
- September 14, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
पाक्षिक ब्लॉग राजा अवस्थी की कलम से....
कविता अपने समय को व्यक्त कर पा रही है?
मनुष्य सभ्यता के इतिहास में या कहें कि मनुष्य सभ्यता के विकास को प्रामाणिक रूप से सहेजने का काम कला ने किया है। कला के सभी रूपों ने यह किया है। वास्तुशिल्प से लेकर चित्रकला और गायन – वादन तक ने इसे सहेजा है। इन सभी कलारूपों को मुखर बनाने का काम साहित्य ने किया है। साहित्य शब्द के अन्यान्य अर्थों के साथ ‘सहित’ यानी ‘साथ’ भी उचित है। भित्ति चित्रों से लेकर शैलाश्रयों तक में जो मनुष्य जाति के जीवन और उसके विकास के चिह्न मिलते हैं, उनके साथ साहित्य ने न जाने कितनी कथाओं के माध्यम से उस समय को जीवंत किया है। वाल्मीकि कृत आर्ष रामायण में न सिर्फ राम का जीवन वृत्त है, बल्कि राम वनवास के बहाने एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र का और वहाँ की वनस्पतियों, नदियों, झरनों, वहाँ के निवासियों की जीवनचर्याओं का विशद और जीवंत वर्णन मिलता है। तुलसदास कृत रचनाओं में तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक दशा का वर्णन मिलता है। महाभारत इस मामले में एक बड़ा दस्तावेज है।
सवाल यह है कि आज जिस साहित्य का सृजन हो रहा है, क्या वहांँ किसी भी काव्यरुप में समय, देश और उसकी दशा अपनी समग्रता में कहीं भी आ रही है? उपन्यास इस मामले में कुछ समृद्ध हैं, किन्तु पिछले कुछ वर्षों के दौरान वहाँ भी बाज़ार की इच्छा को समझकर लिखे गए कुछ समझदारों की कृतियों की व्याप्ति बढ़ी है। कवियों ने अपनी-अपनी छोटी-छोटी लाइनें पकड़ रखी है और उसी लाइन पर यानी विचार पर अपना सारा रचनाकर्म कर रहे हैं। किसी समकालीन कवि या कथित समकालीन महाकवि के पास न वह समग्र दृष्टि दिखाई पड़ती है और न वैसा समग्रता की व्याप्ति से युक्त लेखन। आलोचना ने भी इसी तरह की खण्ड दृष्टि से ग्रस्तता को प्रोत्साहित किया और लगभग अपंग बनी रही। फिर भविष्य इस समकालीन समय को किस तरह मूल्यांकित करेगा? यह एक बड़ा प्रश्न है, जिसपर समकालीन कविता के धुरंधर विचार करने की मुश्किल कभी नहीं उठाएँगे। यह प्रश्न जितना समकालीन गद्य कविता के लिए है, उतना ही जरूरी छांदस कविता यानी गीत, ग़ज़ल और नवगीत के लिए भी है।
ऐसे में हमारे समय में लिखे जा रहे प्रत्येक काव्यरुप का संज्ञान लेना बहुत जरूरी है। प्रत्येक काव्यरुप और उसके कवियों, उनकी कविताओं पर बात करने से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कविता वस्तुत: अपने समय को कितना व्यक्त कर पा रही है। यद्यपि छोटे आकार की गद्य कविताओं, गीतों और मुक्तक छांदस विधाओं के चलन ने कहीं एक जगह पूरे समय, देश और दिशा की उपस्थिति की संभावना को समाप्त कर दिया है, किन्तु उपस्थित काव्यरूपों और कवियों पर इस दृष्टि से भी बात करना जरूरी है कि समकालीन साहित्यिक कर्म क्या भविष्य को अपने समय का प्रामाणिक और वास्तविक दस्तावेज एक न्याय और संवेदनशील दृष्टि की सम्पृक्ति के साथ सौंप रहा है।

राजा अवस्थी
सीएम राइज़ माॅडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कटनी (म.प्र.) में अध्यापन के साथ कविता की विभिन्न विधाओं जैसे नवगीत, दोहा आदि के साथ कहानी, निबंध, आलोचना लेखन में सक्रिय। अब तक नवगीत कविता के दो संग्रह प्रकाशित। साहित्य अकादमी के द्वारा प्रकाशित 'समकालीन नवगीत संचयन' के साथ सभी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय समवेत नवगीत संकलनों में नवगीत संकलित। पत्र-पत्रिकाओं में गीत-नवगीत, दोहे, कहानी, समीक्षा प्रकाशित। आकाशवाणी केंद्र जबलपुर और दूरदर्शन केन्द्र भोपाल से कविताओं का प्रसारण।
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समकालीन कविता का आम आदमी की ओर झुकाव तो है। आज की जटिल सामाजिक संरचना से जूझना, लोकतंत्र पर प्रश्न, सत्ता से टकराव, विपक्ष की मतलबपरस्ती,
संतुष्टि और संतृप्ति के दर्शन वाले देश में गाजर घास -सा छाया बाजारवाद, सभी कुछ टंकित है आज के साहित्य में। फिर भी बहुत अभाव सा महसूस होता है ।
इस रचना कर्म में कभी कहीं कोई हँसी-खुशी की रेखा पाठक को दिखाई देगी ?
आपकी व्यापक दृष्टि सही है कि समग्रता की व्याप्ति से युक्त लेखन दिखाई नहीं पड़ता।
साहित्य -समाज का ध्यान आकृष्ट करना इस ओर कि ” साहित्यिक कर्म क्या सौंपेगा भविष्य के समाज को इस पर विचार करना चाहिए ”
यह आपका प्रशंसनीय एवं विचारणीय लेखन है।
आपके सवाल मौजू हैं। पर मुद्दा यह है कि इसके लिए तटस्थ , निरपेक्ष, और प्रगतिशील विचार वाले लेखकीय प्रयास चाहिए जो इस अपसंस्कृति के दौर में (जो उपभोक्ता संस्कृति की देन है) में मिलना कठिन है। अगर कुछ साहित्यकार हैं भी तो वे किनारे कर दिए गए हैं।