
- July 30, 2025
- आब-ओ-हवा
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नमिता सिंह की कलम से....
एक बार फिर सुधा अरोड़ा की कहानियों से गुज़रते हुए
हमारे समय की बेहद विशिष्ट कथाकार सुधा अरोड़ा का कुछ समय पहले प्रकाशित कहानी संग्रह ‘आमार नाम दमनचक्र’ मुझे मिला। इस संग्रह की लगभग सभी कहानियां समय-समय पर पत्रिकाओं में पढ़ती रही हूं। अपने समकालीनों में सुधा अरोड़ा मेरी प्रिय कथाकार हैं। वे छठे दशक से कहानियां लिख रही हैं और इस रूप में वे मुझसे सीनियर हैं। अपने इस स्तंभ में आम तौर पर मैं नये रचनाकारों की कृतियों पर चर्चा करती हूं लेकिन इन कहानियों से एक बार फिर गुज़रते हुए लगता है आज के संदर्भों में भी ये प्रासंगिक और अर्थवान हैं। सुधा अरोड़ा को भी ‘महिला कथाकार’ का तमग़ा देना उनकी दृष्टि और कृतित्व को छोटा करना है। मैंने हमेशा महिला कथाकारों को अलग श्रेणीबद्ध करने का विरोध किया है। मैं स्वयं भी ‘महिला कथाकार’ के रूप में अपनी पहचान नहीं करती। यह तमग़ा आपके सोच और दृष्टि को सीमित करता है और आपसे एक ख़ास तरह के लेखन की अपेक्षा की जाती है।
उनकी एक बेहद प्रभावी चर्चित कहानी ‘बलवा’ है। राजनीतिक पार्टियां अपनी सभाओं, रैलियों में भीड़ जुटाती हैं और सीधे सादे आदमी का क्या हश्र होता है, यह बेहद मार्मिक कहानी है। गांव से आये लोगों की भीड़ में एक सोनेलाल भी है, अपनी पत्नी और तीन साल के बेटे के साथ। एक बनियान और तौलिया, पांच रुपया फ़ी आदमी, मुफ़्त रेलयात्रा, दो दिन नाश्ता, खाना पानी! कलकत्ता शहर की सैर का लालच। रैली में बलवा होता है। पुलिस मारपीट! घायल सोनेलाल। उसकी जवान पत्नी, बेटा खो गये। शहर के प्रपंच में फंसा सोनेलाल अब पुलिस हिरासत में मरणासन्न है। यह है आज की तस्वीर। राजनीति और पार्टीबंदी के बीच ग़रीब आदमी की नियति। कहानी का एक-एक प्रसंग दृश्य चित्र के रूप में पाठक की चेतना को झकझोरता है।
एक अन्य यादगार कहानी है- आमार नाम दमनचक्र’। यह भी कलकत्ते के परिवेश में रची निम्न मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है। दीप्ति चक्रवर्ती और छोटा भाई दमन चक्रवर्ती। पढ़ने में ज़हीन। स्कूल वार्षिकोत्सव में ढेरों पुरस्कार जीतने वाले। दमन कलाकार बनना चाहता है। वह गिटार बजाता है। संगीत नाटकों का शौक़ीन। दूसरी ओर अभावों में जीता परिवार। बेरोज़गारी और हताशा से दमन चक्रवर्ती कैसे दमन चक्र में बदल जाता है? पूजा-पांडाल की सजावट का चंदा मांगने के बहाने वह ख़ूंख़ार अपराधी के रूप में रूपांतरित हो रहा है। यह अभाव और बेरोज़गारी से घिरे, संभावना वाले एक युवक की नहीं, पूरी एक पीढ़ी की कहानी है।
एक अन्य कहानी ‘काला शुक्रवार’ है। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में भी भीषण दंगे हुए। कुछ समय बाद फिर सिलसिला शुरू हुआ लगातार बम विस्फोटों का, जिनकी गूंज आज भी राजनीति के गलियारों में सुनायी देती है। इसी पृष्ठभूमि में ‘काला शुक्रवार’ उन भयावह स्थितियों और मानवीय त्रासदी का वर्णन करती है। ‘जानकी नामा’ कहानी भी उन्हीं त्रासद परिस्थितियों की कहानी है, जब इन्सान का वजूद केवल उसके नाम की पहचान तक सिमट गया था। तनावपूर्ण वातावरण के बीच किशोरी ज़ुलेख़ाा एक अन्य नाम जानकी धारण करने के बाद भी नहीं बच सकी।
मानव मनोविज्ञान के रेशे-रेशे अलग करती मध्यवर्गीय मानसिकता को सूक्ष्म विवरणों के साथ प्रस्तुत ढेर सारी कहानियों में ‘युद्धविराम’, ‘सात सौ का कोट’ और ‘तेरहवें माले से ज़िन्दगी’ विशेष उल्लेखनीय हैं। संभ्रांत इलाक़ों के पिछवाड़े झोपड़पट्टियां बनना, एक स्लम विकसित होना और फिर अरसे बाद उन पर बुलडोज़र चलना, आज महानगरों की पहचान बन गयी है। इसके बीच उजड़े परिवारों को देखकर बहुमंज़िला सोसाइटी की महिलाएं आश्वस्त हैं कि अब उन्हें काम वाली बाई मिल जाएगी।
‘दमन चक्र’ के समान ही एक अन्य कहानी ‘तानाशाही’ भी एक मध्यवर्गीय परिवार में आज के नौजवान पुत्र की कहानी है। नयी पीढ़ी के पुत्र को छोटे कस्बे में रहने वाले अपने पिता की कपड़े की दुकान ही नहीं, उनकी आदतों से भी परेशानी है। पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिल रही। ‘युद्धरत’ कहानी हिंदुस्तान-पाकिस्तान के संघर्ष के दौरान मुहल्लों में होने वाली हलचल तथा लोगों की मानसिक स्थिति का वर्णन करती है।
नये कहानीकारों के लिए ये कहानियां एक पाठ की तरह हैं। धैर्य के साथ सूक्ष्म विवरणों से बनता वातावरण और मानव मनोविज्ञान की भीतरी तह तक जाकर पाठक के साथ अर्थपूर्ण संवाद स्थापित करना… ये कहानी कला की पहचान बनते हैं। आज़ादी के बाद देश-समाज का रंग-रूप पिछले दशकों में जिस तेज़ी से बदला है, जाति-संप्रदाय की राजनीति जिन पड़ावों से गुज़री है, वह इतिहास की किताबों से भले ही ग़ायब हो जाये, साहित्य में अपने समय की धरोहर है।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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