
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
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आशीष दशोत्तर की कलम से....
वतन की सांसों से वाबस्ता तहरीरों की शायरी
यौम-ए-आज़ादी हर दौर में शाइरी का हिस्सा रहा है। हो भी क्यों न! यह ऐसी रेखा है जिसको आधार मानकर हम अपनी तरक़्क़ी के पैमाने तय करते हैं। पहले ऐसा था, यह था, अब ऐसा है, यह है। शाइरी में शामिल इसके अलग अंदाज़ भी हमें मुल्क की बुलंदियों और आज के हालात पर ग़ौर करने की तालीम करते हैं।
शाइरी ने आज़ाद हिन्दोस्तान को तक़दीर के भरोसे छोड़ने के बजाय तदबीर से वाबस्ता करने का काम किया। उस दौर में ख़ासकर तरक़्क़ी पसंद शाइरों ने तो मुल्क के हालात पर अफ़सोस भी जताया और अवाम के ज़िम्मे मुल्क की बेहतरी के रास्ते बताये। इसी बात को जाफ़र मलीहाबादी ने कुछ यूं कहा-
बनाना है हमें अब अपने हाथों अपनी क़िस्मत को
हमें अपने वतन का आप बेड़ा पार करना है
यानी जैसे-जैसे हमारी आज़ादी उम्रदराज़ होती गयी, अवाम की ताक़त भी बुलन्द होती रही। रहनुमाओं पर से भरोसा उठता रहा और आम आदमी अपनी तकलीफ़ों को अपनी ज़िन्दगी मानता चला गया। इसके बावजूद उसकी काविशें कम नहीं हुईं। जिस आज़ादी के सपने देखे गये थे, धीरे-धीरे ध्वस्त होते नज़र आने लगे। बावजूद इसके मुल्क का हर बाशिन्दा अपने मन में यह भरोसा ज़रूर रखता रहा कि उसकी कोशिश एक दिन कामयाबी में तब्दील ज़रूर होगी। इतना ही नहीं, तसव्वुफ़ के तसव्वुर में भी वतन शामिल रहा। मुज़फ़्फ़र वारसी कहते भी हैं-
वतन की रेत ज़रा एड़ियाँ रगड़ने दे
मुझे यक़ीं है कि पानी यहीं से निकलेगा
आज़ादी के बाद ख़्वाब धूमिल होते चले गये मगर शाइरी में यह विश्वास हमेशा बना रहा कि जो बीत चुका है, उसे भुला दिया जाये और जो बाक़ी है उसे मिलकर सजाया-संवारा जाये। मुल्क की एक ख़ूबसूरत तस्वीर सामने रखने की चाहत शाइर के दिल में सदैव बनी रही। तभी तो जावेद अख़्तर की नज़्म इस बात को कहने लगी-
जो कामयाबी है उसकी ख़ुशी तो पूरी है
मगर ये याद भी रखना बहुत ज़रूरी है
कि दास्तान हमारी अभी अधूरी है
बहुत हुआ है मगर फिर भी ये कमी तो है
बहुत से होंठों पे मुस्कान आ गयी लेकिन
बहुत सी आँखें हैं जिनमें अभी नमी तो है
हर आंख के आंसू पोंछने की कामना एक रचनाकार ने ही की। शाइर की यह पीड़ा भी रही कि मुल्क की गंगा-ज़मज़मी तहज़ीब को अलग-अलग करने की कोशिशें लगातार बढ़ने लगी है। भाई से भाई को जुदा करना और इंद्रधनुषी मुल्क को किसी एक रंग में रंगने के इरादे शाइर को सालते रहे। उसकी कामना वैसी ही रही जैसी नुसरत मेहदी ने अपने इन अल्फाज़ में कहा है-
हर तरफ़ महकी हुई मेरे चमन की ख़ुशबू
है फज़ाओं में अज़ानों की भजन की ख़ुशबू
मुझको विरसे में मिली गंग-ओ-जमन की ख़ुशबू
मेरी हर साँस में बसती है वतन की ख़ुशबू
शाइरी की सांसें आज भी वतन की सांसों में मौजूद हैं। यह धड़कन उस दौर से इस दौर तक निरंतर धड़क रही है। यह यक़ीन भी दिला रही है कि कितनी ही ताक़तें मुल्क को दायरों में क़ैद करने की कोशिश करें, शाइर की ज़ुबान अपने मुल्क के असली रंग में रंगती रहेगी।

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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