
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग ज़ाहिद ख़ान की कलम से....
औरत ने जनम दिया मर्दों को...
साहिर लुधियानवी को अपनी ग़ज़लों और नज़्मों से पूरे मुल्क में ख़ूब मक़बूलियत मिली। अवाम का ढेर सारा प्यार मिला। हिन्दी फ़िल्मों में उन्होंने दर्जनों सुपरहिट गाने दिये। उनके इन गानों में भी अच्छी शायरी होती थी। साहिर के आने से पहले हिन्दी फ़िल्मों में जो गाने होते थे, उनमें शायरी कभी-कभार ही देखने में आती थी। लेकिन जब फ़िल्मी दुनिया में मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी और साहिर आये, तो फ़िल्मों के गीत, उनका अंदाज़ और मेयार भी बदला। गीतों की ज़ुबान बदली। हिन्दी, उर्दू से इतर गीत हिन्दुस्तानी ज़ुबान में लिखे जाने लगे। इश्क़-मुहब्बत के अलावा फ़िल्मी नग़मों में समाजी-सियासी नज़रिया भी आने लगा। इसमें सबसे बड़ा बदलाव साहिर ने किया। अपने शायराना गीतों को फ़िल्मों में रखने के लिए उन्होंने कई बार फ़िल्म प्रोड्यूसर और डायरेक्टर से लड़ाई भी की। अपने फ़िल्मी गीतों की किताब ‘गाता जाये बंजारा’ की भूमिका में साहिर लिखते हैं, ‘मेरी हमेशा यह कोशिश रही है कि यथासम्भव फ़िल्मी गीतों को सृजनात्मक काव्य के नज़दीक ला सकूं और इस तरह नये सामाजिक और सियासी नज़रिये को आम अवाम तक पहुंचा सकूं।’
साहिर की इस बात में सच्चाई भी है। उनके फ़िल्मी गीतों को उठाकर देख लीजिए, उनमें से ज़्यादातर में एक ख़याल मिलेगा, जो लोगों को सोचने को मजबूर करता है। ‘वो सुबह कभी तो आएगी’ (फ़िल्म—फिर सुबह होगी), ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर’, ‘ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो’ (फ़िल्म—प्यासा), ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा’ (फ़िल्म—धूल का फूल), ‘औरत ने जन्म दिया मर्दों को’’(फ़िल्म—साधना) वग़ैरह ऐसे उनके कई गीत हैं, जिसमें ज़िन्दगी का एक नया फ़लसफ़ा नज़र आता है। ये फ़िल्मी गीत अवाम का मनोरंजन करने के अलावा उन्हें तालीमयाफ़्ता और बेदार भी करते हैं। उन्हें एक सोच, नया नज़रिया मुहैया करते हैं। एक अच्छे लेखक, शायर की शिनाख़्त भी यही है।
अपनी फ़िल्मी मसरूफ़ियतों की वजह से साहिर लुधियानवी अदब की ज़्यादा ख़िदमत नहीं कर पाये। लेकिन उन्होंने जो भी फ़िल्मी गीत लिखे, उन्हें कमतर नहीं कहा जा सकता। उनके गीतों में जो शायरी है, वह बेमिसाल है। जब उनका गीत ‘वह सुबह कभी तो आएगी….’ आया, तो यह गीत मेहनतकशों, कामगारों और नौजवानों को ख़ासा पसंद आया। इस गीत में उन्हें अपने जज़्बात की अक्कासी दिखी। बम्बई की वामपंथी ट्रेड यूनियनों ने इस गीत के लिए साहिर को बुलाकर उनका सार्वजनिक अभिनन्दन किया और कहा, ‘यह गीत हमारे सपनों की तस्वीर पेश करता है और इससे हम बहुत उत्साहित होते हैं।’ ज़ाहिर है कि एक गीत और एक शायर को इससे बड़ा मर्तबा क्या मिल सकता है। ये गीत है भी ऐसा, जो लाखों लोगों में एक साथ उम्मीदें जगा जाता है, ‘वह सुबह कभी तो आएगी/बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, यह भूख के और बेकारी के/टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, दौलत की इजारेदारी के/जब एक अनोख़ी दुनिया की बुनियाद उठायी जाएगी।’

इस गीत के अलावा फ़िल्म ‘नया दौर’ के एक और गीत में मेहनतकशों को आह्वान करते हुए उन्होंने लिखा, ‘साथी हाथ बढ़ाना/एक अकेला थक जाएगा/मिलकर बोझ उठाना।’ आज़ादी के बाद मुल्क के सामने अलग तरह की चुनौतियां थीं। इन चुनौतियों का सामना करते हुए साहिर ने कई अच्छे गीत लिखे। लेकिन उनके सभी गीतों में एक विचार ज़रूर मिलेगा। जिस विचार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी, उसी विचार को उन्होंने अपने गीतों के ज़रिये आगे बढ़ाया। उनका एक नहीं, कई ऐसे गीत है, जिसमें उनकी विचारधारा मुखर होकर सामने आयी है। फ़िल्मी दुनिया में भी रहकर उन्होंने अपनी विचारधारा से कभी समझौता नहीं किया। मेहनतकशों और वंचितों के हक़ में हमेशा साथ खड़े रहे।
अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आज़ाद है
रूह गंगा की, हिमालय का वतन आज़ाद है
दस्तकारों से कहो, अपनी हुनरमन्दी दिखाएं
उंगलियां कटती थीं जिसकी अब वो फ़न आज़ाद है
साहिर लुधियानवी को फ़िल्मों में जहां भी मौक़ा मिला, उन्होंने अपनी समाजवादी विचारधारा को गीतों के ज़रिये ख़ूब आगे बढ़ाया। साहिर लुधियानवी साम्रज्यवाद और पूंजीवाद के साथ-साथ साम्प्रदायिकता के भी सख़्त मुख़ालिफ़ थे। अपनी नज़्मों और फ़िल्मी नग़मों में भी उन्होंने फ़िरक़ापरस्ती और तंगनज़र सोच का हमेशा विरोध किया। अपने एक गीत में वे हिन्दोस्तानियों को एक प्यारा पैग़ाम देते हुए लिखते हैं, ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा/इंसान की औलाद है इंसान बनेगा/मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया/हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया।’
साहिर लुधियानवी महिला-पुरुष समानता के बड़े हामी थे। औरतों के ख़िलाफ़ होने वाले किसी भी तरह के अत्याचार और शोषण का उन्होंने अपने फ़िल्मी गीतों में जमकर प्रतिरोध किया। हिन्दुस्तानी समाज में औरतों के क्या हालात हैं, जहां इसका उनके गीतों में बेबाक चित्रण मिलता है, तो वहीं इन हालात के ख़िलाफ़ एक ग़ुस्सा भी है। साल 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘साधना’ में साहिर द्वारा रचित निम्नलिखित गीत को औरत की व्यथा-कथा का जीवन्त दस्तावेज़ कहा जाये, तो अतिश्योक्ति न होगा, ‘औरत ने जनम दिया मर्दों को/मर्दों ने उसे बाज़ार दिया।’ महिलाओं की मर्यादा और गरिमा के ख़िलाफ़ जो भी बातें हैं, साहिर ने अपनी गीतों में इसका पुरज़ोर विरोध किया। औरतों के दुःख-दर्द को वे अच्छी तरह से समझते थे। यही वजह है कि उनके गीतों में इसकी संजीदा अक्कासी बार-बार मिलती है। फ़िल्म ‘देवदास’ के एक गीत में वो लिखते हैं, ‘मैं वह फूल हूं कि जिसको/गया हर कोई मसल के/मेरी उम्र बह गयी है मेरे आँसुओं में ढल के।’
साल 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘प्यासा’ में साहिर ने खोखली परम्पराओं, झूठे रिवाजों और नारी उत्पीड़न को लेकर जो सवाल खड़े किये हैं, वह आज भी प्रासंगिक हैं। ‘ये कूचे ये नीलामघर दिलकशी के/ये लुटते हुए कारवां ज़िन्दगी के/कहां हैं? कहां हैं? मुहाफ़िज़ ख़ुदी के’, वहीं फ़िल्म ‘वह सुबह कभी तो आएगी’ में वे दुनिया की इस आधी आबादी के लिए पूरी आज़ादी का तसव्वुर कुछ इस तरह से करते हैं, ‘दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा/चाहत को न कुचला जाएगा/ग़ैरत को न बेचा जाएगा/अपनी काली करतूतों पर जब यह दुनिया शर्माएगी।’
‘तल्ख़ियां’, ‘परछाइयां’, ‘आओ कि कोई ख़्वाब बुने’ आदि किताबों में जहां साहिर लुधियानवी की ग़ज़लें और नज़्में संकलित हैं, तो ‘गाता जाये बंजारा’ किताब में उनके सारे फ़िल्मी गीत एक जगह मौज़ूद हैं। इन गीतों में भी ग़ज़ब की शायरी है। उनके कई गीत आज भी लोगों की ज़ुबान पर चढ़े हैं। साहिर को अवाम का ख़ूब प्यार मिला और उन्होंने भी इस प्यार को गीतों के मार्फ़त अपने चाहने वालों को बार-बार सूद समेत लौटाया। उर्दू अदब और फ़िल्मी दुनिया में साहिर लुधियानवी के बेमिसाल योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा गया। जिसमें भारत सरकार का पद्मश्री अवार्ड भी शामिल है। आज भले ही साहिर लुधियानवी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें, नज़्में और नग़मे मुल्क की फ़िज़ा में गूंज-गूंजकर इंसानियत और भाईचारे का पाठ पढ़ा रहे हैं।

जाहिद ख़ान
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से लेखन की शुरुआत। देश के अहम अख़बार और समाचार एवं साहित्य की तमाम मशहूर मैगज़ीनों में समसामयिक विषयों, हिंदी-उर्दू साहित्य, कला, सिनेमा एवं संगीत की बेमिसाल शख़्सियतों पर हज़ार से ज़्यादा लेख, रिपोर्ट, निबंध,आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित। यह सिलसिला मुसलसल जारी है। अभी तलक अलग-अलग मौज़ूअ पर पन्द्रह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ मिला है। यही नहीं इस किताब का मराठी और उर्दू ज़बान में अनुवाद भी हुआ है।
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