थ्य बहुत ख़राब हो गया था, फिर भी वे अपनी बेटी के लिए कई छोटी कविताएँ लिखने में कामयाब रहे, जिन्हें उन्होंने अपनी पत्नी के माध्यम से भेजा, जो जेल में उनसे मिलने जाती थीं। वे लगातार कष्ट में रहे, क्योंकि उनकी दादी को एसएस द्वारा कुल्हाड़ी से मार दिया गया था। उनकी माँ के परिवार में भी कोई नहीं बचा था। उन्हें अपनी बेटी की चिंता थी, साथ ही उन्हें अपने रिश्तेदार की भी चिंता थी, जो वारसॉ बस्ती में घिर गये थे।
उनकी एक कविता इस प्रकार है-
“मैं तुम्हे नाव भेजता हूं अपने यार्ड से
लेकिन बेटी, यह काग़ज़ से बनी है
मज़बूत पतवार वाला जहाज़ नहीं बचा है
तेज़-नुकीला जहाज़ नहीं बचा है
बस एक छोटी सी कागज़ की नाव है,
लेकिन बेटी, अभी और बाक़ी है एक असीम इच्छाशक्ति
एक बार फिर यात्रा करने की”
यह कविता कवि के भावनात्मक संघर्ष को व्यक्त करती है। ‘नाव’ यात्रा या स्वतंत्रता का प्रतीक है। कागज से बनी होने के कारण यह बहुत कमज़ोर है। यानी उसकी अंतरात्मा जेल से मुक्त होना चाहती थी लेकिन वास्तविकता यह है कि उसकी उम्मीद काग़ज़ की नाव की तरह है, जो पानी में पिघल जाती है। इसका मतलब है कि वह इस तथ्य से बहुत अच्छी तरह वाकिफ़ है कि वह भागने में असमर्थ है।
होलोकॉस्ट पीड़ितों के परिवार से होने के कारण, उनके अवचेतन मन में दर्द और पीड़ा थी जिसने उन्हें इस दर्द से राहत पाने के लिए कविताएँ लिखने को प्रेरित किया। उनकी कविताएँ प्रतिरोध के एक उपकरण की तरह हैं। इस तरह अनेक लोगों ने युद्ध का सामना करते हुए कविता का सहारा लिया होगा। हम सब को नहीं जानते, लेकिन इतना अवश्य है कि युद्धपरक इतिहास हमें युद्ध से दूर करने की कोशिश तो करता ही है, संभवतया व्यक्ति विशेष को भी जीने की उमंग देता होगा।
यातना शिविर में कविता
2016 में जर्मनी में रेसीडेन्सी के वक़्त जब मैं उन जगहों को भी जानने की कोशिश कर रही थी, तब कुप्रसिद्ध डाकाउ यातनाघर के बारे में जानकारी मिली। मैं वहां तक पहुँची तो जाना कि यह एक जाना पहचाना टूरिस्ट स्थल बन चुका था। यात्रियों की भीड़ जा रही है। यह यात्रा बेहद दुविधाजनक रही क्योंकि एक ओर हम मृत्यु के क्रूरतम रूप का सामना कर रहे थे, दूसरी ओर सब कुछ प्रदर्शन के निहित आ चुका था। इस जगह बच्चे और कुत्ते भीतर ले जाना मना था। बच्चे मौत को समझे बिना चहक उठेंगे, और कुत्ते मौत की हड्डी को पहचानते हैं।
वहां जो देखने को मिला वह अजीब था। वे क़ैदखाने, जहां कैडी रखे जाते थे, टिन के शेड थे, जिनमें एक के ऊपर एक तख़्ते रखे थे, जिनमें मुश्किल से एक डेड़ फिट का अन्तर था। क़ैदियों को अधिकतर भूखे रखा जाता था, जिससे उन्हें दस्त से लग जाते थे। जो कि दूसरे के ऊपर गिरते रहते। कोने में एक खुला पाखाना होता था, जो बुरी हालत में होता था। जिन गैस चैम्बरों में उन्हें ले जाया जाता था, एक चैम्बर में उन्हें गैस से नहलाया जाता, दूसरे में जलाया जाता। उनकी राख पास में डाल दी जाती थी। आजकल उस जगह पर फूलों का बाग़ीचा है, जिस पर नोटिस लगा था ‘यहां चलना मना है’। उस स्थान पर चर्च और प्रार्थना गृह थे, लेकिन उन क़ैदियों को मदद नहीं मिली, जो बाड़े जैसी जगहों पर अमानवीय स्थिति में रखे जाते थे। जब हमें उन संग्रहालयों में जाया गया, जहां उनकी तस्वीरें थीं, वह सामान था, जो उनकी जेब में मिला था, उनमें से अधिकतर क़ैदियों की प्रेमिका या पत्नी या बच्चों या कुत्तों की तस्वीरें थीं। यातना शिविर ने मेरे मन मस्तिष्क पर बेहद प्रभाव डाला था। मैंने एक कविता लिखी थी-
डाकाउ यातना घर
डाकाउ यातनाघर के बाहर नोटिस पर लिखा है
कृपया कुत्ते साथ ना ले जायें
और बच्चे भी,
लिखा तो यह भी था कि
कृपया शोर ना मचायें, ज़ोर से ना हंसे
ऐसा कुछ ना करें कि मृतकों की आत्मा को
कष्ट मिले,
लेकिन व्यक्तिगत सामान वाली लाइब्रेरी में
क़ैदियों के सामान में ख़ूबसूरत प्रेमिकाओं की तस्वीरों के साथ
बच्चों और पालतू कुत्तों की भी तस्वीरें हैं
कैम्प में सन्नाटा है, सैकड़ों दर्शनार्थियों के बावजूद
मानो कि अभी कोई ना कोई मृतात्मा बोल उठेगी
यदि कोई बच्चा होता तो मौत की नाक पर उंगली रख कर हंस देता
और हंस देती उसके साथ राख के बगीचे में सोती मृतात्माएं
मृतकों की राख को मैंने चित्तौड़गड़ में देखा है
जहाँ सैंकड़ों औरतों ने युद्ध में गये पुरुषों के पीछे आत्म जौहर किया था
और यहाँ, डाकाउ में, जहाँ सैंकड़ों क़ैदियों को
गैस चैम्बरों में जलाया गया
युद्ध मौत को क्रूर बनाता है
हालांकि मौत स्वयं में उतनी क्रूर भी नहीं है
चर्च के घन्टे भी शान्त हैं, यहूदी पूजाघर बिल्कुल मौन हैं
आदमी किससे भयभीत है?
मौत से या मौत देने के तरीक़े से
वे निरीह आत्माएं, जो देह के भीतर रहती हुई कुछ नहीं कर पाईं
देह के राख बनने पर इतनी भयदायिनी कैसे बन गईं?
भय ज़रूरी है
अपने से
अपने क्रोध से
नाख़ूनों के तीखेपन से
लेकिन सबसे ज़्यादा
दूसरों को दबाने से मिलने वाले आनन्द से
मौत को अन्त समझने की भूल से
मैं जर्मनी के इस इलाक़े से गुज़रती हुई
पूरे कि पूरे शहर के यातनाघर में बदलने वाली तस्वीरें
शायद ज़्यादा ग़ौर से देख पाऊँ
दुनिया के तमाम अल्लेप्पो में मण्डराती रूहों से सम्वाद कर सकूँ
किसी भी यातनागृह से गुज़रना
आदमी होने की यात्रा से गुज़रना होता है
और थोड़ा और आदमी होने की कोशिश भी होती है
लेकिन क्या आदमी को आदमी बनाने के लिए
यातनाघर ज़रूरी हैं?
सवाल अधूरा है
और मेरी कविता भी
क्रमश:

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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