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भवेश दिलशाद की कलम से....

सिगरेट... औरतें बदनाम और बाज़ार मालामाल

             जे.के. रॉलिंग की एक फ़ोटो इसी साल अप्रैल में चर्चा में थी, होंठों में एक ​सिगार दबा हुआ था और एक हाथ में कॉकटेल का गिलास चमक रहा था। तस्वीरों में कुछ लोग जाने क्या-क्या झांक लेते हैं! कुछ ने हल्ला कर दिया कि रॉलिंग कोई ड्रग्स ले रही हैं। रॉलिंग ने साफ़ किया कि सिगार है भई। फिर बात कुछ ख़ास आगे नहीं बढ़ी। रॉलिंग हिंदोस्तान में या यहां की पैदाइश वाली लेखक होतीं तो क्या वह विवाद की भेंट न चढ़ गयी होतीं!

सोशल मीडिया पर ​अब अरुंधति रॉय की उस तस्वीर पर हंगामा है, जिसमें वह सिगरेट पीती दिख रही हैं। यह फ़ोटो उनकी हाल ही जारी किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ के कवर पर एक मुलम्मे की तरह चढ़ायी गयी है। हुआ यह कि एक वर्ग विशेष ने ऐतराज़ जता दिया। हर तरफ़ तरह-तरह की बातें शुरू हो गयीं। सिगरेट पीने से सेहत को नुक़सान ही होता है; पुरुष लेखकों के सिगरेट पीने से तो कभी दिक़्क़त न हुई; किताब को बेचने के लिए प्रकाशक कवर को विवादास्पद बनाते हैं; भारतीय या कम से कम हिंदी पट्टी वाले समाज में अब भी महिला का सिगरेट पीते दिखना बड़ा मुद्दा क्यूं है… वग़ैरह वग़ैरह। यह कहना नामुनासिब नहीं कि इस तस्वीर को लेकर जो हंगामा खड़ा किया गया, उससे भी किताब कुछ ज़ियादा बिक ही गयी हो, गोयाकि यह कोई पब्लिसिटी स्टंट हो।

सिगरेट पीने वाली महिला लेखकों की यादें कम नहीं हैं। इधर, महिलाओं के सिगरेट पीने की दास्तान इतिहास में बड़ी दिलचस्प है। इत्तेफ़ाक़ यह भी कि इतिहास में जो दो ऐसी सबसे अहम कहानियां हैं, वो दरअस्ल विज्ञापन या मार्केटिंग स्ट्रैटजी की केस स्टडीज़ ही हैं। एक विदेशी सरज़मीन से है तो दूसरी हिंदोस्तान की मिट्टी से।

फ्रायड के भतीजे का कैंपैन

मार्केटिंग की मिसाल क़ायम करता क़िस्सा शुरू होता है 1920 के दशक में न्यूयॉर्क के माहौल से। पहला विश्वयुद्ध ख़त्म हुआ ही था। मशहूर मनोविश्लेषक​ सिग्मंड फ़्रायड के भतीजे एडवर्ड बर्नेज़ एक कारनामे से चर्चा में थे। उन्होंने वॉल्टर लिपमैन के साथ मिलकर इस तरह की सैद्धांतिक रणनीति बनायी कि अमरीकियों को यक़ीन दिला दिया गया कि विश्वयुद्ध में अमरीका की भागीदारी और भूमिका सकारात्मक बात थी। इस बड़ी कामयाबी के दौरान मनोविज्ञान के सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ, ‘इंजीनियरिंग ऑफ़ कन्सेंट’।

हुआ यह कि बर्नेज़ ने प्रमाणित कर दिया कि लोगों को प्रोपैगैंडा के ज़रिये प्रभावित किया जा सकता है। आलोचना के शब्दों में कहें तो उन्हें उकसाया या वरगलाया जा सकता है। अब उन्होंने विचार किया कि युद्ध नहीं बल्कि शांतिकाल में क्या यह मुमकिन है! 1920 के दशक में अमरीकी तंबाकू कंपनी ने जब उन्हें अपनी कैंपैनिंग का ज़िम्मा सौंपा, तब उन्होंने अपने सिद्धांत का व्यापक प्रयोग किया। ‘इंजीनियरिंग ऑफ़ कन्सेंट’ का सरल मतलब यह था कि “लोगों को संज्ञान दिलाये बिना अपने मुताबिक़ नियंत्रित और अनुशासित” करना मुमकिन है। बर्नेज़ का मानना ​​था मन के तार्किक हिस्से के बजाय, जनता के अचेतन को छेड़ना ज़रूरी है। एक तथ्य यह है कि बर्नेज़ के इस मनोविज्ञानी सिद्धांत की आधारवस्तु तक की आलोचना होती रही और एक तथ्य कि यह वही सिद्धांत था, जिसे औज़ार बनाकर जर्मनी में ‘फ़्यूहरर कल्ट’ चला, यानी यहूदियों के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक नफ़रत और हिंसा।

बहरहाल, अपनी इस प्रतिभा के दम पर तंबाकू कंपनी के लिए बर्नेज़ ने महिलाओं को धूम्रपान की तरफ़ खींचने, सिगरेट के उपभोक्ता के तौर पर उकसाने के मक़सद से एक कैंपेन डिज़ाइन किया और सिगरेट बन गयी ‘आज़ादी की मशाल’। पुरुषों के लिए तब अमरीका में सार्वजनिक धूम्रपान मना नहीं था, महिलाओं पर पाबंदी थी। इस कैंपेन ने बराबरी के हक़ और औरतों की आज़ाद-ख़याली का प्रतीक सिगरेट को बना दिया। कैंपेन में कुछ फ़ेमिनिस्टों को बतौर प्रचारक इस्तेमाल किया गया। महिलाओं को खुलेआम धूम्रपान को प्रेरित करते तरह-तरह के (भ्रामक सूचना वाले भी) विज्ञापन बने। सिगरेट को लेकर जितने टैबू थे, सबको तोड़ने की जैसे एक लहर चली। ईस्टर परेड से सड़कों और तंबाकू उत्पादों के चित्रों तक महिलाएं धूम्रपान करती दिख रही थीं। एक सिगरेट ब्रांड ने तो बाक़ायदा कार्यशालाएं कर महिलाओं को सिखाया कि धूम्रपान करते कैसे हैं।

आंकड़े बताते हैं आने वाले दशकों में लगातार महिला धूम्रपान का चलन बढ़ता ही चला गया। अमरीका के इस प्रोपैगैंडा को बाद में यूरोप में भी फैलाया गया। अब इंटरनेट पर खोजने से तथ्य मिल जाते हैं कि कई देशों में महिलाओं के धूम्रपान की परंपरा बहुत पुरानी रही है, लेकिन खुलेआम सिगरेट पीना तक़रीबन हर देश में महिलाओं के चरित्र का नकारात्मक पहलू ही समझा जाता रहा। बहुत-से देशों में तवायफ़ों या बदनाम औरतों को इस व्यसन से संबद्ध किये जाने संबंधी सामग्री मिलती है। भारत भी इन देशों में शुमार है।

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गौहर जान और गौहर-बे-बहा

महिलाओं के खुलेआम धूम्रपान को उकसाने के लिए विज्ञापन जगत की जो दूसरी दिलचस्प कहानी है, वह 19वीं सदी के कलकत्ता की है। 1873 में आज़मगढ़ में एंजेलिना यॉवर्ड की पैदाइश होती है। पिता आर्मेनिया मूल का और मां एक अंग्रेज़ सिपाही की बेटी। 1879 में एक मुस्लिम के साथ अंग्रेज़ महिला का रिश्ता बनना शुरू होता है और वह मलका जान नाम की तवायफ़ बनती है और एंजेलिना बन जाती है गौहर जान। अपनी मां से नृत्य और शास्त्रीय संगीत सीखकर बड़ी कामयाबी हासिल करती है गौहर जान। महफ़िलों, दरबारों में उसके मुरीद ही मुरीद। और वह कलकत्ते की सबसे चर्चित शख़्सियत का रुतबा रखती है।

इसके उलट, 1870 के दशक में बर्बाद हो रही दिल्ली में कारोबारी हाजी करम इलाही भी तबाह हो रहे थे। उनके छोटे भाई बख़्श इलाही ने तब कलकत्ते का रुख़ किया था और कुछ कारख़ानों में काम, नौकरियों करते हुए नया धंधा खड़ा करने के इरादे मज़बूत किये। 1850 के दशक में क्रीमिया के साथ जो जंग हुई, तबसे अंग्रेज़ सिपाहियों को सिगरेट पीने की जैसे लत लग गयी थी। और 1880 के दशक में आसानी से सिगरेट बनाने वाली एक मशीन भी आ चुकी थी। बख़्श इलाही ने तंबाकू आयात कर सिगरेट बनाने के धंधे की तरक़ीब सोची। बताते हैं 20वीं सदी शुरू होने से पहले वह कलकत्ते के सबसे अमीर कारोबारी बन चुके थे।

तंबाकू और सिगरेट के कारोबार में इलाही का सबसे बड़ा हथियार थीं गौहर जान। इलाही के सिगरेट ब्रांड का नाम ही ‘गौहर-बे-बहा’ था। सिगरेट के डब्बों, कार्डों, माचिस की डिबिया तक सब पर गौहर जान की तस्वीरें। कलकत्ते क्या पूरे बंगाल में देखते ही देखते यह सबसे मशहूर ब्रांड बन गया था। इस इतिहास के बारे में प्रोजित मुखर्जी के लेख पठनीय हैं, जो ऐतिहासिक तस्वीरें भी प्रस्तुत करते हैं। (गौहर जान की तस्वीर उन्हीं के ब्लॉग से साभार)

दिलचस्प है कि अमरीका में जो तमाशा 1920 के दशक में हो रहा था, वह भारत में क़रीब 25-30 साल पहले ही मज़ेदार चर्चा था। विज्ञापन का मायाजाल। फ़र्क यह कि अमरीका ने इस विज्ञापन जगत से बर्नेज़ को मनोविज्ञानी सिद्धांतकार के रूप में स्थापित किया, जबकि हिंदोस्तान में इलाही को एक दूरंदेश कारोबारी के तौर पर। वहां फ़ेमिनिस्ट आंदोलन को ऐसे कैंपेन से हवा मिली और यहां क्या कुछ हुआ, बहुत कुछ इतिहास में दर्ज ही नहीं है… मसलन क्या औरतें खुलेआम कलकत्ते में सिगरेट पीते दिखती थीं? क्या महिलाओं ने धूम्रपान को पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती के रूप में अपनाया था? ऐसे सवालों के जवाब अब भी शोध के विषय हैं।

सिगरेट और जेंडर

ख़ास तौर से बर्नेज़ की कहानी के विस्तार में जाते हुए ये आलोचनाएं सामने आती हैं कि महिलाओं की मनोभावनाओं के साथ मनोविज्ञानी स्तर पर खिलवाड़ किया गया। पितृसत्ता के विरोध, समानता और अधिकार के नाम पर उन्हें एक कमज़ोर प्रतीक के साथ साज़िशन संबद्ध किया गया। ताज़ा अरुंधति प्रसंग पर भी यह कहना ज़ियादती नहीं कि विज्ञापन का मायाजाल अब भी आत्मनिर्भर/कामयाब/आज़ाद-ख़याल महिला की छवि तराशकर मुनाफ़े के टूल्स तलाश रहा है।

सिगरेट पीने की इच्छा, धूम्रपान की स्वतंत्रता में कहीं लैंगिक असमानता की बात नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी ख़तरों की जागरूकता के साथ जिस तरह पुरुष इस व्यसन से ग्रसित हो सकते हैं, महिलाएं भी हो सकती हैं। रही बात साहित्य समाज की, तो मुक्तिबोध, फ़ैज़ अहमद फ़ैज या मोहन राकेश के धूम्रपान करते हुए चित्र यदि विवाद पैदा नहीं करते, तो अरुंधति हों या अन्य महिला लेखक, उनके ऐसे चित्र सामने आने पर भी धूम्रपान की नैतिकताओं, ख़तरों, तथाकथित संस्कारों आदि का ज्ञान उंड़ेलना निठल्लों के ही शग़ल हैं।

कुछ और क़िस्सों की तस्वीरें

अमृता प्रीतम सिगरेट पिया करती थीं। ‘रसीदी टिकट’ में दर्ज उनकी एक नज़्म है सिगरेट पर, जो उनके और साहिर के रिश्ते के साथ जुड़ी। इंटरनेट पर यही संदर्भ है कि अमृता स्मोकर थीं। उनके स्मोकर होने का सबूत मिलता है पंजाबी की लेखक अजीत कौर के लिखे रेखाचित्र से, उसमें उन्होंने अमृता के धूम्रपान की आंखों देखी दर्ज की है। हालांकि अमृता प्रीतम की कोई फ़ोटो ऐसी याद नहीं आती जिसमें वह सिगरेट पीते हुए मिली हों। लेकिन मुझे यह ज़रूर याद रहा कि कुछ बरस पहले दीप्ति नवल ने मंच पर जब अमृता का किरदार निभाया था, तब सिगरेट पीते उनकी एक तस्वीर ज़रूर थी। वह अब भी सोशल मीडिया पर उपलब्ध है।

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एक थीं साजिदा। कोविड के दौरान सोशल मीडिया के गलियारों में एक और तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपनी तीली से एक महिला के होंठों में दबी सिगरेट सुलगाते दिख रहे थे। हुसैन अयाज़ ने अध्ययन कर एक ब्लॉग लिखकर बताया, वह शायर साजिदा ज़ैदी थीं। शायरी के लिए तो मशहूर थीं ही, अपने बोल्ड, तरक़्क़ीपसंद मिज़ाज के लिए भी चर्चित थीं। इस तस्वीर को लेकर महिलाओं के धूम्रपान संबंधी बहुत विवाद शायद इसलिए न हुए कि तस्वीर दशकों पुरानी थी, बस एक याद थी। उर्दू की किसी समकालीन महिला लेखक की ऐसी तस्वीर आ जाये तो?

उर्दू की शायर फ़हमीदा रियाज़ के बारे में बातें हैं कि वह सिगरेट पिया करती थीं। हालांकि उनकी भी कोई फ़ोटो इस तरह की याद नहीं आती।

अमृता की नज़्म से मिलते-जुलते प्रतीक की एक कहानी उर्दू की प्रगतिशील लेखक जीलानी बानो के नाम से मिलती है, जिसका शीर्षक है ‘ऐशट्रे में सुलगता सिगरेट’। इस कहानी में वह औरतों की ज़िंदगी को इस रूपक में बांधने का जतन करती हैं। इसी कहानी के हवाले से बानो का स्मोकर होना भी आप कहीं न कहीं सुन ही लेंगे।

हिंदी-उर्दू पट्टी में किसी महिला लेखक का सिगरेट पीना अब भी भले ही सनसनीख़ेज़ मुद्दा है लेकिन वर्जीनिया वुल्फ़ से लेकर रॉलिंग तक कई समकालीन महिला लेखकों/कवियों तक, विदेशी नामों की बड़ी लिस्ट है, सिगरेट पीते हुए जिनकी तस्वीरें आसानी से मिलती हैं। इनमें विवाद नहीं विचार, बेबाकी और अदा खोजी जाती है।

(गौहर जान की तस्वीर कैलकटा बाय गैसलाइट ब्लॉग और साजिदा ज़ैदी व फ़ैज़ की तस्वीर हुसैन अयाज़ के ब्लॉग से साभार।)

(तमाम ख़तरों की सूचनाओं/जागरूकताओं के बावजूद जब तंबाकू उत्पादों के उत्पादन, विज्ञापन, सेवन, प्रदर्शन और वितरण पर कोई पाबंदी नहीं है तो यह लेख धूम्रपान के प्रचार का निमित्त कैसे हो सकता है!)

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

3 comments on “सिगरेट… बदनाम औरतें और बाज़ार मालामाल

  1. भवेश भाई बहुत मेहनत की आपने पर्दे उठाने में… समाज में बाज़ारबाद के प्रभाव का विस्तार किन बदरंग युक्तियों से हुआ और उसकी भेंट चढ़ाने के लिए किस वर्ग का चयन किया गया और कैसे इस्तेमाल किया गया चक्षु खोलने वाला है। बहरहाल इस लेख से दूसरों की जिंदगी के विवादित पहलुओं में झांकने का मौका मिला जिसकी हसरत हर शख्स के दिल में दबी रहती है।

  2. मार्केटिंग में मनोविज्ञान की पहुँच और अचेतन की ताकत, विज्ञापन जगत की कहानियाँ धूम्रपान की तस्वीरों के साथ बहुत दिलचस्प चर्चा है ।
    बहुत बढ़िया है।

  3. बाजारवाद के मनोविज्ञान के साथ साथ पोंगापंथी लोगों के मनोविज्ञान की बखिया उधेड़ने के साहसिक काम के लिए बधाई। आपका लेख रोचक तो है ही, आंखे खोलने वाला भी है।

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