यतींद्रनाथ राही, yatindra nath rahi
अनामिका सिंह अना की कलम से....

यतींद्रनाथ राही: विशाल अनुभव, अलग अंदाज़ व दृष्टि

            कैसा सुखद योग है कि 31 दिसम्बर 2025 को यतीन्द्रनाथ राही जी सौवें बरस में प्रवेश कर रहे हैं। वे निरन्तर रचनाशील हैं, स्वस्थ हैं, ऊर्जा और स्नेह से लबरेज़। संवाद में जीवंतता। आवाज़ में कोमलता और अपनेपन की सुवास।

गीत/नवगीत/ ग़ज़ल सहित 23 कृतियों में जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं को दर्ज करने वाले यतीन्द्रनाथ राही जी का जन्म भारौल (जिला-मैनपुरी) में श्रीमती सत्यवती देवी और गुलाब सिंह जी के पुत्र के रूप में 31 दिसम्बर 1926 को हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा भारौल, मिडिल घिरोर एवं इण्टर ए.के. कॉलेज शिकोहाबाद से किया। सन् 47 में आज़ादी के साथ ज़मींदार उन्मूलन भी हुआ। पिता गुलाब सिंह जी भारौल के मुखिया और ज़मींदार थे। ज़मींदार उन्मूलन के बदलते परिदृश्य और बड़ी सन्तान होने के चलते आपको पिता का हाथ बँटाना पड़ा, परिणामत: छह साल तक कॉलेज छूटा रहा।

इस दौरान घर की व्यवस्था में सहयोग और गाँव में ही खुल गये बोर्ड स्कूल (मिडिल) में अँग्रेज़ी अध्यापन और प्राइवेट स्नातक किया। प्राइमरी उत्तीर्ण शीला जी से विवाह हुआ, जिन्होंने बाद में आपके सान्निध्य में मैट्रिक भी किया। जुलाई 54 में आगरा कॉलेज एम.ए. हिन्दी में प्रवेश और जुलाई 56 में एम.ए.। उस समय मध्य प्रदेश में दसवीं पास भी शिक्षक पात्रता थी। सो आप दोनों ही शिक्षक हो गये।

लेखन का शौक बचपन से ही था। अहीर कॉलेज शिकोहाबाद में ख्यात शायर योगेन्द्र पाल सिंह ‘साबिर’ अँग्रेज़ी प्रोफेसर थे, रिश्ते में मामा। उनसे बहुत कुछ सीखा। हिन्दी प्रोफेसर रघुवीर सिंह ने भगवतीचरण वर्मा का ‘प्रेम संगीत’ दिया, तो लेखन को गति मिल गयी। पहला प्रेम गीत “मैं तारे गिन रहा, उन्हें भी नींद न आती होगी”, 1954 में आगरा कॉलेज की छमाही पत्रिका के शरद अंक में प्रकाशित हुआ।

‘अस्तमित सुर्खियाँ’ संग्रह की भूमिका में राही जी कहते हैं-
“मेरे प्रिय साहित्य साधको!
97 वर्ष की लम्बी चादर, उम्र की खूँटी पर टाँगकर जाने से पहले देने को ये गीत ही तो हैं, जो मेरी साँसों से जुड़े ही नहीं, इनमें ओत-प्रोत हो गये हैं। मैं भूलना भी चाहूँ तो और याद आते हैं। उम्र हारती है तो हौसले और दो क़दम आगे बढ़कर खड़े हो जाते हैं। भीतर संवेदनाएँ खुँदसन करती हैं, तो बाहर अधरों पर गीत के झाँझर झनक उठते हैं, तब मैं कहाँ उन्हें गाता हूँ, ये गीत मुझे गाने लगते हैं।”

यतींद्रनाथ राही, yatindra nath rahi

यतीन्द्रनाथ ने पारम्परिक गीत लेखन से अपनी यात्रा प्रारम्भ की। उनके पारम्परिक गीत भी सर्वथा भिन्न भंगिमा से उतरे हैं। आज नवगीत के विशिष्ट हस्ताक्षर हैं। वस्तुतः ये गीत आत्मसंवाद से शुरू हो समष्टि की शुभता तक पहुँचते हैं।

रे मतवारे
तू बनजारे
धरती-अम्बर आँगन द्वारे
गाता चल
कुछ धरता चल रे।
सगुन-साँतिये-बन्दनवारे
रे मतवारे!

यतीन्द्रनाथ जी के गीत छंद सिद्ध ही नहीं वरन् भाषा सिद्ध भी हैं। वे प्रतिरोध के गीत बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ रचते हैं तो ज़िंदगी के हर कोण को बहुत संगीत्मकता से छूते हैं। हमारे इस पुरखे कवि को पढ़ा जाना तब और ज़रूरी हो जाता है जब सामाजिक पिरामिड के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति असहाय है, वो अपनी हड्डियाँ तक गला बैठा है मगर सत्ता को उसकी सुधि ही नहीं।

तुम्हारे
राजपथ उजले
हमारे
घर अँधेरे हैं

हमें दाता कहा जग ने
हमीं बुनियाद के पत्थर
गये सिंहासनों तक तुम कभी
कन्धे यही चढ़कर
तुम्हारी प्राण-ऊर्जा में
हमारे स्वर घनेरे हैं।

कुछ और गीतों की ये पंक्तियां भी:

खोज रहे हैं राम राज को
गलियों में भटके अँधियारे
….
मतलब जटिल सियासत के हैं
तुम समझे न हम जाने

भारौल में जन्मे राही जी भारौल को भूल नहीं पाये हैं। बचपन उनकी यादों में लौट-लौट आता है। अपनी भूमिकाओं में वे भारौल और आत्मीयजनों को याद करते हुए कहते हैं “कभी लौटकर एक झलक भी मिलेगी क्या उन दिनों की। कहाँ गये वे शहद घुले दिन, ख़ुशबुओं के गाँव?”

क्या फिर कभी
मिलेंगे हमको
खोये गाँव हमारे ?
झुरमुट – झुरमुट
निशा निमंत्रण
पात-पात पर पुलकन
नीड़-नीड़ में
गीत-लोरियाँ
उल्लासों की छलकन
कहाँ गये वे
चन्दा-सूरज
खोये साँझ सकारे ?

उन्हें भली-भाँति कविता और कवि का दायित्वबोध है।

जिसकी ढपली
राग उसी का
धर्म नहीं है कलमकार का
हमने जब ठाना मोड़ा है
मुँह उठता शातिर बयार का
अंत अंधेरों का निश्चित है
लिखता अरुण कथा उदयाचल

आपके गीतों से गुज़रना एक रोमांचक यात्रा सरीखा है। भाषाई प्रयोगधर्मिता ध्यान खींचती है
और बाज़ दफ़ा विस्मित भी करती है। मौजूदा राजनीति का दाग़दार चेहरा उनके गीतों में यों नुमायां होता है-

फेंको धूल
उछालो कीचड़
लाशों पर रोटियाँ सेंक लो
राजनीति का मर्म यही है

अथवा

थामे बैठे नब्ज़ समय की
देख रहे उड़ने के सपने
किसी देवता के पूजन में
याकि, किसी की माला जपने
खो जाएँगे किसी भीड़ में
झंडा-डंडा नारे लेकर
किसी अँधेरी पगडण्डी को
भटका हुआ अँधेरा देकर
लेकर एक भूख आये थे
तरसी प्यास, चले जाएँगे

राही जी देश की ऐसी तमाम मौजूदा परिस्थितियों के लिए जनप्रतिनिधियों और सत्ता संस्थानों की जनविरोधी सोच को बेबाकी से दर्ज करते हैं।

विश्व बन्धुता बातें केवल
मानवता पशुवत है
जीवित आदिम भूख-प्यास है
शेष सभी कुछ मृत है
स्वप्न धरे थे राम-राज के
नरक नये रचते हैं।

अथवा

सुख के पल दो चार
पीर के सिंधु अगाधे हैं
जितनी बार उमीदें बोयीं
पत्थर बरस गये
अंखुआती फसलों को देखे
दीदे तरस गये
राजा जी के तंत्र आँख पर
पट्टी बाँधे हैं।

आब-ओ-हवा के सम्पादक भवेश दिलशाद को दिये एक साक्षात्कार में वे अपना परम्परा विरोधी होना स्वीकारते हैं। वे अंधविश्वास और पाखण्ड से परे ही रहे। लेखन और जीवन में उन्होंने अपना डिक्शन गढ़ा। किसी लीक से बँधकर नहीं रहे। ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ उक्ति को वे जीवन में कुछ इस तरह साकार करते हैं।

जितने बड़े हुए पूजाघर
हुआ देवता उतना छोटा
भटक रहा है मनुज बिचारा
लिये हाथ में सिक्का खोटा
आँखें मूँद कर लिया करते
हम तो दर्शन वृन्दावन के।

उनके शृंगार गीतों की रूमानियत का अंदाज़ नवाचार की कई खिड़कियाँ खोलता है, वहीं साथी की सघन स्मृति के अनेक गीत भावुक करते हैं।

सुर्ख़ ओठ के पारिजात से
फूल चुने थे अँजुरी भर-भर
देह-गन्ध की छुअन ज़रा सी
रोम-रोम कम्पित थे थर-थर
अब इन पत्थर उंगलियों से
यादों के मनके हैं जपने

आपके गीत गेय हैं सो लयात्मकता से पृथक नहीं। भाव बोध के स्तर पर जीवन के समस्त आयामों को स्पर्श करते हैं। स्पष्ट है कि समय की त्रासद स्थितियों, सामाजिक विसंगतियों, आम नागरिक के जीवन की दुश्वारियों का यथेष्ट बोध तो है, पर कवि जीवन और उसकी तमाम दुरूहताओं से नाउम्मीद नहीं, निराश भी नहीं, न ही विमुख।

वे प्रतिरोध, जिजीविषा और प्रेम के संयुक्त कवि हैं। गीत में प्रेम कोई आयातित विषय नहीं। प्रेम है तो गीत हैं, गीत हैं तो प्रेम है। प्रेम अपनी कई भंगिमाओं के साथ इन गीतों में उतरता है।

यह गीत स्पष्ट करते चलते हैं कि उनकी गीत प्रतिभा ने लोक से ख़ुद को समृद्ध किया है। बहुत सँभव था कि स्थापित होते ही वे आत्ममुग्धता के ककून में स्वयं को सीमित कर लेते किन्तु संवेदनशीलता और गीत की ज़िम्मेदारियों के गांभीर्य बोध ने उनकी सोच और जिजीविषा को नयी और सुलझी दृष्टि दी जिससे आवश्यक साहसिक अभिव्यक्तियाँ गीत-दर-गीत दर्ज़ हुई हैं:

कुछ हमारी आस्थाएँ
कुछ हमारे ही करम हैं

नीतियाँ लँगड़ी हुई हैं
न्याय अंधा हो गया है
देश सेवा थी सियासत
आज धन्धा हो गया है
सिर्फ़ अपनी बात कहते
फेंक कर पतवार
बहती धार के ही साथ बहते
कब, कहाँ जाकर डुबाएँ
बावले इनके वहम हैं

या फिर:

धरी बाँसुरी जब भी हमने
तुमने फूँके शंख युद्ध के
सिर नीचा कर बैठे बापू
आँसू बहते रहे बुद्ध के
अन्धा न्याय मूक राजा था
पर पत्थर सच बोले!

वे धार्मिक और जातिगत जड़ता के शिकार नहीं। यहाँ स्पष्ट मान्यता है कि हर इन्सान समान है। तभी वे कह पाते हैं:

सभी एक हैं पंचतत्व से
फिर बैठे क्यों पीठ फेरकर

कोरोना काल के वीभत्स समय में अपने साथी सहित तमाम प्रियजनों की खोने की पीड़ा जब बिल्कुल हरी हो, कोई विशाल हृदय ही आगत का स्वागत हर परिस्थिति में कर सकता है। राही जी ने किया है, कुछ यों-

विकल मन प्राण हैं
बादल!

अभी तो घोर पीड़ा से
उबर पाये नहीं हैं हम
अभी भी सामने आतंक का
छाया हुआ है तम
लुटेरे ऑक्सीजन के
अभी भी मुक्त छूटे हैं
न कोविड के न फंगस के
अभी तक भरम फूटे हैं
मगर तुम आ गये, आओ!
हृदय से स्वागतम बादल!

बादलों की इन गीतों में आवृत्ति है। कहीं बादल ख़ुशी के बाइस बनते हैं, तो कहीं हाशिये पर पड़े आमजन की दशा पर चिंतित होने का सबब।

भोर की किरनें लजाती रह गयीं
धर गये मीठी फुहारें चुलबुले बादल

एक अन्य गीत की पंक्तियां हैं:

गरजे काले मेघ रात भर

हुआ सबेरा दिन भी निकला
फूटे अच्छे दिन के झरने
पीके फूटे उल्लासों के
पुलकाये मौसम के सपने
पर एकाकी पात डाल का
ओढ़े जो पीताम्बर बैठा
जाने किस आगत के भय से
लगा काँपता सा कुछ थर-थर।

जहाँ तक गीतों में मौलिकता की बात की जाये तो प्रतीत होता है कि मौलिकता यहाँ किसी तैयारी के साथ नहीं दर्ज हुई है। यह अपने नैसर्गिक रूप में उतरी और अंकित हो गयी है। डॉ. शिवबहादुर भदौरिया जी के इस कथन से यहाँ सहमत हूँ कि “गीत की रचना प्रक्रिया इतनी सशक्त और चुम्बकीय आकर्षण से युक्त है कि किसी व्यक्ति के चित्त को एक बार छू लेती है तो जीवन भर उसकी ओर खिंचाव बना रहता है। जीवन व्यवहार में बिना उसके ध्यान किये भी वह बनी रहती है।”

ये गीत तकनीकी अतिरंजनाओं के शिकार नहीं हुए हैं। जैसा परिवेश में पाया, इनमें दर्ज होता गया। ये गीत राही जी की क्षमता और गीत कुशलता के जीवंत दस्तावेज़ हैं।

रोज़ रुलाने आ जाता है
घाव एक गहरा

सड़कों पर दुष्कर्म पीड़िता
घृणित क्रूर मानवता
चीर-हरण में व्यक्त कर रहे
पौरुष की सक्षमता
बहुत हुईं बेशर्म हवाएँ
जन-मत अन्धा बहरा।

आपके प्रेम गीत दाम्पत्य प्रेम को एक बड़े कैनवास पर रचते हैं! इनमें दैहिक प्रेम के बनिस्बत आत्मिक राग-रागिनियों के रुचिकर स्वर हैं। यह सुखद है कि उनकी संवेदनशीलता समय के ताप में शुष्क नहीं हुई, इसीलिए उनके गीत जनधर्मी हैं। कवि की विचारधारा का सारा ज़ोर समाज को मानवीयता का पक्षधर होने और उसके साथ संगत देने का दायित्वबोध कराने पर है।

आज जब कुनियोजित तरीके से सामाजिक समरसता तार-तार कर दी गयी है। वैमनस्यता और धर्मान्धता का आलम यह है कि सर्वधर्म समभाव का मंत्र देने वाले देश में आज ही क्रिसमस के अवसर पर अप्रिय खबरें आतीं हैं। एअरपोर्ट पर महिला यात्री समुदाय विशेष के कर्मचारी से अभद्रता और अमानवीय तरीके से पेश आती है। एक नहीं ऐसे सैकड़ों दृश्य आज आम हो गये हैं। आदमी-आदमी पर पेशाब कर रहा है। न्यायालय में न्यायाधीश पर जूता उछाला जा रहा है। बलात्कारी बेख़ौफ़ घूम रहे हैं। खाप पंचायतें बेहूदे फ़रमान जारी कर रही हैं। जो होना चाहिए वही छोड़कर बाक़ी सब कुछ हो रहा है। डायन के नाम पर स्त्रियाँ और उनके परिवार ही फूँक दिये जा रहे हैं। बेशक यह सब अचानक नहीं हुआ। सत्ता के साथ-साथ आमजन की वैचारिक शून्यता भी इस परिदृश्य के लिए उत्तरदायी है।

राही जी “जब तलक हो जियो आदमी के लिए/जब मरो तो मरो आदमी के लिए’ जैसा विराट सोच का सूत्र थमाते हैं।

आदमी के लिए
मुक्त अधिकार दो।
बो रहे नफ़रतें प्यार के खेत में
मृग-तृषा ले
भटकते रहे रेत में
फिर वही सिर फुटौवल
मरे जा रहे
आदमी थे भले
क्या हुए जा रहे
भ्रांतियों को न यों और विस्तार दो।

टाँग कुर्सी की जो
हाथ में आज है
कल को होगी
किसी और की प्लेट में
यह बँगला
तुम्हारा जो अधिकार है
कल को घुसने न देगा
तुम्हें गेट में
सत्य है यह सियासत का स्वीकार लो।

कुछ नहीं है
हमारा तुम्हारा यहाँ
आज हैं हम यहाँ
कल को होंगे कहाँ
जब तलक हो जियो
आदमी के लिए
जब मरो तो मरो आदमी के लिए
देश को कुछ
यही श्रेष्ठ उपहार दो।

यतीन्द्रनाथ राही जी की छवि एक सीधे सरल साहित्यकार की है, उनके व्यक्तित्व में कोई पेंचोख़म नहीं। उनसे संवाद करते हमेशा यही महसूस किया कि सादापन कितना मौलिक, कितना मोहक होता है।

उनके यहाँ यथार्थ को प्रस्तुत करने का साहस है। वे नवगीतों के ज़रिये लोक को न सिर्फ़ नया परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं, बल्कि विस्तार भी देते हैं। इन गीतों के अनुभव का विशाल कैनवास है, समय की चुनौतियों से टकराने का अलग अंदाज़ और दृष्टि भी। वे इन गीतों के ज़रिये एक ईमानदार और जागरूक परिवेश रचने की कोशिश के साथ-साथ प्रतिरोध को ज़रूरी ज़मीन मुहैया कराते हैं।

अनामिका सिंह, anamika singh, ana

अनामिका सिंह

उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में वर्षों से सेवाएं दे रही अनामिका स्वभाव से साहित्य सेवी हैं और अपने काव्य कर्म के साथ ही समकालीन कवियों पर लेखन भी करती हैं। अनेक पत्र/पत्रिकाओं में गीत, ग़ज़लें, समीक्षाएं, लेख आदि प्रकाशित होते रहे हैं। गीत, नवगीत, दोहा और ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, साथ ही आपने 'आलाप', 'सुरसरि के स्वर' जैसे समवेत संकलनों और कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है।

2 comments on “यतींद्रनाथ राही: विशाल अनुभव, अलग अंदाज़ व दृष्टि

  1. आदरणीय यतींद्र नाथ राही जी के सृजन यात्रा का प्रभावी वृत्तचित्र प्रस्तुत करता हुआ सुंदर आलेख, राही जी और अनामिका जी आप दोनों को हार्दिक बधाई

  2. एक सचेत समर्थ रचनाकार को कई स्तरों का सामाजिक व्यवहार ही नहीं, वयस का समृद्ध विस्तार भी मिल जाय, तो उसकी अभिव्यक्तियाँ मानव समाज को किस तरीके संतुष्ट करती हैं, इसका सक्षम उदाहरण आदरणीय यतीन्द्र नाथ राही जी और उनकी रचनाएँ हैं। अनामिका जी आपने उनके बहुआयामी लेखन को म में ही भरसक तूने, समेटने का सुंदर प्रयास किया है।

    दादा राही जी को सौ वर्ष की आयु की सादर शुभकामनाएँ। उनका आशीष हमसब पर अनवरत बना रहे।

    सौरभ पाण्डेय

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