
- July 30, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
मिथलेश रॉय की कलम से....
'वो अक्सर याद आते हैं' यानी एक भूला-बिसरा अभिनेता
गुलशेर भाई जितना मीठा बोलते थे, उतना ही अच्छा गाते भी थे। उर्दू और हिंदी के अल्फ़ाज़ उनसे सुनकर हम उनकी नक़ल करने की कोशिश करते पर गुलशेर भाई गुलशेर भाई ठहरे। गर्मी की सुबह जानी वाकर, नीटू, दीपू, दिनेश, छोटे मामा और मैं घाघरा नदी के किनारे बिताते थे। वहीं गुलशेर भाई रफ़ी, मुकेश के गाने भी गाते और फ़िल्मों से जुड़े किस्से भी सुनाते। घाघरा नदी में तब पानी घुटनों तक होता। अतः आराम से उसके इस पार से उस पार जाया जा सकता था। घाघरा का किनारा जहां हम सब बैठते वहां पूर्व से आकर नदी का बहाव पश्चिम में मुड़ जाता था, यह हमारे लिए एक और फ़ायदे की बात होती। दरअसल नदी के उस पार खरबूज़े के खेत थे, बस क्या था एक-एक करके हममें से कोई एक नदी के उस पार जाता और किसान की नज़र बचाकर एक दो खरबूज़े नदी में फेंक देता। खरबूज़े बहते हुए हम तक आसानी से पहुंच जाते। किसान को भी ख़बर नहीं लगती थी। अगर कभी ख़बर हो भी गयी तो गुलशेर भाई का अंदाज़े-बयां काम आ जाता।
गुलशेर भाई आज सबेरे से “जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला” गाये जा रहे थे। तभी जानी वाकर ने पूछा- क्यों भाईजान दिल में कोई सुई चुभा दिया क्या? गहरी व ठंडी सांस लेते गुलशेर भाई बोले “दुनिया इसी का नाम है बन्धु”.. गुलशेर भाई अपने गानों के बीच ही फ़िल्मी क़िस्से भी सुनाते जाते थे। क़िस्से सुनाते या कोई गाना गाते। वे उन्हीं बातों में से कोई प्रश्न हम लोगों की तरफ़ उछाल देते। वे अब “प्यार किया तो डरना क्या,” गा रहे थे अचानक बोले यह किस फ़िल्म का गाना है। मैंने बिना सोचे समझे ही जवाब दे दिया “अनारकली”, मेरी नासमझी को छुपाते हुए वे बोले, हां मधुबाला ही अनारकली थीं इस फ़िल्म में भांजे साहब। बाक़ी लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया पर हममें से कई दिलीप कुमार और मधुबाला को कम ही उस उम्र में जान पाये थे। उनमें से मैं भी एक था। अब तक खरबूज़े कटकर हमसब के गोल घेरे के बीच अख़बार पर रखे जा चुके होते। गुलशेर भाई ने दावत देते हुए कहा, “चलिए पहले सब लोग मेहनत से तोड़े गये इन खरबूज़ों का लुत्फ़ उठाते हैं, मै अपना क़िस्सा भी कहते चलता हूं”। फिर मज़ा लेते हुए बोलते, वैसे एक सच यह भी है कि चोरी के माल में अल्लाह ने ग़ज़ब का स्वाद रख छोड़ा है।
गुलशेर भाई अब किस्से को आगे बढ़ाते जा रहे थे। “जिन्हें हम भूलना चाहें” मुकेश की आवाज़ में गाया यह गाना 1968 में बनी, फ़िल्म आबरू का है, जो बहुत मक़बूल हुआ। इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इसकी काफ़ी चर्चा रही क्योंकि इस फ़िल्म में मशहूर फ़िल्म डायरेक्टर सी.एल. रावल का बेटा दीपक कुमार हीरो था, दीपक कुमार दिखने में तो सुन्दर था, इसमें कोई शक नहीं तथा उस दौर की व्यावसायिक फ़िल्मों के लिए उपयुक्त भी था। उसमें स्टार मटेरियल भी था पर बाबू लोग ई बम्बई नगरिया की चाल अजब है। जिसको चढ़ाती है तो बरसों तक सर आंखों पर बैठाये रखती है। और नहीं तो रात भर में उतार देती है।
ये जो कुछ लोग कहते हैं न, दर्शक तय करता है कि कौन हीरो चलेगा, कौन नहीं चलेगा यह सब ग़लत है। यह सब फ़िल्म उद्योग के कुछ प्रतियोगी लोग तय करते हैं। दीपक कुमार का हाल रज़िया सुल्तान की तरह था। “ये कहां इतिहास में पहुंच गये गुलशेर भाई?”- जानी वाकर ने पूछा तो गुलशेर बोले, इतिहास तो है पर सच है। देख भाई कुछ इतिहासकार कहते हैं रज़िया के पास सब प्रतिभा थी लेकिन वह ग़लत समय में सिंहासन पर बैठी, उसी तरह दीपक कुमार भी ग़लत समय में फ़िल्मी दुनिया में आये। दरअसल 60-70 का दशक जिस समय में वे अभिनेता के रूप में आये, उस समय अनेक बड़े अभिनेता अपने चरम पर थे। सभी को दीपक कुमार से डर था क्योंकि उनका पूरा घराना फ़िल्मी दुनिया में था। उनके पास न दौलत की कमी थी न राजनीति की। हो सकता था उसके आने से कई लोग स्टारडम से बाहर हो जाते इसलिए उसके बोलने, हाव-भाव, अंदाज़ को लेकर शुरू से ही ख़ूब टीका-टिप्पणी की जाने लगी। हालांकि तमाम आलोचना के बावजूद वह बंदा मुझे कभी बुरा नहीं लगा।
कभी तुम लोग आबरू फ़िल्म देखना, क्या नहीं था इस फ़िल्म में! अशोक कुमार, निरूपा रॉय, रहमान, विम्मी, शशिकला, जीवन, एक से एक नायक, खलनायक थे। गायक रफ़ी, मुकेश.. यह फ़िल्म एक अच्छा पारिवारिक ड्रामा थी, साथ ही थ्रिल भी। अंतिम भाग में कोर्ट रूम ड्रामा जिसमें अशोक कुमार और बाद में घरेलू औरत से एक अच्छे वकील के रूप में निरूपा रॉय का अलग अंदाज़ देखने को मिला। दीपक कुमार, हालांकि कम फ़िल्मों का अनुभव था पर ऐसा भी कमज़ोर अभिनय नहीं किया था कि लोग उन्हें पसंद न करते। लेकिन उसके ख़िलाफ़ उस समय के कई हीरो, फ़िल्म आलोचक, निर्माता हमलावर थे। आख़िर दीपक कुमार पर असफल हीरो का तगमा लगा ही दिया गया और इस तरह सन 1968 का उभरता हुआ यह सितारा फ़िल्मी प्रतियोगिता की धुंध में कहीं हमेशा के लिए गुम हो गया।
गुलशेर भाई की बात ख़त्म होने तक खरबूज़े भी निपट चुके थे। धूप तेज़ हो इससे पहले हम सब घर पहुंच जाना चाहते थे। मैंने यह फ़िल्म गुलशेर भाई के कहने पर ही देखी थी। मुझे लगा गुलशेर भाई की बात में दम तो है।

मिथलेश रॉय
पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।
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गुलशेर की तकलीफ़ और तंज़ ,,,झूठे नहीं हैं।
अभी भी लोग प्रतिभाओं से 9ज़् तरह ख़ौफ़ खाते हैं कि कुछ भी इल्ज़ाम लगा देने से नहीं डरते,,,,
कभी इतना वक़्त हुआ तो आबरू मूवी देखूँगी।
पहले कमेंट में ‘गुलशेर भाई’ ,,,ऐसा लिखना था